An illegally produced distilled beverage.


March 31, 2012

मुर्दा आदमी की ख्वाहिश

बहुत हुई बेवजह की बातें कि मेरे भीतर कोई रात भर जागे, कोई उम्र भर सोचे. चल झूठी कहानियां लिखेंगे और खुश रहेंगे. फ़िलहाल इन्हें पढ़ लो...

महबूब को चूमते हुए
हम हो जाते हैं, एक विशालकाय वर्तुल.

हमारे आवेग के आकर्षण में
बाहर चारों और उड़ने लगती है, सब चीज़ें
भीतर घुलने लगती है, एक जादुई शांति.
* * *

चाकू के लिए ब्रेड को इजाद करना
रोटी के लिए आदमी को बनाना
सुंदर बिस्तर के लिए औरत को लाना
चूमने के लिए प्रेम करना, ये शैतान की ख्वाहिशें है

किसी को चाहना और पत्ता गोभी की तरह बंद पड़े रहना
ये एक मुर्दा आदमी की ख्वाहिश है.
* * *

ये इस दुनिया की दो बड़ी दुर्घटनाएं हैं
एक जो मैं ये लिख रहा हूँ, एक जो तुम इसे पढ़ रहे हो.
* * *

March 28, 2012

इस बात का एतबार नहीं है...

पहाड़ पर बैठ कर उसकी सख्ती के बारे में सवाल नहीं करने चाहिए. उसकी मज़बूरी के बारे में सोचना चाहिए कि उसके पास इंतज़ार के सिवा कोई चारा नहीं है, वरना नदियाँ किसे प्यारी नहीं होती. बेवजह की बातें...


देखो अँधेरे में इन तारों को
और मैं देख रहा हूँ अँधेरे में चमकते हैं, तारे.

रुखसत कर दो, तकलीफ़ का ख़याल दिल से
और मैं तकलीफों पर लगाने लगा, लाल निशान.

कि कल रात मुझे लगा,
तुम बैठी हो कुर्सी के हत्थे पर टिकाये कोहनी
और मैंने ले रखा है, सहारा, कुर्सी के पायों का.
* * *

ओ रॉल्फ सायमन
स्कूल में आखिरी बैंच पर बैठती है, कोई लड़की
क्या उसके पास बची है थोड़ी खाली जगह, थोड़ा सा धैर्य ?
ओ केथरीन बर्कले
अब कितने चुम्बन दूर रह गया है, सोम के युद्ध का मैदान.

ओ लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक हेनरी
कहां गयी शराब, कहां गयी औरतें और कहां गयी नींद.
* * *

March 27, 2012

बस ज़रा कुछ देर और...


ऑफिस जाते हुए एक गली के मोड़ पर कंचे खेलते हुए कुछ बच्चे दिख जाते हैं. एक लड़का कोसता है, कुछ ख़ुद को और कुछ साली तक़दीर को कि गुब्बी में एक साथ दो कंचे आ गए हैं. मैं उनकी तस्वीर उतार लेना चाहता हूँ मगर याद आता है कि कैमरे का मैमोरी कार्ड क्रैश हो गया है. बात सिर्फ़ दो तीन सौ रुपये की है मगर ऐसी छोटी बातें भी कई बार छीन लेती है, क्या कुछ. जैसे कि कई बार आप सोचते हैं कि काश कह दिया होता उसको कि हर कोई नहीं हो सकता है, साथ. दूरियों पर भी छोड़ देनी चाहिए, कुछ चीज़ें.

देखो केसी, कैसे कैसे लोग स्क्रिप्ट राईटर, लिरिसिस्ट, ऑथर... और भी जाने कितना ऊंचा उनका नाम. मैं कहता हूँ जाने दे, जो जैसा होना चाहता है, हो जाता है. मैं रेगिस्तान में रह कर डायरी लिखना चाहता हूँ कि मेरे दिल पर लिखा है, इस मिट्टी से प्रेम... और सुन कि जब पढ़ने पर आते हैं लोग तो पढ़ लेते हैं चलते हुए आदमी के दुखों को भी और भयानक अँधेरे के वक़्त भी कहीं से आ ही जाती है, उम्मीद की रौशनी.
चल, कुछ बेवजह की बातें करते हैं.

प्रेम होता जाता है अनावृत
आफतें बुनती रहती हैं, ज़बरदस्त पैरहन
* * *

उलट पुलट कर दिल की ज़मीं को
बैठ जाता है किनारे
प्रेम की फसल के लिए चाहिए, एक तूफ़ान भरी बारिश.

किसान देखता रहता है उसकी आँखें.
* * *

दिल एक नट की तरह
हाथों में लिए उम्मीद का बांस
हवा में डोलता रहता है, याद के तार पर.

कोई बजाता रहता है, डुगडुगी इश्क़ की
कि आ रही उनके क़दमों की आहट,
बस ज़रा कुछ देर और...
* * *

[ Image courtesy : Prateeksha Pandey  ]

March 25, 2012

यादों का बख्तर...

