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किसी शोरगर की तरह


कोई आवाज़ न थी। कारीगर और मजदूर बारदानों में शोर और औज़ार एक साथ रख कर अपने घर चले गए थे। वीरानी थी। ज़िंदगी के हाल पर उदास ज़िंदगी थी। दीवारें पूछती थीं कि फिर करोगे मुहब्बत किसी वक़्त के छोटे से टुकड़े के साथ? मैंने कहा कुछ भी कर लूँगा बस रोने की इजाज़त दे दो। फिर बेवजह की बातें कि और कोई सूरत नहीं... 

उसके कंधे को छूकर आती हवा में
मैंने घोल दिये लरज़िश से भरे कुछ टूटे शब्द।

एक दिन श्याम रंग के भँवरे के टूट जाएंगे पंख
एक दिन गुलाबी फूल से झड़ जाएगी पत्तियाँ।

उस दिन से पहले, तुम एक बार फिर मिलना।
* * *

हसरतों की पगडंडियाँ कितनी सूनी होती है
कि एक आदमी को चलना होता है तनहा उम्र भर।

इस वक़्त हालांकि तुमने थाम रखा है, मेरा हाथ
सड़क के किनारे बसे हुये हैं ख़ानाबदोश
मगर हम बिछड़ जाएगे, वक़्त की धूल के गुबार में।
* * *

फूल की गरदन से ज़रा नीचे, उम्मीद किसी कोंपल की
जैसे मेरे दिल में तुम्हारा नाम
मगर कांटे जाने कहाँ से चुभते रहते हैं हर सांस के साथ।
* * *

तुमको सिर्फ इतना करना है
कि चीज़ों को रखना, उनकी शक्ल के हिसाब से
चीनी मिट्टी से बने गुलदानों के आस पास।

बाकी तुमसे प्रेम करना सिर्फ मेरा काम है।
* * *

ज़िंदगी कभी तुम्हारे करीब न होगी
इसे भटकते रहना है, ख़यालों के वीराने में।

यही लिखा है वक़्त की किताब में
कि मैं सांस लेने की जुगत में फिरा करूँ
आवारा गलियों में बंद दरीचे और दरवाज़े देखता
और कभी इन राहों पर गुज़रूँ
हाकिम को सजदा करता हुआ।

कि वो उतार लेता है खरगोश की खाल भी
मुझसे देखा नहीं जाता, काँटा तेरे पाँव में।

कितनी तकलीफ होती है, महबूब के बिना जीने में
और तय है कि ज़िंदगी कभी तुम्हारे करीब न होगी।
* * *

मैं रिफ़्यूजी का तम्बू हूँ
न वो मुझे अपना सके, न मैं उसे।
* * *

कठिन समय की दस्तक ने
मुझको एक पाठ पढ़ाया
कि भावनाओं की कश्ती में
ज़िंदगी की चट्टानों पर नहीं हो सकता है सफ़र। 

मैंने मस्तूल को रोप कर ज़मी पर
नाव से बना ली है छत
अब मर्ज़ी है तुम्हारी आओ, न आओ।
* * *

सब हमारे लिए आसान होता
गर हम रुई के फाहे होते
हम उड़ जाते हवा में, हम जल जाते आग में,
हम खो जाते दुनिया की नज़रों से दूर।

मगर हम रुई के फाहे नहीं थे।
* * *

किसी शोरगर की तरह
चाहतों की पोटाश से बुनता हूँ मुहब्बत
कभी तुम चटक जाते हो आंच की तरह
कभी तुम बरस जाते हो आँसू की तरह।

कि कुछ नहीं बनता, हथेलियों में छाले के सिवा।
* * *

कच्ची मिट्टी से बने
मैखाने की दीवार का सहारा लिए
मैं देखता हूँ ज़िन्दगी के गुज़रते हुये सालों को
एक अजनबी गली में।

वो गली जिसमें तुम नहीं रहते।
* * *

दोस्त तुम्हारे प्याले में बची हुई है शराब
कि तुम बैठे हुये हो किसी के इंतज़ार में।
* * *

मैंने गलतियाँ की
और अनमना सोया रहा मेरा अपराधबोध।

उसे शिकायत है कि
दुनिया मुझे वो नहीं देगी जो मैं चाहता हूँ।
* * *

मेरे निर्माता ने बनाया था मुझको
किसी प्रेम के आलोड़न में सम्मोहित होकर
मेरे भाग्य को लिखने से पहले वो सो गया गहरी नींद।

मुझे तुमने गले लगाया 
और फिर दूर रहने की नसीहत देकर खो गए।
* * *

उस एक रात के बाद मेरा वुजूद दो तरफा हो गया।

जब नहीं आती उसकी आवाज़ मैं खाई में लुढ़कता हुआ पत्थर हो जाता हूँ
और कभी, उसकी आवाज़ बना देती मुझे कोमल पंखुड़ी हवा में उड़ती हुई।
* * *

[Painting Image : Brad Kunkle]

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