An illegally produced distilled beverage.


December 27, 2010

वे फेदर टच अंगुलियाँ कैसी थी ?


मेरे एक मित्र हैं अर्जुन मूंढ़. वे अपनी टवेरा कार लेकर घर आये और मैं उनके साथ गाँव की ओर चल पड़ा. बड़े यारबाज आदमी है. पिछले साल एक दोपहर मुझे फोन करके कह रहे थे कि डिप्टी साहब के नंबर दो, फोन करना है. ये वाइन शॉप का सेल्समेन विस्की के सात रुपये अधिक ले रहा है और बिल नहीं देता. मैंने कहा भाई चिंतित न होओ, उपभोक्ता अदालत में बिल न हो तो भी सुनवाई होती है. वह सात रूपये अधिक लेता है तो कोई बात नहीं कल.  हम उस पर दावा कर देंगे. कार में बैठे हुए मैं उस घटना को याद करते हुए मुस्कुराता रहा.

शहर के बाहर निकलते ही उन्होंने कार को नेशनल हाइवे के साइड में लगाया और प्रतीक्षा करने लगे. थोड़ी ही देर में एक बाइक सवार आया और पांच बोतल विस्की दे गया. मेरी ओर देखते हुए कहने लगे बेगार है यानि किसी और का काम है. मेरी मंजिल कुछ और थी इसलिए वे बोतलें मेरी धड़कनों को बढ़ा न सकी. हम सफ़र के दौरान अपनी ज़मीन की बात करते रहे. वे मुझे समझाते रहे कि एक किसान को अपनी ज़मीन की क़द्र करनी चाहिए. मैंने क्षमा मांग ली कि मुझे अपनी नहरी ज़मीन पर जाने का समय नहीं मिल पाता है. इस रास्ते में बीस किलोमीटर पर हम दोनों के एक बेहद करीबी दोस्त का घर आ गया. वहां वे उतरे, कार की चाबी दोस्त को दी और पाँचों बोतल लेकर चले गए.

मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि कुछ फोन शोरगुल से भरी जगहों पर आया करते हैं. वहीं भरी गुडाळ में सेल बजने लगा. आवाज़ आई और खो गई जैसे कमसिन मुहब्बतें पलक झपकते टूट कर सीने में उम्र भर के लिए चुभ जाया करती है. मैं इस भरी भीड़ में आवाज़ के सम्मोहन में खो गया तो बाहर धूप में निकल आया. मैंने सोचा कि कोई अचानक बाद बरसों के क्यों याद करता होगा. आस-पास के गांवों की औरतें अपने बच्चों के साथ जमा थी. पुरुष गोल घेरों में बैठे हुए पोस्त के चूरे को भिगो कर छान रहे थे. मेरे पास भी परिचित लोगों का घेरा बन गया. उनमे बहुत से बच्चे थे. वे जानना चाहते थे कि गाँव तक एफ एम कब तक सुनाई देगा.

मेरे अपने गाँव से दस किलोमीटर आगे के गाँव में दोस्त का ये घर शोक से भरा था. उसके पिता के निधन के बाद कल का दिन शोक के समापन और अटूट स्मृतियों के आरम्भ होने का दिन था. वैसे एक दिन सब खो जाएंगे. उनके पांवों के निशानों को जेठ की आंधियां उड़ा ले जाएगी. हमारे अपने प्रिय जिनकी छाँव में हम बड़े हुए, कंधों पर खेले हैं, एक दिन उनकी पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित कर आना है. मैं ऐसे अनुभवों से गुजरते हुए ही प्रेम को सबसे करीब पाता हूँ. अपने दोस्तों से कहता हूँ तुम खुल कर ढेर सारा प्रेम करो. अपने बच्चों को सीने से लगाओ, माँ के पास चिपक कर बैठो, पिता से कहो कि आप बहुत अच्छे हो और मैं दुनिया में सबसे अधिक आपसे प्रेम करता हूँ. ढलती उम्र में सुन्दरतम होते जाते जीवन साथी को हमराह होने के लिए शुक्रिया कहो.

