कि कुछ नहीं हो सकता


रात के कई पहर बीत जाने के बाद भी अजनबी आवाज़ें, सन्नाटे को तोड़ती रहती है. उदास थकी हुई करवट, पसीने से भीगी हुयी पीठ, तसल्ली की थपकियाँ देती रेगिस्तान की सूखी हवा. सो जाओ, रात जा रही है...

तुम्हें कुछ नहीं सोचना चाहिए
खिड़की के पेलमेट पर रखे हुए तनहा गुलदस्ते के बारे में
उसे आदत है एकाकीपन में जीने की.

कि उन फूलों ने बहुत कोशिशें की थी
लोगों से घुल मिल जाने की
मगर निराशा में चुन ली है यही जगह, ज़रा अँधेरी, ज़रा उदास
जैसे कोई हताश आदमी बैठा होता है, एक अधबुझे लेम्पोस्ट के नीचे.

मैं ऐसी ही चीज़ों के बीच
इसी घर में हूँ, तुम्हें प्रेम करने के लिए
ये मर्ज़ी है तुम्हारी कि रात भर जागते रह सकते हो कहीं भी.

सुनो मेरी बात कि अगर तुम आओगे यहाँ
तो अपनी आदत के हिसाब से मेरे कमरे में रो सकते हो रात भर
कि मुझे भी आदत है पतझड़ के पेड़ों को देखने की
और मालूम है कि सूखी पत्तियों को किस तरह उठाना चाहिए सावधानी से.

ज्यादा सोचा मत करो कि तुम्हारे बिना भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कि मुझे अक्सर चुभते रहते हैं किसी याद के कांटे
जैसे आप बैठे हुए हों किसी नौसिखिये कारीगर की बनायी हुई दरी पर.

तुमसे बिछड़ने के बाद
मैंने कई बार आत्महत्या की और फिर लौट आया घर.
मैंने एक उदास भालू की तरह नैराश्य को सूंघा
और फिर से खो गया आदमियों की भीड़ के जंगल में
कि मरना बड़ा वाहियात काम है जब तक घर पर बच्चे कर रहे हों इंतज़ार.

इधर आने से नहीं डरना चाहिए तुमको
कि मेरे घर की गली से नहीं गुज़रता है कोई झाड़ागर,
किसी के पास नहीं बचे हैं जादुई शब्द
मोहल्ले का सबसे कद्धावर आदमी भी बैठा है, उम्मीद का सहारा लिए हुए.

मैं तुम्हें नहीं करना चाहता हूँ सम्मोहित बिल्ली की तरह आँखें टिमटिमा कर
बस कहना चाहता हूँ कि देखो अहसासों की मुफलिसी के बीच
कितना कुछ तो बचा रहता है हम सब में, उन दिनों का बाकी.

यूं इस दुनिया में नुमाईशों की फ़िल्म चलती रहती है.
आदमी और औरतें मिल कर रोते हैं, एक इंतजार करते हुए कुत्ते को देख कर
मगर भूल जाते हैं, जाने क्या क्या ?   

कि कुछ नहीं हो सकता
फटे पुराने जूतों की तरह ठुकराई हुई पड़ी है ज़िन्दगी, 
हम इसे जीते भी नहीं और फैंकते भी नहीं, जाने किसलिए...

जैसे मैं लिखता रहता हूँ ऐसी बेवजह की बातें, जो कहीं पहुँचती ही नहीं. 
* * *

[Painting Coffee Day, Image Courtesy : Milind Mulick]

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