Posts

Showing posts from January, 2011

ये कैसा वादा था कि...

धुंध भरे दिनों का ये मौसम धरती के छोरों की ओर लौट जायेगा. कुछ ही दिनों में अपने पंखों पर आग ढ़ोने वाली अबाबीलें आसमान पर मंडराएगी. लू दरवाजों पर दस्तक दे रही होगी और हरी घास दिन ब दिन झुलसती जाएगी. रोहिड़ा पर खिल रही होगी फूलों की रंगत. उन भरी धूप वाली लम्बी उदास दोपहर की नाउम्मीद छाँव में बैठे हुए सांस उखड़ने लगेगी. बरसों से ऐसा ही होता आया है कि ख्वाब दोपहर की नींद में सो जाते हैं और मैं किसी इंतज़ार में सुनता रहता हूँ... बुझ गई राह की छाँव.

हाँ उन सीढ़ियों के पास बैठा रहने वाला फ़कीर घनी छाँव वाले पेड़ के नीचे चला जायेगा. हरे कृष्ण गाते हुए दो भक्तों का जोड़ा पिछले कई बरसों से शहर के बीचे से तेज कदम गुजरता था. सुना, उनकी भी जोड़ी टूट गई. सूरज ढल गया तो परछाई भी बुझ गई. पुराने दोस्त के पास से उठते हुए मैंने खुद से कहा, शहर के दरवाजे छोटे हैं और भीड़ बढती जा रही है. इस रेत के सहरा को प्यासे पार करते हुए चालीस साल बीत गए हैं. चलो उसी छत पर जहां रात भर ख्वाबों को उधेड़ते और बुनते हो.


ये कैसा वादा था कि
अश्कों से जादू जगाने की मनाही थी
चुप सी पसरी थी परीशाँ मौसम में
जैसे बात कोई…

विलायती बबूल

मुद्दतों से ये आलम न तवक्को न उम्मीद. शाम के होने से पहले मैं सैनिक कॉलोनी से होता हुआ सड़क पर आता. वहां से कभी पैदल या रिक्शे में बैठ कर शहर के बीच सफ़ेद घंटाघर तक पहुँचता मगर फिर ख़याल आता कि कहीं नहीं पहुंचा हूँ. वही पत्थर से बनी हुई सड़कें, फुटपाथ तक पसरी हुई बरतनों की दुकानें, चाय पीने वालों के लिए बिछी हुई बेंचें, दर्जियों की मशीनों से आती परिचित सी आवाज़ें और मेरे साथ वही मेरी तन्हाई. एक तो वो शहर नया था और फिर मेरी निगाह में कोई दूसरी मंज़िल न थी. शहर से लौट कर आता तो रात भर घर से बाहर बैठे रहने को जी चाहता रहता था.

शाम के ट्रांसमिशन में रेडियो पर गाने बजा रहा होता तो गुजर हो जाती लेकिन खाली शामें बहुत सताती थी. ढाबे से पैक होकर आया खाना कमरे में अपनी खुशबू बिखेरता रहता और मैं अपने किराये के घर के कोर्ट-यार्ड में पसरी हुई रेत पर नंगे पांवों को रखे हुए कुछ सोचता जाता. रेत की ठंडक पांवों को सुकून देती थी. बेख़याल सामने की दीवार को देखता और विस्की पीता. उस समय मेरे पास में ऑफिस से लाया हुआ एक रजिस्टर रहता. जिसमें कुछ कविताओं सा लिखता जाता.

विलायती बबूल : चार कविताएं

[1…

ऐसी भीगी सुहानी रात में

वह बड़ी खिड़की कमरे के पश्चिम में खुलती थी. रेगिस्तान के इस छोर पर बसे क़स्बे के नितांत आलसी लोगों के बीच दिन भर खुली रहा करती. चार भागों में बनी इस खिड़की से रात को ठंडी हवा आती थी. वह सड़क पर खुलने वाले मेहमानों के लिए बने कमरे में थी. उस कमरे का उपयोग बहुत कम होता था. हर सुबह इसमें एक छोटी सेंटर टेबल, लकड़ी का तख़्त, एक प्लास्टिक के फूलों वाला सदाबहार खिला एल्युमिनियम का छोटा सा गमला और पास के आले में अखबार बिछा कर उन पर रखी एक दो पुस्तकों को झाड़ कर साफ़ किया जाता और फिर दिन भर सूना पड़ा रहता.