मुझे यकीन है हम खोयी हुई आवाजें बार बार सुन सकेंगे. सिर्फ आवाज़ ही क्यों कभी न कभी हम देख सकें बिछड़ी हुई आँखों को. मैंने पहले जो बेवजह और बहुत सी बातें लिखी थी, उसमें कमसिन उम्र की मुहब्बत की एक बात ये भी थी.

सूखी निब को कांपते होठों से गीली करके
जो नाम कापियों पर लिखा था, वो नाम किसका था. ...

झमक सी ठंडी रातों और चूर्ण से खट्टे दिनों में
ज्योमेट्री में बिछे कागज के नीचे क्या धड़कता था ?
जिस नर्म दोशीज़ा छुअन के अहसास से जागा करते थे,
वे फेदर टच अंगुलियाँ कैसी थी ?

ज़िन्दगी गुल्लक सी होती तो कितना अच्छा होता
सिक्के डालने की जगह पर आँख रखते
और स्मृतियों के उलझे धागों से बीते दिनों को रफू कर लेते.

December 25, 2010

घर से भागी हुई दुनिया

ये दुनिया ऊबे हुए, निराश और भावनात्मक रूप से नितांत अकेले लोगों की सदी में प्रवेश कर चुकी है. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के कुछ ही दिन शेष हैं. ख़ुशी और सुकून की तलाश में घर से भागी हुई दुनिया फिलहाल हांफने लगी है आगे की मंजिलें क्रमशः हताशा, अवसाद, पागलपन और विध्वंस है. ऐसा होना भी बेहद जरुरी है ताकि फिर से ताजा कोंपलें फूटें और कार्बन क्रेडिट का हिसाब बंद हो सके.

आज क्रिसमस मनाया जा रहा है. दुनिया के सभी पर्वों और त्योहारों की तरह इस पावन अवसर को भी अवास्तविक बाज़ारवाद ने अपने शिकंजे में ले रखा है. रिश्तों की दरारें सामाजिक स्तर पर स्वीकृतियां पा चुकी है. इनकी मरम्मत करने के स्थान पर तन्हा होता जा रहा आज का समाज बेहतर दिखने की कोशिशों में लगा रहता है. अकेले हो चुके परिवार हर साल खरीददारी करने निकल जाते है और अपने आस पास उपभोग और मनोरंजन की सामग्री को जमा करके टूटते रिश्तों को भुलाने के नाकाम प्रयास करते हैं.

इस बार मौसम की मार है. हालाँकि बर्फ़बारी के आंकड़े अस्सी के दशक को अभी मात नहीं कर पाए हैं लेकिन इन बीते हुए चालीस सालों के दौरान तकनीक के हवाले हो चुके मानवीय अहसासों के शोक में बहुत बुरा लग रहा है कि क्रिसमस फीका है. अपने आनंद के रिफिल के अवसरों को जाया होते देख कर चिंतित होना लाजमी है. परिवार नया सामान लाता, नए दोस्त घर पर आते, केरोल्स गाते और फिर कुछ सुकून क्रिसमस ट्री से टपकने लगता. ऐसा न हो पाना आदमी को उसकी तन्हाई का सच्चा आईना दिखाता है. इसमें जो अक्स उभरता है वह बड़ा भयावह है.

इस दशक में दुनिया भर में सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकें नोस्टेल्जिया की थी. ये विपरीत संकेत है कि यानि वो दुनिया बेहतर थी. हम अक्सर अपने बचपन के फोटो को पसंद नहीं करते. हमें लगता है कि वह बड़े बुद्धू की तस्वीर है, उसमे आधुनिकता नहीं है और उसकी सुन्दरता आज के मापदंडों पर ठीक नहीं बैठती है. मैंने अपने बहुत से फोटोग्राफ्स को इधर उधर कर दिया है. एंड्रोयड ऑपरेटिंग सिस्टम वाले सेल फोन को उपयोग में लेते समय मुझे अपनी भोंदू सी पिचके गालों वाली तस्वीरों से ख़ुशी नहीं मिलती लेकिन इस साल के दौरान मैंने नोस्टेल्जिया को ब्लॉग करके जो सुख पाया है वह अविस्मरणीय है.

