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दीवानगी की बातें मगर बेवजह


अब कुछ ताज़ा बेवजह की बातें कि मौसम का रथ सजा हुआ है सुंदर फूलों से, मैं खुश भी हूँ और नशे में भी, मैं बरबाद भी हूँ और आबाद भी और बेवजह की बातें करने को ज्यादा अक्ल कहाँ चाहिए किसी को भी... ज़िंदगी की फेरी हुई एक नज़र काफी है।

[1]
नहीं दिखाई देगा कोई अक्स
आता हुआ दीवार के इस ओर
दुनिया से डरे हुये छुप कर हम करते रहेंगे इंतज़ार।

हम बने ही इंतज़ार के लिए हैं।
* * *

[2]
और इसका कोई हिसाब नहीं है
कि मैंने कितना प्यार किया है

जीवन की तमाम जटिलताओं में
जो चुना जा सकता था आसानी से वह था सिर्फ तुम्हारा नाम।

बाद इसके आसान हो गया ये जीवन
कि अब न मरना है न ही कोई जीना।
* * *

[3]
मैं बैठा रहा
रेत के किनारे मगर रेत ही पर।

जैसे तुम से दूर, तुम्ही के पास।
* * *

उसने बताया
कि कौन सचमुच करता है मुझसे प्यार ।

फिर वो रोने लगा, जाने किसकी याद में।
* * *

[4]
हम कभी जुदा न होंगे
हमारे बीच बह रही होगी समय की नदी।

तुम उस पार रोना, मैं इस पार रोऊँगा।
* * *

[5]
जब तुम्हें ज़रूरत हो प्यार की
तब याद करना मेरी बात
कि प्रेम रूह से किया जाता है, देह नाशवान है।

और मैंने चाहा कि फोड़ लूँ ये रोती हुई आँखें
मगर ये उसने कहा नहीं था।
* * *
[आह मनोरोगी होना बड़ा तकलीफदेह काम है। सब्र आता नहीं उम्मीद जाती नहीं। खुद पर तरस खाकर कुछ आराम नहीं कर पाता हूँ। रेत की कच्ची पगडंडियों वाले शहर की एक शाम फिर से याद कर रहा हूँ कि तुमने कहा है मुझे यहाँ से थाम कर चलो...]

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