An illegally produced distilled beverage.


October 28, 2011

होश कहां होता है, इज़्तराब में...



मैंने चाहा कि लेवेंडर की पत्तियां अपनी हथेली में रख कर मसल दूँ. मैं झुक नहीं पाया कि मेरे कमीज़ और हथेलियाँ में कोई खुशबू भरी है. फुरसत के चार कदम चलते हुए जब हसरतों के कुरते की सलवटों में छिपे हुए बेक़रार रातों के किस्सों को पढना चाहें तो आधा कदम पीछे रहना लाजिमी है. ज़रा आहिस्ता चलता हूँ कि अपने कौतुहल में लिख सकूँ, ज़िन्दगी की लहर का किनारा क्या उलीचता और सींचता रहता है. इस लम्हे की खुशबू के उड़ जाने के डर के बीच ख़याल आता है कि क्या मेरा ये लम्हा किनारे की मिट्टी पर बिखरे हुए सीपियों के खोल जैसी किसी स्मृति में ढल कर रह जायेगा.

मैंने फूलों और चीज़ों को उदासीन निगाहों से देखा और फ़िर सोचा कि रास्तों के फ़ासलों की उम्र क्या हुआ करती है? खुशबू की ज़द क्या होती है? इस वक़्त जो हासिल है, उसका अंज़ाम क्या है? मुझे याद आया कि ईश्वर बहुत दयालु है. वह सबके लिए कम से कम दो तीन विकल्प छोड़ता है. उनमें से आप चुन सकते हैं. मेरे पास भी दो विकल्प थे. पहला था कि मैं वहाँ रुक नहीं सकता और दूसरा कि मैं वहाँ से चला जाऊं. एक आम आदमी की तरह मैंने चाहा कि शिकायत करूँ लेकिन फ़िर उसके आराम में खलल डालने का इरादा त्याग दिया. उसे मुहब्बत से अधिक गरज नहीं है. उसके रोजनामचों में ऐसी बेढब हरकतों के बारे में कुछ दर्ज नहीं किया जाता कि इस दुनिया में हर पल असंख्य लोग खुशबुओं की चादरें सर पर उठाये हुए मुहब्बत की पुरानी मजारों की चौखटें चूमते रहते हैं.

खो देने का अहसास कुछ ऐसा होता है जैसे समय की धूल में गुम हुआ कोई शहर याद आये. उस शहर की गलियों की तसवीर दिखाई दे और ऐसा लगे कि इस जगह पर हम पहले भी थे. या किसी कालखंड में यही जीवन पहले जीया जा चुका है. आस पास पहियों के शोर पर भागता हुआ शहर किसी थ्री डी फ़िल्म सा असर जगाता है लेकिन मैं सिर्फ़ एक निरपेक्ष दर्शक हूँ. नाकाम और बेदखल दर्शक. चुप खड़े पेड़ों के टूटे पत्तों की आहटों के साथ अजनबी रास्तों पर बेवजह टहलते हुए बिछड़ने के बाद के हालात के बारे में सोचता हूँ. एक गहरी उदासी के साथ घबराहट बेआवाज़ कदमों से बढ़ी आती है.

भूल जाता हूँ कि इस मंथर काल में भी सब कुछ अद्वितीय है. इसे दोहराया नहीं जा सकता. यह बीतता हुआ लम्हा और ठहरा हुआ दृश्य अजीर्ण है. यह सवालों का कारखाना है कि इस जीवन रसायन के केटेलिस्ट क्या हैं? जो एक सहज, सरल प्रेम विलयन को बनाते हैं. ज़िन्दगी के अज़ाबों से लड़ते हुए कुछ सख्त हो चला चेहरा किस तरह निर्मल उजास से भर जाता है. दुनिया की सिखाई हुई मायावी समझ के मुखौटे को उतार कर अपने असली वजूद में लौट आता है. प्रेम का सघन रूप किस तरह इतना पारदर्शी होता है.

उसने कहा कि लैवेंडर के इन पत्तों पर बैंगनी फूल नहीं खिलेंगे...