मेरी स्मृतियों में प्रेम की गाढ़ी दास्तान है और कुछ एक बेहद हसीन दोस्त हैं. मेरे पास कभी रिजोल्यूशन नहीं थे, जो जैसा मिला उससे मैंने प्रेम किया है. प्रेम कोई मील का पत्थर नहीं था. मैं उसके जितना पास गया वह उतना ही दूर होता गया. प्रेम मरुथल की मरीचिका भी नहीं था. उसमें छुअन का अहसास था. कुछ ख़त थे और ढेरों निवेदन... वह बरसों बरस चलता ही रहा. उसकी यादें उसका पोषण करती रही. नास्टेल्जिया को जीना भविष्य की दुरुहताओं को भले ही आसान ना करता हो लेकिन एक आस तो बांधता ही है कि कभी कहीं हम एक मुकम्मल अहसास जी पाएंगे तो मेरी निराशा और ऊब साथ रहते हुए भी मुझे जीने का सामान देती रही.

इस दशक के आखिर में दोस्त तुमको एक फिल्म और एक किताब सजेस्ट करना चाहता हूँ. दोनों मेरे ख़याल से अधूरी है और जरुरी भी. सोफिया कपोला की फिल्म "समवेयर". अफ़सोस कि यह भी फार्मूला है. महानायक के व्यक्तिगत जीवन की हताशा और अकेलेपन को केनवास पर उतारती है. सोफिया ने इसमें सदी के दुष्प्रभावों को नायक केन्द्रित कर दिया है. कमोबेश आर्थिक स्तर की प्रत्येक लेयर में जी रहे लोग इसी मुसीबत के मारे हुए हैं. ऐसे ही यियुन ली का फिक्शन "गोल्ड बॉय ईमर्ल्ड गर्ल" एक साथ कई कहानियों की याद दिलाता है. इस बेस्ट सेलर को देख कर ये भी याद आता है कि दुनिया जिस आदर्श समाज के ख्वाब देखती है वह हद दर्जे का असहिष्णु और अमानवीय हो गया है.


December 22, 2010

फिर शाम आएगी, वो फिर याद आएगा

हमें अपने पास बहुत सा स्पेस रखना चाहिए. ज़िन्दगी में, दिमाग में और दिल में भी क्योंकि भरी हुई जगहें अक्सर बोझ बन जाया करती है. मैंने जब काज़िमीर मलेविच का नाम सुना तो खास अचरज नहीं हुआ था. रूसी लोगों के नाम ऐसे ही होते हैं. मुझे ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ था कि वे एक काले रंग की स्क्वायर और सफ़ेद पर सफ़ेद रंग की पेंटिंग बनाने के लिए जाने जाते हैं. इसी तरह डेविड स्मिथ की अमूर्त शिल्प कला और हैरत में डाल देती है. काले रंग का स्क्वायर बनाना भला कोई अविस्मरणीय काम हो सकता है ? या फिर एक ऐसा शिल्प जिसमें डेविड एक स्क्वायर पर एक क्रोस खड़ा करते हैं फिर उस पर एक स्क्वायर रखते हैं फिर उससे एक आयत चिपक जाता है... मेरे लिए ये सब अबूझ है, अविवेचनीय हैं.