जब तक चुभी नहीं थी कोई नुकीली चीज़ पांव में रास्तों का फर्क मालूम न था और जब भी देखा झुका कर गरदन पाया कि हज़ार काँटों पर ही खिले थे सौ फूल और शायद हर कोई नहीं जानता कि गेंहू की बाली सा तीखा होता है, खिलता हुआ प्रेम. तुम देखना समझना अपने आप को और रखना याद कि ज़िन्दगी ने गर दिया है तुम्हें काँटों का बख्तर तो चुभोना न उसे किसी की आँख में.


सबके लिए होती है जगह, कम या ज्यादा
अगर दुनिया
सिर्फ़ काँटों से ही भरी होती तो वे चुभते किसको.
* * *

चुभता है कांटा पांव में
कि हम एक फिर याद कर सकें, अपनी भूली हुई चाल को.
* * *

एक उदासी भरे दिन काँटों से की थी बात
कहा कि थक नहीं गये तुम, मेरी ज़िन्दगी में पड़े पड़े
चलो बाहर घूम कर आते हैं.

फिर धुंधलके के वक़्त
दूर किसी अनजान गली के मोड पर दे आया, उनको चकमा.

मगर हज़ार कोशिशें, नाकाम. 

* * *
सुनों ये सब बेवजह की बातें हैं, असल में कांटा तो तुम्हारी याद है... ज़रा फिर पढना इसे अपने बारे में सोचते हुए.

March 24, 2012

तुम लौटा नहीं सकते

कितने साल हो गए कोई सस्ता सा लतीफा सुनाये हुए और आख़िरी बार कई बरस पहले दिल्ली के एक ढाबे पर दोस्त को दिया था धक्का. कितना ही वक़्त हो गया दस बीस लोगों के बीच बैठे हुए कि खो दिए दोस्त और किसी एक झूठी बात के लिए रोते ही रहे.

तुम लौटा नहीं सकते बरबाद दिनों को
और मैं भूल भी नहीं सकता हूँ उनको. 
मुश्किलों के बाद सख्त हो गया है दिल
कहो अब करें भी क्या इसका
कि इसे छूना नहीं चाहता है, कोई संगतराश.  

हालाँकि आदमी आया नहीं है दुनिया में
खिलने फूल की तरह
उसे उठानी है आसमान को छूती हुई
मेहराबें ईमान की,
उसे खिलानी है रौशनी इल्म की. 

मगर उम्मीद बाकी है, मेरे पास
कि एक नन्हीं लड़की के हाथ में है जादू
चीज़ों को वापस असल शक्ल में लाने का.
हालाँकि कोई भी
लौटा नहीं सकता है, किसी के बरबाद दिनों को.
* * *

[Image courtesy : Satya]

March 23, 2012

आखिर ये दुनिया है...


मुझे नहीं मालूम कि अपनी डायरी में क्या लिखना चाहिए. ये भी नहीं मालूम कि क्या याद रखूं किसे भूल जाऊं. सब आसान है और सब मुश्किल. सोचता हूँ कि उसे कह कर अच्छा किया. अगले पल आता है ख़याल कि मेरे अन्दर से ही कोई उठे और मुझे बहुत सारी गालियाँ दे. ऑफिस के लोग जा चुके होते हैं और मैं अपने कमरे में बैठा होता हूँ. गार्ड से कहता हूँ थोड़ा रुकिए अभी आता हूँ. इसलिए कि कुछ भी आसान नहीं है. सब मुश्किल है. थक कर छत की ओर देखता हूँ. याद आता है कि कल रात भी वह ततैया वहीं पर बैठा था. अचानक आता है ख़याल कि वह तो ट्यूब लाईट के स्टार्टर से चिपक कर कब का मर चुका है ... आह मुश्किल आसान हुई. उदास न हो केसी घर चलो.

कुछ बेवजह की बातें मुश्किलों के बारे में...

किसी न किसी को पढ़ना ही होगा पाठ
बेहतर है कि हम पढ़ा सकें मुश्किलों को.
* * *

उसकी दी हुई तकलीफों को
छुपा लो, घबराए हुए कुत्ते की दुम की तरह
और बैठो किसी तनहा जगह पर.

तुम उम्र भर चाटते हो तलवे प्रेम के
और वह एक बार फेर कर तुम्हारे सर पर हाथ
हो जाना चाहता है अपराधबोध से मुक्त.
* * *

क्योंकर हो ऐसा
कि कह दे वह, नहीं जीया जाता तुम्हारे बिना
और आफत है लेना साँस भी.

क्योंकर न हो हर तरफ दर्द
कि मुझ पर टूटनी ही चाहिए कोई न कोई मुश्किल
आखिर ये दुनिया है, कोई ख़ाला का बाड़ा नहीं.
[ख़ाला का बाड़ा -  मौसी के घर में कंचे खेलने की जगह]
* * *

मुश्किल, रेत में दबा एक संदेश है कि गधों को लौट जाना चाहिए पोखरों के पास और ऊंट देख लें उठा कर अपनी गरदन कि प्रेम का घर कितनी दूर है. साथ ही ये भी लिखा है कि मुश्किलें डरती है, औरत की हाय से... इसलिए जब तक पकड़ के चलोगे उसका हाथ, वे इंतज़ार के सिवा कर न सकेंगी कुछ.

