Skip to main content

ये कोई नहीं जानता...


स्टूडियो के कालीन पर जाने कितनी बार दोस्तों के साथ अधलेटे हुए कुछ गीतों के मिसरे सुने, कभी साज़ छेड़ते हुए किसी ने कोई ग़ज़ल गुनगुनाई और मैं उनको अपनी बेवजह की बातें और दम झूठी कहानियों के प्लाट सुनाता रहा. इस तरह दफ़्तर की ज़िंदगी के दिन और रात बुझते गए. कल मगर साँझ के साथ ठंडक लौट आई. रात में अजब तन्हाई थी. स्टूडियो के कालीन पर लेटे हुए लगता था किसी से बातें किये जा रहा हूँ. मुझे अक्सर मालूम नहीं होता कि किसकी कमी को अपने आस पास पाता हूँ. किसलिए एक तवील ख़ामोशी गढता हूँ. मैं किसलिए शहरों में एक सूनी पड़ी बैंच और वीरानों में दरख़्त का घना साया सोचता हूँ.

सब बेसलीका सब बेसबब ... जैसी कि ये कुछ बेवजह की बातें हैं. एक चश्मे वाली लड़की को याद करते हुए लिखी थी. वो लड़की जो मुझे मेट्रो में मिला करती थी. हालाँकि मैं बड़े शहरों को गया नहीं और रेगिस्तान में मेट्रो की जरुरत नहीं. फिर आज सुबह के ख्वाबों में मैंने एक पारदर्शी फ्रेम वाला चश्मा लगा रखा था. मैं घबराया कि सोते हुए ये कहीं टूट न गया हो. सब उलझन है, इसलिए अकेलेपन का शोर है और सघन उदासी. ज़िंदगी उतनी वाहियात भी नहीं है जितनी कि मैं सोचता हूँ मगर क्या करूँ ऐसी बातें लिखने में ही सुकून आता है.

उसने चश्मे की ओट से
दस्तक देने वाले से पूछा
कि कौन हो तुम?

ज़िन्दगी फिर दगाबाज़ निकली.
वहां कोई नहीं था
* * *

उसने दिव्य दृष्टि से खोला
ज़िन्दगी का आखिरी पन्ना.
और पढ़ कर चौंक उठी.

कि वह ताउम्र अकेली थी.
* * *

एक नन्हे बच्चे ने अपनी कॉपी में
लकीरों से बनाये कई उलझे हुए रास्ते
फिर सो गया आँगन के बीच में.

आधी नींद में नाचती रही उसकी पुतलियाँ
वह मुस्कुराया कई बार
और अचानक उदासी के एक वर्तुल ने काटा
उसके चेहरे पर चक्कर.

आखिर वह कच्ची नींद से उठ बैठा.

उसे नीम नींद में कोई कर गया होगा तन्हा
मुझे लगा, छूट रहा है तुम्हारा हाथ मेरे हाथ से.

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…