ऐसी ही अमूर्त और अनगढ़ ज़िन्दगी हम सब जीते हैं. मैं पिछले कई सप्ताह से कुछ कहानियों के ड्राफ्ट लिख लेना चाहता हूँ लेकिन दिन बहुत छोटे हो गए हैं और नयी खुशबुओं ने अपनी पांखें फैला रखी है. सांझ के धूसर नग्में, रात के तन्हा बिछोडे़ मुझे अपने पहलू में छिपा लेते हैं. इन दिनों शराब की उम्दा क्वालिटी है, मौसम में ठण्ड भी है और दिन में चमकती हुई धूप भी है. सोचता हूँ कि बीज (स्त्री-पुरुष) ने ज़मीन (कोख) से बाहर सबसे पहले अपना सर उठाया होगा फिर उसने साँस ली होगी और अपने पांवों में हौसला भर कर पानी की खोज में निकल गया होगा. इसी तरह निश्चिन्तता से जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते देख कर बीज के रचयिता की ऊब बढ़ गयी होगी. फिर उसने प्रेम जैसी शय का आविष्कार करके बीज को उपहार में दिया होगा ताकि वह सिर्फ पानी (शराब) जैसी मामूली चीजों को आसानी से पा लेने की जगह प्रेम जैसी कठिन चीज के पीछे भागता फिरे.


दरख्तों के पार ज़मी को चूमता
आंख से छिटकता है शाम का आखिरी लम्हा
स्याह दर्द का रंग घुल जाता है क्षितिज के पार.

सोचता हूं उन गुलाबी हथेलियों पर भी
रेशमी अवसाद की सुनहरी तितलियां
दम तोड़ती होंगी.

इतना तय पाता हूँ कि
सफ़र की झोली कुछ और हल्की हो जाती है,
गहरी सांस लेता हुआ, कोई दुआ देता हुआ
एक और दिन चौखट से उठ ही जाता है.

रात की चुप्पी में अंगुलियां
स्मृति की सलवटों को करीने से रखने लगती है
तो रूह यकायक चौंक उठती है, जैसे तूने छू लिया है
और इस तरह कुछ भी जाया नहीं होता.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *

दोस्त तुम जब आओ तो सात समंदर पार से अपने हिस्से की रातों के कुछ लम्हे चुरा लाना. हम उन्हें पनियल ख़ुशी से भिगो कर गर्म सांसों से सुखायेंगे फिर उन पर अभ्रक का नूर उभर आएगा. वे तुम्हारे लौट जाने के बाद भी मेरी याद में चमका करेंगे. मैंने तुम्हारे लिए भी एक तोहफा सोच रखा है कि तुम्हारी पलकों पर अज़रक प्रिंट बहुत फबेगी.

December 15, 2010

धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

मेरे दोस्त, बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं....के जरिये जो बातें करता था वे बहुत दिनों से याद नहीं आई. ज़िन्दगी के आधे रास्ते के बाद हौसला रहता नहीं इसलिए इस बार बिछड़ने की बात चले तो याद दिलाना कि उस घड़ी कुछ भी साथ नहीं देता. उस घड़ी कोई रंग कोई रौशनी नहीं होती. उस घड़ी कोई आसरा कोई सहारा नहीं होता कि मुहब्बत के चले जाने के साथ सब चला जाया करता है. मैंने जाने कितनी बार खोये हुए रास्तों को देखा है जाने कितनी बार टूटा हूँ. इन दिनों फिर से मौसम के खिलने की आस है किसी के आने का वादा है...


धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

उन दिनों हरे दरख़्त थे
दोपहर की धूप थी, पेड़ों की गहरी छाँव थी
डूबती शामों के लम्बे साये थे
रास्ते थे, भीड़ थी, दफ्तर भी थे, केफे भी थे.

पलकों की कोर से इक रास्ता
जाता था ख्वाहिशों के घर
आँखों में रखे हुए तारे रात के, होठों पे लाली सुबह की.

