An illegally produced distilled beverage.


August 16, 2010

ब्रिटनी मर्फी और ये याद का टीला

पानी के बह जाने के बाद रेत पर जानवरों के खुरों के निशान बन आये हैं. उन्हीं के साथ चलता हुआ एक छोर पर पहुँच कर बैठ जाता हूँ. सामने एक मैदान है. थोड़ा भूरा थोड़ा हरा. शाम ढलने में वक़्त है. ये विक्रमादित्य का टीला नहीं है, ये किसी प्रेयसी की याद का टीला है. यहाँ से एक काफिला किसी सुंदरी को जबरन लेकर गुजरा होगा. वह कितनी उदास रही होगी कि पूरे रस्ते में वही अहसास पीछे छोड़ गई है. मैं भी अक्सर चला आया करता हूँ. मैं अपने साथ कुछ नहीं लाता. पानी, किताब, सेल फोन जैसी चीजें घर पे छोड़ कर आता हूँ. मेरे साथ कई दिनों के उलझे हुए विचार होते हैं. मैं उनको रेत की सलवटों पर करीने से रखता हूँ.

रेत की एक लहर से आकर कई सारी लहरें मिल रही हैं. इन्हीं में एक ख्याल है साईमन मार्क मोंजेक का, वह उसी साल दुनिया में आया था जिस साल मैंने अपनी आँखें खोली थी. मैं इस समय रेत के आग़ोश में किसी को सोच रहा हूँ और वह होलीवुड की फोरेस्ट लान में बनी अपनी कब्र में दफ़्न है. वह बहुत ख्यात आदमी नहीं था. उसने दो तीन प्रेम और इतनी ही शादियाँ की थी. इसमें भी कुछ ख़ास नहीं था कि उसने कुछ फिल्मे बनाई, निर्देशन किया और स्क्रिप्ट्स लिखी. वह लन्दन में पैदा हुआ बन्किंघम्शायर के लम्बे चौड़े खेतों के बीच में स्कूल के रस्ते को याद रखते हुए पंद्रह साल की उम्र में अपने पिता को खो बैठा. उसे टेलीविजन से प्रेम हो गया था. वह अपने ख़यालों में इसे एक अद्भुत दुनिया मानता था. उसी में जाकर बस गया. वहां से उजड़ा तो अमेरिका चला गया.

मैं ऐसे पात्रों को बहुत पढ़ता और जीता आया हूँ जिन्होंने प्रेम किया, देह का उत्सव मनाया, तूफ़ान में पतंग की तरह आसमां की ऊँचाई को छुआ और सात आठ साल काम करके पैंतीस साल की उम्र से पहले मर गए. कैसी उदासी है मेरे भीतर कि जापान के टोक्यो शहर की एक गली में बाईस साल के नौजवान चार्ट बस्टर सिंगर की मृत्यु को नहीं भूल पाता. जाने क्यों ऐसे ही आम और खास लोगों की जीवनियाँ और आत्मकथाएं ढूढता फिरता हूँ. उन्हें सहेज कर रखता हूँ. रात को जब पीता हूँ तो उन्हें वाइन भी ऑफ़र करता हूँ.

साईमन की मृत्यु अभी दो महीने पहले ही हुई है. उस दिन मुझे ख़बर नहीं हुई. अगले दिन प्रधानमंत्री जी की प्रेस कांफ्रेंस थी तो उस पर लिखने लग गया था फिर कई दिनों तक मुझे ब्रिटनी मर्फी जैसी खूबसूरत महिला की याद नहीं आई. मैंने शराब को भी नहीं चखा. मैं एक कहानी लिखने लगा. कहानी को इम्प्रेशन से बचाने के लिए कहीं घूमने भी नहीं गया. यानि मैंने ब्रिटनी और साईमन से खुद को बचा कर रखा. कल जाने क्यों उन्हें भुला नहीं पाया. सोचता रहा कि जिस लड़की को उसका पिता दो साल की उम्र में छोड़ जाए और उसकी माँ उसके एक इशारे पर जान देने जितना प्यार करते हुए पाले. वह एक दिन फिल्मों की चका चौंध में चहेता नाम बन जाये और दूसरी शादी के बाद अवसाद में चली जाये. कितना तेज कदम सफ़र है ज़िन्दगी का...