मौसम बदल रहा है. हवा का रुख भी. धूप खिला करेगी और नए फूल उम्र का सफ़र तय करते रहेंगे. मालूम नहीं अपने प्रेम के एकांत को संवारने के लिए वह पार्क के कितने चक्कर काटेगी. लोग टहल कर निकल जाया करेंगे और बैंचों की हत्थियों के नीचे कुछ ओस की बूँदें बची रह जाएगी जैसे बचा रह जाता है एक आंसू... जिसकी नातमाम बातें हथेलियों पर खिल उठेंगी. नाभि के पास तितलियों के घोंसले में हवा की सरगोशी गोया किसी किस्से से आती एक रूमानी अज़ान. बेचैनी दर बेचैनी. ये किसने पुकारा है मुझे... वक़्त का सिरा कहां खो गया है. मैं कौन हूँ... आओ लौट कर. मुझे मेरी पहचान बख्श दो.

* * *
इज़्तराब : उद्विग्नता, विह्वलता, ANXIETY.

October 14, 2011

चाँदनी रात में


ढ़लान शुरू होने की जगह पर बने घर का हल्की लकड़ी से बना दरवाज़ा टूटा हुआ था. उसकी ढलुवाँ छत पर रौशनी बिखरी थी कि ये डूबते चाँद की रात थी. वह दरवाज़ा थोडा खुला, थोडा बंद ज़मीन और चौखट के बीच अटका हुआ था. जैसे कोई उदासीन प्रेम एक तयशुदा इंतज़ार में दीवार का सहारा लेकर बैठा हो.

घर की दर ओ दीवार को बदलती हुई रुतें चूमती निकलती है. बरबाद हुए कोनों को झाड़ने पौंछने और मटमैली दीवारों को सफ़ेद चूने से रंगने के काम वाले इन्ही दिनों घाटी में मौसम की पहली बर्फ गिरा करती है. रेगिस्तान की रातें भी ठण्ड से भर जाती है और पानी से भरी हवा वाली सुबहें खिला करती है. दो रात के बाद इस बार रुत कायम न रह सकी. चाँद पूरब में हाथ भर ऊंचा खिला हुआ है. मैं अपनी छत के ठीक बीच में चारपाई लगा कर उस घर को याद करता हूँ, जो ढ़लान शुरू होने की जगह पर बना है.

उस घर में कौन रहता था? नहीं मालूम कौन...

* * *

नीचे लॉन में खिले हुए पौधों पर चांदनी गिरती है तब उनको देखना अच्छा लगता है. किन्तु पड़ोस की छतों पर लोग जाग रहे होते हैं. उम्मीदें और अनसुलझे सवाल उनकी नींदें चुराए रखते हैं. वे क्या सोचें कि मैं किसलिए रात को अपनी छत पर भटक रहा हूँ? इसलिए अपना ये इरादा त्याग देता हूँ. चारपाई पर बैठ कर सोचता हूँ कि अच्छा क्या था. कोई बोसा, कोई स्पर्श या फ़िर कोई मदहोशी से भरा जाम....

मैंने कहा. "तुम जाया हो गये हो." थोड़ी देर चुप रहने के बाद इसका मतलब समझ नहीं आया. जाया होना क्या होता है. ये जो सुबह सुबह तिल पर सफ़ेद फूल खिले होते हैं या मोठ की तिकोनी सी पत्तियां मुस्कुराती है ना, सब एक दिन में खो जाते हैं. ऐसे ही उस घर के अंदर की चांदनी चली गयी. अब बस भीगी हुई छत चमकती है, रात भर...

* * *

चाँद ने रात का आधा सफ़र तय कर लिया. मैं सो जाऊं और तुम भी आज की रात के लिए लुढ़का दो, अरमानों की सुराही... इस वक्त मैं एक छतरी तान लेना चाहता हूँ कि रौशनी का लिबास चुभ रहा है. 

October 8, 2011

जबकि वो उस शहर में नहीं रहती...




मैं मर गई हूँ. तुम भी अपने बिस्तर में मर जाओ.
उसने पहली बार देखा कि मरने के बाद चाँद तारों को देखना कितना अच्छा लगता है. नींद की प्रतीक्षा नहीं रहती. हवा और पानी की जरुरत ख़त्म हो जाती है. ब्रेड के बासी हो जाने या सर्द दिनों में दही के सही ढंग से जमने की चिंता से भी मुक्त हो जाते हैं. सबसे अलग बात होती है कि मरने के बाद कोई आपका इंतजार भी नहीं करता. वो इंतजार, जिससे उकता कर हर रात हम अपने बिस्तर में मर जाते हैं. ये सोचते हुए कि चाँद कायम रहा और सूरज रोज़ की तरह उगा तो सुबह देखेंगे कि हवा में ठंड कितनी बढ़ गयी है.