मगर एक दिन अचानक
कुछ बुझी हुई हसरतों की आह से, कुछ नाकाम उम्मीदों के बोझ से
उसने हेंडिल ब्रेक लगाया, विंडो के शीशे को नीचे किया,
एक गहरी साँस ली, मगर जाने क्यों... वह उतर ना सकी कार से.

हालाँकि इसी रास्ते पर
उन दिनों भी सूनी बैंचें थी, पीले पत्तों का बिछावन था
और टूटे हुए कुछ पंख थे.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं...

* * *
मैंने पहले भी बेवजह और बहुत सी बातें लिखी थी. तुम उनको फिर से सुनना चाहो तो मुझे मेल करना. मेरा पता साइडबार में लाल अक्षरों में दर्ज है. एक पंडित कहता था तुम्हारी कुंडली में राहू ऐसे घर में बैठा है कि तुम झूठ बहुत बोलोगे. मैंने भी उसे बताया कि मेरी झूठी कहानियां लोगों को बहुत सच्ची लगती है. तुम्हें झूठ के इस कारोबार के बीच एक सच्ची बात कहता हूँ कि तुम्हें सीने से लगाने को जी चाहता है, ये अगर झूठ भी हो तो क्या बुरा है ?

December 13, 2010

गलियों की लड़की मैगी और रेत में मशालें

दुनिया बर्फ में दबी जा रही है. मैं सुबह उठ कर देखता हूँ कि व्हाईट स्पाईडर लिली पर अभी फूल आने बाकी है. एलोवेरा के धूसर लाल रंग के फूलों की बहार है. दूब ने अब नई जड़ें निकालनी शुरू की है और इन सर्दियों में वह यथासम्भव भूमि पर बिछ जाने की तैयारी मैं है. पिछले पंद्रह दिनों से चुटकी भर धूप के निकलते ही छोटे भाई की बीस साल पहले खरीदी गई बाइक पर सवार हो कर गाँव चला जाता हूँ. गाँव की ओर जाने वाले रास्ते पर चलते हुए ऐसा लगता है कि कोई अपनी माँ के पास लौट रहा हो. पेड़, पत्थर, कटाव, मोड़, जिप्सम और जो भी रास्ते में आता है सब जाना पहचाना लगता है. इस सफ़र में कम होती हुई दूरी भावनाओं को गाढ़ा करती रहती है. फ्लेशबैक में आहिस्ता घुसने की तरह कैर के पेड़ों में बैठे हुए मोर पर क्षणिक नज़र डाल कर नई चीजों की ओर देखता हूँ. घरों के आगे बन आई नई चारदीवारी और काँटों की बाड़ें मेरी ध्यान मुद्रा को तोड़ती है.

सब रिश्तेदार गाँव में हैं. गाँव का एक ही फलसफा है लड़के लड़कियों के हाथ पीले कर दो कि बड़े होने पर रिश्ते नहीं मिलते. घर का कोई बूढा चला जाये, अब गाँव को जीमाणा तो है ही फिर क्यों ना बच्चों को निपटा दिया जाये. शादियाँ अभी कर देते हैं और बाकी बाद में बड़े होने पर होता रहेगा. ऐसे में एकाएक ख़बर आती है. भाई एक उठाऊ नारेळ आ गया है. कल सुबह आ जाओ. उठाऊ नारेळ यानि अचानक आया हुआ लग्न जो पहले से निर्धारित नहीं था. गाँव जाओ तो शहर की फर्जी व्यस्तता से मुक्ति मिलती है. देखता हूँ कि क्या बदल रहा है. कभी रास्ते में अकेला रुक जाया करता हूँ. बड़ा पेड़, अँधा मोड़ या फिर कुआ और तालाब जैसी जगहों के आस पास घंटा भर बिता लेता हूँ. सोचता हूँ कि सिगरेट और चाय पीने की आदतें होती या फिर हथेली में खैनी मसलने का चाव होता तो और भी मजा आता. तम्बाकू को रगड़ता और फिर हल्की थपकियाँ देकर चूना उड़ाता रहता.

