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कल्पना के सच

जब मैं अखबार की नौकरी छोड़कर रेडियो में काम करने लगा था तब आपकी अदालत, टीवी का खासा लोकप्रिय कार्यक्रम हुआ करता था. इस कार्यक्रम में एक आधे बाल उड़ा हुआ हँसता मुस्कुराता और इससे भी ज्यादा शांत और शातिर दीखता चेहरा, एक नक़ली कचहरी में वकील बनकर किसी प्रसिद्द व्यक्ति के व्यक्तित्व का अपने नुकीले सवालों से परीक्षण किया करता था. कार्यक्रम को देखते हुए दर्शकों को बड़ा मजा आता था. किसी बड़े, ख्यात या रसूखदार व्यक्तित्व से कड़े सवाल पूछ लेने की चाह, हमें खूब आनंद देती है. सामाजिक परतों में सबसे उपरी परत पर सवार हो चुके आम या खास लोगों को फर्श पर देखने की इच्छा के पूरा होने से हमारा एक अस्थायी प्रतिशोध भी पूरा हो जाता है. हम जिस प्रसिद्धि की कामना करते हैं, वह नहीं मिलती इसलिए हम प्रसिद्द लोगों की खामियों का मजा लेने में सबसे आगे होते हैं. हमारी इसी खामी के मर्म को समझ कर रजत शर्मा ने इसे उत्पादक वस्तु में ढाल दिया था. आपकी अदालत और इसके बाद नए शीर्षक से जनता की अदालत के नए नए कारनामे हमारे सामने आते रहे. इस कार्यक्रम की, जिस बात की ओर दर्शकों ध्यान कभी नहीं जाता था वह थी कि भला इतने प्रसिद्द लोग अपनी पोल खुलवाने के लिए क्योंकर बाखुशी इस कचहरी में अपराधी की तरह आकर बैठ जाते हैं. इस कार्यक्रम में कभी ऐसा नहीं होता कि सवालों से उकता कर नाट्य में अपराधी की भूमिका कर रहा नायक या नायिका चला जाये. वह अपने ऊपर लग रहे आरोपों से तिलमिला उठे और वास्तविक अदालतों में दुर्व्यवहार करने वाले अपराधियों की तरह कोई बर्ताव कर बैठे? इन प्रश्नों के उत्तर कठिन नहीं हैं. ये एक स्वांग है. उतना ही कड़ा जितना कि मुख्य पात्र अनुमति प्रदान करे. इस स्वांग के जरिये हमारा और प्रस्तोता दोनों का काम बन जाता है. हम एक प्रसिद्द व्यक्तित्व को सर खुजाते, नज़रें घुमाते या थोड़ा हकलाते हुए देखकर खुश हो जाते हैं. उससे भी बड़ी बात कि आखिर में कथित अभियुक्त अपनी चतुराई से अभियोजन को नाकारा साबित करके अपनी प्रसिद्धि में एक और तमगा लगा कर सबका अभिवादन करता हुआ रुखसत हो जाता.