[तस्वीर, सर्च इंजन से और क्रेडिट नामालूम Image courtesy : no credit found]

March 20, 2012

तुम भी देखना उचक कर...


ये क्या हुआ है मुझको कि कागज ख़राब किये जाता हूँ. इससे तो पहले बेहतर था कि चुप रहते थे. कब से बैठा हूँ कि छंट जाये अल्लाह मियां की भेजी हुई गर्द मगर वह फिर मसरूफ़ हो गया लगता है किसी की याद में, जैसे मैं खोया रहता हूँ... ये एक बेवजह की बात पढो. तस्वीर घर से दिखते पहाड़ों पर बुझे बुझे सूरज की है.

गर्द से भरा है आसमान
और साँस लेने में है तकलीफ़ कुछ ऐसे
कि किसी कमसिन लड़की का
पहली दफा छूटा है, महबूब के हाथ से हाथ.

सूरज आ चुका है सर पर कब का, अँधेरा मगर कायम है
लोग जा चुके हैं मुझसे दूर... बहुत दूर
मैं जुटा रहा हूँ सामान, आख़िरी सफ़र को
और पाता हूँ कि एक तेरी आवाज़ गायब है, मेरी झोली से.

ओ महबूब, ज़रा तुम भी देखना उचक कर, अपने घर की बाम से
कि गर्द से भरा है आसमान या साँस लेने में तकलीफ़ की वजह कुछ और है...

March 19, 2012

सिर्फ एक बात पर...



रात के अँधेरे ने छुपा दिया है महबूब का चेहरा, कुछ बेवजह की बातें लिखो कि किसी तरह गुज़रे उसका इंतजार... सब बेसलीका और बेवजह है. ये दो खाली झूले महाबार गाँव के पास वाले शिव मंदिर के हैं , दो क्यों सब कुछ खाली खाली सा ही होता है एक उसके बिना....

मुस्कुराती आँखों के लिए
मुश्किल होता है सच को देख पाना.

कि आंसुओं के पार ही दिखते हैं
सात रंग अपनी असली शक्ल में.
* * *

कूड़ेदान में पड़े होने के दिनों में भी
चिंताएं जुडी होती है
गीली थूथन वाले मोटे सूअरों से.

वे आयेंगे खाने की तलाश में
और कर देंगे कूड़ेदान से बाहर.

कि जादू सबके पास होता है,
आपके जीवन को बदल देने का.
* * *

मुसीबत के ऊंट को न छोड़ो ऐसे
कि उसकी कूबड़ में भरी है, अनेक खुराफातें.
वह फिर से किसी दोशीज़ा को लायेगा
बिठा कर अपनी पीठ पर, तुम्हारे लिए.

वह छल लेगी तुम्हें एक बार फिर से
और ऊंट चिढ़ाता रहेगा, बिलबिला कर.
* * *

और ये सब लिख कर नहीं मिटती उसकी याद नहीं बुझता उसका इंतजार
इसलिए सिर्फ ग़ालिब...

March 18, 2012

है कुछ ऐसी ही बात...



कुछ दस्तकें ख़यालों की दुनिया से लौट आने के लिए होती हैं. हालाँकि उदास होने की कोई बात नहीं कि कितना भी सूखा हो बियाबाँ मगर आँखों को धोने के लिए दो चार दिन बाद कहीं पानी मिल ही जाता है फिर ये आँखें खुद को किसलिए आंसुओं से धोने लगती है. बस ये समझ नहीं आता है.

एक उसकी याद के सिवा सब अँधेरा है. इस स्याही से बाहर आने के लिए उसकी आवाज़ का सहारा चाहिए लेकिन आवाज़ नहीं मिलती. ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे फ़ौरी तौर पर किया जाना जरुरी हो सिर्फ़ दर्द को सहना जरुरी है कि इससे बड़ा सम्मान कुछ नहीं होता. ये जानते हुए भी उसे हड़बड़ी में भुला देने की कोशिश में लग जाता हूँ.

ज़िंदगी का कोई सलीका तो होता नहीं इसलिए अचानक कोई चला आता है. वह अनमनी नींद को थपकी देता है. नींद के सरल और मृत्यु सरीखे रास्ते से बुला लेना कोई ख़राब बात नहीं है मगर वह जगा कर अक्सर खुद कहीं चला जाता है. इसके बाद एक फासला रह जाता है. इस फासले के दरम्यान बची रहती है, तन्हाई...

अच्छे या बुरे हालात हर हाल में बदल ही जाएंगे मगर कई बार आप जीने की वजह के बारे में सोचने लगते हैं.
और जीने की वजह आपसे बहुत दूर होती है.

वे दस्तकें, हमारे आशुफ्ता हाल से बेपरवाह होती हैं.

* * *

दाग़ ए दिल गर नज़र नहीं आता,
बू भी ऐ चारागर नहीं आती.

Though the wound of my heart cannot be seen
but my healer, even a trace of its smoldering is missing. 

आह ग़ालिब...

March 17, 2012

मुझे आदत है, घरों में झांकते हुए चलने की


दुखों के बारे में नहीं सोचना चाहिए, यह भी नहीं कि हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ. अगर हम जान सकते मुड़ना तो रास्ते का कोई आखिरी छोर नहीं होता.

