An illegally produced distilled beverage.


April 27, 2012

मर जाता है शैतान उसकी याद में...



शोक क्षणभंगुर है मगर स्मृति कालजयी है. पिताजी जिस घर में बड़े हुए थे, उसकी बाखल की ओर मुंह किये हुए सोचता हूँ कि इस जाळ के पेड़ से अब कितना कम मिलना हो पायेगा. इस पुश्तैनी घर में रहने वाली बड़ी माँ में उन सबका भी हिस्सा था जिनका इस घर में कोई हिस्सा न था. पिताजी कहते थे कि भाई ने स्कूल छोड़ कर खेती की और हम सब छोटे भाईयों को पढाया. इसलिए वे हमारे पिता समान है. साल दो हज़ार चार में वे चले गये फिर मेरे पिताजी और अब मेरी बड़ी माँ भी नहीं रही.

गाँव में चार दिनों से ख़ुद के पास बैठा हूँ. सामने कितनी सारी चीज़ें हैं और उनके बारे में सोचने के लिए कितना कुछ है. मेहमान आ रहे हैं और उनके लिए आँगन में ऊंट के बालों से बुने हुए बेहद सुंदर कालीन बिछे हैं. इस कालीन को जीरोही कहते हैं. इसे ऊंट के बालों को कात कर बुना गया है. कुछ एक में बकरी के बाल भी साथ हैं. बकरी के बालों को बाकर कहते हैं. इन जीरोहियों को गाँव के कुम्हार परिवार हाथ के छोटे लूम पर बुनते हैं. जिसको पीन्जा कहते हैं. मोटर गाड़ियों ने ऊँटों के टोले को विदा कर दिया और सूत की दरियों ने कुम्हारों के पीन्जे खूंटियों पर टंगवा दिए हैं.

मेरा दिल मचल रहा है कि अपनी बैठक के लिए एक जीरोही खरीद सकूँ. इसकी चुभन वैसी ही है, जैसा रेगिस्तान का जीवन...बहुत सी बेवजह की बातें हैं, उनमें से तीन पढ़िए. 

बाबा ये जीरोही चुभती क्यों है?

कुम्हार का पीन्जा रहा होगा ज़रा ढीला
फिर कुदरत ने कुछ छोटे बाल दिए थे ऊंट को
और कुछ इसमें मिला हुआ है बाकर.

अब ऊंट चले गए ईश्वर की खोज में
कुम्हारों ने पीन्जे टांग दिए दीवार पर
बकरी, कुजात का बिगड़ा नहीं कुछ
मगर सिर्फ़ बाकर से नहीं बनती, नयी जीरोही.
* * *

लू चीरती जाती है पत्तों का बदन
चिड़ियाएँ फुदकती रहती हैं डाल पर
चलता रहता है रेगिस्तान का जीवन.

दीवार से पीठ टिकाये
सोचता है शैतान, अपनी प्रेमिका के बारे में
और रोता है बियाबान को देख कर.

खाली कुएं में रहट जैसी एक हूक उठती है बिछोह भरे सीने में
और लकड़ी चीरती, करोती की तरह चमकता है, विरह का प्रेम.

पास कहीं बजते, विवाह के ढोल से आती है आवाज़
शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका...

और मर जाता है शैतान उसकी याद में.
* * *

April 20, 2012

आओ, बैठो इस पास वाले स्टूल पर


आदमी को अब फर्क मालूम नहीं होता, उसके चहरे पर नहीं आती ख़ुशी और चिंता की लकीरें कि दुनिया में मुर्दा सीरत वाले ईश्वर ही बचे हैं.  मगर भूलो नहीं की हमें यहाँ तक अंगुली पकड़ कर कोई नहीं लाया था, ज़रा पिछली गली में देखो. हमारे क़दमों के साझा निशान बचे हुए हैं...



ज़िन्दगी की दुकान खुली हो
तो फ़र्ज़ है कि
बाज़ार से गुज़रे को उम्मीद से देखें.

आप ज़रा ज्यादा पहचान की हैं
तो सोचा कि कहूँ
आओ, बैठो इस पास वाले स्टूल पर
मिल कर उम्मीद करते हैं
सूरज के डूबने से पहले बोहनी हो जाये.

कि अब तक इसी तरह
ज़िन्दगी बसर करने की आदत है मुझको.

