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Showing posts from November, 2011

अनुपस्थिति

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आज मैं तुमको जोर्ज़ बालिन्त की एक कहानी सुनाना चाहता था किन्तु जाने क्यों अब मेरा मन नहीं है. मैंने उस कहानी के बारे में अपनी लिखी हुई बीसियों पंक्तियों को ड्राफ्ट में छोड़ दिया है. मौसम में कोई रंगत नहीं है कि कुदरत के फ्रीज़र का दरवाज़ा अभी खुला नहीं है. मेरी अलमारी में अच्छी विस्की की बची हुई एक बोतल बहुत तनहा दीख रही है. नहीं मालूम कि हिना रब्बानी खान इस वक़्त किस देश के दौरे पर है और अमेरिकी सुंदरी कार्ला हिल्स ने उन्नीस सौ बानवे में जो कहा था कि हम दुनिया में शांति लायेंगे और सबको रहने के लिए घर देंगे, उसका क्या हुआ? फिर भी दिन ये ख़ास है इसलिए इस वक़्त एक बेवज़ह की बात सुनो.
दीवार की ट्यूबलाईट बदल गयी है सफ़ेद सरल लता में
और संवरने की मेज़ का आइना हो गया है एक चमकीला पन्ना.

मोरपंखों से बनी हवा खाने की एक पंखी थी
वो भी खो गई, पिछले गरम दिनों की एक रात.
मेरे सामने रसोई का दरवाज़ा खुला पड़ा है मगर जो चाकू है
वह सिर्फ़ छील सकता हैं कच्ची लौकी.

और भी नज़र जो आता है सामान, सब नाकामयाब है.

कि मेरी दो आँखों से सीने तक के रास्ते में
आंसुओं से भरा एक फुग्गा टकराता हुआ चलता है, हर वक़्त.

वह…

चैन भी है कुछ खोया खोया...

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एकांत के अरण्य का विस्तार क्षितिज तक फैला दीखता है किन्तु इसकी भीतरी बुनावट असंख्य, अदृश्य जटिलताओं को समेटे हुए है. एक विचार जब कभी इस जाल के तंतु को छू जाये तो भीतर रह रही, अवसाद नामक मकड़ी तुरंत सक्रिय हो जाती है. मैं इसीलिए निश्चेष्ट और निरुद्धेश्य समय को बीतते हुए देखता हूँ. उसने कई बार कहा कि आप लिखो. मुझे इसका फ़ौरी जवाब यही सूझता कि हाँ मैं लिखूंगा. लेकिन आवाज़ के बंद होते ही उसी समतल वीराने में पहुँच जाता हूँ. जहाँ जीवन, भुरभुरे ख़यालों की ज़मीन है. दरकती, बिखरती हुई...

संभव है कि विलक्षण व्यक्तियों का लिखा हुआ कई सौ सालों तक पढ़ा जाता रहेगा और पाठक के मन में उस लिखने वाले की स्मृति बनी रहेगी... और उसके बाद? मैं यहीं आकर रुक जाता हूँ. पॉल वायला के जीवन की तरह मैं कब तक स्मृतियों के दस्तावेज़ों में अपना नाम सुरक्षित रख पाऊंगा. मेरे इस नाम से कब तक कोई सर्द आह उठेगी या नर्म नाजुक बदन अपने आगोश में समेटने को बेक़रार होता रहेगा. मैं सोचता हूँ कि कभी उससे कह दूंगा कि मेरा जीवन एक सुलगती हुई, धुंए से भरी लकड़ी है. जिसके दूसरे सिरे पर एक आदिम प्यास बैठी है. वक़्त का बढ़ई …

कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे

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उस मोड़ पर एक आदमी नई चिलम छांट रहा था. मैंने पीछे मुड़ कर देखा. रास्ता सूना था फिर गाड़ियों की एक कतार मेरी बेखयाली को चीरती हुई गुजरने लगी. मुझे अचरज हुआ कि अभी थोड़ी ही देर पहले मैं कार में बैठा हुआ सिगरेट के बारे में सोच रहा था और अब इस आदमी को देख रहा हूँ. मैंने कई सालों से सिगरेट नहीं पी है. अब भी कोई जरुरत नहीं है. फिर ये क्या खाली हुआ है जिसे धुंए से भरने का मन हो आया है. मैंने उस आदमी के बारे में सोचा कि जब वह चिलम पिएगा तो हर बार उसे और अधिक धुंआ चाहिए होगा. एक दिन वह थक कर लुढ़क जायेगा. उसे समझ नहीं आएगा कि जो चिलम का पावर हाउस था, वो क्या हुआ...
मुझे भी समझ नहीं आ रहा. अचानक चाहा, यही बैठ जाऊं कि मैं बहुत चिलम पी चुका हूँ. फिर देखा दूर तक सड़क खाली थी. नीली जींस और सफ़ेद कुरता पहने हुए खुद को देखा तो उस लड़के की याद आई जो एक शाम चूरू की वन विहार कॉलोनी के मोड़ पर लगे माइलस्टोन पर देर तक बेवजह बैठा रहा. कि उस दिन कोई नहीं था. सब रास्ते शोक मग्न थे. सड़क के किनारे खड़े कीकर के पेड़ों पर सफ़ेद कांटे चमक रहे थे. बुझती हुई शाम में दरख्तों की लंबी छाया घरों की दीवारों को चूम रही थी म…

लड़की, जिसकी मैंने हत्या की

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उसका नाम चेन्नमा था. उसके माता पिता ने उसे बसवी बना कर छोड़ दिया था. बसवी माने भगवान के नाम पर पुरुषों की सेवा के लिए जीवन का समर्पण. चेनम्मा के माता पिता जमींदार ब्राह्मण थे. सात-आठ साल पहले वह बीमार हो गयी तो उन्होंने अपने कुल देवता से आग्रह किया था कि वे इस अबोध बालिका को भला चंगा कर दें तो वे उसे बसवी बना देंगे. ऐसा ही हुआ. फिर उस कुलीन ब्राह्मण के घर जब कोई मेहमान आता तो उसकी सेवा करना बसवी का सौभाग्य होता. इससे ईश्वर प्रसन्न हो जाते थे.
नागवल्ली गाँव के ब्राह्मण करियप्पा के घर जब मैं पहुंचा तब मैंने उसे पहली बार देखा था. उस लड़की के बारे में बहुत संक्षेप में बताता हूँ कि उसका रंग गेंहुआ था. मुख देखने में सुंदर. भरी जवानी में गदराया हुआ शरीर. जब भी मैं देखता उसके होठों पर एक स्वाभाविक मुस्कान पाता. आँखों में बचपन की अल्हड़ता की चमक बाकी थी. दिन भर घूम फिर लेने के बाद रात के भोजन के पश्चात वह कमरे में आई और उसने मद्धम रौशनी वाली लालटेन की लौ को और कम कर दिया.
वह बिस्तर पर मेरे पास आकार बैठ गयी. मैंने थूक निगलते हुए कहा ये गलत है. वह निर्दोष और नजदीक चली आई. फिर उसी ने बताया कि म…

मर्तबान की तलछट में उदासी

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प्रेम निर्वृति नहीं है. इसका उद्यापन असंभव है.
एक मांझा सीढ़ियों के किनारे पर अटक गया है. भौतिकी पढ़े बिना किसी बच्चे ने मांझे के तनाव में तरंगों का संसार रच कर अपनी चरखी के लिए अधिकतम हिस्सा बचा लिया होगा. मैंने सोचा कि मेरे पास भी एक साबुत डोर कहां बची है. मुझे ये हुनर क्यों नहीं आया. मेरा धागा तो उलझा ही रहा और चरखी टीन-ऐज़ को अलविदा कहने के दिनों में कहीं खो गयी.
साल डूबते गए और ख़ुशी सकेरने की कोशिश में ज़िन्दगी की डोर का सिरा कितनी ही बार ज़ख़्मी होकर टूटता गया. हम प्रेम कि तलाश में जिस निर्मल और साबुत मन को लेकर निकले थे. वह कितनी ही बार बिखर चुका है और उसका तलछट गंदली स्मृतियों से भर गया है. इस पारदर्शी मर्तबान में रखी आशाएं विनष्ट हो चुकी हैं.
इसी असंभव से नफ़रत करते हुए एक बेवजह की बात.