अक्सर मैं एक ऐसी ज़हीन लड़की से
करता हूँ बात
जो करती है दावा कि मुश्किलें सबके साथ है.
और ऐसे में कोई भी उठा लेगा तुम्हारा फायदा
इसलिए बंद रखो खिड़कियाँ दिल की .

मगर बंद तो रह नहीं पाता
कोई भी बीज
एक दिन फूट कर खिल ही जाता है, कभी न कभी.

बावजूद इसके अविश्वास से भरी लड़की ने
खूब बातें की मुझसे
उसके पहलू से उठते हुए, मैं कहना चाहता था
कि जिन्होंने की थी एक आसान दुनिया की कल्पना
उनको अपने मेनू से हटा देना चाहिए था प्रेम.

कुछ प्रार्थनाएं बेकार ही होती हैं
हम मांग रहे होते हैं किन्तु वे पूरी नहीं हो पाती. 
हमें खुश करने के लिए कहता है, हर कोई
कि जो चीज़ें नहीं बनी होती है हमारे लिए
ईश्वर उनसे बचा लेता है हमको .

इन बेढब बातों के बीच मुझे एक पते की बात मालूम है
कि मैं एक लालची आदमी हूँ
जो अक्सर ये हिसाब लगाता है कि क्या नहीं मिला
कल रात भी, मैं भर लेना चाहता था उसे अपनी बांहों में...

मुझे आदत है घरों में झांकते हुए चलने की
और घरों से आती आवाजें सुनने की
कल एक माँ अपने बच्चे से कह रही थी, ज़ख्मों को रहने दो खुली हवा में

सच
प्रेम में रोना एक अच्छा काम है.

March 15, 2012

शुक्रगुज़ार होना चाहिए, तुम्हें...


मौसम ऐसा है कि देर रात तक जागने लगा हूँ और सुबह सो नहीं पाता. उलझनों के अनदेखे परदे के पार खुद से पूछता हूँ कि क्या चाहिए दोस्त, किसलिए इतने अधीर हो और बहुत दिनों से क्यों टूटे डूबे रहते हो? सवाल राहत नहीं देते, ये बस कहीं भाग जाने का सामान बुनते हैं. चेहरे पर भीगा सीला मौसम उतर आता है. मुझे कुछ नहीं चाहिए, कुछ भी नहीं... मैं बिखरा बिखरा सा हूँ और सिमट जाना चाहता हूँ. दिल भारी हो आया, मन उदास और अक्ल नाकाम तो बेवजह की बातें लिखने लगता हूँ. थोडा सा और रो लूं तो एक और पंक्ति लिख सकूँ. थोडा सा और बस एक बार फिर थोडा सा... कि मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए.


ज़िन्दगी की मेज पर रखी कटोरी में
कुछ ही बचे थे, दाने उम्र के
और अचानक किसी ने थपथपाई पीठ.

थोड़ा उधर सरको, मैं भी बैठूंगी तुम्हारे पास.
* * *

एक महान आदमी जीता है
तड़पती आत्मा को छिपाए हुए.

मगर मुझे करनी है तुमसे बात
कि रात बहुत तनहा और ज़िन्दगी ऐसी क्यों हैं.
* * *

शुक्रगुज़ार होना चाहिए तुम्हें

कि इस सफ़र में दर्द न होता साथ
तो कितनी बढ़ जाती, तन्हाई.
* * *

आखिर
लौट आई मुस्कान मेरे चहरे पर

जब ये सोचा
कि तुम्हारे साथ न होने का दुःख
सिर्फ इक ज़िन्दगी भर का ही है.
* * *

तस्वीर, घर के बैकयार्ड में खड़ी मेरी नन्ही बच्ची की दो सायकिलें, मेरे पास जब तक अपनी बीएसए नाम वाली सायकिल थी, मैं समझता था कि मुहब्बत किसी अच्छी चीज़ का नाम है.

March 13, 2012

उदास किराडू और थार फेस्टिवल


कल रात को साढ़े ग्यारह बजे स्टूडियो से लौटते हुए अनगिनत बाइक सवार और मोटर गाड़ियों से सामना हुआ. उनको देख कर मुझे दो लोगों की याद आई एक ललित के पंवार और दूसरे संजय दीक्षित. मैं नहीं जानता कि दोनों में समानताएं क्या है मगर एक साथ याद आने का साझा कारण था, "थार फेस्टिवल". थार एशिया के सबसे बड़े मरुस्थल का नाम है और फेस्टिवल का अर्थ मुझे मालूम नहीं है. आंग्ल भाषा का शब्दकोष लेकर बैठूं तो उसमें पर्व या त्यौहार जैसा कुछ पाता हूँ. तो मेरी स्मृति में इस रेगिस्तान में कोई थार नाम का पर्व या त्यौहार कभी रहा नहीं. जो लोग मेरे सामने से गुज़र रहे थे, वे इसी आयोजन से लौट रहे थे और शायद कैलाश खेर को सुन कर सूफ़ियाना अनुभूति से भरे हुए रहे होंगे.