जब तक आता है कोई
बताओ उस लड़के के बारे में
जिसे आपसे बिछड़ने में लगता था डर
और यकीनन आप कहेंगी
कि शहर बस गए हैं दूर दूर तक
मगर केक्टस की नस्लें भी हो गई है बेशुमार.

मेरी ज़िन्दगी के बारे में न पूछना
मैं उस जायरीन की बात दोहराऊंगा
कि दादा अमरुदीन की दरगाह तक आने में
जिनको उठानी पड़ती है तकलीफें
ख़ुदा उन्हीं का हमराह होता है.

और फिर सुख के लिए
छींके में पुराने अंडे की तरह
लटके रहना भी कोई ज़िन्दगी है.

कभी उठाना चाहिए
कौ़म के लिए भी हमें, अपना हाथ
सिर्फ रोटी तोड़ने की जगह
हाक़िम के गिरेबान पर भी डालें हम बुरी नज़र.

कभी जब न आ रहा हो कोई दुकान की तरफ
पास वाले स्टूल को सरका लें थोड़ा और पास.

कि जब हो चलेगा
वक्त, दुकान ड्योढ़ी करने का
मेरी नाउम्मीदी को बुझा देगा
लोगों का एक काफ़िला
वे बखुशी उठा लेंगे, मुझे अपने कंधों पर
और मैं फिर गलत ठहरूंगा
कि इस दुनिया में लोग तुमसे प्यार नहीं करते.

तब तक के लिए
आओ बैठो इस पास वाले स्टूल पर...
* * *
[Image courtesy : Puja Upadhyay]

April 18, 2012

ज़िन्दगी का हाथ बड़ा तंग है...

उन दिनों सबसे अधिक चाहतें थी. सब जल्दी बड़े होने के ख्वाब देखते थे. बूढ़े लोग करते थे दुआ कि ये कुछ और सालों तक बच्चे बने रह सकें. कमसिन उम्र की कल्पनाओं के पंख ज़मीन से बड़े थे. उनको जीने के लिए नहीं चाहिए थी खाली जगह और वे सामान्य दिनों को बिता सकते थे, महान दिन की तरह. ये आज की तरह सिर्फ़ ख़ुद को बचाए रखने की जुगत में लगा जीवन न था, उन दिनों बड़े हो जाने के लिए समय ख़ुद उकसाता था. लेकिन हम कभी बड़े नहीं होते सिर्फ़ खुरदरे होते जाते हैं. एक बेवजह की बात है, जो कई सारी बातों से मिल कर बनी है. 

दरअसल जो नहीं होता,
वही होता है सबसे ख़ूबसूरत
जैसे घर से भाग जाने का ख़याल
जब न हो मालूम कि जाना है कहां.

लम्बी उम्र में कुछ भी अच्छा नहीं होता
ख़ूबसूरत होती है वो रात, जो कहती है, न जाओ अभी.

ख़ूबसूरत होता है दीवार को कहना, देख मेरी आँख में आंसू हैं
और इनको पौंछ न सकेगा कोई
कि उसने जो बख्शी है मुझे, उस ज़िन्दगी का हाथ बड़ा तंग है.

कि जो नहीं होता, वही होता है सबसे ख़ूबसूरत. 
* * *
[Painting image courtesy : Lorna Millar]

April 15, 2012

गठरी में भरी अकूत कल्पनाएँ...


कुछ बातें मिट्टी से इश्क़, वतन के ख़याल और ईश्वर के बारे में. वह ईश्वर, जो हमारी कैद आत्मा पर रखी हुई काली परछाई मात्र है. बाकी महबूब सबसे हसीन है, वह सदा कमसिन है. बाँहों से फिसलता हुआ, सताता जाता है. हम फिर लौट कर उसी महबूब की गोद में सर रख कर आँखें मूँद लेते हैं.. यानि सब कुछ बेतरतीब है, ओरण के किसी पेड़ की छाँव में अनगढ़ गीत गाते लड़के की तरह

गिरजे का ख़याल आते ही
देख पाता हूँ एक अटारी
और उसके अंदर बंधी हुई घंटी.

तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
तो बेहिसाब ख़यालों की पतंग उड़ती है
दूर दूर तक ईश्वर के खेतों में.
* * *

ईश्वर एक मूर्ख अध्यापक है
अपनी ही भूलों को दुरस्त करने के लिए
डूबा रहता है नरक और स्वर्ग के फरेब में.
* * *

रात की हर घड़ी
मेरे साथ सोये रहते हैं, ईमान और कुफ़्र
तुम्हारी याद आते ही
मैं ईमान को धकेल देना चाहता हूँ, पलंग से नीचे,

मुझे नफ़रत है भौतिक चीज़ों से भी
कि उस वक्त तारों को देखने वाली दूरबीन से
नहीं की जा सकती कल्पना, प्रेम के आकार की.
* * *

उन मुखौटों को
बाद हमारे भी किया जायेगा याद
जो मुरत्तिब को भूल सके.

जिन्होंने अपनी आत्मा से
पुकारा होगा,वतन की मिट्टी को.
[Murattib - arranger, disposer; director]
* * *
[Image courtesy : Lisa and The Devil]

April 13, 2012

तूं सोया रह सकता है, उसके साथ...

कुछ ख़ुद को दी हुई सलाहें हैं बाकी ख़यालों के नक़्शे पर उभर आई उम्मीदों पर पड़े हुए दाग़ हैं. एक तूं हो नहीं सकता और तेरे सिवा कुछ भी नहीं...

रसायन के नियम
सब जगह नहीं आते काम
दिल के कीमियागर
सब चीज़ों को बदल देते हैं, अफ़सोस में.
* * *

दिल इतना बुद्धू है कि हर वक़्त
अहमक़ी दुनिया पर
फ़ाश करना चाहता है, अपना राज़.
* * *

वीराने की ओर लौटता हुआ तूफ़ान होता है
आदमी.

दिल के धड़कते ही चढ़ता है आसमान में
दिल के टूटते ही उतर आता है ज़मीन पर.
* * *

पी लो थोड़ी सी और गर बढ़ गया हो सवालों का बोझ
चलो लड़खड़ाते यूं कि लगे आहिस्ता नाच रहे हो तुम
कहो महबूब से कि तूं सोया रह सकता है, उसके साथ.

यूं एक बच्चे की तरह
हैरत से देखता है क्या, उम्र के इस मोड़ पर सोचता है क्या?
* * *
[Painting image courtesy : Judith Cheng]

April 11, 2012

खरगोश भी पी सकता है, शराब...


एक काम की बात, एक पेड़ जैसे आदमी की कामना, साथ ही जादूगर लड़की और खरगोश की दो बेवजह की बातें.


सब बातें नहीं होनी चाहिए हमारे बस में
मगर मूर्खतापूर्वक करना प्रेम
और समझदारी से मारे जाना, सीखना चाहिए सबको.
* * *

हमें पेड़ की तरह
अपने पांवों में उगानी चाहिए
कुछ मजबूत जड़ें
और शाखाओं को देना चाहिए, सही आकार
कि उन पर पंछी बना सकें घोंसले.

पत्तियों को देना चाहिए हुनर
कि वे ख़ुद के लिए जुटा सकें धूप
और राहगीरों के विश्राम को छाया.

जब भी सूखा पड़े, जड़ें सींच लाये पानी
पंछी बता सकें कि आने को है तूफ़ान
और राहगीर फिर से बो दें, हमारे बीज.

इस तरह ख़ुद को करना चाहिए तैयार
दुर्भाग्य का मुकाबला करने के लिए.
* * *

लड़की ने एक जादूगर की तरह
दिल से निकाल कर बैंच पर रख दिया
एक ज़िन्दा खरगोश
और फिर नए करतबों में लग गई.

कि क्या नहीं होता इस दुनिया में
मगर अब भी लोग देखते हैं हैरत से
कि बैंच पर बैठा खरगोश, पीने लगा, शराब. 
* * *

April 9, 2012

आखिर इस दिल को क्या कहिये...


