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Showing posts from August, 2012

ख़ूबसूरत औरतें

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प्रेम तो था मगर अलभ्य सा, ख़ुशी थी मगर नाकाफ़ी थी। अशांत, अप्रसन्न, टूटे बिखरे जीए जा रहे थे कि किसी ने थाम कर हाथ कहा। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ? ख़्वाब ख़ूबसूरत भी होते हैं। बेवजह की बहुत सारी बातें... उसके बारे में नहीं मगर ख़ूबसूरत औरतों के बारे में

कुछ मूर्ख लोग बातें करते हैं
ख़ूबसूरत औरतों के बारे में
कि वे छूते ही बदल जाती हैं प्रेतों में
और छूने वाला हो जाता है
पनीर के पीछे भागता, बिना पूंछ वाला चूहा।
* * *

शक्की आदमी को
हर बार यही संदेह होता है
कि ख़ूबसूरत औरतें घिरी होती हैं संदेहों से।
* * *
यही एक मुश्किल है
कि अँधेरे में डर जाती हैं ख़ूबसूरत औरतें
कि अँधेरा ढक देता है ख़ूबसूरती को।
* * *
हर समय एक नुकीली चीज़
चुभती रहती है ऐसी औरतों को
कि वे ख़ूबसूरत औरतें हैं।
* * *
सुन्दरता की सारी प्रस्तावनाएँ
हो जाती हैं व्यर्थ, ख़ूबसूरत औरतों के बारे में
जब कोई पढ़ रहा होता है
उपसंहार से ठीक पहले की कुछ पंक्तियाँ।
* * *
ख़ूबसूरत औरतें
सुंदर ततैये का घोंसला होती है
उसके अन्दर से खिल कर उड़ती रहती है
हज़ार ख़ूबसूरत औरतें।
* * *
प्रेम करने वाली
ख़ूबसूरत औरतें खतरना…

गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा

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एक रोज़ उड़ ही जाती हैं, सब मुश्किलें और राहतें मगर ये न समझाना किसी को कि ज़िन्दगी को आसानी से जीया जा सकता है। कोई तुम पर यकीन नहीं करेगा। मेरे साथ कोई न था, एक परछाई थी, उसी के बारे में बेवजह की बातें

आवाज़ न दो, उसके नाम को

बेसबब बेबसी
और बेख़याल ज़िन्दगी
कि तनहा पड़ा
रात का टूटा सियाह प्याला।

दिल के हज़ार गोशे
गोशों में बिखरा हुआ अँधेरा
न रौशनी, न रंग कोई,
न नियाज़, न कोई उम्मीद।

जब सर पे था सूरज
एक फ़कीर ने कहा,
चूम कर इस पानी को
लिख दे, दुआ उसके नाम।

अपनी ही परछाई को देख कर
भर ले हैरानी का जादू अपनी आँखों में।
* * *

देखो ये धूप उसकी याद
और तुम्हारा वजूद, बेशक्ल परछाई

जैसे लौटती हुई आवाज़ के टुकड़े.
* * *

एक दरख्त की शाख ने पंछी से पूछा
तुम्हारी आँखों के नीचे ये सियाही सा क्या है?

पंछी ने कहा, सो जाओ चुपचाप
मैं चुरा लाया हूँ,
रोशनी के जादू से बनने वाली परछाई।
* * *

हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव

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किसी प्रेतात्मा को छूकर आई ख़राब हवा थी। किसी आकाशीय जादुई जीव की परछाई पड़ गयी थी, शराब पर। किसी मेहराब पर उलटे लटके हुए रक्तपिपासु की पुकार में बसी थी अपने महबूब की याद। दुनिया का एक कोना था और बहुत सारी तन्हाई थी। मेरे मन में एक ख़याल था कि एक दिन दबा दूँगा, तुम्हारा गला। ऐसे ख़राब हालात में बेवजह की बातें भी ख़राब थी...