ललित के पंवार की याद आने की एक वजह थी कि इस रेगिस्तान की मिट्टी से जुड़े सरोकार और चिंताएं उनके दिल में रहती हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने गहरे ह्रदय से कहा था कि मरु प्रदेश की इस अनूठी धरोहर को विश्व के पर्यटन मानचित्र पर वो सम्माननीय स्थान क्यों नहीं मिल पा रहा? उनके इस सवाल में तल्खी नहीं एक दिली पीड़ा थी. ललित जी शायद आईटीडीसी के सबसे बड़े अधिकारी है. दिल्ली में बैठ कर भी अपनी जड़ों की ओर झांकने की आदत से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं. अख़बारों में छपी उनकी चिंताओं को पढ़ते हुए मैं चाहता था कि उनको एक लम्बा ख़त लिखूं मगर नहीं लिखा.

वैसे थार फेस्टिवल के बारे में याद करता हूँ तो मुझे एक शोभा यात्रा से सिलसिला शुरू होता हुआ दिखता है. इसमें कुछ लोक कलाकारों और नर्तकों के दल होते हैं वे उसी अंदाज़ में परेड करते हुए चलते हैं जैसा कि हम दुनिया भर के वृहदतम खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आग़ाज़ में देखा करते हैं. उन सब भव्य परेडो के सामने यह एक बेहद बोना प्रदर्शन होता है. डिजिटल ऐज़ में आज हर घर में विश्व भर के आयोजन पहुँच रहे हैं. ऐसे में इस परेड को देखने और इसे एक उत्सव में तब्दील कर देने के लिए स्थानीय नागरिक अपने घरों की मुडेरों पर चढ़ आयेंगे और पुष्पवर्षा से इसे अतुलनीय बना देंगे. यह असम्भव है.

इसी शोभा यात्रा में कुछ घुड़सवार होते हैं. इनकी शक्ल हर साल बदलती रहती है. जिस किसी भी सरकारी अधिकारी के पास घोड़े पर चढ़ने का साहस और अपने ओज के प्रदर्शन की लालसा बची होती है, वह उन पर सवार हो जाया करता है. इस तरह एक सरकारी बन्दोली का पावन ध्येय अपने उत्कृष्ट स्वरूप में नुमाया होने लगता है. वैसे एक और कमाल की बात होती है कि ये मालाणी के प्रसिद्द घोड़े नहीं वरन ब्याह शादियों में दुल्हे को ढ़ोने वाली नचनियां घोड़ियाँ हुआ करती हैं.

रूमी ने कहा था कि मेरे महबूब आ मैं तुझे अपने सर पर पगड़ी की तरह बांध लू भले ही तेरा नुकीला तुर्रा बार बार मुझे सताता जाये. इसी प्रिय पाग को कौन सर पर जल्दी और सुंदर बांध सकता है जैसी एक प्रतियोगिता होती है. टेंट हाउसों से आये शादी ब्याह वाले कालीनों पर खड़े प्रतिभागी एक सुंदर तरीके से पगड़ी बांधने के सामूहिक अचम्भित कर देने वाले प्रदर्शन की जगह अजब ढंग से हाथ हिलाते हुए मसखरे जान पड़ते हैं. उनको देखते हुए मेरे दिल से दुआ निकलती है कि ऐ रेगिस्तान की पगड़ी तेरी शान सदा कायम रहे.

यहाँ साल भर में कम से कम एक बार रंगोली बनाने की प्रतियोगिता हर स्कूल कॉलेज में अवश्य होती है. रंगोली हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा है. हम एक सुंदर रंग भरे जीवन की कामना को इसी तरह से व्यक्त करते हैं. लेकिन मैं आज तक नहीं समझ पाया कि यह अगर कला है तो प्रतियोगिता कैसे हुई? इसके अलावा ढोल बजाने की, महिलाओं द्वारा सर पर घड़ा उठा कर दौड़ने की, पोते का हाथ पकड़े हुए दादा के दौड़ने की और कई बार तो अंग्रेजों के इजाद किये चमच में नीम्बू रख कर दौड़ने जैसी कलाओं का प्रदर्शन होता है. इन सबको देखते या सोचते हुए उदास होने लगता हूँ, देश और दुनिया के लोग इससे प्रभावित न हो सकेंगे.

एक और उदासी इस बात की घेरती है कि ये सारा का सारा आयोजन जैसलमेर में होने वाले मरु-महोत्सव का क्लोन भर है. कोई महीना भर पहले हज़ारों विदेशी और असंख्य देसी सैलानियों द्वारा महज एक सौ साठ किलोमीटर दूर रेत के स्वर्णिम धोरों में इस सबका आनद लिया जा चुका होता है. थार फेस्टिवल सोचता है कि रेगिस्तान की खुशबू से कोई बचा रहा गया हो तो बाड़मेर चला आये. कुछ एक साल पहले एक भूला भटका गोरा आदमी महाबार चला आया तो आयोजकों ने उसे इतनी फूल मालाएं पहनाई कि वह शर्मिंदा हो गया. इस कृत्य को देख कर मैंने अपना सर आउटडोर रिकार्डिंग के यंत्रों के पीछे छिपा लिया.