एक रोज़ हो जाता है हर कोई नाउम्मीद और बचा हुआ ऐतबार खो जाता है. हालाँकि सब पहले से ही जानते हैं कि किसी दिन यह दोस्तों को सुनाने लायक, एक किस्सा भर रह जायेगा कि किस तरह बोरियत भरे दिनों को इश्क़ विश्क की बातें करके काटा जा सकता है या काम के दिनों को कैसे बरबाद किया जा सकता है या फिर महबूब की बेरुखी की धूप के दौरान पनाह कहां ली जा सकती है. खैर मैंने पाया कि दिल एक बड़ा मूरख साज़ है. इसी फ़लसफ़े में कुछ बेतुकी बेवजह की बातें निकल आई है. मैं चाहता हूँ कि इन बातों को उठा कर मार दूँ दिल के मुंह पर... मगर इस दिल को आता है, हज़ार आंसू रुलाना इसलिए चुप रहता हूँ.

कहवा घरों के कोने में
या मॉल की रेलिंग का सहारा लिए
मेट्रो में आँखें मूंदे हुए या तलघर वाली पार्किंग में
या फिर पार्लर के सोफे पर
अचानक धड़कने लगता है मूर्ख दिल

दिमाग आखिर कब तक,
एक चरवाहे की तरह फिरे, इसके पीछे.
* * *

कार्डियोग्राम देख कर चारागर ने कहा
दिल हुज़ूर,
वह दे रहा है धोखा आपको, अब कर लेना चाहिए किनारा

दिल ने कहा मैं इतना भी मूर्ख नहीं हूँ.
* * *

महबूब बिछाता जाता है मुश्किलें
ठुकराता रहता है, फेर कर नज़र
नहीं करता उसकी आमद का इंतज़ार.

मगर बाधा दौड़ का धावक होता है दिल
हांफता हुआ गिनता है, अब कितनी बची है बाधाएं.
* * *

किताबों में जो दिखाई गयी है दिल की शक्ल
और जो महबूबों ने सोची है पीपल के पत्ते जैसी
मेरे ख़याल से दोनों ही वाहियात है.

कि दिल शायद बना होगा गैंडे की खाल से, ऊंट की प्यास से
शेर की दहाड़ से, बाज़ की आँख से और खरगोश की चाल से

कि हज़ार धोखे खाता है, हज़ार उम्मीदें रखता है.
* * *

April 7, 2012

रेशमी सियाही लौट गई उफ़क को....


दो घड़ी बैठो सुकून से ख़यालों की खिड़की पर गिरा दो नाउम्मीदी का पर्दा कि सुलझती जाएं ज़ुल्फें नाकामियों की उतरती आये सियाही बेकसी की. ये काली घनी रात महबूब है, दिन का उजाला फिर से वीरानी ही लिखेगा. कुछ बेवजह की बातें

सफ़ेद कबूतर बना कर
जादूगर उसे छिपा लेता है झोले में,
कभी बिठा लेता है काँधे पर

हसरतें उम्र भर, टुकड़े - टुकड़े ख़्वाब.
* * *

एक जोड़ी चमकती हुई आँखें
बदल गई, भीगी हुई तस्वीर में.

खिल गयी है, वन लता प्रेम की
* * *

उस दिन के बाद सेलफोन की रिंग
आपको नहीं करती, खुश.

वह या तो बुनती है बाहर जाने का रास्ता
या फिर तकिये में छुप कर रोने की जगह.
* * *

सितारों यूं न देखो तुम
कि ऐसी कोई बात नहीं

बस उसे जाना था, अपने महबूब के पास
मुझे भी याद आये, कुछ भूले हुए से काम.
* * *

[Painting Image Courtesy : Kevin Frank]

April 5, 2012

एक लड़की की कहानी


कहानी कहना एक अच्छा काम है. मैं कुछ सालों तक लगातार ड्राफ्ट तैयार करता रहा फिर अचानक से सिलसिला रुक गया और मैं अपने जाती मामलों में उलझ कर कुछ बेवजह की बातें लिखने लगा. मुझे यकीन है कि मैं एक दिन अच्छी कहानी लिखने लगूंगा... मेरा समय लौट आएगा.

कुछ एक मित्रों के अनुरोध पर अपनी आवाज़ में एक कहानी यहाँ टांग रहा हूँ. इस कहानी को रिकार्ड करने के दौरान किसी भी इफेक्ट का उपयोग नहीं किया है कि आवाज़ अपने आप में एक इफेक्ट होती है... खैर किसी भी तरह का बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है, सिर्फ आवाज़...

बिना कोई और बात किये, लीजिए सुनिए.

April 4, 2012

स्मृति का उजाड़ रेगिस्तान...


