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Showing posts from February, 2012

चल हट, ढाई ढूश...

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29 फरवरी चार साल में एक बार तो आती है, वह तो कभी नहीं आता.

मुख़्तसर बातें करो बेजा वज़ाहत मत करो - डॉ. बशीर बद्र. [ Muḵẖtaṣar - Abridged, curtailed, concise, small;  Waẓāḥat - to be clear, Clearness, purity.]

दिल टूट गया है

आओ
आधा आधा पिज्जा खाते हैं
थोड़ी सी सिंगल माल्ट पीते हैं
* * *

बेवजह की बातें
चल हट, ढाई ढूश ?
[ढाई ढूश - पारी समाप्त, खेल रद्द, सौदा ख़त्म ]

आई लव यू
माने ?
चल दारू पियेंगे और किसी को लात मारेंगे.
* * *

प्रेम कोई विलक्षण आदिम चीज़ नहीं है

यह अनवरत है
अभी खो गया है, कभी फिर मिल जायेगा.
* * *

तामीर में शामिल एकाकीपन...

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बावरी हवा ने विदा होते मौसम के पदचिन्ह पौंछ डाले थे और आने वाले मौसम का इंतज़ार करने के सिवा कोई रास्ता न था. ऐसी ही आज की शाम थी. मेरे कंधों पर एक नीले रंग का जेकेट रखा है ठीक वैसे कि तुझे भूल जाएँ तो बेहतर या याद आती रहे तो अच्छा... जाने दो, बेवजह की बात सुनो.


अक्सर मेरे हाथ लगती थी
एक तस्वीर
तनहा, गुमसुम और बेनियाज़.

कि अद्भुत रचयिता ने
लड़कियों की तामीर में
शामिल रखा, एकाकीपन.

लड़के मगर बुनते रहे
अपना एकांत, शराब के दो प्यालों से.
* * *

ये कोई नहीं जानता...

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स्टूडियो के कालीन पर जाने कितनी बार दोस्तों के साथ अधलेटे हुए कुछ गीतों के मिसरे सुने, कभी साज़ छेड़ते हुए किसी ने कोई ग़ज़ल गुनगुनाई और मैं उनको अपनी बेवजह की बातें और दम झूठी कहानियों के प्लाट सुनाता रहा. इस तरह दफ़्तर की ज़िंदगी के दिन और रात बुझते गए. कल मगर साँझ के साथ ठंडक लौट आई. रात में अजब तन्हाई थी. स्टूडियो के कालीन पर लेटे हुए लगता था किसी से बातें किये जा रहा हूँ. मुझे अक्सर मालूम नहीं होता कि किसकी कमी को अपने आस पास पाता हूँ. किसलिए एक तवील ख़ामोशी गढता हूँ. मैं किसलिए शहरों में एक सूनी पड़ी बैंच और वीरानों में दरख़्त का घना साया सोचता हूँ.

सब बेसलीका सब बेसबब ... जैसी कि ये कुछ बेवजह की बातें हैं. एक चश्मे वाली लड़की को याद करते हुए लिखी थी. वो लड़की जो मुझे मेट्रो में मिला करती थी. हालाँकि मैं बड़े शहरों को गया नहीं और रेगिस्तान में मेट्रो की जरुरत नहीं. फिर आज सुबह के ख्वाबों में मैंने एक पारदर्शी फ्रेम वाला चश्मा लगा रखा था. मैं घबराया कि सोते हुए ये कहीं टूट न गया हो. सब उलझन है, इसलिए अकेलेपन का शोर है और सघन उदासी. ज़िंदगी उतनी वाहियात भी नहीं है जितनी कि मैं स…

उदासी, बहुत सारी बेसबब उदासी...

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कौन पुकारेगा और किसको पुकारेगा... कोई नहीं पुकारेगा, किसी को नहीं पुकारेगा, फिर भी दया करो मुझ पर..
कोई कविता कोई कहानी नहीं सूझती
बस तेरी आहट की लरज़िश मेरी छत पर उतर रही है.

ईंटों के घर की कच्ची छत पर
बिछे हुए इस सन्नाटे में यादों का चूरा उड़ता दिखता है.

इस चूरे में एक उजला उजला दिन निकला है
दिन की तपती पीठ पे इक सायकिल फिसली जाती है

सायकिल पर रखे बस्ते में इक गीला दरिया बैठा है

इस दरिया में यादों की रंगीन मछलियाँ
गोते दर गोता खाती कोई लाकेट ढूंढ रही है,
जो तूने आँखों से चूमा था...

इस मंज़र से घबरा कर दिल और भी डूबा, साँस गई
आखिर उकता कर मैंने
विस्की जिन जो भी रखी थी, सब पी डाली है
फिर भी बाहर सन्नाटा है, फिर भी भीतर सब खाली खाली है.

कोई कविता
कोई कहानी नहीं सूझती, बस तेरी आहट की लरज़िश...

प्रेम : कुछ बेवजह की बातें

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इन दिनों मुझे मोहलत नहीं है कि ब्लॉग कर सकूँ और सोशल साइट्स पर आकर लाईक्स के चटके मार सकूँ. दिन मसरूफ़ हैं और सुकून गायब... साँझ गए घर आया हूँ तो बेवजह की बातें लेकर बैठ गया हूँ. मेरी इन बातों पर न जाना और दुआ कि प्रेम आप सबके लिए शुभ हो.

