फूल पर घिरती शाम


कल जून महीने का आखिरी दिन था. रेगिस्तान, आँधियों की ज़द में है इसलिए तापमान कम था. दोपहर के वक़्त, नेशनल हाई वे पर पसरा हुआ सन्नाटा तोडती कुछ गाड़ियाँ. अचानक तेज़ रफ़्तार बाइक पर गुज़रा, एक नौजवान. इस गरमी में भी बाइक के रियर व्यू मिरर में टंगा हुआ, हेलमेट. उसे भूल कर, रास्ते भर सोचता रहा जाने क्या कुछ.... बहुत सारी बेवजह की बातें, मगर तीन पढ़िए... कि किसी दिन आ जाओ  रेगिस्तान की शाम की तरह

गलियों में उतरती
तन्हा शाम के कदमों की आहट
उचटती हुई नींद, तेरे ख़याल की.
* * *

सबसे ऊँची शाख़ पर खिले
इकलौते फूल पर घिरती शाम
जैसे सुरमई होता, इंतज़ार.
* * *

अतीत के धूसर अरण्य के किनारे

खिड़की, जिसे साँस कहते हैं
रोज़नामचा, ज़िन्दगी के नाम का
और हर शाम उसकी याद लिए हुए.
* * *

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