An illegally produced distilled beverage.


February 26, 2010

1411 बाघ और 11 हिंदी चिट्ठा चिन्तक

कल रात को पीने के लिए वोदका का एक पैग ही बचा था। रूस की इस देसी शराब को मैं ज्यादा पसंद नहीं करता हूँ. आधी रात होते ही उतर जाया करती है फिर भांत - भांत के बेहूदा सपने देखते हुए सुबह हुआ करती है. आज विस्की के बारे में सोच रहा हूँ।

चौदह
सौ ग्यारह बाघ और सिर्फ ग्यारह हिंदी चिट्ठा चिन्तक... ? कूट शब्द 1411 के तहत बाघ को समर्पित पोस्ट्स में ग्यारह प्रविष्ठियां दिख रही है। सोचता हूँ किसके बारे में चिंता की जाये ? बाघ या फिर उन के बारे में जो दिन में चार पोस्ट लिखते हैं और चेतना - चूतना की बातें किया करते हैं। जिन्होंने चिट्ठे को भी सोशियल नेटवर्किंग बना दिया है।


बाघ मैं तुम्हारे लिए विस्की के दो पैग बचा कर रखते हुए, ये टुच्ची पोस्ट तुम्हें समर्पित करता हूँ. तुम दूर दूर तक घूमते हुए हर पेड़ पर अपने मूत की विशिष्ट गंध छाप लगा कर अपना इलाका चिन्हित करते रहो. घबराओ मत अपनी संख्या को लेकर विलुप्त तो डायनासोर और जाने क्या क्या हो गए. आज अगर एक डायनासोर रात भर के लिए मेरा मेहमान हो जाता तो वह दो साल पीने जितनी शराब अकेले गटक जाता. मैं इस खातिरदारी में बरबाद हो जाता.

डार्विन
साहब की जयकार करते रहो समय बदलेगा तो पारिस्थितिकी तंत्र को भी बदलना ही पड़ेगा और जो फिट है वह सरवाईव करेगा. दुनिया के लंबरदारों के पास बढ़ते तापमान में लोगों के लिए सहानुभूति भी नहीं है फिर तुम तो यार जानवर हो. इसलिए दो पैग लेकर सो जाया करो।


February 20, 2010

बाराती पीकर झूमें तो अच्छा है या सांसद को फोन करे तो ?

मेंबर पार्लियामेंट को रात बारह बजे के बाद एक पिया हुआ मतदाता फोन करके यह कहे कि आपकी याद आ रही थी. उसको कैसा फील हुआ होगा ?

मौसम में ख़ास तब्दीली नहीं थी ठंडी हवा चल रही थी। अहमदाबाद जाने वाले हाईवे के पास नयी आबादी में चहल पहल थी. १६ फरवरी को शादी का बड़ा मुहूर्त था. आने वाले महीनों में कम ही सावे थे तो सब सेटल हो जाने की जल्दी में थे. एक साधारण सा दिखावटी कोट पहने हुए आप थोड़ा परेशान हो सकते हैं किन्तु कार में बैठ जाने के बाद वही कोट गरम अहसास देने लगता है. घर से दस गली के फासले पर खड़ी इस शादी में कौतुहल कुछ नहीं था. संचार क्रांति के बाद कोई ऐसी ख़ास प्रतीक्षित अनुभूति का रहस्य भरा रोमांच, दूल्हा - दुल्हन और बाराती - घरातियों में शायद ही बचा होगा. मुझे लगा कि ये तकनीक का अत्याचार है. इसी उधेड़बुन में मेरे सेल फोन ने सूचित किया कि तीसरी गली में एक कार खड़ी है जिसमे तीन लोग वेट ६९ कि बोतल के साथ इंतजार कर रहे हैं. ओह ! टेक टूल्स तुम भी कभी कितने काम आते हो.

रात के ग्यारह बज कर चालीस मिनट पर चाँद आसमान के बीच था। शराब ला... शराब ला के नारे मन से उठते हुए झाड़ियों के तले फैले हुए अँधेरे में सरकते हुए गुम हुए जा रहे थे. मैंने कई औपचारिक दुआ सलाम का जवाब दिया. कार की सीट्स के नीचे फंसे हुए पांवों में शराब से मिट रही हरारत का असर पंहुच रहा हो तो इस अनुभव को बताने के लिए आप किस के शब्द उधार लें, ये सोचना भी मुश्किल काम है. मैं अक्सर अपने पीने के ज्ञान को उपयोग में लेते हुए सेल फोन को पीना शुरू करते ही ऑफ कर दिया करता हूँ. हमेशा ऐसा ही होता है कि पीने के बाद उमड़े हुए प्यार की घटाओं को बर्दाश्त कर पाना आपके भूले बिसरे हुए प्रेमी के लिए बहुत मुश्किल काम होता है. ये मुई शराब है ही ख़राब कि ऐसे ऐसे लोगों की याद दिलाती है जिनको चेतन में आप दफ़्न कर चुके होते हैं और पीते ही उनके चेहरे आकर लेने लगते हैं.