परसों शहर की ओर लौट रहा था तब शाम होने को थी. चाचा के घर के बाहर बैठे हुए देखा सड़क के पार दो चिमनियों के ऊपर आग जल रही थी. ये आयल पोर्सेसिंग टर्मिनल की चिमनियाँ है. दिन में किसी विशालकाय मशाल जैसी दिखती है और रात को किसी ड्रेगन की मुखज्वाला सी. सामने एक बड़ा कारखाना बना हुआ है. रेत के धोरों के बीच ये एक जगमगाता हुआ टापू है. मेरे देश का बाईस फीसद कच्चा तेल यही से निकाला जायेगा. इन रेत के धोरों में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में कल-कारखानों की क्रांति के समय से भी अधिक भयावह संक्रमण जारी है. इस विकास को देखता हूँ तो एक कथा की पात्र स्मृत होती है. उसका नाम मैगी था. मैगी की कथा रचते समय युवा पत्रकार स्टीफन क्रेन ने ऐसे ही संक्रमण को चिन्हित कर शब्दों में ढाला था. उन्होंने अपने स्वप्रकाशित प्रथम उपन्यास "मैगी : अ गर्ल ऑफ़ स्ट्रीट" के जरिये निम्न वर्ग के जीवन की दुरुहताओं को उकेरते हुए एक खूबसूरत लड़की की कहानी रची.

उस उपन्यास को पढ़ते हुए आपको कई बार बांग्ला साहित्य के पात्र याद आयेंगे. ऐसे पात्र जिनको मजबूरी में देह व्यापार को एक पेशे के रूप में चुनना पड़ा था. स्टीफन की नायिका अपने सारे फैसले जल्दी करती है. वह खूबसूरत है. उसके समक्ष चुनौतियाँ है. उसके माँ और पिता अव्वल दर्जे के शराबी हैं. समाज तेजी से अमीर होने की ओर भाग जा रहा है. एक दिन भाई के दोस्त से प्रेम हो जाता है और वह उसके साथ भाग जाती है. प्रेमी उसका अधिकतम उपयोग कर उसे ठुकरा देता है. घर लौटती है तो माँ और भाई स्वीकार नहीं करते... आखिरी रास्ता उसे बदनाम पेशे में ले जाता है और वह जल्द ही मर जाती है.

इस कहानी में सिक्स्थ सेन्स के बीज हैं. कुछ घटनाएँ स्टीफन के जीवन से मिलती जुलती है. पेशे से पत्रकार ये साहित्य सृजक इस उपन्यास के बाद एक वेश्या के बचाव के लिए व्यवस्था से लड़ता है फिर मात्र उन्नतीस वर्ष की आयु में दुनिया को छोड़ जाता है. पैसे के पंख पर सवार और मनुष्यों के ढूंगों पर कीमतों के गोदने का ब्लू प्रिंट लिए फिरते सौदागरों के समाज की इस कथा में जो दारुण दृश्य खुल कर सामने आता है. वह मुझे इस थार की ज़मीन पर भी दीखता है.

स्टीफन ने बहुत सारी कविताएं लिखी, निरंतर छोटी कहानियां लिखी और अख़बार के लिए लगातार काम किया था. क्या उसे कुछ अहसास था कि उसके पास बहुत सीमित दिन है. क्या मनुष्य के साथ भाग्य जैसा कोई टैग लगा होता है जिसमें उसकी एक्सपायरी डेट लिखी होती है ? कितने लोग ये अहसास कर पाते हैं कि उम्र प्रतिपल छीजती जा रही है और हमें दुनिया की इस यात्रा को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. हमें निरंतर सामाजिक बदलाव को चिन्हित करते हुए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ कर जाना चाहिए. परसों में रेत के धोरे पर बैठा हुआ यही सोचता रहा कि इन बदलावों की कहानी कौन लिखेगा ? मैं कुछ और भी सोचता लेकिन रात होने के साथ रेत का तापमान तेजी से गिरता है और एक हल्का सा जेकेट मेरे लिए पर्याप्त गर्मी नहीं सहेज सकेगा.

