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कार की सीट पर बैठा हुआ है एक हिरण


कई शामों से हर शाम कुछ लिखने को दिल मचलता रहता है। कल कुछ दोस्तों को आवाज़ दी और उनको सुनाई ये बातें और फिर उठ गया ये कहता हुआ- रेगिस्तान के इस छोर पर एक मुल्ले ने अपने ख़ुदा के आगे दुखड़ा रोना शुरू कर दिया है, मैंने भी कुछ बेवजह की बातें कर ली है और अब वक़्त हो चला है उपदेशक की बातों को भूल कर बाज़ार की उस गली का चक्कर लगा आने का, जहां मिलती है बेअक्ल होने की दुआ... 

ज़िंदगी ने कहा है कि खुश रहा करो तो उसका हुक्म बजा लेते हैं।

मुझे यकीन ही नहीं था इस बात पर
कि कोई तुमसा मिल जाएगा ज़िंदगी के रास्ते में

चाहे तब हँसाए, चाहे तब रुलाये।
* * *

एक सुहानी शाम को
बूढ़ा आदमी मिलता है गुलाबी पंखों वाली परी से
और देख कर मुसकुराता है.

परी भी शरमा कर छिप जाती है
एक नौजवान के पीछे
उसे देख कर फिर मुसकुराता है बूढ़ा आदमी
एक सुहानी शाम को....
* * *

सब रोज़गार दफ़्तरों में भरे रहते हैं
रजिस्टर नाम और पतों से
मगर प्रेम के लिए नहीं मिलता कोई उपयुक्त अभ्यर्थी।

कि बेवकूफ आवेदनकर्ता
अपनी आगे की ज़िंदगी जीना चाहता है सुख से।
* * *

शाम के चौकीदार से कहो
भोर के तारे तक जागना हो सकता है आसान

अगर वह पड़े सके किसी तंगदिल औरत के प्यार में।
* * *

अपनी आँखें बंद करो और
उछाल दो ज़िंदगी का सिक्का
फिर देखो कि क्या लिखा है तुम्हारे भाग में?

जबकि एक तरफ लिखा है प्रेम
दूसरी तरफ उसी का पर्यायवाची दुख।
* * *

वो सुबह उठते ही चूमता था बच्चों को
दिन भर प्यार भरी निगाह से देखता साथ काम करने वालों को
रात को बीवी को बताता कि तुम कितनी हसीन हो
और फिर खुश होकर सो जाता था बदनसीब आदमी।

ऐसे मसख़रों की ज़िंदगी के खाते में
ईश्वर को ज़रूर लिखनी चाहिए एक महबूबा,
कि रोना भी एक खूबसूरत काम है।
* * *

मौत से भी बुरा होता है मौत का न आना

लेकिन उससे भी बुरा है
किसी ठुकराये हुये प्रेम को इल्तजा करते जाना
पड़े रहना उसकी फेरी हुई नज़र की ठोकरों में।
* * *

कि शाम तक आते आते
बहुत पीछे छूट जाती है सुबह

लेकिन कुछ सुबहें सताती रहती हैं उम्र भर
कि किसी को नहीं चूमना चाहिए सुबह की नींद में।
* * *

और तुम सौंप दो खुद को मुझे
ये कह कर ईश्वर ने चुरा लिए
जाने कितने ही लोगों से उनके प्रेमी ।

ईश्वर के लिए कोई रहम नहीं है मेरे दिल में।
* * *

मेरा प्याला भर रहा है उसके नाम के अक्षरों से
अफसोस ये है कि ज़िंदगी बीतेगी उसी के बिना।
* * *

और शाम की गंध
उतर आती है, उसकी बाहों के किनारों से
बुझ जाता है साया धूप का,
सब कुछ चल पड़ता है अपनी राह पर।

दुख का क्या है, लंबी तो जिंदगी ज़िंदगी भी नहीं होती।
* * *

कुछ लोगों ने ज़िंदगी को बना लिया फुटबाल
और उससे खेलते रहे उम्र भर
कुछ लोगों ने ज़िंदगी को रख लिया अखरोट जैसे खोल में बचा कर

लेकिन आखिर दोनों नष्ट हो गई।
* * *

ज़िंदगी एक खूबसूरत इंद्रधनुष नहीं है

वह एक बांझ दाई है
बेरहम आँख से देखती है प्रेम को।

तोड़ती रहती है प्रेम के नए बीजों को
पानी देती है सूख कर ठूंठ हुई स्मृतियों को।
* * *

हवा नहीं है मेरे साथ
कि इस तरफ नहीं झुकती कली,
जिस तरफ बैठा हुआ हूँ मैं।

गुमशुदा किसी खयाल में
और साथ में किसी और के।
* * *

चिड़ियाघर में तारबंदी में घिरा हिरण
सोचता है खुले मैदान, हरी घास,
तलहटी की झड़ियों और शिकारी जानवरों के बारे में
आहिस्ता टहलता हुआ रुक जाता है,
नकली पेड़ की छिटपुट बिखरी छांव के पास
बिखरे गंदे पानी में अपना मुंह देखता हुआ।

लोहे की कंटीली बाड़ में
जिंदगी सताती है प्यास बन कर,
याद आती रहती हैं, जी ली गयी सब हसरतें
कि पोखर से पानी पीकर ज़िंदा लौट आना
महबूबा के पहलू से मर कर लौट जाना।

चिड़ियाघर के हिरण का दुख तुम्हें सुनाने से पहले
मैं देखता हूँ कि कार की सीट पर बैठा हुआ है एक हिरण।
* * *

वक़्त के ज़र्द पत्तों के बीच से आती है
किसी भूले हुये रंगीन सपने की आहट
फिर कभी उसकी आवाज़ का एक टुकड़ा
शोर मचाने लगता है गली में दौड़ते हुये नादान बच्चे की तरह।

फिर से बिखर जाती है संभली हुई ज़िंदगी।
* * *

कोई जगह नहीं थी
कोई वादा नहीं था, नहीं थी कोई आवाज़, भ्रम था।

या ये एक भ्रम है
कि कुछ किए बिना अनमना पड़ा हुआ
काट रहा हूँ सुबह की टहनी।

धूप के आते आते चला जाऊँ मुंडेर की छांव में,
एक पारदर्शी मुंडेर जो रोक नहीं पाती तुम्हारी याद की धूप।
* * *

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…