ज़िन्दगी में जब भी कोई चीज़ आगे नहीं बढती तो उस पर धूल और काई जमने लगती है. हम छटपटाने लगते हैं. नयेपन की चाह में ये ठहरा हुआ लम्हा बोझ बन जाता है. हाँ बोझ.... ये कुछ बेवजह की बातें भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी. ये सारी बातें अलग अलग समय लिखी गई हैं. इनके विषय जुदा हैं और ये बेहद कच्ची हैं. ड्राफ्ट में बेतरतीब पड़े रहने से बेहतर लगा कि आज इनको यहाँ टांग देता हूँ. और हाँ मैं अपने ख़यालों की दुनिया के पात्रों से मुहब्बत करता हूँ. वे हर जगह मेरे साथ होते हैं. उस वक़्त भी जब मेट्रो में देख रहे हों किसी अजनबी को या सोच रहे हों अपने महबूब के बारे में... और तब भी जब वे कायदे से मुझे कह चुके हों अलविदा.

किताबों के कोने से नहीं टपकती शराब
कवर नहीं होते गरम और लज्जा भरे गुदगुदे
और फिर मरे हुए लोगों के अनुभव से
किस तरह संवरती, ज़िन्दा आदमी की तकदीर.

तुम्हारी कसम सब रहा नाकाम, जो लिखा था किताबों में.
* * *

प्रेम में मुझे रुलाने का कोई फायदा नहीं है
कि एक दिन हर कोई भूल जाता है, बुरे दिनों को.
* * *

कई बार लगता है ऐसा
कि बार बॉय उठा ले जाये सारे प्याले,
सिगरेट कि डिबिया को फैंक दे कचरे में
पौंछ डाले टेबल पर रखा शीशा
सेल फोन की कॉल हिस्ट्री को कर दें डीलिट
बाहर निकल आयें सड़क पर और पूछें
कि यहाँ से सफ़दर हाशमी रोड पहले आएगी या संसद मार्ग
कि आदमी के खून का रंग कैसा है ?
* * *

[तस्वीर ऋषिकेश शहर की एक गली में खड़े हाथ ठेले की है.]

April 1, 2012

कहीं नहीं है, कोई...


दिन का डेढ़ बजा था, कुछ देर और बात की जा सकती थी. लेकिन जो बातें होती, वे शायद मुझे रोक कर नहीं रख पाती. दोपहर ज्यादा गरम नहीं थी. बरसों से चालीस के ऊपर की गरमी में जीने की आदत है. तो क्या करूं? कोई काम नहीं था. मुझे शाम पांच बजे से दस मिनट पहले तक स्टूडियो में होना चाहिए था. उससे पहले ये कोई तीन घंटे...

बहुत नहीं होते हैं तीन घंटे मगर कई बार कुछ लम्हे भी शायद कट न सकें किसी भी आरी से. घर के पहले माले की सीढ़ियों से उतरते हुए सोचता हूँ कि क्या बुरा है अगर अभी चला जाऊं दफ्तर. मैं कुछ डबिंग का काम कर लूँगा. चलो उठ जाता हूँ... फिर जाने क्या सोचता हुआ पलंग का सहारा लिए बैठा रहता हूँ.

एक बार देखूं क्या? नहीं... क्या कहूँगा कि शाम हसीन हो, रात अच्छी बीते. वैसे भी हर हाल में फूल मुरझाते जाते हैं और सब आबाद रहता है. आज का एक दिन और डूब जायेगा. अच्छा, आज पिजन बॉक्स में कुछ न मिलेगा. परसों रात सब ख़त्म. बची हुई कुछ बूँदें भी न होगी.

एक घंटा बीत गया है, अभी कहीं नहीं गया हूँ. फर्श पर बैठा हुआ ऑफिस के बारे में सोचता हूँ कि कितना अच्छा होगा. शाम के सात बजने के बाद डूबते सूरज का हल्का अँधेरा स्टूडियो के आगे फैला होगा. एक सिक्युरिटी गार्ड के सिवा वीकेंड पर दफ्तर में कौन मिलता है. यूं बाकि सभी दिनों भी स्टूडियो खाली खाली सा ही होता है. सीढ़ियों पर बैठ कर शाम को बुझाया जा सकता है.

