An illegally produced distilled beverage.


July 21, 2012

कि कुछ नहीं हो सकता


रात के कई पहर बीत जाने के बाद भी अजनबी आवाज़ें, सन्नाटे को तोड़ती रहती है. उदास थकी हुई करवट, पसीने से भीगी हुयी पीठ, तसल्ली की थपकियाँ देती रेगिस्तान की सूखी हवा. सो जाओ, रात जा रही है...

तुम्हें कुछ नहीं सोचना चाहिए
खिड़की के पेलमेट पर रखे हुए तनहा गुलदस्ते के बारे में
उसे आदत है एकाकीपन में जीने की.

कि उन फूलों ने बहुत कोशिशें की थी
लोगों से घुल मिल जाने की
मगर निराशा में चुन ली है यही जगह, ज़रा अँधेरी, ज़रा उदास
जैसे कोई हताश आदमी बैठा होता है, एक अधबुझे लेम्पोस्ट के नीचे.

मैं ऐसी ही चीज़ों के बीच
इसी घर में हूँ, तुम्हें प्रेम करने के लिए
ये मर्ज़ी है तुम्हारी कि रात भर जागते रह सकते हो कहीं भी.

सुनो मेरी बात कि अगर तुम आओगे यहाँ
तो अपनी आदत के हिसाब से मेरे कमरे में रो सकते हो रात भर
कि मुझे भी आदत है पतझड़ के पेड़ों को देखने की
और मालूम है कि सूखी पत्तियों को किस तरह उठाना चाहिए सावधानी से.

ज्यादा सोचा मत करो कि तुम्हारे बिना भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कि मुझे अक्सर चुभते रहते हैं किसी याद के कांटे
जैसे आप बैठे हुए हों किसी नौसिखिये कारीगर की बनायी हुई दरी पर.

तुमसे बिछड़ने के बाद
मैंने कई बार आत्महत्या की और फिर लौट आया घर.
मैंने एक उदास भालू की तरह नैराश्य को सूंघा
और फिर से खो गया आदमियों की भीड़ के जंगल में
कि मरना बड़ा वाहियात काम है जब तक घर पर बच्चे कर रहे हों इंतज़ार.

इधर आने से नहीं डरना चाहिए तुमको
कि मेरे घर की गली से नहीं गुज़रता है कोई झाड़ागर,
किसी के पास नहीं बचे हैं जादुई शब्द
मोहल्ले का सबसे कद्धावर आदमी भी बैठा है, उम्मीद का सहारा लिए हुए.

मैं तुम्हें नहीं करना चाहता हूँ सम्मोहित बिल्ली की तरह आँखें टिमटिमा कर
बस कहना चाहता हूँ कि देखो अहसासों की मुफलिसी के बीच
कितना कुछ तो बचा रहता है हम सब में, उन दिनों का बाकी.

यूं इस दुनिया में नुमाईशों की फ़िल्म चलती रहती है.
आदमी और औरतें मिल कर रोते हैं, एक इंतजार करते हुए कुत्ते को देख कर
मगर भूल जाते हैं, जाने क्या क्या ?   

कि कुछ नहीं हो सकता
फटे पुराने जूतों की तरह ठुकराई हुई पड़ी है ज़िन्दगी, 
हम इसे जीते भी नहीं और फैंकते भी नहीं, जाने किसलिए...

जैसे मैं लिखता रहता हूँ ऐसी बेवजह की बातें, जो कहीं पहुँचती ही नहीं. 
* * *

[Painting Coffee Day, Image Courtesy : Milind Mulick]

July 17, 2012

रह गई हो कोई बात


दो बेवजह की बातें जो पड़ी रह गई ड्राफ्ट में जैसे किसी को कहते कहते रह गई हो कोई बात

दूसरे पैग के बाद खरगोश ने कहा
मुझे नहीं मालूम कि तनहा क्यों हूँ.

ये भी नहीं पता कि किसी को चाहने से
कोई किस तरह हो जाता है तनहा
जबकि वह रहा ना हो कभी भी उसके साथ.
* * *

खरगोश ने एक तरफ रख दिया,
आधी पढ़ी,
रिलेशनशिप की किताब को
कि हर कोई दूसरे को ठहरा रहा था दोषी.

