An illegally produced distilled beverage.


November 28, 2012

निर्मल रेत की चादर पर


किताबें बड़ी दिल फरेब चीज़ होती हैं। मैं जब भी किसी किताब को अपने घर ले आता हूँ तब लगता है कि लेखक की आत्मा का कोई टुकड़ा उठा लाया हूँ। परसों राजस्थान शिक्षक संघ शेखावत के प्रांतीय अधिवेशन के पहले दिन चौधरी हरलाल शोध संस्थान के प्रांगण में तने हुये एक बड़े शामियाने में जलसे का आगाज़ था। मुझे इसे सम्मेलन में एक वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था मगर मैं अपनी खुशी से वहाँ था कि मेरे पापा ने सदैव शिक्षकों के हितों के लिए लड़ाई लड़ी है। इस आयोजन स्थल पर बोधि प्रकाशन की ओर से पुस्तक प्रदर्शनी भी लगी थी।

मुझे दूर से ही किताबें दिख गयी। जिन्होंने कभी किताब को हथेली में थामा होगा वे जानते हैं कि इनकी खशबू क्या होती है। आज कल मेरे कंधे पर एक भूरे रंग का स्कूल थैला लटका रहता है। इस थैले को मानू या दुशु में से किसी ने रिटायर किया हुआ है। मेरे पापा भी ऐसा ही करते थे। वे हम भाईयों की रिटायर की हुई चीजों को खूब काम मे लेते हुये दिख जाते थे। मैं सोचता था कि पापा कितने कंजूस है। अपने लिए एक नयी चीज़ नहीं खरीद सकते। लेकिन अब समझ आता है कि ऐसी चीजों में अपने बच्चों की खुशबू साथ चलती रहती है।

मैंने स्टाल पर किताबों में एक खास किताब को खोजना शुरू किया। वह नहीं दिखाई दी। मैंने पूछा- क्या आपके पास विजया कांडपाल की किताब है? उन्होने कहा कि हम वह किताब नहीं लाये हैं। इस किताब का नाम है प्रेमांजलि। इसमें फिलीपीन्स में जन्मे कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविताओं का हिन्दी अनुवाद है। विजया द्वारा अनूदित कवितायें प्रथम पाठ में एक सुंदर सम्मोहन बुनती हैं। कुछ कवितायें मैंने एक ब्लोग पर पढ़ी थी। इस कविता संग्रह के बारे में मुझे शैलेश भारतवासी ने बताया था इस किताब को न पाकर मुझे एक बार लगा कि ये निराश करने वाली बात हो गयी है लेकिन बोधि प्रकाशन से ही मेरे प्यारे कवि रामनारायण 'हलधर' के दोहों का संग्रह आया है। मैंने उत्साह से पूछा- हलधर जी की किताब है? उन्होने मुसकुराते हुये कहा- हाँ है न।

इसके बाद मैंने बड़े सुकून से कई सारी किताबें देखी। थोड़ी ही देर में मेरे हाथ में कुछ किताबें हो गयी। मैं खुश हो गया।

सरकार में ऊंचे ओहदे रखने वाले सियासत के नामी लोगों के बीच मंच पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक नन्द भारद्वाज जी बैठे थे। उनके पास मैं भी अपना वही थैला लिए बैठा था। इस भूरे रंग के बैग में अब तक ओम पुरोहित कागद, बल्ली सिंह चीमा, माया मृग, और रामनारायण हलधर की किताबों का आनंद भरा हुआ था। मैं सियासत और उसके कामों के बारे में कोई राय देने का हक़ नहीं रखता हूँ इसलिए मैंने अपने उद्बोधन में हंगरी के कुछ शिक्षकों की कहानियों पर बात की। हंगरी की ये कहानियाँ एक मित्र ने पिछले साल दी थी। उस दोस्त ने कुछ और भी दिया होता तो भी वह मेरे साथ होता मगर कहानियाँ मेरे लिए सबसे अद्भुत उपहार है।

माया मृग जी से मेरा परिचय कूल जमा छह महीनों का ही है किन्तु मैं उनको एक ऐसी सोच वाले प्रकाशक के रूप में जानता रहा हूँ, जो किताबों को जन जन की चीज़ बनाने को प्रतिबद्ध है। सौ रुपये में दस किताबें खरीदने की सोचना आपको एक बेतुकी बात लग सकती है। ये सच भी है कि हर एक प्रकाशक ढाई तीस सौ से नीचे एक किताब की बात ही नहीं करता है। ऐसे में पाँच सौ रुपये में भूरे रंग का बैग भर सकना मेरे जैसे मध्यम वर्ग के आदमी के लिए बेहद खुशी की बात है। मैं माया मृग का एक कविता संग्रह भी लाया हूँ... कि जीवन ठहर न जाए।

