अगर आप कभी देख सकें


आह ! बीस दिन पुरानी लू. दर्द से भरा बदन और हरारत. कुछ बातें, बेवजह की बातें...

नाकामी से दुखी होकर
ज़िन्दगी देखती है, नयी ज़मीन
और सोचती है कोई नया रास्ता
जहाँ से आगे शुरू किया जा सके, सफ़र.

नाकामी को नहीं दिया जा सकता तलाक
कि नाकामी से हुआ नहीं था कभी निक़ाह .
* * *

लकड़ी के पलंग पड़े रहते हैं वहीं
जहाँ उनको रख दिया जाता है
जैसे ठहरे हुए इंतजार में, कोई महबूब.

बैंक के लोकर में रखी होती हैं कुछ चीज़ें
जैसे वीरान जगहों पर
किसी के साथ बितायी हुई शामों की याद.

अगर आप कभी देख सकें मुड़ कर, ख़ुद को
तो यही तस्वीर पाएंगे
कि आपने बीते लम्हों को कर लिया हैं पलंग
और समाये हुए हैं, उसकी गोद में.
देख रहे हैं, उन्हीं लम्हों का ख़्वाब
जो रखे हैं याद के खाते में सावधि जमा की तरह.
* * *

[Painting Image courtesy : Lynne Taetzsch ]

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