Posts

Showing posts from January, 2012

उसे कहना चाहता था

Image
बेवजह की बातें...
उसे कहना चाहता था
तुम्हारे भरे हुए चेहरे पर अच्छा लगता है चश्मा
जब कभी तुम दबा लेती हो अपनी हंसी
तब दिखती हो सबसे सुंदर.

असंख्य जटिलताओं वाले प्रेम को
किया जा सकता है स्केच
चश्मा हटाने के बाद तुम्हारे सरलतम चेहरे पर
* * *

प्रेम से बड़ा नुकसान कुछ नहीं होता
कि एक दिन कोई
आपको चुरा कर चला जाता है.
* * *

[Image courtesy : South Korean Piainter Carto]

ताम्रपत्र सरीखा है, मोरचंग

Image
उस मंडप में रह रह कर मंच से बजती थी तालियाँ और सामने कुछ सौ लोगों की भीड़ कौतुहल भरे हृदय में दबाए बैठी थी अनेक आशंकाएं. उन्होंने कहा कि हकीम खां एक महान कलाकार है लेकिन आखिर कमायचा हो ही जायेगा लुप्त इसलिए हम सब कमायचों को इक्कठा कर के सजा देना चाहते हैं संग्रहालय में, आने वाली पीढ़ी के लिए.

मोरचंग बनाने के सिद्धहस्त लुहार आजकल व्यस्त हो गए हैं लोहे की कंटीली बाड़ बनाने के काम में इसलिए मणिहारे माला राम गवारिये के पास बचे हुए पीतल के इन छोटे वाद्य यंत्रों को भी घोषित किया जाता है राष्ट्रीय संपत्ति. उन्होंने गर्वीली आवाज़ में कहा कि ताम्रपत्र सरीखा है ताम्बे से बना मोरचंग.

रंग बिरंगी झालरों की चौंध में उन्होंने तीन हाथ लंबे खोखली लकड़ी से बने वाद्य नड़ के बारे में बताया कि यूरोप के पहाड़ी गाँवों के चरवाहों के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन ही बचे हैं इसलिए ये अनमोल धरोहर हैं.

उन्होंने धोधे खां को ओढाई शाल और श्री फल के साथ एक हज़ार रुपये से सम्मानित किया. बायीं तरफ रखवा लिया हरे रंग का झोला, संरक्षित कर लिए दो जोड़ी अलगोजा. आंसू भरी आँखों से कलाकार ने बताया कि सिंध से लायी जाळ कि जड़ से इसे बनाय…

उस बज़्म में हम...

Image
अगर धूप तल्ख़ न हो जाये तो बहुत देर लेट सकता हूँ, आसमान को तकता हुआ. सुन सकता हूँ, रौशनी के अँधेरे में डूबी उलटी लटकी रोशनदानों जैसी असंख्य खिड़कियों से आती आवाज़ें. इधर नीचे आँगन में कोई ज़र्द पत्ता विदा होने के पलों में जाने क्या कहता फिरता है कि टूट जाती है, मेरे ख़यालों की सीढ़ी...  मगर मैं फिर से लौट जाता हूँ ऊंची मेहराबों में टंगी अदृश्य खिड़कियों की ओर. याद आती है एक बेवजह की बात...
नेहरू बाज़ार की लम्बी दुकान में
चित्रकार फ्रेडरिक की पेंटिंग के क्लोन को देखते हुए
एक ज़िद्दी लट आ बैठती थी उसके कॉलर पर
और ईर्ष्यालु टेबल पंखा घूम-घूम कर उसे उड़ा देता हर बार
मैं अपने हाथ को रख लेता वापस जेब में.

सरावगी मैंशन में एक कोने वाली छोटी सी दुकान में
बची हुई थी किसी दोशीज़ा की खुशबू
गोया कोई नमाज़ी गुज़रा था इश्क़िया गजानन की गली से
और देखा मैंने कि तुम उलझी खड़ी हो जींसों के रंग में.

