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और ये तन्हाई बेहिसाब...


जिनको सुंदर आराम कुर्सियों पर बैठने की जगह नहीं मिल पाई थी, वे रेल गार्डों के बक्सों पर, अपने ही सामान या फर्श पर बैठ गये थे. कुछ नौजवान बातों में गुम थे और एक हल्के गुलाबी रंग की राजपूती पोशाक पहनी हुई नवयुवती घूँघट को बार बार ठीक करते हुए, सेल फोन पर करती रही बात. कुछ किशोरियां बेखयाल अल्हड़ता में खोयी हुई फेरती रही, एक दूसरे के बालों में अंगुलियाँ. मैंने सोचा कि वे शायद संकेतों में कर रही होगी बात, उन लड़कों के बारे में जो पीछे छूट गए होंगे.

मैं एक बुरा यात्री हूँ. रेगिस्तान को छोड़ कर कहीं नहीं जाता हूँ. अपने मुंडाए हुए सर पर उग आये कुछ एक बालों पर हाथ फेरता हुआ आसमान को देखने लगता हूँ. रेल स्टेशन के लम्बे टीन शेड के पार बादलों की झलक पाता हूँ. हॉकर को बीस रुपये देता हुआ एक कॉफ़ी और पानी की बोतल मांग लेता हूँ. सोचता हूँ कि इस हॉकर ने जाने कितने यात्रियों को देखा होगा मगर शायद सोच न पाया हो नेसकैफे के पाउच और टी बैग के स्टाक के सिवा कुछ.

कॉफ़ी के तीसरे घूँट के वक़्त पूरे प्लेटफार्म पर अपनी नज़र दौड़ता हूँ. सब तरफ सूनापन मगर यात्रियों से, उमस से और उम्मीद से भरा हुआ. तो तुम क्या करोगे इस साढ़े तीन घंटे के दौरान? मैं, मैं नुसरत साहब को सुनूंगा, चीज़ों से बातें करूँगा, रेल के साथ दौड़ते हुए दरख्तों पर बैठे हुए पंछियों को देखूंगा, सोचूंगा कि हमें किसलिए मिलती है ज़िन्दगी और अब कैसे जीया जा सकता है इसे आगे.... और आख़िरी से पहले वाले कोच में शानदार तनहा यात्रा करते हुए, मैंने कुछ नहीं सोचा. इन कुछ बेवजह की बातों के सिवा...

शुक्रिया रेगिस्तान
इतना सूना होने के लिए.

उसकी याद के मंज़र को
नहीं तोड़ता कोई चेहरा
और ये तन्हाई बेहिसाब.
* * *

खूबसूरत है
खाली पड़ी रेल डिब्बे की लोवर बर्थ
तनहा डोलती हुई पानी की बोतल
रेत के बोसे और तुम्हारी याद के झोंके.

यात्रा, चित्रित नहीं है किसी नक़्शे पर
यात्रियों ने छुपा रखी है दिल में.
* * *

फट पड़ेगा इंजन और ध्वस्त हो जाएंगे डिब्बे
मेरा सर टकराएगा सामने की सीट से
फिर यकसां आता है ख़याल
कि गुम हुई मुहब्बत से बेहतर है, गुम हुई ज़िन्दगी,
* * *

वे जो बच कर आये थे, ज़िन्दगी की आफतों से
उन्होंने फिर कभी नहीं देखा मुहब्बत का ख़्वाब
सोचते रहे सफ़र के रास्ते को
बैलगाड़ी के पहिये से निकल सकने वाली कील को.

बाकी कुछ लोग आफतों के साथ भी
खोये रहे महबूब की उजली गरदन के नूर में.

तुम इतने दूर क्यों हो?
* * *

पहियों के अविराम शोर
और यात्रियों की बेसुरी आवाज़ों के बीच
कई बार ट्रेन भूल जाती है रेगिस्तान का रास्ता
और दौड़ने लगती बर्फ भरे बियाबान में.

कभी इसकी खिड़की से
आने लगती है, हंडिया की तीखी गंध
कभी डिब्बे में आई रौशनी की लकीर
महबूब की तस्वीर बन कर मिट जाती है. .

एक बवंडर पीछा करता हुआ ट्रेन का
एक बवंडर पीछा करता हुआ यात्री का.
* * *

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