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Showing posts from September, 2010

शोक का पुल और तालाब की पाल पर बैठे, विसर्जित गणेश

[4] ये हमारी यात्रा की समापन कड़ी है.
सड़क एक पुल में बदल गई है. यह पुल चार साल पहले आई एक नदी की स्मृति है और सैंकड़ों परिवारों का शोकगीत है. इसे आश्चर्य कहते हैं कि रेगिस्तान में सौ साल में एक बार नदी बहती है. यह आश्चर्य शीघ्र ही दुःख में तब्दील हो जाता है. जब भी यहाँ से गुजरता हूँ तो वही दिन याद आते हैं, रेगिस्तान में बाढ़ के दिन... हम एक हेल्प लाइन प्रोग्रेम कर रहे थे. जिले के आला अधिकारियों और बाढ़ में फंसे हुए लोगों को मोबाइल और रेडियो के जरिये जोड़े हुए थे. लगान फिल्म का भजन बज रहा था कि मेरा फोन चमकने लगा. ये मेरा निजी नंबर था मगर बेसिक फोन्स के ठप हो जाने के कारण इसे ऑन एयर कर दिया गया था. एक श्रोता का फोन था. उसने कहा "मेरे सामने सौ फीट दूर हमारे पड़ोसी का पक्का घर है, उस पर पांच लोग बैठे हैं और वे डूबने वाले हैं... वे नहीं बचेंगे और हम भी कुछ नहीं कर सकते." मैं उनके फोन को कंट्रोल रूम में ट्रांसफर करता हुआ रेडियो पर सहायता दल को लोकेशन के बारे में बताता हूँ. तभी उधर से आवाज़ आती है "वे डूब गए... " मैं ऑन एयर चल रहे फोन का फेडर डाउन कर देता …

आओ शिनचैन लड़कियों के शिकार पर चलें

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मैंने दादा के घर के बाहर फैली खुली साफ़ सुथरी रेत पर पहली बार एक गुबरैले को देखा था. तब मेरी उम्र पांच सात साल रही होगी. वह मेरे लिए विस्मय का कारक था. खुद उल्टा चलता हुआ गोबर की एक गेंद को लुढ़काता हुआ चला जा रहा था. विस्मय व्यक्ति के सुख और दुखों की तात्कालिक अनुभूति होती है. इसी से सारे रसों का बेहतर स्वाद मिलता है. किसी की सुन्दरता को देख कर जब मैं विस्मित होता हूँ तो मुझे श्रृंगार रस के तत्व याद आते हैं. इक्यानवे-बानवे के दिनों में एक सुंदर सी दिखने वाली लड़की से मिलने की तमन्ना मचलती रहती थी. आख़िरकार हम मिले और मैं विस्मित था. इस पहली मुलाकात का हासिल सिर्फ उदासी थी. इससे उबरने के लिए कई और मुलाकातें जरुरी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरा विस्मय निर्जीव होकर ठहर गया. बरसों सोचे गए दृश्यों के उलट तस्वीर देखना भी विस्मित करता है.
बेटे से अविश्वसनीय घटनाक्रम वाली कहानी सुन कर मैं खो गया था. मुझे एकाएक गंभीर अफ़सोस हुआ कि इसके विस्मय को छल लिया गया है. अमेरिकी कार्टून करेक्टरों में नए विस्मयबोध की लालसा में निरंतर रचे गए अतिरंजित हादसों और उनसे उबरने के तरीकों को देख कर मे…

हरे रंग के आईस क्यूब्स

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दक्षिण अफ्रीकी देश से आया कोयले का चूरा उड़ रहा है. हर सप्ताह कत्थई लाल रंग के बीस डिब्बों वाली एक रेल गाड़ी आकर उतरलाई स्टेशन पर रुकती है. दूर देश की खदानों का कोयला ट्रकों में लादा जाता है. काले रंग की गर्द रेलवे ट्रेक से होती हुई चारों और बरसने लगती है. ये कोयला हाल ही में रेगिस्तान में उग आये थर्मल बिजली कारखानों तक जाता है. दिन के दो बजने को है, जोधपुर जाने वाली पेसेंजर के निकलने का समय है. उन्नतीस रुपये में दो सौ दस किलोमीटर का सफ़र, डिब्बे भरे हुए और सफ़र से बंधी आशाएं सरपट भागती हुई.
उत्तरलाई स्टेशन से तीन सौ मीटर दूर एक नाडी है. रेल छूटती है और हम एक दिशा में चल रहे हैं. सोचता हूँ कि घर से बाहर आते ही मैं रूपांतरित होने लगता हूँ. पुराने सुख दुखों के बीच नए रंग की कोंपलें मन की धरती को फोड़ते हुए खिलने लगती है. अभी थोड़ी देर पहले पत्नी का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि क्या वाकई हर व्यक्ति के लिए घर बनाना अनिवार्य है ? मेरे पास बहुत पैसे नहीं है कि घर बना सकूँ. हम दोनों ने सत्रह अट्ठारह साल उस घर के लिए दिये हैं जिसने हमें जीवन दिया है. इन सालों की कमाई से जो…