मैंने जब स्नातक किया था उन्हीं दिनों डॉ आईदान सिंह भाटी ने मुझे कुछ किताबें दी थी। उनमें ओम पुरोहित "कागद" की किताब भी शामिल थी "धूप क्यों छेड़ती है"। ओम जी के बारे में राजेश चड्ढा खूब बात किया करते हैं। वे उनके सुख दुख के अभिन्न साथी हैं। मैं दो साल राजेश चड्ढा के सानिध्य में रहा हूँ। इस बार भी किताबों के बीच "कागद" नाम देखते ही मुझे चड्ढा जी की याद आई। मैंने दो किताबें ली, एक है "पंचलड़ी" और दूसरी "आँख भर चितराम"।

बल्ली सिंह चीमा और रामनारायण "हलधर" मेरे प्रिय कवि हैं। दोनों ही ज़मीन से गहरे जुड़े हुए हैं। इन दोनों की ग़ज़लों और दोहों में ग्रामीण जन जीवन की आर्द्र गंध है। ये दोनों ही हक़ और हक़ीक़त की बात बड़े कायदे से करते हैं। इन दोनों के बारे में सोचते हुए मैंने पाया कि मुझे घर जाने की जल्दी है। मैं इन किताबों को जल्दी से पढ़ लेना चाहता हूँ। मैं बार बार इन किताबों के पन्नों के फेरे लगाना चाहता हूँ। मैंने कई कई बार किसी जल्दबाज़ बच्चे की तरह किताबों को सूंघा और खुश होकर सो गया। आज मेरी गरदन में बेतरह दर्द है। मैं अपनी डॉक्टर दोस्त की बताई हुई दवा को नियम से लेने के बाद भी कोई आराम नहीं पा रहा हूँ। इसलिए इन किताबों की बात करने बैठ गया हूँ।

मैं आलोचक नहीं हूँ। मुझे सिर्फ प्रेम करना आता है।

कागद की एक कविता :

बेकला री चादर माथे
आरी तारी सरीखा
काढ़े कसीदा अचपली पुरवाई कोरे समंदर हबोलो खावतो।

थार कबीर अंगेजै चादर मुरधरी, पण राखे जस री तस।

कविता का टूटा फूटा अनुवाद :

निर्मल रेत की चादर पर
अस्थिर वायु उकेरती है सोनल ज़री का बारीक कशीदा
चित्रित करती है, लहरों से भरा समुद्र।

कबीर सदीठ थार ओढ़ता बिछाता है मरुधर की चादर मगर रख देता है अनछुई।
* * *

मुझे इन्हीं दिनों अपने दादा नन्द भारद्वाज जी से उनका कहानी संग्रह मिला है। आपसदारी। इसकी दो कहानियाँ मैंने राजस्थानी में पढ़ रखी हैं और एक बेहतरीन कहानी "तुम क्यों उदास हो मूरहेन" विगत दिनों व्यापक चर्चा में रही है। फिलहाल मैं उदास तो नहीं हूँ मगर मेरे पास बदन दर्द और हरारत के बीच एक कुछ बेचैन लम्हे हैं।

November 23, 2012

तुम्हारा नाम, किसी तितली की तरह

उस वक़्त कायदे से सुबह जा चुकी थी मगर रात भर न सो पाने की खुमारी में कोई उम्मीद कह रही थी कि वह इसी गली से गुज़रेगा। आपको रुलाने के बाद जाने कौन कितनी दूर से चल कर आता है। कितने ही वायदे और उम्मीदें खत्म कर के... मगर नहीं आता कुछ भी सब्र की तरह सब कुछ आता है ख़लिश की तरह

मैंने हवा में बनाया एक सुंदर किला
उसमें बनाया एक जालीदार झरोखा तुम्हारे नाम का
उसी तरफ छोड़ दिया तीर, एक गुलाबी पन्ने के साथ।