बाद अरसे के सलेटी जींस के घुटनों पर खिल आये सफ़ेद फूल,
सॉफ्ट टॉयज और तस्वीरों में कैद चेहरों से उड़ गया रंग
याद के आलिंगनों में आता रहा
पचास पैसे में एक ग्लास पानी बेचने वाला दुबला लड़का
सिनेमा का मैटिनी शो, अपरिचित बि…

घास की बीन

Image
बया ने रात भर पत्तों के बीच देखा आकाश
दोपहर में किया याद, रेगिस्तान के ख़ानाबदोश सपेरों को
और फिर घने बबूल पर टांग दी, घास की बीन.

आंसुओं की बारिशों से भीगी रातों में,
ठुकराए हुए घोंसलों से उठती रही एक मादक वनैली गंध.

आदम मगर बुनता रहा, दिल के रेशों से घर, हर बार
बिखरता रहा उजड़े ख़्वाबों का चूरा
मन के गोशों से उठती रही हर बार एक उदास कसैली गंध.

क्यों एक दिन हो जाता है इश्क़ मुल्तवी, सौदा ख़ारिज,
क्यों ताजा खूं की बू आती है, क्यों परीशां परीशां हम हैं?

हसरतों के बूमरेंग

Image
आधे खुले दरवाज़े से आती हुई रौशनी पीछे नहीं पहुँच पा रही थी. वह मुझसे दो हाथ जितनी दूरी पर खड़ी थी. गाढे रंग के कसे हुए ब्लाउज की चमकीली बाँहों और चौड़े कंधों पर अँधेरा पसरा हुआ था. दरवाज़े की झिरी से आती हुई रौशनी कम थी. उसकी आँखें मुझसे मुखातिब थी और हम शायद बहुत देर से बात कर रहे थे. हल्के अँधेरे और उजालों की छुटपुट आहटों के बीच लगा कि कोई आया है. दो कमरों के पहले तल वाले उस घर की बालकनी दक्षिण दिशा में खुलती थी.

पतली सीढ़ियों से उस स्त्री के पति की पदचाप सुनाई देने लगी. हम दोनों जड़ हो गए. एक अमूर्त अपराध की शाखाएं हमें कसने लगी. वह दरवाज़े के पीछे रसोई के आगे वाली जगह पर खड़ी रही. आते हुए क़दमों की आवाज़ों से मुझे लगने लगा कि मैं कोई गलत काम करते हुए पकड़ा गया हूँ. तूफ़ान आने से पहले उड़ते हुए दिखाई देने वाले पत्तों की तरह आशंकाएं मेरे आस पास तेजी से मंडराने लगी. जबकि हम दोनों ही नितांत सभ्य तरीके के एकांत में थे. मैं दरवाज़े के पीछे से निकल कर बालकनी की ओर चल पड़ा. लोहे की हल्की रेलिंग से नीचे देखते हुए पाया कि यहाँ से उतरना बहुत कठिन है.

स्वप्न में एक विभाजन हुआ. वह अचानक से टूटा और …

ऑक्सफोर्ड टो वाले शू

Image
बीते साल की कुछ और बेवजह की बातें...
याद की खिड़कियाँ

और ऐसे ही किसी दिन न भूल पाने की बेबसी में
एक से दूसरे कमरे में टहलता रहता हूँ
याद की खिड़कियों पर सुस्ताती गिलहरियों को देखता
बेसबब वार्डरोब को खोले चुप खड़ा सोचता हूँ,
दीवार... दराजें... स्याही... कुहासा...शहर और वीराना
एक विलंबित लय में लौट आता हूँ बिस्तर पर...