पिछले साल दिसंबर में ब्रिटनी मात्र बत्तीस साल की उम्र में मर गई. उसकी मृत्यु के कारण बताये गए थे कि वह बहुत अधिक एनीमिक हो गई थी और हृदयाघात को सहन नहीं कर पाई. मुझे बहुत अफ़सोस होता है कि इस दो साल के विवाहित जीवन में अपनी माँ और पति के साथ रहते हुए भी ब्रिटनी को किस चीज की कमी थी कि उसने कोकीन जैसे पदार्थ का सहारा लिया. हालाँकि अमेरिकी चिकित्सा विभाग इस बात की पुष्टि नहीं करता मगर ये सच है कि उसने अत्यधिक मात्र में नशीले पदार्थों का सेवन किया और दो महीने में ही चालीस पौंड से अधिक वजन खो दिया था.

मुझे पश्चिम की जीवन शैली और उसके जीवन पर प्रभावों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं है. उनकी क्या खूबियाँ और क्या खामियां है नहीं जानता मगर इतना समझ आता है कि भारतीय जीवन शैली मेरे जैसे अवसाद प्रेमी को बचा कर रखने में कामयाब है. अपने रचे गढ़े गए अफसोसों के साथ रहते हुए मुझे कभी इस तरह से जीवन को समाप्त करने का विचार नहीं आया. मैं हर बार ऐसे दौर को जी भर के जीते हुए आगे बढ़ा हूँ. कल भी सोच रहा था कि जिस दुनियां में शादियाँ और प्रेम क्षण भंगुर हैं वहां आखिर ऐसा क्या था कि मर्फी के जाने के बाद साईमन पांच महीने से अधिक जीवित न रह सका. उसने भी ब्रिटनी की तरह अपने जीवन का अंत क्यों कर लिया ? और वह ब्रिटनी की माँ जिसने दूसरी शादी ही नहीं की... अभी भी उस घर में कैसे रहती होगी ? किस ह्रदय से उसने पांच महीने के अंतराल में दो बार इमरजेंसी को फोन कर के बताया कि कोई मरने वाला है और वे सच में चले गए.

तुम भी बिना मिले मत जाना किसी से... मेरे जैसे लोग उनके लिए भी दुआ करते हैं जिनको कभी देखा ही नहीं...

August 9, 2010

क्रश... क्रश... क्रश.. काश, लोबान की गंध से बचा रहूँ.

आसमां में बादलों के फाहे देखता हूँ और कमरे में अपने वजूद की तरह बिखरी बिखरी चीजें. म्यूजिक सिस्टम के स्क्रीन पर वेव्ज उठ कर गिर रही है. लोक संगीत के सुर बज रहे हैं. रात में रीपीट मोड में प्ले किया था. तीन बजे के बाद शायद दीवारों ने सुना होगा, मुझे नींद आ गई थी. इन दिनों में व्यस्त भी बहुत हूँ और खुश भी तो याद आता है कि ऐसा ही दस साल पहले भी था. उन सालों में ज़िन्दगी ने मुझे एक साथ कई वजीफे दे रखे थे. मैं जिधर देखता था मुहब्बत थी. एक सुबह राजेश चड्ढा ने कहा 'चलो, आपको लैला - मजनूं की मज़ार दिखाते हैं.' वो रेत का दरिया ही था, जिसमें से हम गुजर रहे थे. कोई एक सौ किलोमीटर से भी ज्यादा पाकिस्तान की तरफ चलते रहने के बाद हम गाड़ी से उतर गए. मेरे कदम जिस तरफ बढ़ रहे थे, उसी तरफ से लोबान की गंध तेज होती जा रही थी.