इस मुश्किल जिंदगी में आसान हैं सिर्फ रूमानी ख़याल।
* * *

मैं रोता रहा चार दिन और तीन रात तक

हालात के सिपहसालार बने रहे पत्थर की मूरतें
अदने से कारिंदे भी भीग न सके, आंसुओं की गीली आवाज़ से
इससे ज्यादा उदास करने वाली कोई बात नहीं बीती, मेरे साथ।
* * *

मेरी जान, तुम्हें हर हाल में सोचना चाहिए
उन दिनों के बारे में, जो रोज़ खो जाते हैं, पश्चिम में

कि अभी तक मेरी मुट्ठी में बचा हुआ है, तुम्हारा नाम, किसी तितली की तरह
मगर मैं रहूँगा कब तक।
* * *

November 21, 2012

रात का एक बजा है

भविष्यवाणी के अनुसार
रुक गए बाज़ीगर के हाथ
गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ़ हवा में स्थिर हो गयी
काले और सफ़ेद रंग की गेंदे।
समय की परिधि के किसी कोने पर
वक़्त के हिसाब से रात का एक बजा था।

इस ठहरे हुये ऐंद्रजाल में
पाँवों ने पहनी पुरानी चप्पल
अंगुलियों ने अंधेरे में अलमारी से हटाये जाले।
आँखों ने शब्दकोश से झाड़ी धूल
दिमाग ने पढे प्रेम, चुंबन, आलिंगन के अर्थ।

दिल धड़कता रहा कि
विस्मृति की धूल में ढक जाने तक के लिए
उसके नाम का पहला अक्षर
परिधि के पास से गुज़र रहा है, बार बार।

रात का एक बजा है, जाने कब तक के लिए।
* * *

November 19, 2012

किसी हादसे की तरह

सड़क से ज़रा दूर ढलान में पड़ी हुई
एक बरबाद गाड़ी के ठीक बीच में
उग आए कंटीले झाड़
बख्तरबंद लोहा हो गया जंगल का हिस्सा।

कोई चला गया किसी हादसे की तरह
उगते रहे सन्नाटे के बूटे, याद के कोमल कांटे
उदासी के आलम ने रंग लिया, अपने रंग में।
* * *

वक़्त का लम्हा भूल गया उस रिश्ते की मरम्मत करना। एक ने मुड़ कर नहीं देखा, दूसरे ने आवाज़ नहीं दी। इसलिए सफ़र के अनगिनत रास्ते हैं कि कोई भी जा सकता है किधर भी, वादा सिर्फ दिल के टूटने तक का है। रिश्तों की रफ़ूगरी भी कोई अच्छा काम है क्या? 


November 17, 2012

जीने के लिए


वे दोनों भाग सकते हैं उन दीवारों से दूर, जिन पर उन्होने कभी खुशी खुशी लिखा था कि रात के ग्यारह बजे हैं और ये दीवार एक "टाइट हग" की गवाह है। मगर लिखा हुआ हमेशा उनका पीछा करता रहता है।
वे दोनों पर्याप्त नहीं थे एक दूसरे के लिए कि वे अक्सर ख़ुद के लिए भी कम पड़ जाते थे। जैसे चाहते थे कि प्यार कर सकें बहुत देर तक मगर कोई और आ जाता था दोनों के बीच पारदर्शी दीवार की तरह।
वे दोनों हो सकते थे ख़ुद से नाराज़ मगर पर्याप्त वजहें नहीं थीं। उन्होने कई बार अलग अलग अपने प्रेमियों से कहा और सुना था कि तनहाई बहुत है और काश तुम हो सकते यहाँ, मुझे समेट लेते अपनी बाहों में। 
वे दोनों सप्ताहांत की रातें अपने दोस्तों के साथ बिताने के बाद अपने ओरबिट में लौट आते और उनकी भाषा बदल जाती थी। जिस शिद्दत से वे सप्ताहांत का इंतज़ार किया करते थे उसी शिद्दत से कहते थे, आह आपसे बात न हो सकी दो दिन। 
वे दोनों डरते थे इस बात से कि अलग होने का कहते ही दूसरा कहेगा कि आह मैंने सोचा तुम मुझसे ज्यादा प्यार करते थे। हालांकि वे दोनों जा सकते थे एक दूसरे से दूर बाखुशी... 
वे दोनों एक बुरी स्मृति की तरह जीने को मजबूर होने के आखिरी पायदान पर खड़े होने से पहले एक दूसरे से कह रहे थे कि आप जाकर भी कहीं जा नहीं पाते हैं।  