फिर
समय की धूल से भरे तकिये पर सर रखे सोचता हूँ
कि रिसाले और किताबें नहीं दे पाते हैं सीख, तुम्हें भूल पाने की
* * *

शुभकामनाएं

वह हद दर्जे का जाहिल था
जींस के नीचे 'ऑक्सफोर्ड टो' वाले शू पहना करता
डिनर से पहले प्रे नहीं करता
सोता था चिपक कर और ओढ़ लिया करता बेड कवर
और उसके आने का भी कोई सलीका न था...

काश ! उसको वेलेंटाइन और फ्रेंडशिप डे की तरह
सिलसिले से साल दर साल आने का हुनर पता होता
ये सोच कर उसने मोबाइल वापस रख दिया है.

ऐसा सोचते हुए मैं भी नहीं कर रहा हूँ फोन
कि बाते बेवजह हैं और बहुत सी हैं..
* * *

शाम के टुकड़े

Image
कभी कभी कोई इंतज़ार नहीं होता. चेहरों से उतर जाती है पहचान, स्मृतियाँ कायम नहीं रह पाती. सिटी कोतवाली से कुछ आगे ऊपर की ओर जाती संकड़ी पेचदार गलियों के किनारों को कुछ अधिक काट कर बनाया गया रास्ता ज़रा बायीं तरफ मुड कर ख़त्म होता सा दीखता है. वहीं पर बड़ी हवेली की गोद में राज के कारिंदों के लिए मकान बने हुए हैं. पीछे पहाड़ी का हिस्सा है और सामने नीचे की ओर सर्पिल रास्ते घाटी में खो जाते हैं. इन रास्तों के किनारे बेढब सिलसिले से मकान बुने हुए हैं.
हर शाम घरों के चौक में रखी सिगड़ी से उठता धुंआ पत्थरों की दीवार को चूमता रहता है. इच्छाओं की अनगढ़ सफ़ेद लकीर हवेली की छत तक जाते हुए जाने क्या सोचती हुई, मुड़ मुड़ कर देखती रहती है. सुबह सूरज सिर्फ किले के दरवाज़ों पर ही दस्तक देता. दोपहर की बिना धूप वाली गलियों में तम्बाकू बाज़ार से तीन गली पहले पान वाले से मुनक्का खाते हुए बीता दिन, किसी विस्मृत शहर की तस्वीर सा याद आने लगता है.
ढलुवा पथरीली सड़कों पर आहिस्ता चढ़ते उतरते, याद के पायदानों पर बीते दिनों के पांव नहीं दिखते. एक कड़ा वर्तमान बाहं थामे रखता है. नीले घरों के आगे भा…

मर जाने से बहुत दूर

Image
तुम कहां होते हो. जब किसी बहुत पुरानी धूसर स्मृति से जागा कोई अहसास मेरे पास होता है. काश मैं बता सकूँ कि किस स्पर्श की नीवं पर बैठी है उदास चुप्पी. काश तुम देख सको कि किसी के जाने से बदल जाता है, क्या कुछ... कि और एक बेवजह की बात.

मर जाने से बहुत दूर

जनवरी के इन दिनों में सोचूँ क्या कुछ
कि नौजवान डाक्टरनी की खिड़की पर उतरती है धूप
अक्सर साँझ के घिरने से कुछ पहले.

लुहारों के बच्चे होटलों पर मांजने लगे हैं बरतन
आग के बोसे देने वाली भट्टियाँ उदास है
कि अब उस जानिब नहीं उठती है कोई आह
जिस जानिब था मर जाने का खौफ, हमसे बिछड़ कर.

अचानक
ख़यालों के ओपरा में हींग की खुशबू घोल गया है
अभी उड़ा एक मटमैला कबूतर.
और दीवार पर उल्टी लटकी गिलहरियाँ
अब भी कुतर रही है, दाने समय के, जनवरी के इन दिनों में...