एक गुम-ख़याल सफ़र से लौट आने के बाद
हर कोई पाता है कि
प्रेम खड़ा है वहीँ, जहां से सफ़र को गए थे.
* * *

प्रेम का घर दूर से पहचाना जा सकता है

हवा में डोलते बेरंग आशाओं के टूटे झालर,
मुंडेर से लटकी आंसू भरी हिचकियों के जाले.
* * *

प्रेम, दुबले लड़के का कहा हुआ
छोटा सा वाक्य है
काश, थोड़ी सी और होती शराब ...
* * *

ओ लड़के...

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सब अजनबी रास्ते, सब अनजाने लोग. अपने ही शहर में चलते फिरते होता है महसूस कि किसी सफ़र पर निकल आया हूँ. तुम नहीं रहती मेरे शहर में, मैंने तुम्हें देखा भी नहीं... मगर फिर भी तुम्हारे सफ़र पर जाते ही मैं अचानक कई बार सड़कों को दूर तक गुम होते हुए, किनारे खड़े दरख्तों पर बैठे पंछियों को और सरकारी इमारतों के आहातों में हरकारों को देखता हूँ, अचरज भरी आँख से. मैं खो जाता हूँ किसी अनजाने शहर में...

तुम न जाने
किस गली से गुज़रना पसंद करो,

इसलिए बसते जाते हैं शहर दूर दूर तक.
* * *

बेतुके ख़्वाबों के सिलसिले में
एक टुकड़े से बुनी थी शक्ल, तुम्हारे घर की
और फिर वह खो गया, उसी ख़्वाब की राह पर.

मगर ये झूठ है कि
मैंने देखा नहीं है तुम्हारा घर, तुम आये नहीं मेरे यहाँ.
* * *

[Image Courtesy : Michael Naples]

सबसे घटिया जुआरी

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एक बेवजह की बात है अगली दो बातें महाबार गाँव के धोरों की स्मृतियों से बुनी है.


उन्होंने ज़ब्त कर लिया मेरा पासा
और मुझे यह कहते हुए कर दिया बहिष्कृत
कि मैं सबसे घटिया जुआरी हूँ.

मेरे पासे के सब तरफ लिखा था, एक तुम्हारा नाम.
* * *

पिलाण की पीतल की कूंट में
या अनजाने पिरो लिया मोहरी की राती डोर में
या फिर गोरबन्द की लड़ियाँ ले गयी अपने साथ.

सिर्फ चूमने तेरे हाथ को एक सस्ती कौड़ी हो गया, मेरा दिल.

पिया सिणगारो कसूम्बल ऊंट
आपाँ उड़ जावाँ, लाल शाहबाज़ कलंदर के सहवन देस.

[पिलाण : ऊंट की काठी; मोहरी : लगाम; राती : लाल; गोरबंद : ऊंट सज्जा को कौड़ियों और सूती रेशमी धागों से बुना सज्जा वस्त्र; सिणगार : श्रृंगार; कसूम्बल : रात जैसा गहरा लाल; आपाँ ; हम दोनों; उड़ जावाँ : उड़ जाएँ; लाल शाहबाज़ कलंदर : सैय्यद उस्मान मरवंडी, एक सूफ़ी संत; सहवन : शाहबाज़ की जगह का नाम]
* * *

गिर गया, चाँद सा कंघा मूमल के केश से

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कई सौ सालों पहले
मूमल ने रेगिस्तान को देख कर उदास
अपनी ओढ़नी में भर लिए बहुत सारे रंग.
रेत में उग आई सोनल घास,
जहां गिरा था, चाँद सा कंघा मूमल के केश से.

महेंदर चढ़ा रहता था नौजवान ऊंट की पीठ पर
चांदनी रातों में, रेत के धोरों पर पीता रहा,
दीवड़ी भर मूमल का प्रेम
उन धोरों की छाती में बहती है, विलोप हुई नदी काक.

एक ढाढी बैठा रहता, काहू गाँव की एक जाळ की छाँव में आधी आँखें मीच कर जताता था, संशय ज़िन्दगी पर
मगर उसे प्रेम पर था यकीन
कहता, नैणा मुजरो मानजो, पिया नहीं मिलण रो जोग.
[ओ पिया हमारे मिलने का संयोग नहीं है, आँखों से अभिवादन स्वीकार लो]

चौमासे से पहले फुरसत की दोपहर में 
एक कारीगर ने लिखा बावड़ी की पाल पर
सब उड़ जासी जगत सूं,  रेसी बाकी प्रीत.
[इस दुनिया से सब कुछ खो जायेगा, प्रेम बचा रहेगा]

कुछ साल पहले
एक बिरतानी आदमी ने कहा कि यहाँ लिखा है
मैं रेगिस्तान हूँ, मुझे लूट लिया जाये, तेल के लिए.
उसने खोद दिया मूमल का दिल, नोच ली सोनल घास...

एक उदास मांगणियार ने गाना छोड़ दिया लोक गीत,
माणीगर रेवो अजूणी रात...

एक था, उथला उथला दिखने वाला मीठा गहरा रेगिस्तान...


* * *
लोद्…