मुझे इन रजत शर्मा साहब की याद इसलिए आई कि एशियन ह्यूमन राईट कमीशन ने कहा कि सामूहिक बलात्कार के बाद मौत के मुंह में धकेल दी गयी निर्भया की पहली बरसी पर एक कार्यक्रम पेश किया गया. इन्डिया टीवी द्वारा आयोजित इस सजीव बहस में नारीवादी सामाजिक कार्यकर्ता, विषय विशेषज्ञों और कार्यक्रम प्रस्तोता ने भाग लिया. इसका विषय एक एनजीओ के मुख्य कार्यकारी द्वारा एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ बलात्कार किया जाना था. एएचआरसी ने कहा कि इस कार्यक्रम में टीवी चैनल के कार्यक्रम प्रस्तोता ने ये दावा किया कि हम बलात्कारी को उसके अंजाम तक पहुंचाएंगे. यह एक तरह से मिडिया ट्रायल ही था, जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता और उर्दू स्कोलर खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली. आत्महत्या के कारण क्या हैं, ये जाँच का विषय है. लेकिन क्या सचमुच मिडिया ट्रायल किसी भी तरह से समाज के लिए हितकारी है. क्या कोई भी टीवी और सोशल तंत्र एकतरफा प्रचार करता जाये ये उचित है? क्या कोई एक व्यक्ति किसी भी तरह से इतने बड़े माध्यमों पर हो रहे कुप्रचार का अकेला सामना कर सकता है. क्या हम पीड़िता को इस तरह से न्याय दिलवा सकते हैं. क्या हम इस तरह से नकली पीड़ित और असली दोषी के बीच की पड़ताल को सही दिशा में ले जा सकते हैं? इन सब सवालों का एक जवाब यह है कि हमें न्यायाधिकारी बनने की जगह ये काम न्यायालयों पर छोड़ना चाहिए. किसी को अपराधी करार देकर उसका चरित्र हनन करना भी उतना ही अमानवीय है जितना कि किसी स्त्री की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का दोषी होना. हाल का घटनाक्रम दोनों पीड़ितों के साथ एक तरह का दुर्व्यहार है. इसका सबसे डरावना पक्ष ये है कि जो भी किसी का पक्षधर है, वही सर्वाधिक नुकसान कर रहा है. स्त्री सम्मान की रक्षा के लिए बने कड़े कानून आज इतनी सक्रियता से काम कर रहे हैं कि हमें सोशल मिडिया और इलेक्ट्रोनिक मिडिया पर ऐसे हस्तक्षेप से बाज आना चाहिए जो न्याय की प्रक्रिया से पूर्व ही पीड़िता को बदनामी और आरोपी को मृत्यु की ओर धकेलता है.

क्या हम कभी सोचते हैं कि एक कार्यक्रम से हज़ार करोड़ रुपयों का टीवी चैनल कैसे खड़ा किया जाता है. ये मार्च दो हज़ार पांच की बात थी, जब हम सब बेहद उत्सुक और उत्तेजित हो गए थे. हम टीवी पर फ़िल्मी दुनिया के लोगों के अंतरंग संबंधों को सार्वजनिक होते देखने की प्रतीक्षा करने लगे थे. उस साल कोई आठ एक महीने पहले खबरिया चैनल बाज़ार में आया था और इसने अपने दर्शकों की संख्या बढाने के लिए एक विदेशी कार्यक्रम की नक़ल करते हुए, उसका भारतीय संस्करण तैयार कर प्रसिद्धि पाने वाले सुहैब इलयासी के साथ मिलकर कुछ स्टिंग का प्रसारण करना शुरू किया था. दर्शक बेसब्र इंतज़ार से भर गए थे कि वे सिने जगत के जिस सच को अपनी कल्पना में सोचा करते थे उसे परदे पर साकार देख लेना चाहते थे. दो एपिसोड का प्रसारण मुझे याद है. जिनमें अमन वर्मा और शक्ति कपूर के स्टिंग ऑनएयर किये गए. इसके बाद भी कुछ प्रसारण किये जाने थे. टीवी और प्रस्तोता का दावा था कि वे सच को सामने लायेंगे मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा न होने के संभावित कारण बहुत सारे हो सकते हैं. आप भी बेहतर सोच सकते हैं कि कम से कम नैतिकता और समाज को गंदगी न परोसे जाने की भावना से उनका प्रसारण हरगिज न रोका गया होगा. हम उससे भी भयानक दौर में पहुँच गए हैं कि आज हमारे पास कई सारे माध्यम उपलब्ध है. हम इनके जरिये कितने ही झूठ परोस सकते हैं. क्या सचमुच हमारी सामाजिक और नैतिक चेतना इस स्तर की है कि इस तरह के औजारों का ठीक उपयोग कर सकें. क्या हम समाज के अन्य लोगों और मुद्दों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं जितने कि खुद के लिए रहना चाहते हैं. एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता और पुरुष के बीच के अजाने रिश्ते के सच को जाने बिना ही सार्वजनिक सामाजिक उपहास और घृणा का विषय बना देना कितना बड़ा अपराध है. इस अपराध के लिए सज़ा तय होनी चाहिए.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…