इस फेस्टिवल की थीम क्या है ये कोई ठीक ठीक नहीं जानता किन्तु बाहर से इतना समझ आता है कि बाड़मेर जिले में बिखरी हुई अद्भुत सांस्कृतिक धरोहर के स्थलों पर आयोजन किये जाएँ ताकि पर्यटक वहां पहुँच सके. लेकिन यह आयोजन कुछ दवाबों के कारण एक तुष्टिकरण का सालाना कारोबार बन कर रह गया है. बालोतरा में होता है, चोहटन में होने ही लगा है. अब कई और जगहों के ऐतिहासिक सांस्कृतिक महत्त्व सामने लाया जा रहा है. नई मांगें खड़ी हुई है. जैसे कला और संस्कृति के संरक्षण और उत्थान का काम प्रशासन का है. आयोजन के लिए जिम्मेदार कोई अधिकारी उनको ये जवाब नहीं देना चाहता कि अगर आपके क्षेत्र में कोई अनूठी विधा है तो उसके लिए सामूहिक प्रयास कीजिये, सरकार का मुंह न देखिये.

जिला कलेक्टर इस समारोह की आयोजन समिति के अध्यक्ष होते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है. उनके सामने एक लाल बस्ता हर साल उसी तरह आ जाता होगा जैसे होली दिवाली आया करती है. इस बस्ते के साथ कुछ चापलूस भी चिपके हुए आ जाते हैं. उनसे अगर कलेक्टर कहें कि ऐसा कर लें तो वे अपनी मुंडी इस तरह हिलाएंगे कि उसका अभिप्राय हाँ और ना के बीच का कुछ समझा जाये. आखिर कलेक्टर समझेंगे कि ये थार फेस्टिवल है क्या और कैसे किया जाता है. दो घंटे बाद सब थक जाएंगे और एक सामूहिक आवाज़ आएगी कि सर जो आप कहें या मेम आपने बिल्कुल ठीक कहा है. कायदे से हर दो साल बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा का कोई योग्य अधिकारी इस फ़ाइल को नए सिरे से समझने के लिए अपना सर खपाता देखा जा सकेगा.

कनाना की आंगी गैर को देखना एक अद्भुत अहसास है. अजंता एलोरा के भित्ति चित्रों को मात देती हुई मूर्तिकला वाले किराडू के रोम रोम में अनचीन्हे सौन्दर्य का वास है. यहाँ के लोक सुर महान शास्त्रीय परम्परा के रेशमी कालीन के सुनहले धागे हैं. रेगिस्तान के कण कण में अनूठा सौन्दर्य है. बावजूद इसके ललित के पंवार जैसा व्यक्ति चिंतित हो जाता है कि आखिर लोचा कहां है. उनका ऐसा होना लाजिमी है. जो भी आदमी रेगिस्तान से प्यार करता है वह चाहता है कि लोग रेगिस्तान को जाने और समझें. लोग हमारे जीवन को देखने के लिए यहाँ तक आयें. किन्तु अफ़सोस...

मुझे संजय दीक्षित इसलिए याद नहीं आते कि शेन वार्न उनको धोखेबाज़ कहता है वरन इसलिए कि उस आदमी ने शास्त्रीय और लोक संगीत के एक भव्यतम आयोजन की कल्पना की थी. उसके विजन में एक वृहद् आयोजन था जो हमारी संस्कृति की शास्त्रीयता और रेगिस्तान के जीवट भरे जीवन के कोलाज को बुनता. क्या रेगिस्तान के इस कोने में सीमा पर बैठा हुआ आदमी कभी सोच सकता है कि वह ग्रेमी एवार्ड से सम्मानित पं. विश्व मोहन भट्ट को सुन सकता है ? क्या वह कल्पना कर सकता है कि शास्त्रीय संगीत के महान कलाकार रेगिस्तान के जिप्सी गायकों के साथ एक ही मंच पर बैठ कर इस सूखे रेतीले प्रदेश को सुरों से हरा भरा कर सकते हैं.

लेकिन संजय दीक्षित या उनकी समानधर्मा सोच के अधिकारियों के दिल में बसने वाला शास्त्रीय आयोजन एक लोकानुरंजन के सस्ते तमाशे में तब्दील हो गया है.

मैं कल रात को देर तक सोचता रहा कि कभी पंवार साहब को लिखूंगा कि इस आयोजन को जैसलमेर के क्लोन होने से मुक्त करवाया जाये. इसे किराडू के मंदिर समूहों पर विशिष्ट रूप से केन्द्रित किया जाये कि पर्यटक जैसलमेर सिर्फ़ रेत देखने नहीं वरन विशाल रेगिस्तान के बीच खड़े अद्भुत सोने जैसे किले के मोहपाश में बंध कर आते हैं. बाड़मेर अगर कोई आया तो किराडू के लिए आएगा, किराये पर नाचने और ढोल पीटने वाले तमाशों को देखने के लिए नहीं... इस आयोजन को लोक एवं शास्त्रीय संगीत के विश्व के सबसे बड़े आयोजनों जैसा रचा जाये. लोक संगीत की विविध गायन और वादन विधाओं पर कार्यशालाएं आयोजित की जाये. पैसे देकर बड़े कलाकारों को बुलाने की जगह लोक संगीत के प्रसंशकों और जिज्ञासुओं के लिए ठहरने के उचित प्रबंध किये जाएँ.