मेरे तीसरे पैग के बाद मुझे याद नहीं आया मगर साथ बैठे मित्र ने कहा आपका फोन दो. मैंने उसे ऑफ नहीं किया था और यकीनन मेरे फोन नंबर हमारे सांसद के पास नहीं रहे होंगे ये सोच कर फोन दे दिया. ज़मीन पर उगी हुई कांटेदार झाड़ियों और गमले में खिले गुलाबों का कोई रिश्ता नहीं होता. देश की राजनीति में युवाओं को आने का आह्वान किया जाता है मगर सब जगह हालात एक से ही हैं. वंशवाद की बेल पोषित है, बचा हुआ सामान उजड़े हुए किलों की ढहती हुई दीवारों से आ रहा है. इनसे अलग कोई संसद और विधान सभा तक आ रहा है तो वह अपराध और धन की ताकत से. ऐसे किसी व्यक्ति को फोन करना मेरे लिए शर्म की ही बात है फिर भी एक नए चुने गए सरपंच और एक जिला परिषद के सदस्य के साथ बैठे, बहके हुए मित्र ने मेरे फोन से सांसद महोदयको कॉल करके मुझे ही फोन दे दिया. मैंने कहा कि आपकी याद आ रही है इसलिए फोन किया है बाकी बात आप इस मित्र से करो कहते हुए फोन वापस पकड़ा दिया.

रात ख़राब हुई। सुबह भी ख़राब. दिन भी ख़राब. शाम भी ख़राब. सही कुछ नहीं था मगर मेरे मित्र जो कल फोन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि भाई साहब एक मतदाता पांच साल में एक बार तो पीकर अपने सांसद को फोन कर ही सकता है. आज अगर उसका फोन वापस आये तो आप चिंतित होना... ये उनकी कूटनीतिक समझ थी, ठीक ऐसा ही हुआ कि मेरी चिंता जाती रही. दो दिन तक सांसद महोदय का फोन नहीं आया.

सियासत अल्टीमेट है यानि पैसा आते ही पॉवर की भूख जाग जाती है और सिर्फ बिछी हुए चौसर के पासों को याद रखा जाता है। साल चौरानवें में एक मित्र की शादी में जयपुर के पास बस्सी जाना हुआ. प्रीतिभोज स्थल के मुख्य द्वार पर एक लग्जरी क्लास की स्पोर्ट्स कार से कुछ नौजवान उतरे. उनकी एंट्री किसी फिल्म के महानायक सदृश्य थी. पाखंड और आडम्बर से भरा उनका प्रदर्शन शायद बारातियों के लिए गर्व हो. उनके हाथ में दुनाली बन्दूक थी. कमर पर एक रिवाल्वर भी लटक रहा था. उनका नेता राजस्थान विश्व विद्यालय का पूर्व अध्यक्ष था और आज वह राज्य विधान सभा का सदस्य है. जय हो दुनालीतंत्र की लेकिन पिछले राज्य विधान सभा के चुनाव में पहली बार एक बी पी एल चयनित युवा एम एल ए चुना गया यही मुझे आशान्वित करता है. उस सदस्य के साथ जयपुर के फुटपाथों पर मैंने चाय पीते हुए कई दिन बिताये हैं. वे हौसले के दिन थे. अब महज पीने के दिन हैं. नियम से पीने के.

मुझे अभी भी अफ़सोस है और उम्मीद भी कि अगली तीन चार रातों के बाद ये असर कम हो जायेगा. भारत का लोकतंत्र अमर रहे. दुकाने सजी रहें.

February 9, 2010

स्फिंक्स, कई मौसम बीत गए हैं ढंग से पीये हुए.

जिन चीजों को आप सीधा रखना चाहते हैं वे अक्सर उल्टी गिरती हैं. आईने हमेशा खूबसूरत अक्स की जगह सिलवटों से भरा सदियों पुराना चेहरा दिखाया करते हैं. किस्मत को चमकाने वाले पत्थरों के रंग अँगुलियों में पहनेपहने धुंधले हो गए हैं तो मैंने उन्हें ताक पर टांग दिया है. अफ़सोस ज़िन्दगी से ख़ास नहीं है. कुछ लम्हें तुम्हारे लिए रखे थे वे बासी हो गए हैं और कुछ आंसू पता नहीं किसके लिए हैं जो मेरी आँख से बहते रहते हैं. मेरा अधोपतन तीव्र गति से हो रहा है ऐसे संकेत मिल रहे हैं. पिछले साल दो बार ही "की बोर्ड " पर अंगुलियाँ चलाने का सामर्थ्य जुट पाया था. जिंदगी में जो बची हुई दोस्त थी. उनमे से एक से सम्मुख विवाद के बाद स्यापा मिट गया है और एक तर्के-ताल्लुक पर कब से ही आमादा है.