रेत के मैदानों में बिखरे लोकगीतों में बिछोह का दर्द, धरती पर आसमान की तरह खिला रहता है। मौसम आते जाते रहते हैं मगर नहीं बदलती याद की तस्वीर। इन्हीं रेत के धोरों के पास बचे हुये पहाड़ों पर उगे रहते हैं कंटीले थोर किसी की स्मृतियों जैसे हरे। उन पर कभी कभी खिल आते हैं सुर्ख़ फूल, दूर से लगता है किसी ने गूँथ ली है अपनी चोटियाँ। घाटियों की उपत्यकाओं में रह रह कर गूँजती है किसी की आवाज़, मगर आता कोई नहीं। मन का रेगिस्तान भरा हुआ है छलावों से, सब दरख्त, पहाड़, पानी, और प्रेम माया है। न कोई प्रेम करने आता है न कोई प्रेम करके चला जाता है। मृत्यु के आने तक यही भ्रम एक सहारा है, जीने के लिए। 

November 16, 2012

कहाँ है वो माफ़ीनामा



एक कपूर की गोली थी।

पिछली सर्दियों की किसी शाम अचानक उसकी खुशबू आई। किसी पैरहन से छिटकी होगी या किसी सन्दूक के नीचे से लुढ़क कर मेरे पास आ गयी हो। उसका रंग सफ़ेद था। इतना सफ़ेद कि उसे ज़माना सदियों से कपूरी सफ़ेद कहता था। उसका चेहरा चाँद जैसा गोल था, ठीक चाँद जैसा। मैं कई बार खो जाता था कि उसकी आँखें कहाँ और सफ़ेद होठ कहाँ पर हैं। उसके गोल चहरे पर कुछ लटें कभी आ ठहरती होगी बेसबब, ऐसा मैं सोचा करता था। उसकी हंसी में घुल जाती होंगी बंद कमरे की उदासियाँ ये खयाल भी कभी कभी आ जाता था।

एक शाम ऐसे ही छत पर बैठा शराब पी रहा था कि अचानक से कोई तीखा अहसास जीभ के एक किनारे पर ज़रा देर ठहर कर चला गया। मुझे लगा कि उसके मुंह में कोई चोर दांत है, जिसने काट लिया है प्यार से। ये मगर एक बेहद कोरा चिट्टा खयाल था जैसा कि उसका रंग था। वो जो एक कपूर की गोली थी। ऐसे ही एक बार मैंने किसी चीज़ को अलमारी से उतारने के लिए हाथ ऊपर किए तो वही खुशबू चारों और बिखर गयी। कपूर की खुशबू।

दिल्ली गया था। शहर के बीच एक खूबसूरत जगह पर साफ सुथरे कमरे में शाम होने को थी कि मैंने अपना स्वेटर बाहर निकाला। इसलिए नहीं कि ठंड थी, इसलिए कि पहन कर देखूँ कैसा दिखेगा। स्वेटर बहुत नया नहीं है, इसे पिछली सर्दियों से पहले खरीदा था। दो एक बार पहना होगा कि रेगिस्तान की सर्दियाँ बिना अलविदा कहे चली गयी थी। इस बार खोला तो लगा कि कपूर की खुशबू आने लगी है। ऐसे ही, जैसे कोई प्रिय के जाने के बाद लौट आया हो घर में।

मैंने देखा कि सामने की कुर्सी भर गयी है उसी सूरत से, सफ़ेद रंग की गोल सूरत। आप यकीन मानिए कि उसने बचाए रखा खुद को, सफ़ेद चोर दांतों को, गोल चेहरे को और न देखी जा सकने वाली आत्मा को। कि वह डूब नहीं सकती थी किसी रंग में, घुल नहीं सकती थी उसकी खुशबू किसी और रंग में कि वह नहीं थी फटे पुराने वाहियात किस्म के ऊनी कपड़े के लिए। मैंने सोचा कि अगर मेरे पास इस वक़्त कोई बारूद होता तो भी मैं खड़ा होता इस कपूर की गोली के पक्ष में... मैं जला लेता अपनी अंगुलियाँ मगर कोई आग इस कपूर को छू नहीं सकती थी।

