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महबूबा, अजमेरी अंडे कुछ नहीं होते


शाम बीत गयी है। शाम का इंतज़ार भी है। कोई नहीं है, कोई है भी। यकीन ज़िंदगी पर नहीं और उसी ज़िंदगी के भरोसे जीए जा रहा हूँ। तुम न आओगे कभी इसी बात पर रोता हूँ और सुना है कि कुछ भी कायम नहीं है। तो क्या तुम आओगे एक दिन, क्या मैं फिर से देखूंगा चाँद अभी डूबा नहीं, सुबह अभी खिली नहीं। जाने दे आज बेवजह की सबसे उबाऊ बातें।

ओ महबूबा, मैं कहना चाहता हूँ
कि इस वक़्त आ गए हैं बादल बहुत सारे आसमान में
इसी वजह से उतार दिया है हरे रंग का स्वेटर।

तुम्हारे बिना
जाने किस शाख पर भूल गया है मौसम, रंगों की ज़ुबान को।
* * *

एक बार बात करो
अपने सब सुखों के बीच इस इकलौते दुख को सुन लो
* * *

तुमने कभी नहीं कहा
कि कोई उम्मीद है
मैंने कभी नहीं सोचा कि कोई उम्मीद है।
* * *

उसने तोड़ लिया इंद्र के सिंहासन का एक पाया
सोने के पाये से खरीदा पुष्पक विमान
और उतर गया एक गुलाब के फूल बेचने वाले के पास।

फिर रात के अंधेरे में कहा
सितारों क्या तुम अभी बने रहोगे वहीं, जहां रोज़ होते हो।
* * *

ये कितना अच्छा था
मैंने खूब सारी गलतियाँ की, तुमने उनको परखा
और आखिर हम किसी नतीजे पर नहीं आए।

इसी बहाने कुछ और वक़्त बिताने की मोहलत मिली।
* * *

हम तीन दोस्त थे।

एक ने मेहरानगढ़ किले की
तलहटी में बनाया किताबों से घर
और छुप गया शब्दों की घनी छांव में।
दूजे ने गज़नी की तोड़ी मूरतों को
सीने से चिपकाए उदास खड़े किराड़ू की याद में
बनाया शराब का टांका और उसमें कूद गया।

मुझे चाहिए, भटकने के लिए हसरतों की उजाड़
मैं भर देना चाहता हूँ तुम्हारे दिल में रेगिस्तान
और बचा हुआ हूँ, तुम्ही को उदास करने के लिए।
* * *

उसने कहा
कथाकार के चेहरे को सलाखों की शक्ल में
किताब के पीछे छापना अच्छी बात नहीं है।
कवि की दाढ़ी भी गलत है
कि उसमें घुसने के लिए चाहिए काले रंग का चोर तिनका।

मैंने कहा आलोचक के बारे में क्या खयाल है?

उसने कहा कि अजमेरी अंडे कुछ नहीं होते
लोग सिर्फ नाम देख कर खड़े हो जाते हैं कतार में।

हालांकि वो जानता था
कि आज फरवरी महीने का पहला दिन है
मेरी जेब में कुछ ऐसे कागज़ के टुकड़े होंगे, जिनसे खरीदी जा सके शराब।

मैं मगर सोच रहा हूँ कि किसी से न कहूँ कुछ।
* * *

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…