मैंने लैला मजनूं का किस्सा बचपन में सुना था. मेरी स्मृतियों में मजनूं अरब देशों के रेगिस्तान में भटकते हुए मुहब्बत की फ़रियाद करता था. उस दिन अचानक मैं उसकी मज़ार के सामने खड़ा था. मुझे नहीं मालूम कि उन दो मज़ारों का सच क्या है किन्तु वहां से लौटते ही मैं अगली रात की गाड़ी से चार सौ किलोमीटर दूर जयपुर चला गया. लोबान की गंध अब भी मेरे साथ थी. वहां मैंने उसको खोया जिससे में डूब कर मुहब्बत करता था. उसे खो देना जरूरी था फिर चार छः महीने तक शराब पीता रहा. एक दिन सरकार ने मेरा स्थानांतरण रेत के ही किनारे मेरे अपने घर में कर दिया. यहाँ आते ही सब ठीक लगने लगा लेकिन कुछ ही दिनों में वही हाल हो गया. याद के तपते मौसम में मुझे लोकगीतों से राहत हुई. सुना और सुना... बस सुनता गया.

पिछले कुछ सालों से 'जिप्सी म्यूजिक' में सबसे मीठी आवाज़ मुझे गफूर खां मांगणियार की लगती है. वह साल दो हज़ार की एक खिली हुई दोपहर थी. गफूर ने मेरी ओर देखा और हाथ से इशारा किया. जिसका अर्थ था कि वो मुझे कुछ सुनाना चाहता है. मैंने उसे रोक कर कहा गफूर आज साज़ रहने दो और मूमल सुना दो. उसने कहा बिना साज़ के ? हाँ, मैं जानता था कि वह खालिस गायक है इसलिए दिल से गा ही लेगा. उसने गाया...

उसी का एक टुकड़ा आपको भी सुनाता हूँ.
ढोला तुम्हारे देस में मैंने तीन रतन देखे हैं, एक प्रियतम दूसरी उसकी प्रिया तीसरा कुमकुम के रंग का नौजवान ऊंट. ओ प्रियतम सावन के महीने की पहली तीज से भी जल्दी घर आना, तुम्हारी ये प्रिया डरती हुए कहती है जल्दी से घर की ओर मुडो. मूमल, रंग महल में खड़ी अपने केश सुखा रही है और बियाबान में एक तनहा खड़ा पेड़ दिन दिन सूखता ही जा रहा है. सांवले रंग की काजल की रेखा की तरह भूरे क्षितिज पर महल की बुर्जों के पार बिजली चमक रही है.. ओ ढोले की मूमल आओ, चलो तो तुम्हें मरुधर देस ले चलूँ. मूमल का सिर अखंड नारियल सा गोल है और उसके बाल विषधर नाग से हैं. ओ ढोले की मूमल आओ, चलो तो तुम्हें मरुधर देस ले चलूँ...



August 3, 2010

धोधे खां की बकरियां और विभूति नारायण राय

इस रेगिस्तान में जन्मे धोधे खां की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है. वे एक बहुत दुबले पतले और पांच वक़्त के नमाजी इंसान है. उनके पास जो संपत्ति है. वह एक झोले में समा जाती है. जो नहीं समा पाता वह है बकरियों का रेवड़ और कुछ किले ज़मीन. उन्होंने राजीव गाँधी की शादी में अलगोजा के स्वर बिखेरे थे. उनका मानना है कि इस संगीत को सुन कर इंदिरा गाँधी प्रसन्न हो गई थी. उन्होंने अपने हाथ से कुछ सौगात भी दी थी. भले ही अलगोजा जैसा वाद्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में शहनाई जितना उचित सम्मान न पा सका हो लेकिन उन्हें फ़ख्र है कि दिल्ली एशियाड का आगाज़ अलगोजा के स्वर से ही हुआ था.

मैंने जाने कितने ही घंटे उनके अलगोजा को सुनते हुए बियाते हैं. वे मेरी ज़िन्दगी के सबसे सुकून भरे पल थे. वह ख़ास कलाकार इतना सहज है कि रिकार्डिंग स्टूडियो और बबूल के पेड़ की छाँव में फर्क नहीं करता. इसीलिए मैं उसका मुरीद भी हूँ. मैंने बहुत नहीं तो कुछ नामी कलाकारों के पास बैठने का अवसर पाया है लेकिन इस सादगी को वहां नहीं पा सका. धोधे खां ने दुनिया के पचास से अधिक देश देखे होंगे और वहां के लोगों का प्यार पाया होगा. उनकी गहरी आँखें हमेशा उस अदृश्य सर्व शक्तिमान के रोमांच से भरी रहती है.