आज की रात चाँद कुछ इस तरह खिला है जैसे वह कपूर की गोली थी। मैंने अभी पी नहीं है शराब और मैं ग्रामर का मास्टर भी नहीं हूँ वरना हो सकता है कि मैं मार देता खुद को गोली इस बात के लिए कि मैंने ही लिखा है, एक कपूर की गोली थी। मैं खुद की कनपटी पर रखता रिवाल्वर और कहता कि अभी बात खत्म नहीं हुई है इसलिए लिखो एक कपूर की गोली है। जबकि ऐसा है नहीं।


कहाँ है वो माफ़ीनामा जिस पर लिखा है कि मैंने तुमसे प्यार करने की गलती की है, मुझे मुआफ़ कर दिया जाए। लाओ, मैं लिख दूँ अपने नाम का पहला अक्षर...
* * * 

[ Painting image courtesy : Karla Aron]

ये पोस्ट कल की रात लिखी थी। पीठ में दर्द भरा था इसलिए लेपटोप को छोड़ दिया था। आज पोस्ट कर रहा हूँ मगर कहाँ कायम रहती है सब चीज़ें? देखो चाँद भी कल से बेहतर है। 

November 14, 2012

एक लंबी और बेवजह की बात : हमारी दिल्ली


मैंने यूं ही कहानियाँ लिखनी शुरू की थी। जैसे बच्चे मिट्टी के घर बनाया करते हैं। ये बहुत पुरानी बात नहीं है। साल दो हज़ार आठ बीतने को था कि ब्लॉग के बारे में मालूम हुआ। पहली ही नज़र में लगा कि ये एक बेहतर डायरी है जिसे नेट के उपभोक्ताओं के साथ साझा किया जा सकता है। मुझे इसी माध्यम में संजय व्यास मिल गए। बचपन के मित्र हैं। घूम फिर कर हम दोनों आकाशवाणी में ही पिछले पंद्रह सालों से एक साथ थे। बस उसी दिन तय कर लिया कि इस माध्यम का उपयोग करके देखते हैं।

हर महीने कहानी लिखी। कहानियाँ पढ़ कर नए दोस्त बनते गए। उन्होने पसंद किया और कहा कि लिखते जाओ, इंतज़ार है। कहानियों पर बहुत सारी रेखांकित पंक्तियाँ भी लौट कर आई। कुछ कच्ची चीज़ें थी, कुछ गेप्स थे, कुछ का कथ्य ही गायब था। मैंने मित्रों की रोशनी में कहानियों को फिर से देखा। मैंने चार साल तक इंतज़ार किया। इंतज़ार करने की वजह थी कि मैं समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं से प्रेम न कर सका हूँ। इसलिए कि मैं लेखक नहीं हूँ। मुझे पढ़ने में कभी रुचि नहीं रही कि मैं आरामपसंद हूँ। मैं एक डे-ड्रीमर हूँ। जिसने काम नहीं किया बस ख्वाब देखे। खुली आँखों के ख्वाब। लोगों के चेहरों को पढ़ा। उनके दिल में छुपी हुई चीजों को अपने ख़यालों से बुना। इस तरह ये कहानियाँ आकार लेती रहीं।

दोस्तों को कहानियाँ पसंद आई तो उन्होने कहा किताब चाहिए। संजय भाई ने एक प्रकाशक का नाम बताया। उनसे बात की। मालूम हुआ कि सिर्फ उन्हीं लेखकों की कहानियाँ छप या बिक सकती हैं जो हंस, कथादेश, वागर्थ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे हों। जिनके नाम को पाठक जानते हों। मैंने कहा कि मेरे पास ये सब तो नहीं है। फिर भी आप छाप देंगे क्या? उन्होने कहा कि हाँ छाप सकते हैं, पैंतीस से उनचालीस हज़ार रुपयों में काम बनेगा। मेरे पास कुछ रुपये थे मगर वे इस तरह के कामों के लिए नहीं थे।

मैंने शैलेश भारतवासी से बात की, उन्होने कहा कि मैं आपकी कहानियाँ पढ़ना चाहूँगा। मैंने उसी वक़्त सोच लिया कि अब बात बन जाएगी। कहानी पढ़ने का मतलब था कि वे संभवतया इंकार न कर सकेंगे। आखिर ऐसा ही हुआ। उन्होने पूछा कितने लोग खरीद सकते हैं। मैंने कहा- एक आप जो छाप रहे हैं और दूसरा मैं जो लिख रहा हूँ। उन्होने दोबारा, तिबारा पूछा तो मैंने बताया कि शैलेश जी, ये आभासी संसार है। यहाँ लाइक करने, टिप्पणी करने और वास्तविक जीवन में चाहने के बीच का फासला बहुत बड़ा है। इस पर किसी तरह का यकीन नहीं किया जा सकता।