सपने में एक उदास चिड़िया

Image
यह कोई अच्छी बात भले ही न हो मगर हर सुबह चंद ख़्वाबों के टुकड़े सिरहाने रखे होते हैं. मैं जागते ही एक जिज्ञासु और उम्मीद भरे बच्चे की तरह पहेली को जोड़ कर एक मुकम्मल तस्वीर बनाने में जुट जाता हूँ. वे छोटे टुकड़े आपस में इस तरह गुम्फित होते हैं कि कोई सिरा सही से पकड़ में नहीं आता है. उनका फलक व्यापक और तत्व विस्मयकारी होते हैं. उन सपनों को खोल पाने के लिए मैं सबसे पहले अपनी जेब टटोलता हूँ. जिसमें कुछ कामनाएं रखी रहती हों. मैंने ऐसा सुन रखा है कि सपने अक्सर हमारी अपूर्ण इच्छाओं और उनके दायरे में रखी हुई अवचेतन सोच के प्रतिनिधि होते हैं.

मैं अपने असंख्य सपनों को दर्ज़ कर सकता था मगर उन दिनों ऐसी डायरी लिखने की सुविधा नहीं थी. मेरे पास हर समय एक रजिस्टर हुआ करता था. उसमें कुछ बेहद निजी बातें लिख लिए जाने के कारण वह रजिस्टर गोपनीय दस्तावेज हो जाता था. उसका अंज़ाम तय था कि वह जीवन का हिस्सा बन कर साथ नहीं रह सकता था. मेरी बहुत सी बेवजह की बातें उसके साथ ही नष्ट हो गयी. मुझे प्रकाशन उद्योग और लेखकों से नफ़रत नहीं है मगर उनके बारे में बात करके भी ख़ुशी नहीं होती कि वे सब आत्ममुग्ध और…

रात में घुल आई सियाही है

Image
एक पाँव दूब पर रखे, दूजा कुर्सी पर टिकाये कुछ भी सोचना बेकार था. कल रात के एक ख़याल की याद तारी थी कि उसने अपनी नाक तक ओढ़ रखा है, लिहाफ. मेरी नज़्मों को पढ़ कर दिलाती है याद कि कहानियां लिखा करो. मैं कहानी के किरदारों से दोस्ती करने से डरता हूँ कि उनकी दुनिया से लौटने का मन नहीं होता. यह विपश्यना में जाने से पहले के द्वंद्व में अटक जाने जैसा काम है. मैं बोलता भी नहीं और कई सारे पात्र मुझमें ही बोलते रहते हैं. कथाओं के किरदारों का सरल होना बेहद कठिन है और जीवन की भूल भुलैया के उलझे हुए अप्रत्याशित रास्ते बेहतर है. फ़िलहाल एक और बेवजह की बात कि बरबाद जवानी की इमारत अक्सर वैभवशाली बचपन की खूबसूरत नींव पर ही खड़ी होती है.

वाश बेसिन के आईने से पोंछते बीते दिनों को
भीगे गुलाबी होठों पर आता तो होगा, किसी नज़्म का मुखड़ा
कुरते की सलवटों से झांकती बेचैन नींद और रात की उतरनों को देखते
कभी ये भी आएगा ख़याल
कि उड़ ही जाती है खुशबू उम्र की, उसके बिना या इसके साथ.

जब भी काट लेगा कोई, ज़िन्दगी की जेब से एक दिन
सुकून के सोफे पर पसारे पांव सोचेगी, अब कौन मिलता है राह में.

डायनिंग टेबल पर दिखेगी …

रेवड़ी के ठेले

Image
बेवजह की बातें जो इस ब्लॉग की किसी पोस्ट में शामिल नहीं है.
सलाह

मित्र, मैं कल सुबह से बड़ा उदास हूँ
बावजूद इसके तुम्हें इक नेक सलाह देना चाहता हूँ कि
डूबते उजालों को देख उसकी याद में संजीदा न होना.

सोचना उन दिनों को जब गालों को गरम हवा चूमती थी ...
शाम के बुझने से पहले छत का मौसम जेबों में भर आता था
और हाथों के तकिये पर सर रख कर सो जाते थे.