मेरा मन एक अजगर
अपनी ही कुंडली में हैरान।

तेरी याद
ताबीज में बंधा भालू का नाखून।
* * *

वो दिन ही ख़राब था
एक ऐसी याद का दिन
जिस पर लिखी हो, क़ैद की उदासी।
* * *

मुझे जंगली खरगोशों से प्यार है
कि उनको जब नहीं होना होता है बाँहों में
वे सभ्य होने की जगह
मचलते रहते हैं, भाग जाने को।

जंगली खरगोश तुम्हारे जैसे हैं।
* * *

और मैं मरा ही नहीं
जीता गया, निरंतर।
* * *

मैंने एक आधारशिला रखी
कि अबकी बरसात में
यहाँ से बहाई जाएगी नदी।

नादाँ लोग हंस कर चले गए, जैसे वे हँसते हैं प्यार पर।
* * *

वहाँ लोग कम और अच्छे हैं,
इसलिए सोचा है मैंने
कि हम दोनों चले जायेंगे उत्तरी ध्रुव।

यहाँ प्रेम करने और कुछ दिन बाद
हमारी नंगी लाशों के
गालियों में पड़े मिलने …

तबेले का धुंधलका

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वो पाकिस्तान से चला आया. अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ. कई दिनों तक एक पेड़ की छाँव में पड़ा रहा. उससे कंजर अच्छे थे. जिनके पास तम्बू वाले घर थे. उससे भिखारी अच्छे थे. जो किसी प्रत्याशा के बिना मंदिरों के आगे पड़े रहते थे. वह एक ठेला लगाना चाहता था. उसे यकीन था कि एक ठेले के सहारे वह तीन लोगों का पेट भर लेगा. उसके पास सर छुपाने को जगह न थी. देश आज़ाद हुआ था और सेना के ट्रक शांति बहाली के लिए गश्त कर रहे थे. 
वह असंख्य दुखों के बीच भी अपनी जिजीविषा का पोषण करता जा रहा था. जीवन के कष्टप्रद थपेड़े, उसका मनुष्यों के आचरण से परिचय करवा रहे थे. वह सिंध से आया हुआ हिन्दू था. इसलिए वह सिन्धी हिन्दू था. इसलिए वह एक सिन्धी था. अपने वतन से बिछड़ कर नए शहर में अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ एक घरोंदे की तलाश में, एक शरणार्थी सिंधी। 
वर्ष 1948 में मनोरंजन पत्रिका में छपी रांगेय राघव की ये कहानी "तबेले का धुंधलका" विस्थापन की पीड़ा का दस्तावेज़ है. इस कहानी में रांगेय राघव ख़ुद कथा के मुख्य पात्र हैं. यानी प्रथम पुरुष ही अपनी कथा कह रहा है. इस तरह की बुनावट कि आपकी साँस निकल जाये. इतनी सरल …

कुछ बात और है कि...

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एक बरसा हुआ बादल था, जैसे दुख से भरी युवती का सफ़ेद पीला चेहरा। एक मिट्टी की खुशबू थी कीचड़ से भरी हुई। एक आदमी की याद थी जो मर कर भी नहीं मरता। एक तुम थे जिसने कभी दिल की बात कही नहीं और एक मैं था कि जाने क्या क्या बकता गया।

साहब क्या खोज रहे हो?

ईमान का एक टुकड़ा बचा था
खो गया है

आचरण के गंद फंद अब कहां मिलेगा.
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मैडम जी, ये कैसी उदासी?

चप्पल की एक जोड़ी अम्मा ने दी थी
जाने कहाँ गयी है
घर परिवार के झूठ झमेले में अब कहां मिलेगी.
* * *

बेटा जी, किसलिए यूं मुंह फुलाए

मेरे वो, सोशल साईट से विदा हो गए
सेल नंबर भी बंद पड़े हैं
मीका जाने कब गायेगा, तूं छुपी है कहां मैं तड़पता यहाँ
* * *

ओ टकले कारीगर, ये कैसी चिंता

दो रुपये का छोटा रिचार्ज करा कर
बच्चे घर से पूछा करते हैं
बापू, सौ रुपये का खाना लेकर कब आओगे.
* * *

डॉक्टर जी ये हैरत है कैसी

पैंसठ साल की ये बुढ़िया
दिन भर में दस रुपये का कपड़ा सी लेती है
सोच रहा हूँ मोतियाबंद के जालों में से दिखता कैसे है?
* * *

गाँधी टोपी वाले ट्रक डिलेवर रूठे क्यों हों

तुम लोगों ने देश की गाड़ी कंडम कर दी
गियर का भी ग्रीस खा गए.