कहानी की किताब छापने का काम शुरू हो गया। मैंने संजय भाई का सबसे ज्यादा फायदा उठाया। साथ ही अनु, प्रतीक्षा, कविता, अमित, आभा, पृथ्वी, स्वाति, अंजलि जी और बहुत सारे दोस्तों को कष्ट दिये। किताब को प्री ऑर्डर पर रखा गया। शैलेश साहब ने कहा कि हस्ताक्षर करने दिल्ली आना होगा। किताब को प्रिन्टर से हम तक आने में अनुमान से ज्यादा वक़्त लग गया। दिल्ली शहर में घूमता हुआ अचरज भरी आँखों से देखता रहा। अच्छा कवि नहीं हूँ मगर लिखने में मजा आता है। इसलिए अपने कुछ अपडेट्स कविता की शक्ल में लिखे। कुछ दोस्तों से मिला। नौ और दस तारीख के बीच की रात को एक बजे दो सौ किताबों पर साइन किए। दो और किताबों पर अगले दिन साइन किए।

आप सबको क्या कहूँ कि दो सौ से ज्यादा प्री ऑर्डर के बारे में जानकार मुझे कैसा लगा होगा। लव यू दोस्तों। किताब आप तक आती होगी, फिलहाल ये कुछ पंक्तियाँ पढ़िये। दिल्ली महानगर की अलग अलग जगहों पर बैठे हुये चार टुकड़ों में लिखी है।

हमारी दिल्ली

कैसा शहर है
इसकी आँखों पे धुंध का चश्मा
इसके बदन पर धूप की तपिश ही नहीं है
बस ओढ़ी हुई है एक पानी की चादर।
लोग उड़े जाते हैं
मखमली फ़ाहों से रुकते ठहरते।

हैरत में हूँ कि इतने बड़े शहर में
इस कदर भीड़ में भी तनहाई का बसेरा।
कोई पीठ थपथपा के कहता है मुझको
आवाज़ों के मेले में भी होता है, चुप्पी का कोना
सरसब्ज ज़मीं में भी छूट जाती है, सूखी मिट्टी।

मैं खोये हुये आदमी की तरह देखता हूँ
इंतज़ार करते हुए गुमशुदा रास्तों को।

इस शहर के पाँवों में बसों की पाजेब
शिराएँ रेल की पटरियों जैसी
और किनारे पर जिगर की तरह बसी हुई कच्ची बस्तियाँ
इसके दिल की सेहत को बाई पास सर्जरी सी मेट्रो की सांसें।

इसकी जेबों में भरी बड़े माल्स की चमचम
कॉफी के प्यालों की खनक के नीचे
ओबामा की बातों के शक्कर के दाने
सड़क के किनारे सिगरेट पीते लड़के
तंग कपड़ों में नुमाया, मिजाज़ इस शहर का।

ये कैसा शहर है
कि इसके माथे में छत्तीसगढ़ के जंगल की ख़ुशबू
मुगलिया ज़माने के दिल फरेब ड्रामे।

श्री राम सेंटर के आगे खड़ा सोचता हूँ
जो तुम होते यहाँ पर तो कितना अच्छा होता।

हर तरफ
सूखे पत्ते पड़े हैं सड़क के किनारे
ख्वाब दौड़े जाते हैं हसरत उठाए
शहर की हक़ीक़त के चाबुक अजब हैं
बरसते हैं ख्वाबों की पीठों पर मुसलसल
मगर वे कभी भी, किसी को दिखते नहीं हैं।

इस शहर में हर तरफ आईने हैं
जिनमें हुक्मरान आदमी को सुखी देखता है।
उन्हीं आईनों में
हुक्मरानों को मसखरा देख कर
रसोई, चूल्हा, रोटियाँ भूल कर, लतीफे सुनाता, अजब ये शहर है।

ये कैसा शहर है कि
इसमें अभी तक हैं ज़िंदा, बँटवारे की यादें
अभी भी बिछड़ी गलियों की महक है बाकी
अभी भी यहाँ लोग प्रेम करना नहीं भूले।

रात में जगमगाता शहर जागता है
मैं वसंतकुंज से लौटता हुआ सोचता हूँ
दिल की जेबों में भर कर क्या क्या ले जाऊँ?