काश मुहब्बत लोकगीतों सी अनगढ़ न होकर
घरानों के बड़े ख़याल की बंदिशें होती जिसे नियम से सीखा जा सकता.
* * *

ख़त जो लिखा नहीं

मैंने तुम्हें एक ख़त लिखा है.
उसमें मजाज़ की इक नज़्म लिखी
और पास रह कर दूर हो जाने का हुनर लिखा है.

एक आईने का बयान है उसमें
कि टीन ऐज़ के मुहासे के धब्बे जैसी तेरी याद
हमेशा मेरे साथ रहती है. 
फिर कई सालों का फासला लिखा
और ये भी लिखा है कि बहुत चुभती है चुप्पियाँ.

यकीनन, तुम पढोगे उसे मुहब्बत की रौशनी में
और सो नहीं पाओगे किसी भी करवट .
इसे पढ़ कर रो दोगे तुम, यही सोच कर रो पड़ी हूँ मैं.
* * *

डिस्क्लेमर : कहना गलत गलत

Image
"उनसे जो कहने गए थे फैज़ जान सदक़ा किये अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद"
ब्लॉग लिखता हूँ. इसलिए नहीं कि लेखक हूँ इसलिए कि कुछ शब्द मन की कोमल दीवारों से टकराते हुए आवारा फिरते हैं, उनको सलीके से रख देना चाहता हूँ. कवि नहीं हूँ मगर कुछ बातें साफ कहते हुए मन को असुविधा है. इसलिए उनको बेवजह बातें कहता हुआ, आड़ा तिरछा लिखता हूँ. वे बातें कविता सी जान पड़ती है. उदास नज़्मों और कहानियों की बातें अच्छी लगती है मगर ऐसा भी नहीं कि ख़ुशी को देखे हुए बरस बीते हों.
सुंदर और हुनरमंद लोग अच्छे लगते हैं. मेरे बहुत सारे क्रश हैं. उनके पास होना चाहता हूँ मगर कोई ऐतिहासिक प्रेम करने में असमर्थ हूँ. अब तक जो अच्छा लगा, उससे कह दिया है कि आपसे बहुत प्रेम है. इस शिष्ट समाज के भद्र शब्दों से मुझे परिभाषित नहीं किया जा सकता है. इसके लिए अनेक शब्द हैं जो मुझे बयान करने के लिए कई बार जरुरी हो सकते हैं जैसे लम्पट, नालायक, बे-शऊर आदि...
हथकढ़ मेरी डायरी है. यह पब्लिक डोमेन में इसलिए खुलती है कि लोग जान सकें कि रेगिस्तान में एक आदमी अपनी तमाम खामियों के साथ खुश होकर जी रहा है. इस डायरी को लिखने की…

एक तुम्हारे नाम का अक्षर

Image
नए साल के लिए मैं कुछ शुभकामनाएं चुन लेता मगर जॉन लेनोन, वूडी एलेन, मार्क ट्वेन चुप थे, मजाज़, फैज़, ग़ालिब और मीर सब चुप थे इसलिए एक बेवजह की बात लिख कर ये दुआ करता हूँ कि इस दोशीज़ा साल से तुम्हारा इश्क़ कायम रहे.
एक तुम्हारे नाम का अक्षर

खिड़की के पार बर्फ के रेशे थे, ख्वाहिशों के उड़ते फाहे थे
मगर नाच की आखिरी लरज़िश के बाद
डाल पर झूलती चिड़िया ने गाये एक गीत के कुछ मिसरे.

अँगुलियों से फिसल कर अब, रजाई की ठंडी तह पर गिरा है मोबाइल
कि तुम्हारे नाम के पहले अक्षर से आगे लिखा नहीं गया कुछ भी.

दीवारों पर यादों का सफ़ीना है, लिहाफों में उदासी है
कह तो दूँ सब तुमको मगर बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.