जिन्होंने नहीं लगाये थे दोष
वे अभी थे प्रेम में
और उनके पहलू में रखा था, इंतजार.
* * *

July 13, 2012

देखा तो पाया कि शाम है


रिस रहा हो खून दिल से, लब मगर हँसते रहें, कर गया बरबाद मुझको ये हुनर कहना उसे... सुबह से फ़रहत शहज़ाद साहब की ग़ज़ल सुन रहा हूँ. आवाज़ उस्ताद मेहदी हसन की है. वे मेहदी साहब जिनको सुनते हुए एफ एम 100.7 पर संजीदा ग़ज़लें प्ले करते हुए बाईस से पच्चीस साल की उम्र के दिन काटे थे.
तुम हो क्या कहीं ?

फूलदान में खिल रहा है
किसलिए, नूर तेरी बात का.
* * *

सोचो, ये कैसी है, चुप्पी
अजगर के आलिंगन सी.
* * *

तोड़ दो, अब कसम कि
बारिशें बहुत दूर हैं, अभी.
* * *

कभी रहो साये की तरह
दरख़्त कम है, धूप ज्यादा.
* * *

देखो बाहर, रात है सुहानी
और जाने बचे हैं, कितने दिन.
* * *

और कभी जो रो पड़ो तो याद करना कुछ भी दूर नहीं है कहीं भी, वह या तो है या है ही नहीं. 

July 10, 2012

मिटा तो न दोगे ?

वो लड़का किराये पर जीप चलाता था. टेक्सी स्टेंड के आगे से गुज़रती हुई स्कूल की लड़कियों को देखा करता. उस लड़के को गाँव से पांच किलोमीटर दूर ढाणी में रहने वाली एक लड़की देखा करती थी. एक दिन स्कूल ख़त्म हो गयी, इंतज़ार बढ़ गया.

ज़िन्दगी है तो साबुन तेल भी चाहिए. लड़की बस में बैठ कर बायतु गाँव आया करती. उस दिन जीप किराये पर नहीं जाती थी. बबूल के पेड़ों की कच्ची पक्की छाँव में स्टेंड पर ही खड़ी रहती. खरीदारी का वक़्त हाथ की कुल्फी की तरह होता था, लड़की उसे बचाए रखना चाहती थी मगर वह पिघलता जाता. लड़की की ढाणी के पास रेल रूकती नहीं थी वरना लड़की रेलगाड़ी की खिड़की में बैठी रहती और लड़का जीप चलाता हुआ साथ साथ पांच किलोमीटर तक जा सकता था.

लेकिन बकरियां थी न, बकरियां रेत के धोरों पर खड़े दरख्तों की पत्तियां चरती. लड़की हर शाम उनको घर लाती. लड़का वहीं मिलता. धोरे की घाटी में हरी भरी नदी जैसी सूखी रेत पर रात तनहा उतरती. लड़का बायतु चला जाता, लड़की अपनी ढाणी.

बायतु गाँव के बाहरी छोर पर बना हुआ एक कमरे का घर. दरवाज़े पर थपकियों की आवाज़. ऐसा लगता था कि बाहर दो तीन लोग हैं. बिना जाली वाली खिड़की से कूद कर लड़की बाहर निकल आई. अँधेरी रात. दो बजे का वक़्त. सूना रेगिस्तान. साँपों का स्वर्ग. लकड़बग्घों की पुकार. बबूल के ज़हरीले काँटों से भरे रास्ते.

लड़की भागती रही. हवा से तेज, अँधेरे में बिल्ली की तरह.
पांच किलोमीटर भाग कर घर की बाखल के आगे साँस रोक कर कुछ पल खड़ी रही. फाटक को बिना आवाज़ किये खोल कर अन्दर आई. चारपाई से उठा कर राली को आँगन में बिछा कर लेटी हुई तारे देखने लगी.

दो गाड़ियों की रौशनी ढाणी की ओर बढती आई. पदचाप और खुसुर फुसुर की आवाज़ें. तीन चार आदमी घर के बाहर खड़े हुए. पिताजी आँगन में आकर देखते हैं. लड़की पूछती है, कुण है बाबा ? वे कहते हैं, सो जा. लेकिन लड़की पीछे पीछे बाहर तक आ गयी. 