चरखे सारे टूट गए हैं, गंद कमल पर छाई है,
लाल रंग प…

कभी सोचा है तुमने?

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पिछले कई दिनों से कहानियों के ड्राफ्ट्स को मुकम्मल करने के काम में लगा हूँ। छब्बीस हज़ार शब्दों वाली कुल छः कहानियाँ मेल के जरिये दोस्त को भेज दी थी। कल तक तीन और ड्राफ्ट को पूरा कर लिया। बारह हज़ार शब्द और हो गए, सोचा चलो पूरा हुआ पहली किताब का काम। विंडोज़ सेवन प्लेटफार्म पर एमएस वर्ड में काम कर रहा था। जैसे ही वर्ड को बंद किया तो उसने पूछा आपके क्लिपबोर्ड पर कुछ बहुत ज्यादा इकट्ठा हो गया है। क्या इसे फिर भी सेव किया जाए। मैं कहानियों को कंट्रोल एस करके निश्चिंत था इलिए कहा जाने दो। वर्ड ने मेरा कहना माना और सब किए धरे को वापस असली शक्ल में पहुंचा दिया। 
एक बार जी उदास हो गया। फिर सोचा कि चलो अच्छा हुआ। ये कहानियाँ कौनसी बेस्ट सेलर होनी है। अपना ही लिखा है और मिट जाने से अपन ही उदास हैं। आओ सुकून का काम करते हैं, कुछ बेवजह की बातें करते हैं 

मास्टर के हाथ में डंडा 

यूं तो बड़ी चालाकी से किया था शामिल
उसने बदनीयती को दुनिया में
मगर अब नहीं करता यकीं कोई, खुद उसकी नीयत पर ।

कभी कभी फूटी किस्मत ईश्वर को भी ले डूबती है।
* * *
शाम और रात के बीच का कोई वक़्त
और भी उबलेगी भट्टी कच्ची श…

मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं

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बदहवास दौड़ती हुई ज़िन्दगी को कभी कोई अचानक रोक ले तो कितना अच्छा हो. हासिल के लिए भागते हुए, नाकामी का मातम झोली में भरते जाना और फिर ज़रा रुके नहीं कि दौड़ पड़ना. याद के वे खाने सब खाली. जिनमें रखी हों कुछ ऐसी चीज़ें कि आखिरी बार सुकून से एक ज़िन्दगी भर साँस कब ली थी, पानी को पीने से पहले ज़रा रुक कर कब देखा था कि मौसम कैसा है. वो कौनसा गीत था जो बजता रहा दिल में हज़ार धड़कनों तक, आखिरी बार कब उठे थे. किसी प्रियजन का हाथ थाम कर... ऐसे सब खाने खाली. 
हमारे भीतर किसी ने चुपके से हड़बड़ी का सोफ्टवेयर रख दिया है. विलासिता की चीज़ों के विज्ञापन उसे अपडेट करते जाते हैं. इस दौर का होने के लिए आदमी ख़ुद को वस्तु में ढालने के काम में मुसलसल लगा हुआ. वस्तु, जिसकी कीमत हो सके. वस्तु, जिसे सब चाहें. वस्तु, जिसके सज़दे में दुनिया पड़ी हो. ऐसा ही हो जाने के लिए भागम भाग.
रेल का फाटक दिन में कई दफ़ा रोक लेता है. हमारे शिड्यूल में रेल का फाटक नहीं होता इसलिए परेशानी, झल्लाहट और बेअदबी भरे वाक्य हमारे भीतर से बाहर की ओर आने लगते हैं. अपना स्कूटर एक तरफ रोक कर फाटक के नीचे से आने जाने वालों के लिए म…