इसलिए वहां से उठते हुए मैंने थोमस बीर को स्टीफन क्रेन की जीवनी लिखने के लिए धन्यवाद दिया कि इससे बहुत लोगों को दो खूबसूरत उपन्यासों और एक नौजवान की सोच से रूबरू होने का अवसर दिया. मैंने अपनी जींस पर चिपकी धूल को हटाते हुए दूर खड़े चाचा को देखा. वे अनार के झाड़ को इग्नोर करते हुए अपने काश्तकार से बात कर रहे थे. मुझे चाचा ने बहुत बार कहा है मेरे इस घर में रहो... मैंने कभी सोचा ही नहीं कि यहाँ रुक कर भले ही कोई महान रचना ना लिख सको फिर भी ब्योरे तो दर्ज कर ही दो. ये जगह भी इतनी सुंदर और शांत है कि यहाँ बैठ कर खूब शराब पी जा सकती है और सुंदर स्त्रियों के बारे में सोचा जा सकता है.

December 6, 2010

पेंसिलें

आज के बाद स्कूल ले जाने के लिए तुम्हें आधी पेन्सिल मिला करेगी. पापा ने ऐसा कहा तब मैं बहुत डर गया था. मैं इंतज़ार करने लगा कि अब वे कहें स्कूल जाओ. उस सुबह मैंने बताया था कि मेरी पेन्सिल खो गई है. ऐसा एक ही सप्ताह में दूसरी बार हुआ था. मुझे याद नहीं कि उन दिनों पेन्सिल की कीमत अधिक हुआ करती थी या मेरे पिता को तनख्वाह कम मिलती थी या फिर वे मुझे अपनी चीजों को संभाल कर रखने का हुनर सिखाने के लिए प्रयत्न किया करते थे.

पेन्सिल से कोई प्रेम नहीं था. मुझे पढना अच्छा नहीं लगता था. क्लासवर्क और होमवर्क की औपचारिकता को पूर्णाहुति देने के सिवा पेन्सिल किसी काम नहीं आया करती थी. उसकी लकड़ी का बुरादा बेहद फीका और ग्रेफाईट स्वादहीन हुआ करता. उनको छीलने से फूलों के आकार का जो कचरा बनता था अक्सर किसी उकताए हुए मास्टर की खीज निकालने के सामान में ढल जाता. मैं पेंसिलों को संभालने से ज्यादा प्यार खुली आँखों से सपने देखने को करता था. उन सपनों में बेहद सुंदर लड़कियाँ हुआ करती और किसी ताज़ातरीन अपराध की खुशबू फैली रहती. मेरे इन दोशीज़ा सपनों को स्कूल का कोलाहल या रेल की पटरी के टुकड़े से बनी हुई घंटी क्षत-विक्षत कर देती थी. मुझे वही सिक्वेंस फिर दोबारा कभी नहीं मिलती.

मेरी खोयी हुई पेंसिलें कभी वापस नहीं मिलती थी. अपनी चीजों को संभालने का सबक नहीं सीख पाया और ज़िन्दगी भर पेंसिलें खोता ही रहा. उनके खो जाने का दुःख होता था. मैं बहुत उदास हो जाया करता था कि इस बेकार बात के लिए कभी भी डांट पड़ सकती है. सब खोयी हुई पेंसिलें मेरी स्मृतियों में हमेशा दस्तक देती रहती थी. वे काले और लाल रंग की धारियों वाली पंचकोण पकड़वाली हुआ करती थी. उन पेंसिलों से कान खुजाना मना था. पेंसिलों से दीवारों पर लिखना भी मना था. उनसे कुछ खूबसूरत नाम लिखे जा सकते थे मगर डरता था.

