अनंत बिछोह में


मेरे ही हाथ से मिट गयी सारी बातें. कॉफ़ी नहीं, सुकून नहीं, बस एक बेख़याली है. किस आरी से काटूं ऐसे वक़्त को? चिट्ठियां रख दूँ उसके आले में या ज़रा जोर से पुकारूँ नाम या फिर नए सिरे से लिखूं. जो मिटने से बच गया, उसे पढ़िए... बेवजह की बातें

जब डूब रहा होता है सूरज
अधिक चमकने लगते हैं पीले पत्ते
जैसे अनंत बिछोह में
हवेली की खिड़की में खड़ी नायिका.
* * *

एक दिन तूफ़ान ने
ख़ुद को झाड़ पौंछ कर किया साफ़
कि वह अपने साथ उठा लाया था जाने क्या क्या.
एक घर के टुकड़े देख कर
उसे ख़ुद के बेघर होने पर रोना आया.
जैसे कोई रो पड़ता हो सुन कर, महबूब का नाम.
* * *
[Image courtesy : Prateeksha Pandey]

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