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वह कुछ इस तरह बसा है स्मृतियों में

जहां पर वह रहता था, उस भूगोल में कुछ भी स्थायी नहीं था. बबूल की छोटी झाड़ियाँ एक चौड़ी सड़क के किनारे किसी झालर की तरह उगी हुई रहती थी. कुछ दूर देखो तो उनमें कुछ चिड़ियाएँ या फिर जीभ लटकाए हुए कुत्ते हांफते रहा करते थे. सामने एक बड़े परिसर में सन्नाटा पसरा रहता. उसने कई बार सोचा कि घरों के दरवाजे सड़कों पर न खुल कर सामने किसी घर में खुलने चाहिए. धूप इस तरह बराबर पसरने की जगह बादलों की शक्ल में हो. दूर दूर तक बस धूप के टप्पे दिखाई दें. घर से बाहर निकलें तो भाग कर किसी छाँव वाले टप्पे तक पहुँच जाएँ.

उसके घर के बाहर एक रेत की नदी बहती थी. दरवाज़े की चौखट के पास भी माँ अक्सर बारदाना डाल कर भीतर आने के महीन रास्ते बंद कर दिया करती किन्तु एक शक्ल दीवारों से छन कर नीम अँधेरे में भी उस तक पहुँच जाती. वह उसे अपने सामने की दीवार पर टांग देता किन्तु वह ख़यालों की तस्वीर उछल कर किसी और कोने में जा बैठती. वह कहता खेलो नहीं, यहाँ आओ मुझे प्यार करो. मगर रवायत ऐसी थी कि कमसिन उम्र की तस्वीरें खेलने में ही यकीन रखती थी.

वे छेड़ के छुप जाने की हुनरमंद थी. वह सोचता था कि जब वे छुप जाती है तब क्या मैं भी उसके कमरे में किसी तस्वीर की तरह मंडराता हूँ ? क्या मैं भी देखता हूँ कि वह मुझे अपने पास बुला रही है, रूठ गई है और बेसब्र होकर मुंह फेर कर सो गई है या कुछ देर बाद फिर से देखने लगी है और कहती है. आओ ना मुझे प्यार करो.... सदियों बाद भी ये नामालूम रहा कि वह ऐसा सोचती थी या नहीं लेकिन उसने उसके ऐसा सोचने के बारे में लिखा...


गरम दिनों में
दीवार से उखड़े हुए पोस्टर की याद
रह रह कर मेरे बिस्तर पर उतरती है
मैं सो जाती हूँ तकिये को सर पे रख कर.

जाड़े की स्याह रातों में
लज्जा में डूबा कोई चाँद दिखाई नहीं देता
बस क्षितिज के पार का आलोक
रेशमी चादर ओढ़े हुए आता है छत पर
मैं उसे सजा लेती हूँ माथे की बिंदी की तरह.

जिस दिन बरसात भिगो जाती है
घर के आगे बना सीमेंट का आँगन
दीवारें खिल जाती है कोंपलों की तरह
कोठर से उठती है सीले हुए गेहूं की ताजा गंध...
मैं दरवाज़े पर बैठी सोचती हूँ
कि तुम्हारे आने के लिए ये सबसे अच्छा दिन है.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.... [24 मई 1994]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…