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उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं होता


इतवार की सुबह है और बाद मुद्दत के मन का हाल बेहतर है। कुछ काम किए हैं और कुछ कर लेने का इरादा है। एक खयाल दिल से दिमाग तक फेरे लगा रहा है कि पिछले महीने से भर से मुझे बरदाश्त कर रहे दोस्तों को शुक्रिया कह दूँ। शुक्रिया, शुक्रिया और दिल की गहराई से शुक्रिया। महबूब एक ही है मगर प्यार आप सबसे है। जो मुझे बचा लेते हें बुरे दिनों में। आगे कुछ और लिखूंगा तो खुशी में आँखें भीग जाएगी। आप समझ सकते हैं। ये कुछ बेवजह की बातें हैं जो शुक्रवार एक मार्च और शनिवार के दरम्यान लिखी थी। ये कहीं उदास कहीं उम्मीद से भरी हैं कि उदासी से अपने ओरबिट की ओर संक्रमण के समय की कवितायें हैं।

ये कवितायें लिखने से पहले मैं कमरे के अंदर के नीम अंधेरे से घबरा कर बालकनी में आकर बैठ गया था। बाहर खुली रोशनी से उम्मीद थी कि वह मुझे उदासी की छुअन से दूर रखेगी। यातना के तीस दिन गुज़रने के बाद आखिर सब्र को बहला कर लाया। सोच रहा था कि लौट जाऊँ फेसबुक के दोस्तों के पास मगर ज़रूरी था कि दर्द की इस दास्तां को लिखना जारी रखूँ और पूरा होने पर ही लौटूँ। मैंने खुद ही काट डाली थी सुकून की शाख और दोष लगाने को कोई सर भी नहीं है। मैं खुद के लिए दुआ करता हूँ कि बदनसीब आदमी क्यों खुद के लिए खड्डे खोदता है और क्यों उन में गिर कर फरियादें करता है। शुक्रवार की सुबह माँ ट्रेन से जोधपुर गयी है। बच्चे और बीवी स्कूल चले गए थे। एक दो माले का घर था पिताजी का बनाया हुआ और एक मैं था। कुछ ये शब्द थे।

फूल के दिल को चीरती हुई निकलती है
सुई फूलवाले की
इसके बिना मुमकिन नहीं है दो फूलों का एक साथ हो पाना।
* * *

वहाँ ज़रूर रखी होती है एक गहरी सांस
जहां रखा है तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।
* * *

चुप्पी की खुशबू बांध लेती है हवा के पंख
पूरा जंगल भर जाता है अचरज से
कि आवाज़ देकर छिप जाता है कोई परिंदा।

मैं आँखें मूँद कर चुरा लेता हूँ ये दृश्य।
* * *

आज सोचा है
कि लगा ही दूँ विज्ञप्ति।

कि जिसे भी उठाना है दुख
वह आ सकता है प्रेम करने।

शैतान को चाहिए एक खुशी की घड़ी वापस।
* * *

प्यार एक सरल रास्ता है
मगर शैतान चलता रहा है, दुख के अंगारों पर
तुम तक आने के लिए।

जैसे कि मेरे शब्द पढ़ कर अक्सर लोग कोसते नहीं मुझे
समझने लगते हैं मेरा दुख अपनी प्रेमिका को याद करके।
* * *

ऐसा नहीं है कि मैं मरूँगा नहीं
मगर इस तरह मरना, क्या तुम देख सकोगी?

आँखें फेर लेने से कुछ न होगा
मौत का दृश्य उतरता है उस वक़्त
जब आँखें फेरने जितनी ताकत नहीं बचती किसी के दिल में।
* * *

तुम्हें उन सब
बोसों की गहराई की कसम है
कि भुला देना सब कुछ।

शैतान की दीवानगी के सिवा।
* * *

प्रेम होने से पहले
आराम कुर्सी पर उचक कर बैठा हुआ शैतान
मुस्कुराकर कहता है तुम आओ तो सही।

प्रेम के बाद ढल जाता है शैतान, एक इंतज़ार से भरे आदमी में।
* * *

हाँ तुम चूम सकती हो
जाली से आती रोशनी की गवाही में

मैं मगर इस बालकनी से क्या कहूँगा कल
कि तुम कहाँ चली गयी
और रोशनी आती है क्या याद दिलाने के लिए।
* * *

और सच में कोई करना नहीं चाहता है प्यार
सब गुज़ार देना चाहते हैं एक लम्हा खुशी का।
* * *

शैतान कभी नहीं देखता
ज़िंदगी की तारांकित शर्तों की ओर
वह गाता रहता है, निषिद्ध गान।

रेगिस्तान,समंदर और बर्फ की दुनिया
हसरतें, उम्मीदें और ये दर्द की दुनिया
रंग-बिरंगी फिर भी ये ज़र्द सी दुनिया।

देवताओं के दूत उसे कर देते हैं क़ैद,
तारांकित शर्तों के उल्लंघन में
मगर शैतान रोता नहीं, किस्मत के सितारों का रोना।
* * *

कोई वजह नहीं है
दिन की हथेलियों में खुद को कुर्बान कर देने की।

वजहें चली गयी हैं, उसी के साथ,
अगर कहीं है कोई दुबली पतली सी शैतान की प्रेमिका
तो उसके ये इंतज़ार के दिन हैं।
* * *

आक के पत्तों से बना कर दोना
उसे होठों से लगाकर पानी पीने के बाद
किसान ने उसे रख दिया एक तरफ।

शैतान ने किसान को कभी नहीं किया माफ
कि वन नाइट स्टेंड से नफ़रत है शैतान को।
* * *

रेल के गाने की द्रुत में लय
जैसे शैतान की प्रेमिका के बेकाबू होने की याद

मैं ईर्ष्या करता हूँ इस आवाज़ से, छुक छुक छुक।
* * *

वो बादल की तरह छा जाती है
शैतान खड़ा हो जाता है दोनों हथेलियों से ओक बना कर
एक बूंद टपकती है, टप।

आँखें मुंद जाती हैं एक साथ, खो जाती है बूंद विस्तृत जगत में।
* * *

सदियों तक के लिए
अदृश्य, अनाम, अजीर्ण और अनिमेष
शैतान की प्रेमिका
बिछाए रखती है खुशबू अपने आने की।

रेलवे क्रॉसिंग पर दरवाज़े के आगे बैठा चौकीदार
मुझसे पूछता है, आज किसे विदा कर आए
कोई भी नहीं पूछता कि तुम कब आने वाली हो।
* * *

रंगीन रिबन की तरह
एक खयाल मेरे गालों को छूकर गुज़रा।
वो ही नाम
जो छुपा है मेरे ज़ेहन में, उग आया पूरब से।

रेल की पटरियों पर पहियों के बीच से
छन कर आ रही थी खुशबू नए दिन की।

हवा की ठंडक में कहा मैंने
ऐ कुदरत मुझे फिर से शैतान कर दे
लौटा दे शैतान की प्रेमिका।

वक़्त कितना ही अच्छा क्यों न हो
उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं होता।
* * *

[तस्वीर : प्रतीक्षा पांडे] 

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
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विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
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दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

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* * *
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