सात आठ साल तक इन लगातार खोती जा रही पेंसिलों से मुक्त हो जाने के बाद एक दिन पापा के एक दोस्त ने मुझे शाम को अपने घर बुला लिया. "बेटा अब तुमको स्केच करना सीखना है" ऐसा सुनते हुए, मैंने देखा कि वे एक नाटे कद के आदमी है. उन्होंने तहमद पहनी हुई है. उनके सिर के कुछ बाल गायब हैं और बाकी किसी राजघराने के गवैये की तरह पीछे से वन लताओं से आपस में उलझे हुए हैं. आज मैं कहूँ तो वे बाल किसी कविता जैसे थे. उनके चेहरे पर तेज था. वे पहले ही लुक में एक डीप आदमी लगते थे.

दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा "मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है." उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा "बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा."

मैं पेन्सिल से कोई चमत्कार नहीं कर पाता था. उनकी नोक की साइज़ बढती गई मगर मेरा हाथ तंग बना रहा. हम शहर से बाहर गए ताकि कुछ स्टिल स्केच कर सकें. वहां वे अपना काम करते और मैं सोचता था कि अपनी पसंद की लड़की का पोर्ट्रेट बना कर उसे अचंभित कर दूंगा. सीले सीले से रहने वाले उस फर्स्ट फ्लोर पर मेरे गुरूजी ने मुझे एक ऑयल पेंटिंग दिखाई थी. उनके हिसाब से वह एक अधूरी पेंटिंग थी और वे लगातार उस पर काम करते जा रहे थे. मेरी समझ कहती थी कि वह उनकी महबूबा है. इसके अलावा उनके पास बहुत सी सुंदर पेंटिग्स थी. वे हमेशा मुझे लुभाती रही. उनके नीचे नाम लिखा होता 'राकेश भटनागर'. मैं अक्सर काम कम करता और ऐसी सुंदर पेंटिंग्स के नीचे अपना नाम लिखे होने के सपने ज्यादा देखता था.

मैं कभी अच्छी तसवीर नहीं बना पाया. नंगे स्केच का पुलिंदा, जो मेरे अभ्यास से जन्मा था. उसे मैंने दो चार साल संभालने के बाद जला दिया. पेंसिलों की मैंने जितनी उपेक्षा की उतने ही चित्र दूर होते गए. खुद को राकेश लिखने वाले बृज बिहारी लाल भटनागर सम्भव है कि अभी भी आगरा के आस पास किसी केन्द्रीय विद्यालय में मुझसे अच्छा शिष्य खोजते होंगे या फिर रिटायर होकर उस पेंटिंग को पूरा करने में लगे होंगे. मैं चित्रकार नहीं हो पाया लेकिन उनसे बहुत प्यार करता हूँ.

मेरे दो बच्चे हैं. उनको कुछ हो जाता है तो मुझे पेंसिलें याद आने लगती है. सोचता हूँ कि मेरे पिता अफ़सोस करते होंगे कि जो नालायक कभी अपनी पेन्सिल नहीं संभाल पाया वह बच्चों को क्या संभालेगा. मुझे आज कल कुछ सूझता ही नहीं. मैं कभी सीढ़ियों को याद करने लगता हूँ कि मैंने लोगों की सबसे सुंदर तस्वीरें सीढ़ियों के साथ देखी है. कभी मुझे यकीन होने लगता है कि मुहब्बत की एक्सपायरी डेट नहीं होती. कभी सोचता हूँ कि हमें पेंसिलों को भी संभाल के रखना चाहिए ताकि एक दिन जिंदगी में सबसे प्रिय व्यक्ति की तस्वीर को पूरा कर सकें. वसीम बरेलवी साहब का ये शेर मेरी यादों के लिए बड़ा माकूल है.

किताब-ए-माज़ी के औराक उलट के देख ज़रा
ना जाने कौनसा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले !

डरते हैं बंदूकों वाले