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आखिर ये दुनिया है...


मुझे नहीं मालूम कि अपनी डायरी में क्या लिखना चाहिए. ये भी नहीं मालूम कि क्या याद रखूं किसे भूल जाऊं. सब आसान है और सब मुश्किल. सोचता हूँ कि उसे कह कर अच्छा किया. अगले पल आता है ख़याल कि मेरे अन्दर से ही कोई उठे और मुझे बहुत सारी गालियाँ दे. ऑफिस के लोग जा चुके होते हैं और मैं अपने कमरे में बैठा होता हूँ. गार्ड से कहता हूँ थोड़ा रुकिए अभी आता हूँ. इसलिए कि कुछ भी आसान नहीं है. सब मुश्किल है. थक कर छत की ओर देखता हूँ. याद आता है कि कल रात भी वह ततैया वहीं पर बैठा था. अचानक आता है ख़याल कि वह तो ट्यूब लाईट के स्टार्टर से चिपक कर कब का मर चुका है ... आह मुश्किल आसान हुई. उदास न हो केसी घर चलो.

कुछ बेवजह की बातें मुश्किलों के बारे में...

किसी न किसी को पढ़ना ही होगा पाठ
बेहतर है कि हम पढ़ा सकें मुश्किलों को.
* * *

उसकी दी हुई तकलीफों को
छुपा लो, घबराए हुए कुत्ते की दुम की तरह
और बैठो किसी तनहा जगह पर.

तुम उम्र भर चाटते हो तलवे प्रेम के
और वह एक बार फेर कर तुम्हारे सर पर हाथ
हो जाना चाहता है अपराधबोध से मुक्त.
* * *

क्योंकर हो ऐसा
कि कह दे वह, नहीं जीया जाता तुम्हारे बिना
और आफत है लेना साँस भी.

क्योंकर न हो हर तरफ दर्द
कि मुझ पर टूटनी ही चाहिए कोई न कोई मुश्किल
आखिर ये दुनिया है, कोई ख़ाला का बाड़ा नहीं.
[ख़ाला का बाड़ा -  मौसी के घर में कंचे खेलने की जगह]
* * *

मुश्किल, रेत में दबा एक संदेश है कि गधों को लौट जाना चाहिए पोखरों के पास और ऊंट देख लें उठा कर अपनी गरदन कि प्रेम का घर कितनी दूर है. साथ ही ये भी लिखा है कि मुश्किलें डरती है, औरत की हाय से... इसलिए जब तक पकड़ के चलोगे उसका हाथ, वे इंतज़ार के सिवा कर न सकेंगी कुछ.

[तस्वीर, सर्च इंजन से और क्रेडिट नामालूम Image courtesy : no credit found]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…