Posts

Showing posts from October, 2012

भूल जाओ

Image
कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

पत्थर के दरीचों से

Image
काले बुर्के वाली ख़वातीन ने पीछे से आवाज़ दी – “एक मिनट” उनको मेरा एक मिनट नहीं चाहिए था। वे हम दो भाइयों के बीच जगह बनाना चाहती थी। मैंने सोचा कि वे ऐसा भी कहा सकती थी कि थोड़ी सी जगह दीजिये। भाषा का ये कैसा सुंदर उपयोग है कि हम समय की इकाई का उपयोग नाप की इकाई की जगह बखूबी कर लेते हैं। विधान सभा भवन के ठीक सामने सौ मीटर के फासले पर मेला लगा हुआ है। यह मेला मध्यम वर्ग की कम कीमत में अधिक चीज़ें पा लेने की लालसा का बेजोड़ प्रतीक है। मेले में प्रदर्शित चीजों की नुमाईश के लिए टिकट है। हर कोई बड़ी शालीनता से पूरे दाम चुका कर मेले में सलीके से प्रवेश कर रहा था। ये वही लोग थे, जो अक्सर नियम कायदों में चलाने जीने पर नाक भौं सिकोड़ते रहते होंगे। 
मेले में हर स्टाल पर सेल्स गर्ल थीं। उनके चेहरे खास तरह के पाउडर से पुते हुये थे। उनके होठों पर एक समान लाल रंग की गहरी लिपस्टिक थी। पलकों पर गहरे सलेटी रंग का मसकारा था। उनके दांत साफ थे और होठों की लंबाई कई किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी, जिनको वे सप्रयत्न इकट्ठा करने के काम में लगी हुई थीं। वे शक्ल, रंग रूप और पहनावे से एक खास तरह का साम्य बु…

बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई

Image
शाम फैली हुई है। गहरी, इतनी गहरी की रात का धोखा होता है। कोई सागर था सूख गया। कुछ चट्टानें और रेत बची रह गयी। जैसे किसी के जाने के बाद बची रह जाती है स्मृतियाँ। ऐसे ही बचे हुये एक पहाड़ पर रोशनी है। एक हरे रंग की झाईं उतरती हुई इस छत तक दिखाई देती है। मुझे ख़याल आता है कि उस चोटी पर बने मंदिर में माँ जोगमाया... बाढ़ाणे शहर को अपनी गोद में बसाये हुये मुस्कुरा रही होगी। 
रेगिस्तान में सदियों से आंधियों का सामना करते हुये और पानी की दुआ मांगते हुये इन्सानों ने एक औरत से ही पाया होगा जीवन जीने का हौसला। जब भी आदमी की नज़र थक कर बिछ गयी होगी धरती की देह पर, उस औरत ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर फिर से खड़ा कर दिया होगा। तुम आदमी हो, जाओ लड़ो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। 
अहसान फ़रामोश आदमी ने इतनी बेटियाँ मारी कि पचास सालों तक गाँव में कोई बारात न आई।  *** 
एक लड़के ने कहा कि देखो मैं तुम्हारे सफ़ेद फूलों के बीच एक लाल गुलाब खिलाना चाहता हूँ। इसलिए कि तुम्हारे सब फूलों का रंग वक़्त के साथ सफ़ेद हो गया है। उसने कहा। हाँ खिलाओ, लाल गुलाब। लड़के ने एक कांटे से उसकी पीठ पर बनाना शुरू किया किन्हीं दो होठो…

तुम भी कब तक

Image
रात के ग्यारह बजे हैं
और आखिर उसने छोड़ दिया है
इरादा एक और करवट लेने का।

एक टुक देखे जाती है छत के पार
आसमान के सितारों को
उसके पहलू में सोया है बेटा
हरे बिस्तर पर खिले, रुई के कच्चे फूल की तरह।

मैंने अभी अभी, कुर्सी पर बैठे बैठे
फैला ली है अपनी टाँगे कुछ इस तरह
जैसे फैली हो किसी याद की परछाई।

आखिर जाम में घोल लेना चाहता हूँ
रात की नमी में भीगे किसी पेड़ की ताज़ा खुशबू
मगर कुछ दिहाड़ी के मजदूरों ने
बुझा दी है, सोने से पहले की आखिरी बीड़ी।

तुम भी कब तक लेटी रहोगी, बिना करवट लिए हुए
मैं भी कब तक फैलाये रख सकूँगा याद की परछाई।
* * *
[Image courtesy : Manvika]

उम्र भर यूं ही...

Image
नीम के दो पेड़ों के आगे की दीवार पर फैली हुई बोगेनवेलिया की टहनियों पर खिल रहे, रानी और गुलाबी रंग के फूलों पर शाम आहिस्ता से उतर रही होगी. मैंने स्टूडियो के भीतर टेप लाईब्रेरी में बैठे हुए सोचा. कोने वाली खिड़की से रौशनी की एक लकीर मेग्नेटिक टेप्स की कतार को छू रही थी. वहीं कुछ ततैये ऐसी की ठंडक के कारण आराम कर रहे थे. आहिस्ता से रौशनी की लकीर गायब हो गयी. ततैयों ने अपना पीला रंग कृष्ण को समर्पित कर दिया. मैं मगर एक घूम सकने वाली कुर्सी पर बैठा हुआ सोचता रहा कि जो शाम आई थी, वह चली गयी है. 
आपको वक़्त नहीं है मुझसे बात करने का... सेल फोन पर दर्ज़ इस शिकायत को पढ़ कर आँखें बंद कर ली. अट्ठारह साल तक अलग अलग शहरों में रेडियो के एक जैसे दफ्तरों में ज़िन्दगी के टुकड़े टूट कर गिरते गए हैं.   मैंने अपनी जेब में एक हाथ रखे हुए कुर्सी को ज़रा और झुका कर सामने रखे ग्रामोफोन रिकोर्ड्स की तरफ देखते हुए चाहा कि काश कोई आये और नीचे से तीसरे कॉलम का पहला रिकार्ड प्ले कर दे. कोई आया नहीं बस एक साया सा लाईब्रेरी के दरवाज़े में लगे कांच के छोटे से टुकड़े के भीतर झांक कर आगे बढ़ गया.  * * *
घर की छत प…