उस लड़के को लोगों ने पकड़ कर बिठाया हुआ था. एक आदमी ने कहा. मैंने ख़ुद देखा था, आपकी बेटी इसके कमरे में थी.
माऊ रा ठोकणों ... आ के हवाई जाज में उड़न आई है ? ऐसा कहते हुए, पिताजी ने पास खड़े आदमी के एक थप्पड़ रसीद कर दी.

रात के तीन बज गए थे.

कुछ महीने बाद लड़की बाड़मेर के बाज़ार से खरीदारी कर रही थी. लड़का भी वहीं कहीं था. लड़की ने उसको एक नज़र से देखना जारी रखा. बाड़मेर का बाज़ार गायब हो गया. लोग सम्मोहन की निंद्रा में खो गए. अचम्भा सर झुका कर कहीं छुप गया. क़यामत जैसा कुछ होने से ठीक पहले लड़की बोल पड़ी. "डरना मत..."

लड़की ने एक गहरे यकीन से लड़के की ओर आँखों से ऐसा इशारा किया कि ये दुनिया और दुनिया वाले ख़ाक है. लड़का सोच रहा था कि वह वहाँ है या नहीं.
* * *

अरुण डबराल सर को ये सच्ची कहानी मैंने साल दो हज़ार तीन में सुनाई थी. इसे लिखा न जा सका कि मैं कोई काम सलीके से नहीं कर सकता हूँ. कभी कभी हफ्ते महीने विस्की को भी भूल जाता हूँ. पापा कहते थे, किशोर साहब के काम बहुत होते हैं मगर पूरे कोई नहीं हो पाते. मैंने सोचा कि कविता जैसी चीज़ से क्यों आपका दिन बरबाद करूँ इसलिए ये ही सुना दूं.

अगर वे दोनों कभी स्टूडियों आयेंगे तो मैं उनको डबराल सर की पसंद का अदालत फिल्म से ये गीत सुनाऊंगा. 

July 8, 2012

जबकि न था, कभी कोई वादा


संकरी गलियों और खुले खुले खलिहानों, नीम अँधेरा बुने चुप बैठे खंडहरों, पुराने मंदिर को जाती निर्जन सीढियों के किनारे या ऐसे ही किसी अपरिचित वन के मुहाने के थोड़ा सा भीतर, वक़्त का एक तनहा टुकड़ा चाहिए. मैं लिखना चाहता हूँ कि मेरे भीतर एक 'वाइल्ड विश' मचलती रहती है. उतनी ही वाइल्ड, जितना कि नेचुरल होना. जैसे पेड़ के तने को चूम लेना. उसकी किसी मजबूत शाख पर लेटे हुए ये फील करना कि सबसे हसीन जगह की खोज मुकम्मल हुई.

मैं कई बार इन अहसासों के जंजाल से बाहर निकल जाने का भी सोचता हूँ. फिर कभी कभी ये कल्पना करता हूँ कि काश अतीत में लौट सकूँ. हो सकूँ वो आदमी, जो मिलता है ज़िन्दगी में पहली बार...

ऐसा भी नहीं है
कि न समझा जा सके, मुहब्बत को.

वह भर देता है, मुझे हैरत से
यह कह कर
कि तुम बता कर जाते तो अच्छा था.

जबकि न था, कभी कोई वादा इंतज़ार का.
* * *

कोई कैसे जाने, रास्ता तुम तक आने का

वक़्त के घोंसले में खो गयी
उम्मीदों भरी, वन चिरैया की अलभ्य आँख.
* * *

July 6, 2012

रीत रहा है, फूटा प्याला


आँख मूंदे हुए बुद्ध की मूरतों की तस्वीरें, किसी यात्री की भुजाओं पर गुदे हुए नीले टेटू, बालकनी में पड़े हुए खाली केन्स, सड़क पर उड़ता हुआ कागज से बना चाय का कप, आंधी के साथ बह कर आई रेत पर बनी हुई लहरें... जाने कितनी चीज़ें, कितने दृश्य पल भर देखने के बाद दिल और दिमाग में ठहरे हुए. 