उन दिनों स्पाई कैम नहीं थे और जेब खर्च से नहीं खरीदा जा सकता था, एक सीसीडी कैमरा.
इसलिए उसने खिड़की में बैठे हुए, फर्श पर लेटे हुए, बस के सफ़र की नीम नींद में मेरे होठों पर रखे, नर्म ताजा बोसे.
मेरे सीने पर लिखा, अपने आंसुओं की स्याही से और आँखों की अचरज भरी रौशनी से बुनी,

जबकि ऐसी कोई वजह नहीं...

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इन सुस्ताई हुई रातों की भोर के पहले पहर में आने वाले ख्वाबों में बच्चों की सेहत और एक उपन्यास जितना लम्बा अफ़साना लिखने के दृश्य होने चाहिए थे. लेकिन आज सुबह बदन में ठण्ड की ज़रा झुरझुरी हुई तब देखा कि एक मुसाफ़िर बाहर वाले कमरे में अपना सामान खोल रहा था. रात घिर आई थी. मुझे किसी सफ़र पर जाना था और चीज़ें सब बिगड़ी हुई थी. ग्यारह दस पर छूटने वाली गाड़ी का कोई मुसाफ़िर मुझे फोन पर पूछता है कि क्या सामने वाली बर्थ आपकी है? सपने की नासमझी पर अफ़सोस हुआ कि किसी मुसाफ़िर को मेरा फोन नम्बर कैसे मालूम हो सकता है.

एक पेढी पर से फांदता हुआ अपने थैले के पास आ जाता हूँ. बोध होता है कि मेरे बैग में बेकार पुराने कपड़े भरे हैं. मैं उनको बाहर कर देने के लिए उसको देखता हूँ. लेकिन उसमें पिछली सर्दियों में लिए गये दो नए स्वेटर खाकी रंग के कागज के लिफाफे में रखे हैं. ये जरुर जया ने किया होगा, ऐसा सोचते हुए भाई की आवाज़ सुनता हूँ. वह मुझे लगातार होती जा रही देरी में भी ट्रेन तक पहुंचा देने के लिए चिंतित है. मेरा टिकट खो गया है. वह सब दराजों और बैग के खानों में तलाश लिए जाने के बावजूद नहीं मिलता. …

दूर से लगता हूँ सही सलामत

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मैं इससे दूर भागता रहता हूँ कि ज़िन्दगी के बारे में सवाल पूछना कुफ्र है. ये क्या सोचते हो? ऐसे तो फिर जीना कितना मुश्किल हो जायेगा? इस सवाल को रहने दो, जब तक है, अपने काम में लगे रहो... इन गैरवाजिब बातों में सुख है. ज़िन्दगी से प्रेम करने लगो तो डर बढ़ता जाता है. उसी के खो जाने का डर, जिससे प्रेम करने लगे हों. अचानक ऊपरी माले में एक सवाल अटक जाता है कि न रहे तो?

साँस घुटने लगती है. बिस्तर पर झटके से उठ बैठता हूँ. सोचता हूँ बच्चों को बाँहों में भर लूं... पत्नी का हाथ थाम लूं. सीधा खड़ा हो जाऊं. अपने सर को पानी झटकते हुए कुत्ते की तरह हिलाऊँ. अपनी सांसों पर ध्यान दूँ कहीं कोई साँस छूट न जाये. ख़ुद से कहता हूँ कि ये दीवानगी है. सब तो खैरियत से हैं. अभी चीज़ों ने ख़ुद को थाम रखा है. थोड़ी देर रुको सब सामान्य होने लगेगा. वह थोड़ी देर नहीं आती. वह समय मीलों दूर है. दोनों हथेलियों को बिस्तर पर टिकाये हुए मुंह खोल कर साँस लेता हूँ. कुछ लम्बी सांसें...

ऐसे अनगिनत दिनों में भय निरंतर पीछा करता रहा. एक उदास दोपहर में दोस्त ने पूछा फिर कैसे छुटकारा होगा ? वह सेडेटिव, जो आपके मस्तिष…