जैसे दिन हैं
शाम भी वैसी ही निकली. सात महीने बाद टी वी चलाया तो स्टार न्यूज़ पर अद्भुत रिपोर्ट देखी. सदी की महानतम लापरवाही अब तक मैं कोपेनहेगन शिखर सम्मलेन को मान रहा था. कल मालूम हुआ कि वह इसके आगे कुछ नहीं कि सहवाग पहली पारी में सौ रन बना कर देशद्रोही हो गया था और उसने अगली पारी में खुद को स्वात घाटी में बैठे हुए किसी कठमुल्ले का प्रतिनिधि साबित किया. ख़बर ने मुझे व्यथित कर दिया. देश पर मंडरा रहे संकट के जिम्मेदार को पहचान तो लिया गया है मगर अभी भी कई दशकों से राष्ट्रद्रोही ख़ुशी से हैं तो सहवाग को दंड शायद ही मिल पाए. ये खेल कितने हज़ार करोड़ का कारोबार है ? कौन चलाता है ? मिडिया को कितना मिलता है ? इस खेल की नियामक संस्था से भारत सरकार का कोई लेना देना ? फिर ये किस देश के लोग हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं ? स्टार न्यूज़ जैसे कितने चेनल हैं ? ऐसे सवालों ने शाम खराब कर दी. तीन पैग लिए तब जा के गाड़ी ने फिर से स्टार्ट लेना शुरू किया. फ़िराक साहब हँसते खेलते महफ़िल में आते और दो घूँट लेकर संजीदा हो जाया करते थे किन्तु मैं आराम में जाता हूँ.

सवाल ये भी दिमाग में आता है कि गरीब आदमी को इस धरती पर बहुत कोसा जाता है. बिलगेट्स ने कहा था या नहीं पर मेरी जितनी ही औकात वाले एक एस एम एस को फोरवर्ड करते रहते हैं "गरीब पैदा होना आपका दोष नहीं है पर गरीब मरना..." गरीब दारू पीकर मर जाता है, फिर वो कौनसा द्रव्य है जिससे अमर हो पाए ? लालची और शोषक राजे महाराजे नहीं बचे, महल और हवेलियाँ नहीं बची तो गरीब भी क्या ? मेरे साथ एक अलवर के सज्जन काम करते हैं. उनको सब यादव साहब कहते हैं. बाईस साल से पी रहे है. कुल्ला भी उसी से करते हैं. कमज़र्फ बेअसर शराब, नालायक शराब, बदजात शराब और ये चोर कम्पनियाँ... लेकिन, आपको क्या लगता है कब तक जियेगा ? वैसे इन दिनों वह पिया हुआ नहीं होता है तब सूखे तिनके सा हिलता रहता है.

शराब के कसीदे पढना वस्तुतः अपने मानसिक कुपोषण के पोषण का प्रयास मात्र होता है फिर भी मैं एक जिम्मेदार आदमी हूँ, मन हो तो कई दिनों तक नहीं पीता लेकिन जब अफ़लाक से ही जाये तो रात से पहले मैं खुद जवान होने लगता हूँ, कई सारे दुःख दर्द हल्के हो जाया करते हैं, मन में क्षमा भाव बढ़ जाता है, किसी दब्बू की भांति किये गए व्यवहार को फिर से ना दोहराए जाने का हौसला जाता है, मुहब्बत जाग उठती है, सराही और ठुकराई गयी सब स्त्रियाँ, भोगे और भगाए गए सब सुख याद आते हैं और रोने को जी चाहता है. त्रुटियों के पक्ष में नए तर्क हाजिर होने लगते हैं. कल दिन भर जिसे "लुकिंग हॉट" कह कर मन पछताता रहा, उसके समर्थन में कई तस्वीरें बनने लगती है. सुंदर है तो है... कहना पहले भी अपराध था और आज भी है. पहले भी होता था और आज भी हो गया. अब हर कोई चमचूतिया, कविता तो नहीं कर सकता ना...

कविता ना कर पाने का कोई गिला नहीं है मगर इस अजब समय में ग्रीक पौराणिक कथाओं के दानव स्फिंक्स की तरह इस दुनिया का हर इंसान पहेलियाँ पूछता है और उत्तर ना दे पाने वालों का गला घोंट देने को वचनबद्ध है. ढंग के लोग और दिन दुनिया में बचे ही नहीं हैं. दोस्त बाबू लाल तेरी याद रही है, कितने ही दिन हुए है दुनिया को सर से उतार कर पिए हुए.

डरते हैं बंदूकों वाले