कॉफ़ी पीते हुए चार बज गए. मुझे फिर लगा कि देखना चाहिए, वह शायद हो वहां पर... मगर उठ कर आईने में देखता हूँ. अपने सेल पर हाथ रखता हूँ. उसे आवाज़ दूं, एसएमएस करूं? न, कुछ न करो. बस ऑफिस जाओ. बाइक पर बैठे हुए लगता है कि फोन वाईब्रेट हुआ. नहीं ऐसे ही लगा होगा. रास्ता मुझे अपने आप खींचता रहता है. ऑफिस केम्पस में सर से हेलमेट उतारते हुए लगता है कि गरमी वाकई ज्यादा है. बाल भीग गए हैं... नीम की सूखी पत्तियां फिर से उतर आई है, स्टूडियो के आगे.

सात बज कर तीन मिनट. एक ख़याल कि इस वक़्त बाहर शाम सबसे सुन्दर होगी. किसी के साथ होने से और भी अधिक सुन्दर.... क्या रात भी गहरी होने वाली है. मेरे भीतर से कोई कहता है कि बिल्कुल सच्ची बात है. वह मुझे ये नहीं समझाता कि तुम ये सब किसलिए सोच रहे हो. मैं क्यू शीट में देखता हूँ कि कुछ ऐसा बचा तो नहीं जिसे टेप लाईब्रेरी से लाना हो. नहीं मेरे पास सब था.

वक़्त और बेचैनी मिल कर मुझे सताने लगते हैं. सामने शीशे के पार कंट्रोल रूम के कंसोल पर बैठा एक पुराने दिनों का साथी सामने के पैनल में लगे डीटीएच टीवी पर किसी ख़बर को गौर से देख रहा है.  मुझे कुछ और करना चाहिए. मैं पिछले तीन महीने से जमा हुए दोस्तों और अजनबियों के संदेश मिटाने लगता हूँ. थक जाता हूँ. स्टूडियो की कुर्सी पर आधा ज़मीन पर लटके हुए देखता हूँ कि एस्बेस्टास की कुछ शीट्स अपनी जगह से सरक गयी हैं. दीवार के एक कोने का वाल पेपर उखड़ आया है. चेंज ओवर का एनाउन्समेंट करके फिर से छत को देखना चाहता हूँ, मगर देख नहीं पाता हूँ. बाहर चलो.

बाहर कुछ दफ्तर के ही कुछ लोग खड़े हैं. मैं पूछता हूँ कि आप लोगों के पास कुछ है या ऐसे ही खड़े हो. सबने एक साथ कहा. हाँ सर है. आर्मी केन्टीन से आई एक घटिया सी रम की बोतल. मैं फिर भी खुश हो जाता हूँ. ख़ुशी या अफ़सोस को चहरे से हटा कर पीने लगता हूँ. सर आज जल्दी है? अरे नहीं मेरे पास आज बहुत फुरसत है. सामने कुछ नमकीन रखी है और कुछ कच्चे प्याज की फांकें हैं. बाकि सिर्फ चुप्पी है कि वे चुप हैं. मैं भी...

शोर करते हुए पत्ते भी चुप हो जाते हैं. अँधेरा काफी घिर आया है. पूछता हूँ कि कोई है क्या? कहीं नहीं है, कोई... भीतर से आवाज़ आती है. मैं फिर से इस जवाब देने वाले का शुक्रिया कहते हुए उठ जाता हूँ. आठ पंद्रह होने को है, फिल्म म्यूजिक का वक़्त हुआ. सुखविंदर को प्ले करूँगा फिर खुद से कहता हूँ हरगिज नहीं आज ऊषा उथुप से शुरू करूँगा.. फिर भूल जाता हूँ कि आगे क्या बज रहा है. कोई गीत खोजता हूँ लेकिन मिल नहीं पाता... जाने दो, विज्ञापन क्यू करो... स्कूल चले हम.

इंतज़ार करो.... अचानक पाता हूँ कि ट्रांसमिशन ओवर हो गया. रात के ग्यारह दस बज गए शायद काफी देर हो गयी. है ना? इतनी भी कहां कि इंतज़ार बुझा दिया जाये.... आह एक अप्रेल हो आई है. मूर्खों का दिवस शायद प्रेमियों का भी...

डरते हैं बंदूकों वाले