ज़िया सराय के अबूझे रास्तों पर
नई उम्र की नई फसल के ताज़ा चेहरे
गलियाँ मगर फिर वही पुरानी
तवारीख़ के पेच और खम उलझी।

आईआईटी की दूजी तरफ
पश्चिमी ढब के बाज़ार सजे हैं
कहवाघरों के खूबसूरत लंबे सिलसिलों में
खुशबाश मौसम, बेफिक्र नगमें, आँखों से बातों की लंबी परेडें
कोई न कोई कुछ तो चाहता है मगर वो कहता कुछ भी नहीं है।

सराय रोहिल्ला जाते हुये देखता हूँ कि
सुबह और शाम, जाम में अकड़ा हुआ सा
न जाने किस ज़िद पे अड़ा ये शहर है। ये अद्भुत शहर है, ये दिल्ली शहर है।
* * *

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November 7, 2012

वो जो कहता है, मैं हूँ...

उसने तनहा आदमी को एक बड़ी अच्छी बात कही कि कभी कभी अपने साथ होना कितना सुखद होता है। हम अपनी पसंद से कुछ चेहरों की याद को चुनते हैं। उन्हें अपनी मरज़ी से आने और जाने देते हैं। इधर कोई कुर्सी पर चुप बैठा रहा, जाने क्या सोचते हुये। मैं उसी कुर्सी की ओर देखता हूँ। अब कभी फिर से न ये जगह होगी, न वो होगा, न कोई उम्मीद... कुछ हालात सच में लाजवाब होते हैं। ज़िंदगी फिर से उसी उदासी के दड़बे में लौट आती है। हाथ की लकीरों का रंग नहीं बदलता, बेवजह की बातें, उदासीन होकर टूट पड़ती है, अपने ही ऊपर कि वो जो कहता है, मैं हूँ। वह कहीं नहीं होता।

उस जादुई सड़क पर चलते हुये
की होती कोई भी जंगली कामना
या दिमाग और दिल के बीच बना कर एक मजबूत सेतु
गर लिखी होती कोई दरख्वास्त
तो भी ईश्वर के पास कोई हल नहीं होता तनहाई का।
* * *

जब तक उसने देखा मुड़ कर
रास्ता खत्म हो चुका था
सड़क के उस पार
मंडी हाउस के सामने वाला
मेट्रो स्टेशन अदृश्य हो गया
मैं फिर से खड़ा था, रेगिस्तान के ठीक बीच।

कुछ चीज़ें कभी नहीं छोड़ती हमारा साथ
हम रोकर फिर से सिमट आते हैं उन्हीं के पहलू में।
जैसे रेत सोख लेती है
जगमगाते दृश्यों को, भीड़ को, आंसुओं को,
और अभी अभी यहाँ खड़े महबूब के अक्स को।
* * *

प्रेम करना
नींद में किसी जंगली खरगोश का ख्वाब देखने जैसा है।

इसलिए उसने कहा
मैं नहीं दे सकती हूँ अपनी आत्मा को धोखा
या हो सकता है कि वह कोई बरसाती नदी थी
जिस अजनबीयत से आई थी, उसी से चली भी गयी।
* * *

November 5, 2012

सब अँधेरों के एकांत से परे

अचानक से हवा का एक ठंडा झौंका आया है। खिड़कियाँ जाने कितने ही दिनों से खुली हुई थीं। एक दोस्त ने कहा था कि तुम जानते नहीं तक़दीर के बारे में कुछ। वह अपनी सहूलियत और सीढ़ियाँ खुद चुनती है, मगर तक़दीर है बहुत अच्छी...

उसने रचा यकीन का स्वयंवर
और बुलाये कई योग्य प्रतिभागी

कोई हार गया ये सब देख कर।
***

खरगोश ने किया था उसे प्यार
सब रोशनियों के बीच
सब अँधेरों के एकांत से परे

बतख ने कहा, तुम गुनहगार हो, नेक्स्ट...
***

इसके बाद नहीं सोचा उसने कुछ भी
कि डार्टबोर्ड के ठीक बीच वाले घेरे में लगा सकेगा कोई निशाना

उसने हाथ छोड़ कर कहा, अब लगाओ निशाना।
***

मगर फिर भी
जादूगर लड़की मुस्कुराती है
खता खरगोश की है, कि उसी ने चाहा है।
***

डरते हैं बंदूकों वाले