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भुरभुरी चट्टानों के बीच घर


एक छोटी कविता और कुछ बेवजह की बातें. मैं एक ख़राब कवि हूँ. मुझे फिलिस्तीन पर लिखना नहीं आता मगर महमूद दरवेश से प्यार है. मैंने उनको पहली बार साल नब्बे में पढ़ा था. उन्हीं दिनों मैंने अंगोला के किसी कवि की एक ऐसी कविता पढ़ ली थी कि पढ़ते ही दिल ने चाहा, इसे कमरे की अलमारी के पल्ले पर चिपका लूं. मालूम नहीं कि उस कमरे का अब क्या हाल होगा. उन दिनों वह तम्बाकू के धुंए की गंध से भरा होता था. रात के आते ही उसकी खुशबू में एल्कोहल की गंध भी समा जाती थी.

एक रात सिगरेट खत्म हो गई. राकेश ने कहा कि चाय की पत्ती को सिगरेट की तरह पिया जा सकता है. ख़याल आया, हो सकता है कि निकोटिन की कमी को टेनिन से पूरा किया जा सके. लेकिन एक तो सिगरेट इतनी बेढब बनी कि उसे जलाये रखना मुश्किल था फिर उसका स्वाद ऐसा कि चूल्हा अभी बुझाया हो. जिस राकेश ने ये ज़बरदस्त आइडिया दिया, वह सिगरेट पीता ही नहीं था. खैर ये जरुरी नहीं कि एडिसन ने बल्ब का अविष्कार सिर्फ़ ख़ुद के लिए किया होगा. कई बार आदमी मजे मजे में कुछ ऐसे काम कर बैठता है कि दुनिया बदल जाती हैं. मैं अपने मजे के लिए कविता लिखता हूँ भले ही इससे दुनिया न बदले.

कुछ झीलों को आदत होती है
भुरभुरी चट्टानों के बीच घर बनाने की
उन्हें हर वक़्त चाहिए, ज़िन्दगी में उथल पुथल

जैसे बहुत से लोग
जब घिरे होते हैं बेचैन ख़यालों से
तब उनको आता है यकीन  कि वे ज़िन्दा हैं.

मैं कई बार शायद
अपने बारे में कर रहा होता हूँ बात
जब कहता हूँ मौसम ज़रा उदास है.
* * *

याद के किताबखाने में रखे हैं
बेहतरीन दिन रात
कि न गए होते कहीं सफ़र पर
तो ज़िन्दगी में गूँज रहा होता सन्नाटा.

कि न पुकारा होता उसका नाम तो
बहुत बेस्वाद होती ये पुरानी विस्की भी.
* * *
[Photograph Jodhpur in blue, Courtesy : Ronald Enghofer ]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…