मुंह के बल औंधे गिरे हों और लौटरी लग जाये

हम जीवन का आरोहण करते हुये हर दिन बड़े होते जाते हैं। साल दर साल हमारे अनुभव में इजाफा और उम्र की तस्वीर में रेखाओं की बढ़ोतरी होती जाती है। मनुष्य एक आखेटक है। वह अपने रोमांच और जीवन यापन के लिए निरंतर यात्रा में बना रहता है। अगर सलीके से दर्ज़ की जाए तो कुछ बेहद छोटी यात्राएं भी हमें अनूठे आनंद से भर देती हैं। मेरा बेटा ऐसी ही एक छोटी सी यात्रा पर मेरे साथ था। आज के दौर के बच्चे सबसे अधिक सितम बरदाश्त कर रहे हैं। उनको जल्दबाज़ी की दौड़ में माता पिता की लालसा और भय की मरीचिका में दौड़ते जाना होता है। दस साल का बच्चा है और चौथी कक्षा में पढ़ता है। समझदार लोगों से प्रभावित उसकी मम्मा कहती है कि ये एक साल पीछे चल रहा है. मैं कहता हूँ कोई बात नहीं एक साल कम नौकरी करनी पड़ेगी. हम सब अपने बच्चों को अच्छा नौकर ही तो बनाना चाहते हैं. दरिया को पूरी रवानी से बहता हुआ देखने की जगह पर बांधों की नीव बनाने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. फ़िलहाल हम दोनों में ये तय है कि वह जैसे पढ़ और बढ़ रहा है, उसकी मदद की जाये. उसकी तमाम असफलताओं के दोष मेरे हिस्से में डाल दिये जाये बाकी बची हुई सफलताएँ दोनों मिल …

मैं तुम्हारी आँखों को नए चिड़ियाघर जैसा रंग देना चाहती हूँ

डिक नोर्टन को कम ही लोग जानते हैं. मैं भी नहीं जानता. उसके बारे में सिर्फ इतना पता है कि वह एक विलक्षण लड़की का दोस्त था. उससे दो साल आगे पढ़ता था. उस लड़की ने उसे टूट कर चाहा था. वह कहती थी, तुम्हारी साफ़ आँखें सबसे अच्छी है मैं इनमे बतखें और रंग भर देना चाहती हूँ एक नए चिड़ियाघर जैसा... उस लड़की का नाम सिल्विया प्लेथ था. हां ये वही अद्भुत कवयित्री है जिसने लघु गल्पनुमा आत्मकथा लिखी और उसका शीर्षक रखा 'द बेल जार' यानि एक ऐसा कांच का मर्तबान जो चीजों की हिफाज़त के लिए ढ़क्कन की तरह बना है.
प्लेथ ने आठ साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी. इसके बाद उसने निरंतर विद्यालयी और कॉलेज स्तर की साहित्यिक प्रतियोगिताएं जीती. उसके पास एक मुक्कमल परिवार नहीं था. वह अकेले ही नई मंजिलें गढ़ती और फिर उन पर विजय पाने को चल देती थी. उसके भीतर एक प्यास थी कि वह दुनिया को खूबसूरत कविताओं से भर देना चाहती थी. वह पेंटिग करती थी. उसे गाने का भी शौक था. उसने कुछ एक छोटी कहानियां भी लिखी. जो उसने हासिल किया वह सब दुनिया की नज़र में ख़ास था किन्तु स्वयं उससे प्रभावित नहीं थी. उसकी कविताओं …

दिनेश जोशी, आपकी याद आ रही है.

अब उस बात को बीस साल हो गए हैं. वे फाके के दिन थे. शाही समौसे और नसरानी सिनेमा की दायीं और मिलने वाली चाय के सहारे निकल जाया करते थे. उन्हीं दिनों के प्रिय व्यक्ति दिनेश जोशी कल याद आये तो वे दिन भी बेशुमार याद आये. मैं डेस्क पर बैठ कर कई महीनों से प्रेस विज्ञप्तियां ठीक करते हुए इस इंतजार में था कि कभी डेट लाइन में उन सबको भी क्रेडिट मिला करेगी, जो अख़बार के लिए खबरें इस हद तक ठीक करते हैं कि याद नहीं रहता असल ख़बर क्या थी.