मुझे उस कमरे की खिड़की बड़ी भली लगती थी कि उससे बाहर आते - जाते हए लोगों को देखा जा सकता था. घर हमेशा ठहरा हुआ सा जान पड़ता और मेरी ऊब को बढ़ाता रहता था. खिड़की के सामने बाहर गली के दूसरे छोर पर एक विलायती बबूल का पेड़ था. उसकी छाँव बहुत हल्की हुआ करती थी. जिन दिनों लू नहीं चलती उसके नीचे बैठ कर धूप से बचा जा सकता था. मैं भी घर की ठंडी तन्हाई को बाहर बबूल के नीचे की कुरकुरी छाँव से केश कर लेना चाहता था किन्तु कभी कर नहीं पाया. इसलिए सदा ही उसी खिड़की के पास बैठा हुआ दिन के सपने द…

मुख़्तसर ये कहना...

एक हल्के से टी-शर्ट में छत पर बैठा हूँ. शाम से ही मौसम खुशनुमा होने लग गया था. बदन से गरम कपड़े उतारते ही लगा जैसे किसी रिश्ते के बोझ को ढ़ो रहा था और संबन्ध ख़त्म हुआ. इतना साहस तो सबमें होना चाहिए कि वह ज़िन्दगी की कॉपी में लिखे कुछ नामों पर इरेजर घुमा सके मगर ऐसा होता नहीं है. मैं तो नए मिले लोगों के भी बिछड़ जाने के विचार मात्र से ही सिहर जाया करता हूँ. रौशनी में कस्बा चमकता है. आसमान में धुले हुए तारे हर दिशा में और चाँद पश्चिम में लटका है. मैं मदभरी हवा में तुरंत अपना ग्लास उठा लेता हूँ और भूले हुए सदमें याद करता हूँ.

अपनी गणित लगता हूँ कि सदमे का कोई स्थायी शिल्प नहीं होता. वह हर घड़ी अपना रूप बदलता रहता है. अभी जो नाकाबिल-ए-बरदाश्त है, वह कल तक अपनी गहनता को बना कर नहीं रख सकता. ग़म और खुशियाँ समय के साथ छीजती जाती है. उन पर दुनियादारी के आवरण चढ़ते रहते हैं और इस तरह हम जीवन में निरंतर सीखते हैं. सब वाकयों को हमारे भीतर का एक खामोश टेलीप्रिंटर दर्ज करता जाता है. इस सब के बावजूद ज़िन्दगी सदा के लिए अप्रत्याशित ही है. वह नई राह नए समय में बखियागरी के नए हुनर दिखाती ह…

मेहरुन्निसा ख़ाला, आप बहुत अच्छा लिखती हैं...

दोपहर की धूप लाचार सी जान पड़ रही थी. दफ्तर सूना और कमरे बेहद ठन्डे थे. स्टूडियोज में बिछे हुए कालीनों तक जाने के लिए शू ऑफ़ करने होते हैं तो काम के समय पांव सारा ध्यान खींचे रखते हैं. अफसरान का हुक्म है कि हीट कन्वेक्टर का इस्तेमाल किया जाये लेकिन रेगिस्तान में दिन के समय इनका उपयोग मुझे बड़ा अजीब सा लगता है. मैं अपनी रिकार्डिंग्स को पूरा करके बाहर खुले में निकल जाता हूँ. कार्यालय के भीतरी द्वार के ठीक आगे सरकारी कारों के घूमने के लिए जगह छोड़ी हुई है. बीच के छोटे से बागीचे और हमारे माली के बीच पिछले सत्रह सालों से लडाई चल रही है. मिट्टी अपने फूल खिलाना चाहती है माली दूसरे फूल.