धोधे खां बातूनी है या नहीं कह नहीं सकता मगर मैंने उनके साथ लगातार तीन - तीन घंटे तक कई बार परिवार, कला और कला से जुड़े अनुभवों और समाज के बारे में बातें की है. दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्क आकाशवाणी के राष्ट्रीय कार्यक्रम संस्कृति भारती के लिए उन पर आधारित एक लघु रूपक भी बनाया था. इस कार्यक्रम के निर्माण से पहले भी कई बार मैं उनके गाँव में बकरियों के रेवड़ के बीच बैठ कर अलगोजा सुनता रहा और वे हर बार आल्हादित होकर, हर एक रचना के बाद अपने रचयिता ईश्वर का आभार व्यक्त करना नहीं भूलते.

धोधे खां से अलग होकर मैं शाम होते ही कुछ और कलाकारों के साथ बैठ जाता तो अगले दिन वे मुझे अपने बच्चे की तरह समझाते "अल्लाह ताला ने हमें ये शरीर दुनिया की बेहतरी के लिए दिया है, और आप साहब इसको शराब से ख़राब कर रहे हैं, क्या जवाब दोगे...?" मेरा ये बेटा... ऐसा कहते हुए वे अपने मंझले बेटे की और देखेते हुए कहते हैं "इसने बीड़ी पीनी शुरू की है, मुझ से छुप कर पीता है ... अभी से सांस फूलती है... मूजिक की बजाई एक दिन ख़त्म हो जाएगी. इसकी सांस फूल जाती है और मेरे को देखो पैंसठ साल की उम्र में राग प्रभाती को तीन बार बजा लेता हूँ..."

खैर धोधे खां साहब को याद करने का कोई इरादा नहीं था. वह तो कल रात को बरसात की हल्की फुहारें लगातार पड़ रही थी.बच्चे खाना खा के सो चुके थे और वायदे के हिसाब से पत्नी को भी मेरा इंतजार नहीं था तो मैं छत पर बैठ कर कोई सात आठ दिन बाद शराब पी रहा था. दिन को दो तीन मित्रों के फोन आये वे सब बड़े ही व्यथित थे कि विभूति नारायण राय जैसे आदमी ने कैसा स्टेटमेंट दिया है. उन्होंने स्त्री लेखिकाओं को छिनाल कहा है. उन्होंने एक समूह के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है. ऐसे ही या इसी अर्थ के उनके सवाल थे तो मुझे धोधे खां की याद आ गई.

धोधे खां की याद इसलिए कि वे हर बात में अपने कान पकड़ते हुए अल्लाह तौबा का उच्चारण करने की आदत रखते हैं दूसरा ये कि उनकी बकरियां अभी तक मौका मिलते ही अलगोजा को चबाने को आतुर रहती है. इसलिए भी कि वे सब एक सुर में मिमियाती हैं और इसलिए भी कि उन्होंने बिना साक्षात्कार पढ़े, मैं - मैं की जुगलबंदी की है. बकरियों, विभूति जी ने भले ही इशारे में कहा किन्तु उनका इशारा साफ़ है. वे किसी एक महिला लेखिका की बात कर रहे है. जिनकी आत्म कथा को पढ़ने से लगता है कि शीर्षक 'कितने बिस्तरों पर कितनी बार' होना चाहिए था ? मैं नाम लिखूंगा तो गुड़िया रूठ जाएगी. वे एक ख़ास रस्ते पर चलने वाली होड़ को बेहतर नहीं मानते, बस इतनी सी बात है. आपको लगता है कि वे पूरी बिरादरी की बात कर रहे हैं तो खुद को टटोल कर देखिये कहीं आप भी उसी पंक्ति में नहीं हैं. असल हल्ला तो कान में बिना बाली डाले हुए अमर - बकरे कर रहे हैं.

मैं जिन लेखिकाओं को जानता हूँ. वे भद्र और सुसंस्कृत महिलाएं हैं. भले ही उनके नाम बड़े नहीं है मगर मेरी नज़र में उनकी लेखनी बहुत बड़ी है और उनके लिए मेरा सम्मान भी इसलिए है कि वे धोधे खां की अलगोजा चबाने को आतुर बकरियां नहीं हैं. मेरी दुआ है कि वे साहित्यिक आकाश की सब ऊंचाइयां पार कर लें.

डरते हैं बंदूकों वाले