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बस ज़रा कुछ देर और...


ऑफिस जाते हुए एक गली के मोड़ पर कंचे खेलते हुए कुछ बच्चे दिख जाते हैं. एक लड़का कोसता है, कुछ ख़ुद को और कुछ साली तक़दीर को कि गुब्बी में एक साथ दो कंचे आ गए हैं. मैं उनकी तस्वीर उतार लेना चाहता हूँ मगर याद आता है कि कैमरे का मैमोरी कार्ड क्रैश हो गया है. बात सिर्फ़ दो तीन सौ रुपये की है मगर ऐसी छोटी बातें भी कई बार छीन लेती है, क्या कुछ. जैसे कि कई बार आप सोचते हैं कि काश कह दिया होता उसको कि हर कोई नहीं हो सकता है, साथ. दूरियों पर भी छोड़ देनी चाहिए, कुछ चीज़ें.

देखो केसी, कैसे कैसे लोग स्क्रिप्ट राईटर, लिरिसिस्ट, ऑथर... और भी जाने कितना ऊंचा उनका नाम. मैं कहता हूँ जाने दे, जो जैसा होना चाहता है, हो जाता है. मैं रेगिस्तान में रह कर डायरी लिखना चाहता हूँ कि मेरे दिल पर लिखा है, इस मिट्टी से प्रेम... और सुन कि जब पढ़ने पर आते हैं लोग तो पढ़ लेते हैं चलते हुए आदमी के दुखों को भी और भयानक अँधेरे के वक़्त भी कहीं से आ ही जाती है, उम्मीद की रौशनी.
चल, कुछ बेवजह की बातें करते हैं.

प्रेम होता जाता है अनावृत
आफतें बुनती रहती हैं, ज़बरदस्त पैरहन
* * *

उलट पुलट कर दिल की ज़मीं को
बैठ जाता है किनारे
प्रेम की फसल के लिए चाहिए, एक तूफ़ान भरी बारिश.

किसान देखता रहता है उसकी आँखें.
* * *

दिल एक नट की तरह
हाथों में लिए उम्मीद का बांस
हवा में डोलता रहता है, याद के तार पर.

कोई बजाता रहता है, डुगडुगी इश्क़ की
कि आ रही उनके क़दमों की आहट,
बस ज़रा कुछ देर और...
* * *

[ Image courtesy : Prateeksha Pandey  ]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…