गार्ड के पास कपड़े की लीरियों और चिंदियों को कातने का हुनर है. वह एक्स आर्मी पर्सन है. कभी मुलायम कपड़े की फुल थ्रू से बंदूकों की नाल साफ़ करते रहे होंगे, आज कल ढेरिया घुमाने या क्रिकेट कमेंट्री सुनने के सिवा विशेष अवसरों पर होने वाली पार्टियों में आर्मी के सलीके से पैग बनाते हैं. मुझे देखते हैं और कहते हैं कुर्सी लगा देता हूँ लेकिन मैं पिछले तमाम सालों में उलटे रखे हुए गमलों पर बैठना पसंद करता रहा हूँ. मैं धूप…

बेहिजाब तन्हाई में

उदासियाँ अपने पहलू में सकेरता हूँ
और हथेलियों के आईने में उगती हैं तस्वीरें
फिर बेहिजाब तन्हाई में देखता हूँ कि
तेरे जूड़े में खिलती शाम से धुंधला गए हैं चमेली के फूल
और मैं छीजती शाम की आखिरी कोर पर बैठा हुआ
ओढ़ता हूँ तेरी सांसों के लिबास...

बच्चे जब स्कूल चले जाते हैं
या दफ्तर में अलसायी दोपहर पसरने लगती है
जाने ये कैसे ख़याल आते हैं ...बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं


* * *

सुबहें अब भी जरा देर से हुआ करती हैं. रात को सपने सताते रहते हैं. सपने में जंगल है. संकरे रास्ते हैं. मैं किसी अपघाती सा घूमता हूँ. कुछ टहनियों को हटाते ही खुला मैदान आ जाता है और दो एक पत्तियां सब कुछ अँधेरे से ढक देती है. मेरे साथ कोई है जिसकी शक्ल नहीं दिखती. सपने में दुस्साहस है मगर प्रेम नहीं है, सहवास नहीं है. बेचैनी में जागता हूँ और कोसता हूँ. उजाले में मकानों की पहचान गढ़ता हूँ. उलझे हुए धागों को भूलने के लिए म्यूजिक प्ले कर देना चाहता हूँ. सबकी की एक प्ले लिस्ट होती है मेरी भी है. इसमें शुजात हुसैन साहब की इस ठुमरी को कब से सुन रहा हूँ याद नहीं मगर ये चरवाहे सी है जो सुकून की भेड़ों को घेर लाती है.

थोड़ी सी शराब और बहुत सा सुकून बरसे...

ये बेदखली का साल था. हर कोई अपनी ज़िन्दगी में छुअन के नर्म अहसासों को तकनीक से रिप्लेस करता रहा. सौन्दर्यबोध भी एप्लीकेशंस का मोहताज हो गया था. हमने अपनी पसंद के भविष्यवक्ता और प्रेरणादायी वक्तव्य पहुँचाने वाली सेवाएं चुन रखी थी. सुबहें अक्सर बासी और सड़े हुए समाचारों से होती रही. शाम का सुकून भोर के पहले पहर तक दम तोड़ने की आदत से घिरा रहा. कभी किसी हसीन से दो बातें हुई तो कुछ दिन धड़कने बढ़ी फिर बीते सालों की तरह ये साल भी बिना किसी डेट के समाप्त हो गया.

पिछले साल एक किताब कभी रजाई से झांकती तो कभी उत्तर दिशा में खुलने वाली खिड़की में बैठी रहा करती. कभी ऑफिस में लेपटोप केस से बाहर निकल आती फिर कभी शामों को शराब के प्याले के पास चिंतन की मुद्रा में बैठी रहती. मैं जहां जाता उसे हर कहीं पाता था. कुछ एक पन्नों की इस किताब के एक - एक पन्ने को पढने में मुझे समय लगता जाता. आखिर दोस्त अपने परिवारों में मसरूफ़ हुए, ब्लॉग और फेसबुक पर ख़त-ओ-किताबत कम हुई और मैंने उसे पढ़ लिया. इसे पढने में मुझे कोई आठ - नौ महीने लगे हैं.

आंग्ल भाषा की इस किताब का शीर्षक है, क्या हम सभ्य हैं ? मुझे इसे पढ़ कर बे…