हमारे अख़बार के दफ्तर में ग्राउंड फ्लोर पर प्रिंटिंग प्रेस और ऊपर के माले में एक हाल के तीन पार्टीशन करके अलग चेंबर बनाये हुए थे. एक में खबरों के बटर पेपर निकलते थे दूसरी तरफ पेस्टिंग, ले आउट और पेज मेकिंग का काम होता था. बाहर की तरफ हाल में रखी एक बड़ी टेबल पर तीन चार लोग, जो खुद को पत्रकार समझते थे, बैठा करते थे. मैं भी उनके साथ बैठ जाया करता था.
एक सांध्य दैनिक में काम करते हुए कभी ऐसे अवसर नहीं मिलते कि आप कुछ सीख पाएं, सिवा इसके कि हर बात में कहना "उसको कुछ नहीं आता". इसी तरह के संवादों से दिन बीतते जाते हैं. ऐसे अखबारों के हीरो क्राइम र…

हम तुम... नहीं सिर्फ तुम

अभी बहुत आनंद आ रहा है. रात के ठीक नौ बज कर बीस मिनट हुए हैं और मेरा दिल कहता है कुछ लिखा जाये. खुश इसलिए हूँ कि चार दिन के बुखार के बाद आज सुबह बीवी की डांट से बच गया कि मैंने दिन में अपने ब्लॉग का टेम्पलेट लगभग अपनी पसंद से बदल लिया कि एक दोस्त ने पूछा तबियत कैसी है कि अभी आर सी की नई बोतल निकाल ली है... हाय पांच सात दिन बाद दो पैग मिले तो कितना अच्छा लगता है.
सुबह ख़राब हो गई थी. मेरे समाचार पत्र ने अपने परिशिष्ट का रंग रूप तो बदला मगर आदतें नहीं बदली. यानि वही सांप वाली फितरत कि मध्य प्रदेश में व्यापार करने और अख़बार के पांव जमाने को भारतीय जनता पार्टी को गाली दो लेकिन हिंदुस्तान की खुशनुमा फेमिली के तौर पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन और उसकी पत्नी का इंटरव्यू छापो. चाचा, कृष्ण के वैज्ञानिक तत्व पर शोध की पोल यहीं खुल जाती है. तुमसे तो कुलिश साहब अच्छे थे कि जो करते थे, वही कहते भी थे. तुम मीर तकी मीर से शाहिद मीर तक को भुला देना चाहते हो और संगीत में अन्नू मलिक को हिंदुस्तान का सिरमौर मनवाना चाहते हो, कि तुम्हें सब भूल जाता है और एक आमिर खान का लास्ट पेज पर पांच सेंटी म…

अफीम सिर्फ एक पौधे के रस को नहीं कहते हैं

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उसे मरने से बीस दिन पहले अस्पताल में लाया गया था. उसने ज़िन्दगी के आखिरी दिन एक पुलिसकर्मी की परछाई देखते हुए बिताये थे. वह लीवर और ह्रदय के निराशाजनक प्रदर्शन से पीड़ित थी. उसका नाम एलोनोरा फेगन था और बेल्ली होलीडे के नाम से पहचानी जाती थी. वह अमेरिका की मशहूर जोज़ गायिका थी. पैंतालीस साल की होने से पहले ही मर गई. उसे अफीम से बेहद लगाव था. इसके लिए वह कुछ भी कर सकती थी. कुछ भी यानि कुछ भी...इंसान की अपनी कमजोरियां होती है. उसकी भी थी.

मुझे लगता है कि उसकी ज़िन्दगी के आखिरी दिन उस भारतीय आम एकल परिवार जैसे थे. जिसमे पत्नी या पति को विवाहपूर्व या विवाहेत्तर सम्बंधों का पता चल जाये फिर तुरंत रोने -धोने, लड़ने - झगड़ने और आरोप - प्रत्यारोप के बाद अपराधी को अन्य परिवारजनों द्वारा नज़रबंद कर दिया जाये. ऐसे ही लेडी डे के नाम से मशहूर उस स्त्री के हालात रहे होंगे कि वह अपनी कमजोरियों पर बैठे एक पहरेदार को देखते हुए मर गई और ठीक इसी तरह कई परिवार भी तबाह हो गए. नशाखोरी और देहिक सम्बन्धों की चाह सभ्य समाज में अनुचित है, अपराधिक है... मगर है.

हमारा समाज कथित रूप से बहुत ही सभ्य है. सभ्य होने…