मुकम्मल होने के इंतज़ार में पड़े हुए कहानियों के ड्राफ्ट्स. बेपरवाह ढलता हुआ दिन, शाम और विस्की, रात और सुबह के सिरहाने रखे हुए कुछ सपने...
* * *

एक चार गुणा चार आकार के सेल में नन्हा सा खरगोश. उसे पकड़ लेने के लिए मैं दरवाज़ा रोके हुए. वह बाहर की ओर आया तो किसी डरे हुए आदमी की तरह उसे पांव से अन्दर धकेल दिया. खरगोश से भी किसी कटखने ज़हरीले जंगली जानवर जैसा डर. वह पैर के धक्के से कोने में चला गया. फिर से आया तो उसे दोनों हाथों में उठा लिया. उसने दोनों दांत मेरी तर्जनी अंगुली पर लगा दिए. दर्द होना चाहिए था मगर था नहीं. 

खरगोश ने मेरे नीले रंग के शर्ट से ख़ुद को पौंछा और ख़ुद पूरा नीला हो गया. इलेक्ट्रिक ब्लू. 
एक गुलाबी रंग से घिरी हुई नन्ही लड़की ने मेरे हाथ से खरगोश ले लिया. थोड़ी देर बाद उसने मुझे खरगोश लौटाया. मैंने हाथ में लेते ही पाया कि ये सिर्फ़ उसका फ़र है. उसने खरगोश को अन्दर से पूरा गायब कर दिया था. मैं बेहद उदास और ऐसा रुंआसा कि अगर रोना आ गया तो जाने कितना ही रोना पड़ेगा. मैं किसी बच्चे की तरह चिल्लाते हुए रोना चाह रहा था किन्तु मैं बच्चा नहीं था. मेरा दुःख बच्चे जैसा था. 
मैं जाग गया. किसी गिल्ट से घिरा हुआ. ऐसी कि जो बुझ न सके किसी भी उपाय से...
* * *

इस बार डूबता हुआ सूरज उत्तर दिशा में किसी परमाणु बम की तरह फूटा. छत से इस नज़ारे को देखते हुए मैं बच्चों से कहता हूँ कि सब लेट जाएं. जैसा कि आपदा के वक़्त बचाव के लिए सिखाया जाता है. इस तरह लेटे हुए सोचना अँधेरे के बारे में, ज़िन्दगी से किसी के चले जाने जैसे अँधेरे के बारे में... या अपनी ही जेब में रखा हुआ अलविदा, दुनिया को कह देने के बारे में. 

एक और अपराधबोध. मेरा हाल हमले के बाद आँगन में गिरे हुए भयभीत पंछी जैसा. टूटे सपने के बाद खुली आँख से दुनिया को देखते हुए ख़ुद को असहाय पाना. सोचना कि ये सब क्या था. क्यों बार बार सपनों में डूबता हुआ सूरज फट कर बुझ जाता है. 
* * *

फिर भी इन सबके बीच इस सप्ताह कहानी के एक ड्राफ्ट पर काम कर लिया. रात को आभा को कहानी सुनाई. आधी कहानी होते होते बेटी भी चली आई. शीर्षक है "रंग उड़े होर्डिंग पर नीलकंठ". आभा ने कहा. बहुत अच्छी है. मानू ने कहा. मैं इसे सुन कर संजीदा हो गई हूँ.
* * *

और कुछ यादें भी लगातार...

July 1, 2012

फूल पर घिरती शाम


कल जून महीने का आखिरी दिन था. रेगिस्तान, आँधियों की ज़द में है इसलिए तापमान कम था. दोपहर के वक़्त, नेशनल हाई वे पर पसरा हुआ सन्नाटा तोडती कुछ गाड़ियाँ. अचानक तेज़ रफ़्तार बाइक पर गुज़रा, एक नौजवान. इस गरमी में भी बाइक के रियर व्यू मिरर में टंगा हुआ, हेलमेट. उसे भूल कर, रास्ते भर सोचता रहा जाने क्या कुछ.... बहुत सारी बेवजह की बातें, मगर तीन पढ़िए... कि किसी दिन आ जाओ  रेगिस्तान की शाम की तरह

गलियों में उतरती
तन्हा शाम के कदमों की आहट
उचटती हुई नींद, तेरे ख़याल की.
* * *

सबसे ऊँची शाख़ पर खिले
इकलौते फूल पर घिरती शाम
जैसे सुरमई होता, इंतज़ार.
* * *

अतीत के धूसर अरण्य के किनारे

खिड़की, जिसे साँस कहते हैं
रोज़नामचा, ज़िन्दगी के नाम का
और हर शाम उसकी याद लिए हुए.
* * *

डरते हैं बंदूकों वाले