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कठपुतली, मैं काठ की


कुछ दिन सफ़र नए शहर को, कुछ शामें परिंदों से भरी, कुछ फेरे सुकून के... ऐसा ही हो ! दो बेवजह की बातें

कठपुतली

कुछ क़दम सफ़र
डूबता, मन उदास
कौन देस, कौन मुसाफ़िर.

तनहा दरख़्त, सूनी शाख
अबूझ, असीम, अतल प्यास.

वीराना ये तेरी याद का
कठपुतली, मैं काठ की.
* * *

सलामती

भीगी हुई आँखें
सिमटे हुए से पांव
रंग सब बिखरे हुए.

ये ख़यालों की दुनिया नामुराद
और लिपटी धुंए से, अंगुलियाँ.

अचानक बैठी होती है, सामने
वीरान सी एक उदासी शाम की.

बेनूर, ये ज़िन्दगी का आईना !
* * *

[तस्वीर रंगीन और उम्मीदों से भरी हुई कि ज़िन्दगी कैसी भी हो, खूबसूरत होती है. ]

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