इन दिनों मैं यहाँ नहीं था, यह सच है.
मैं अजनबी भूगोल की सैर पर था. अपनी समझ खो चुके एक भटके हुए यात्री की तरह मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मेरे लिए वह नयी जगह थी. वहाँ पर बहुत सामान्य और उपेक्षा योग्य चीज़ें भी मुझे डरा रही थी. मैं एक पहली कक्षा का बच्चा था, जो दर्शनशास्त्र की किताब पर बैठा हुआ था. उस शहर में मेरा कोई नहीं रहता. उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ों का रास्ता उसी जगह से जाता है. हाँ, बीस एक साल पहले मेरी एक बहन जोरहट में रहा करती थी. उसके फोन आया करते थे लेकिन मैंने कभी पूछा नहीं कि पहाड़ों के शहर कैसे दिखते हैं. अब सोचता हूँ कि हमें पूछते रहना चाहिए कि हमारी नियति का वेब जटिलता से गुंथा है. इसके अलग अलग सिरे हमारी प्रतीक्षा में होते हैं. संभव है कि इसे पढ़ते हुए तुम्हें भी ये ख़याल आये कि कभी इस रेगिस्तान में आना होगा.

कभी कभी हमें,
उन जगहों का मुआयना कर लेना चाहिए, जहाँ आने वाले कुछ सालों में जाना होता है.
मैंने देखा कि वहाँ हरे रंग की चादर बिछी है. घुमावदार रास्ते हैं. शहर से बाहर किन्हीं दो छोटी पहाड़ियों पर एक चौकोर हवेली खड़ी है. उसकी अनगिनत खिड़कियाँ बंद हैं. मैंने अग्नि दिशा की एक खिड़की को खोल कर देखा था. दूर तक चुप्पी पसरी थी. निर्जीव चुप्पी. मुझे उस हवेली में एक बड़ी अजीब सी अनुभूति हुई. जब मैं खिड़की से बाहर देखता तो लगता कि ये ऊंची नीची घाटियों वाला चुप सा स्थान है लेकिन जैसे ही मैं खिड़की बंद करता, एक भरा पूरा निर्जन रेगिस्तान दिखाई देने लगता.

साया अक्सर तनहा क्यों होता हैं? ये मुझे अब तक समझ नहीं आया.
उस हवेली में भी कोई था. ऐसा कोई जिसे कई सालों बाद वहाँ आना है. किसलिए? ये मालूम नहीं. मैं एक अफ़साना बुनने लगा. विस्मृत हो चुके दिनों का अफ़साना. इसकी सही शुरुआत के लिए मैं अपने होस्टल के कमरा नम्बर तीन सौ सात में चला आया. उसकी बालकनी में सिगरेट के टोटे पड़े थे. मुझे धुंए की तलब ने घेर लिया. मैं तीसरे माले से नीचे की ओर जाती हुई सीढियों की तरफ बेतहाशा भागने लगा. उस कमरे में आज भी जरुर किसी नौजवान की गंध बसी होगी लेकिन मैं अपने अतीत के दृश्यों को देख कर घबरा गया था. मुझे लगा कि मैं कितना बीत चुका हूँ.

उसकी आवाज़ सबसे अधिक रोमांस से भरी तब लगती जब वो बागीचे में घूमते हुए बात करती. मुझे ओल्ड केम्पस के सामने वाली रुई धुनने की दुकान में उड़ते हुए फाहे याद आने लगते. मैं सोचने लगता कि उसकी सांसें नर्म नाजुक फाहों की तरह आस पास उड़ रही है और वह उनको करीने से रखने के जतन किये जा रही है. सुबह और शाम बागीचे की हवा मेरे साथ चलती है. रात को आकाश में तारों की वो ज्यामितीय संरचना फ़िर अपने पास बुला लेती है. जिसमें एक तने हुए धनुष बाण का आभास होता है. अचानक आवाज़ फ़िर से आई, शायद यही कहा था. मैं मर गयी हूँ...

कई बरस हुए उसका फोन नहीं आया मगर अब उसे कभी ऐसा न कह सकूँगा कि मैं सिलीगुड़ी नहीं गया.

डरते हैं बंदूकों वाले