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याद की रेज़गारी के बीच


एक बेपरवाही का पर्दा है। मुसलसल हवा की आमद के साथ हिलता है और धोखा होता है कि कोई आया। दीवार पर बीते दिन की महीन परछाई है। उड़ते हुये रंगों की याद का कोलाज है। फूल सा फाहा है स्मृति का। हालांकि नहीं लौट कर आता कुछ भी फिर भी दुआ भी कोई चीज़ है। जहां रहे खुश रहे, आक के डोडे से बिछुड़ा हुआ सफ़ेद पंख लगा उम्मीद सरीखा बीज सा पल। उदासियों की विदाई की कुछ बातें हैं, बेवजह बातें।

कि जिंदगी के बस्ते में रखी याद की रेज़गारी के बीच
एक चेहरा खड़ा है,
रुत बदलने की उम्मीद लिए खड़े किसी पेड़ की तरह।
* * *

याद करना चाहिए उस दुख को
जिसके साथ पहली बार आया था मुक्ति का खयाल।

मैं मगर दिल में रखता हूँ, गिरफ़्त होने की घड़ी को।
* * *

तुम यहाँ सिर्फ जी नहीं रहे हो
तुम हो यहाँ पर किसी विहंगम दृश्य को देखने के लिए नियुक्त पहरेदार
तुम में भरी है अद्भुत शराब।

तुम छूकर आए थे, एक लिफ्ट के आखिरी क्षणों में महबूबा के बाल।
* * *

और मेरी पसंद के बारे में पूछते ही
मैं खो गया रंगों के ऐंद्रजाल में
मगर उचक कर दिया मैंने जवाब कि सवाल ही गलत है।

इसलिए कि हर कोई जानता है
मेरा महबूब रख दे जिस रंग पर नज़र, मुझे वही पसंद है।
* * *

हमें
इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए
कि लोग मिलते हैं और खो जाते हैं।
* * *

प्रेम, एक अर्धचेतना का बिछौना है
भयावह रेतीले वर्तुलों में
चमकीली धातुओं के बारीक टुकड़ों की चौंध से भरा।

ये बातें किसी की स्मृति भर है कि
उसकी एक नज़र, कई ख्वाब, बुझ गया मायावी धोखा।
* * *

तुम्हारे बारे में सच क्या है?

आखिरी बार पूछा वर्दी पहने हुये आदमी ने
कि दुआ और उम्मीद के सिवा भी कुछ कहो।
* * *

उसने जकड़ लिया बाहुपाश में
चूमा बेतरह, उधेड़ दी बखिया उदासियों की
फिर मुस्कुरा कर बोला।

मैंने सुना है, अवसर एक ही बार आता है।
* * *

अचानक से एक उम्मीद विदा हो गयी
सूखी पत्तियों जैसी किसी आवाज़ में।

मैंने कहा
सुनो,
तुम सामने बैठे रहो तो हज़ार और उम्मीदें है मेरे पास।
* * *

कोई वजह नहीं उम्मीद के लिए कि 
उम्मीद को कोई वजह क्यों चाहिए होगी।
* * *

यात्रा के आख़िरी पड़ाव पर
हमें बिछड़ना चाहिए भय के साथ
भय एक दूजे को खो देने का।

मगर चीज़ें बनी है किसी मक़सद के लिए
मेरा मक़सद तूँ है।
* * *

[पेंटिंग की इमेज एक दोस्त के घर की दीवार से]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…