गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा


एक रोज़ उड़ ही जाती हैं, सब मुश्किलें और राहतें मगर ये न समझाना किसी को कि ज़िन्दगी को आसानी से जीया जा सकता है। कोई तुम पर यकीन नहीं करेगा। मेरे साथ कोई न था, एक परछाई थी, उसी के बारे में बेवजह की बातें

आवाज़ न दो, उसके नाम को

बेसबब बेबसी
और बेख़याल ज़िन्दगी
कि तनहा पड़ा
रात का टूटा सियाह प्याला।

दिल के हज़ार गोशे
गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा
न रौशनी, न रंग कोई,
न नियाज़, न कोई उम्मीद।

जब सर पे था सूरज
एक फ़कीर ने कहा,
चूम कर इस पानी को
लिख दे, दुआ उसके नाम।

अपनी ही परछाई को देख कर
भर ले हैरानी का जादू अपनी आँखों में।
* * *

देखो ये धूप उसकी याद
और तुम्हारा वजूद, बेशक्ल परछाई

जैसे लौटती हुई आवाज़ के टुकड़े.
* * *

एक दरख्त की शाख ने पंछी से पूछा
तुम्हारी आँखों के नीचे ये सियाही सा क्या है?

पंछी ने कहा, सो जाओ चुपचाप
मैं चुरा लाया हूँ,
रोशनी के जादू से बनने वाली परछाई।
* * *

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