हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव


किसी प्रेतात्मा को छूकर आई ख़राब हवा थी। किसी आकाशीय जादुई जीव की परछाई पड़ गयी थी, शराब पर। किसी मेहराब पर उलटे लटके हुए रक्तपिपासु की पुकार में बसी थी अपने महबूब की याद। दुनिया का एक कोना था और बहुत सारी तन्हाई थी। मेरे मन में एक ख़याल था कि एक दिन दबा दूँगा, तुम्हारा गला। ऐसे ख़राब हालात में बेवजह की बातें भी ख़राब थी...

मेरा मन एक अजगर
अपनी ही कुंडली में हैरान।

तेरी याद
ताबीज में बंधा भालू का नाखून।
* * *

वो दिन ही ख़राब था
एक ऐसी याद का दिन
जिस पर लिखी हो, क़ैद की उदासी।
* * *

मुझे जंगली खरगोशों से प्यार है
कि उनको जब नहीं होना होता है बाँहों में
वे सभ्य होने की जगह
मचलते रहते हैं, भाग जाने को।

जंगली खरगोश तुम्हारे जैसे हैं।
* * *

और मैं मरा ही नहीं
जीता गया, निरंतर।
* * *

मैंने एक आधारशिला रखी
कि अबकी बरसात में
यहाँ से बहाई जाएगी नदी।

नादाँ लोग हंस कर चले गए, जैसे वे हँसते हैं प्यार पर।
* * *

वहाँ लोग कम और अच्छे हैं,
इसलिए सोचा है मैंने
कि हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव।

यहाँ प्रेम करने और कुछ दिन बाद
हमारी नंगी लाशों के
गालियों में पड़े मिलने से बर्फीली तन्हाई बेहतर होगी।
* * *

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