संगीत सीखने को आतुर देश विदेश के लोगों को आमंत्रित किया जाये और उनके प्रदर्शन के लिए इस आयोजन में जगह बनायीं जाये. पंवार साहब को वैसे मालूम ही होगा कि दुनिया भर के लोग मांगणियार और लंगा गायिकी यहाँ रह कर सीख रहे हैं. मांड गायिका रुकमा के यहाँ एक आस्ट्रेलिया से आई युवती केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस गा रही थी. मुझे उनको सुनते हुए कैसा लगा होगा ये लिख पाना कठिन है. यहाँ की गायक जातियों के अनगिनत हीरों को अपने ही घर में सम्मान नहीं मिल रहा है. उन सबके लिए ये आयोजन कला के सालाना प्रदर्शन का मंच जरुर बनना चाहिए.

इस आयोजन के बारे में एक ठोस रूप रेखा और स्पष्ट कार्य योजना होनी चाहिए ताकि नए आने वाले अधिकारी अपने चमचों का मुंह न देखें. वे अपनी योग्यता से इसे और नई ऊँचाई देने के सार्थक काम कर सकें. मुझे मालूम है कि कोई भी काम जो किसी विशिष्ट उत्पाद पर आधारित नहीं होगा एक किराने की दुकान बना रहेगा, कभी विश्व विख्यात न हो सकेगा.

मुझे वे पत्रकार और जनसंचारकर्मी याद आ रहे हैं जो इस मेले में जगह मिल जाने के लिए अधिकारियों का मुंह जोहते रहते हैं. प्रशासन इनके लिए भी कभी सम्मानपूर्वक बैठने की व्यवस्था नहीं कर पाता है और आम आदमी के साथ ठीक वैसा ही सुलूक होता है जैसा खैरात लूटने आये नियाज़ियों के साथ... इसलिए कल रात मैंने कैलाश खेर को सुनने जाने की जगह नेट पर एक दोस्त से बात करना प्रिय जाना. अभी दो दिन का आयोजन बाकी है और मेरी उम्मीदें भी कि एक दिन लोग बाड़मेर ये देखने आयेंगे कि ग्यारहवीं सदी में इस रेगिस्तान में भी ऐसे अद्भुत मंदिरों का निर्माण हुआ जिनकी मूर्तिकला आपके गंदगी भरे मस्तिष्क को एक बार फिर नए सिरे से स्त्री पुरुष की देह के सौन्दर्य को देखने के लिए प्रेरित करेगी.

कितना अच्छा होता कि इसका नाम "किरातकूप संगीत महोत्सव" होता.

* * *

तस्वीर किराडू के शिव मंदिर संख्या चार की है. इसे महर्षि दयानद सरस्वती विश्वविध्यालय अजमेर में इतिहास के एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉ. महेंद्र चौधरी के शोध प्रबंध से लिया गया है.

March 11, 2012

खोये हुए सफ़र का एक लम्हा


रेल के सफ़र में मेरी नज़र बार बार सामने की बर्थ पर लेपटोप को सीने से लगाये लेटी हुई लड़की की ओर उठ जाती. जाने किसलिए, अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ जगहों या सफ़र के हिस्सों को पहले भी देख चुका हूँ. परसों शाम बाज़ार की एक सूनी गली में ऐसी ही लड़की को देख कर चौंक उठा था. क्या पीछे छूटे हुए धुंधले चेहरे, एक दिन हमारे सामने से किसी साये की तरह गुज़र जाते हैं या फिर हम ही उनको पुकारते हैं. अपने भ्रम रचते हुए खुद को दिलासा देने के खेल में लगे रहते हैं.

फ़िलहाल रेत पर बैठा हूँ. दोपहर होने तक ये गरम नहीं होगी कि अभी फाल्गुन विदा हुआ है. मैं कहीं पहुँच जाने के सफ़र पर नहीं हूँ. रेलगाड़ी कहीं खो गयी है. दूर एक घने पेड़ की छाँव है, कुछ परिंदों की आवाज़ें हैं और जहां तक रेत है वहां तक रास्ता है... मंज़िल सिर्फ़ सफ़र है, एक तनहा सफ़र.

सफ़र कर रही लड़की के पांवों में थी
पतली सी चप्पल
और फानूस की गहरी रौशनी के रंग सी
घुटनों को ढकने वाली तंग पतलून.

