Skip to main content

मर जाता है शैतान उसकी याद में...



शोक क्षणभंगुर है मगर स्मृति कालजयी है. पिताजी जिस घर में बड़े हुए थे, उसकी बाखल की ओर मुंह किये हुए सोचता हूँ कि इस जाळ के पेड़ से अब कितना कम मिलना हो पायेगा. इस पुश्तैनी घर में रहने वाली बड़ी माँ में उन सबका भी हिस्सा था जिनका इस घर में कोई हिस्सा न था. पिताजी कहते थे कि भाई ने स्कूल छोड़ कर खेती की और हम सब छोटे भाईयों को पढाया. इसलिए वे हमारे पिता समान है. साल दो हज़ार चार में वे चले गये फिर मेरे पिताजी और अब मेरी बड़ी माँ भी नहीं रही.

गाँव में चार दिनों से ख़ुद के पास बैठा हूँ. सामने कितनी सारी चीज़ें हैं और उनके बारे में सोचने के लिए कितना कुछ है. मेहमान आ रहे हैं और उनके लिए आँगन में ऊंट के बालों से बुने हुए बेहद सुंदर कालीन बिछे हैं. इस कालीन को जीरोही कहते हैं. इसे ऊंट के बालों को कात कर बुना गया है. कुछ एक में बकरी के बाल भी साथ हैं. बकरी के बालों को बाकर कहते हैं. इन जीरोहियों को गाँव के कुम्हार परिवार हाथ के छोटे लूम पर बुनते हैं. जिसको पीन्जा कहते हैं. मोटर गाड़ियों ने ऊँटों के टोले को विदा कर दिया और सूत की दरियों ने कुम्हारों के पीन्जे खूंटियों पर टंगवा दिए हैं.

मेरा दिल मचल रहा है कि अपनी बैठक के लिए एक जीरोही खरीद सकूँ. इसकी चुभन वैसी ही है, जैसा रेगिस्तान का जीवन...बहुत सी बेवजह की बातें हैं, उनमें से तीन पढ़िए. 

बाबा ये जीरोही चुभती क्यों है?

कुम्हार का पीन्जा रहा होगा ज़रा ढीला
फिर कुदरत ने कुछ छोटे बाल दिए थे ऊंट को
और कुछ इसमें मिला हुआ है बाकर.

अब ऊंट चले गए ईश्वर की खोज में
कुम्हारों ने पीन्जे टांग दिए दीवार पर
बकरी, कुजात का बिगड़ा नहीं कुछ
मगर सिर्फ़ बाकर से नहीं बनती, नयी जीरोही.
* * *

लू चीरती जाती है पत्तों का बदन
चिड़ियाएँ फुदकती रहती हैं डाल पर
चलता रहता है रेगिस्तान का जीवन.

दीवार से पीठ टिकाये
सोचता है शैतान, अपनी प्रेमिका के बारे में
और रोता है बियाबान को देख कर.

खाली कुएं में रहट जैसी एक हूक उठती है बिछोह भरे सीने में
और लकड़ी चीरती, करोती की तरह चमकता है, विरह का प्रेम.

पास कहीं बजते, विवाह के ढोल से आती है आवाज़
शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका...

और मर जाता है शैतान उसकी याद में.
* * *

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…