जब वह देख रही होती खिड़की से बाहर
दिखती थी
कला दीर्घा में बेजोड़ चित्रों की नुमाईश के बीच
एक नन्ही बच्ची सी.
* * *

खिड़की के पास बैठी
लड़की के चेहरे पर रौशनी और रंगों का
अविराम कोलाज बनता और मिटता जाता था

जैसे कोई गवैया विलंबित आलाप के बाद
रच रहा हो द्रुत का जादुई सम्मोहन.
* * *


March 8, 2012

रंग सारे नुमाया हैं, बेरंग

खालीपन एक भरा पूरा शब्द है. खालीपन है तो वहाँ कुछ नहीं होना चाहिए फिर मैं जाने क्यों घबराने लगता हूँ. घबराहट में अक्सर कोई शक्ल बुनने लगता हूँ. चुप्पी तोड़ने के लिए उस शक्ल से बातें करता हूँ. उन बातों को ज़हन में छुपा कर रखता हूँ. एक दिन मैं भीड़ में खो जाता हूँ. भीड़ से उकता कर उसी जगह लौट आता हूँ. खालीपन की ओर दौड़ने लगता हूँ. वहां कई शक्लें बैठी होती हैं, खुश और बेपरवाह... वे वैसी ही होती है जैसी मैं उन्हें छोड़ गया था. उनको देखते ही छुपने की जगह खोजने लगता हूँ. शायद उनसे डर जाता हूँ. अगर मुझे लगता है कि उन्होंने मुझे देख ही लिया है तो इस तरह का अभिनय करता हूँ कि मैं यहाँ ऐसे ही आया था. कुछ खोज नहीं रहा था. आखिर भले ही मैंने उन्हें बुना है मगर वे शक्लें पूछ तो सकती है ना मैं इस तरह तनहा क्यों हो जाता हूँ?

दोस्त. आ कुछ खालीपन के बारे में बेवजह की बातें करते हैं, वे बातें जो तेरे कहने से आप ही दुरस्त हो जाती है.

मुझसे पूछता है बार बार
उसने कितने दिनों से पूछा ही नहीं है
तुम्हारा हाल ?

खालीपन एक चुगलखोर है.
* * *

ज़िन्दगी अपरिभाषित दुःख नहीं
दर्द भरी जिज्ञासा थी

कोई खो जाता है, तो मिलता क्यों है ?
* * *

ज़िन्दगी के ड्रामे में
मेरे खो जाने को बुनने के लिए
उन्होंने रचे रुदन और आंसू.

काश, उन्होंने बुना होता
मौन के तंतुओं से गहन खालीपन.
* * *

March 4, 2012

अहा ! कितना सुंदर कालजयी दृश्य...



आपने कभी कोई ऐसी चीज़ देखी है जिसे देखा न जा सके. कुछ बेवजह की बातें, उसी के बारे में...

दिल की दीवार के कोने में
आग की कूची से बना कर
एक तन्हा चेहरा
चित्रकार चला गया, दूसरे काम पर.
* * *

असंख्य उष्ण कीटों की तरह
काट कर छुप नहीं जाती, तन्हाई.

वह लिजलिजे सेंटीपीड की तरह
सौ पांवों से रेंगती हुई चलती है.

अचानक गड़ा देती है अपने दांत
आपके दिल के पास.
* * *

तन्हाई असाध्य है.

उसे सिर्फ़ रिप्लेस किया जा सकता है
तुम्हारे स्पर्श से.
* * *

March 1, 2012

आ कि तेरी जेब में रखूं...

बड़े दिनों से गुनगुनाये जाने लायक बेवजह की बात नहीं लिखी थी. कई साल पहले एक दोस्त साथ थे, वे पहाड़ में अपने घर को चले गए. रेत के शब्दों और पहाड़ की आवाज़ की जुगलबंदी खो गयी. शाम ढले वे अक्सर गुनगुनाया करते "दर्द से पीले पड़े पत्तों की लेकर एक सौगात सुहानी, शाम पुरानी आई है कि याद तुम्हारी आई है..." फिर अचानक रुक जाते और कहते. "केसी आप उदास उदास न लिखा करो, देखो जीवन कितना सुंदर है. मैं आपको देख रहा हूँ और आप..." मैं उनको बीच में टोकता कि "मैं फ्रायड आलू और ग्लास को देख रहा हूँ..." इसके बाद हम दोनों देर तक मुस्कुराते. 

नन्ही प्यारी बच्ची तान्या, आज डबराल अंकल यहाँ होते तो वे इस नयी बेवजह की बात को तुम्हारे लिए गाना जरुर पसंद करते. हालाँकि इसके मीटर और फीट का हिसाब नहीं किया है. जब अपने संगीतकार आयेंगे तब देख लेंगे. फ़िलहाल हेप्पी वाला बर्थडे. 

आ कि तेरी जेब में रखूं 

लफ़्ज़ों की ताज़ा कलियाँ, 
सपनों की आवारा गलियां. 
ओढ़नी के ऊदे बादल, बाँहों की कोमल टहनियां. 

नदियों के गीले किनारे, 
भीगे पेड़ों के सहारे 
सूखे पत्तों का बिछौना, नेह के महके इशारे. 

दर्द का छोटा फ़साना, 
प्रेम का नन्हा ठिकाना 
याद की रंगीन झालर, जीने का कोई बहाना. 

एक सुर्ख़ दिल ये मेरा, 
और सब खुशियों का डेरा 
खुद को ही रख दूं, पूरा का पूरा, पूरा का पूरा 

आ कि तेरी जेब में खुद को ही रखूं दूं, पूरा का पूरा... 

[Happy Birthday Tanya : Dushu, Manu, Abha and Maa]

डरते हैं बंदूकों वाले