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Showing posts from February, 2013

गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में

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जब आप वक़्त का टूटा हुआ आईना देखते हैं तब पाते हैं कि आपके माथे की सलवटों में तकलीफ़ों के निशान कम और उन नेक इन्सानों के नाम की लकीरें ज्यादा है। वे इंसान जो आपको बचा कर ज़िंदगी के इस मुकाम तक लाये हैं। मगर मुहब्बत और ऐसी ही दूसरी बरबादियों की लकीरों के पार जाकर वे नाम पढ़ने के लिए चाहिए एक उम्मीद की रोशनी।
वे मजे मजे के सात आठ दिन
गुच्छे में बंधे हुये फूल गुलाब के
किसी फोन के बहाने बार बार, सूरत चुपके से देख लेना चाँद की।

सुबह नंगे पाँव फर्श पर चलते हुये सुनना
रात की चादर में गुम, सब लड़ाइयाँ
कि फिर से गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में।
* * *

ये दुनिया इसीलिए इतनी सुंदर है
कि इसके भीतर छिपे
रहस्यों को आप कभी जान नहीं पाते हैं।

मनुष्य का मन
राख़ के नीचे छिपा हुआ अघोरी का बदन है
जादू और भय से भरा हुआ।
* * *

प्रेम डरता रहता है,
एक रात की सुकून भरी नींद से
और सुबह आती है किसी खोये हुये ज़माने की
चादर के नीचे से निकल कर अजनबी की तरह।

मगर हम करते जाते हैं, प्रेम।
* * *

वह इतना स्ट्रेट फारवर्ड था
कि उसके तरीकों से क्रूरता की बू आती
हालांकि उसने सिर्फ ये तय कर रखा था
कि ज़िंद…

मेरे पतन के कारण

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ऐसा भी कहीं होता है कि जो खिलता हो उसका बीज न हो। इसलिए प्रेम और दुख के भी बीज होते हैं। उनको भी चाहिए होता होगा कोई मौसम अपने रूपायन के लिए। मैंने एक ग्रीन हाउस बना रखा है। इसमें फूल रही पौध को लेकर संशय है कि बोता तो मैं प्रेम हूँ मगर उगता सिर्फ दुख ही है। इस पैदावार के सिलसिले को, इस काम को कुछ मुल्तवी किया जाने का सोचा है। इस फसल के ये कुछ ताज़ा फूल हैं।


मैंने कहा कि हम दो अलग अलग ही दिखते हैं सुंदर
कि दो सुंदर रंग मिल कर बन जाते हैं एक काला रंग।

मैंने सोचा कि उसने जवाब में कहा है
मैं बसा लूँगी इस रंग को अपनी आँखों में
मगर तब तक बावर्ची समेट लेता खाना दोपहर का
इसलिए वह चली गयी बिना कुछ कहे।
* * *

फासला था बहुत
और लोग भी कहते जाने क्या क्या

इसलिए उसने कहा कि
आदमी का सबसे अच्छा आविष्कार है, डिवाइडर
तुम उस तरफ चलो, मैं इस तरफ चलूँगी।
* * *

उसने कहा कि प्रेम रूह से होता है
इसी बात के जवाब में मैंने नहीं दिया सिर्फ एक मेसेज का जवाब
वो शायद रो पड़ी, न जाओ छोड़ कर।

मैंने सोचा कि कहाँ गए कृष्ण, राधा क्या हुई
मगर उसे न होगी कभी खबर मेरी तड़प की।

* * *

उसके पेट पर बनी हुई है क…

बरबादी का भागीदार

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मेरी पास पुख्ता वजह है सिर्फ अपने आप से नाराज हो जाने की मगर मुझे अब तक सिखाया यही गया है कि मिल जुल कर करने से काम आसान और बोझ हल्का हो जाता है। इसलिए कुछ नाराजगी थोप देता हूँ तुम्हारे ऊपर, कुछ तुमको भी बना लेता हूँ मेरी इस बरबादी का भागीदार। 
मैं एक गुपचुप डायरी लिखता हूँ
ईश्वर का नाम लेकर
ताकि लिख सकूँ, सही सही ब्योरे।

उस डायरी में लिखता हूँ
कि आंसुओं की भी बन सके बेड़ी
तुम भी गिर पड़ो मुंह के बल कभी, मेरी ही तरह।

कहो, आमीन।
* * *

एक दिन आप रो रहे हों
महबूब के घर की खिड़की के सहारे बैठे हुये
और अंडे को फ्राई करते हुये आपका महबूब सोचे
कि ये किसी मुर्गे के रोने की आवाज़ है।

कि अक्सर इसी तरह की बेखयाली के साथ
मेरे महबूब, तुमने भी किया है प्यार मुझसे।
* * *

मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया जीवन में
जिसे मैं बता सकूँ अपने बच्चों को।

तुम्हारे बारे में बताना नहीं चाहता हूँ कुछ भी।
* * *

न्याय के लिए कटघरे में खड़े हुये
कितना असहाय हूँ मैं

कि जो भी बातें मालूम हैं मुझे, सिर्फ तुम्हारा बचाव करती हैं।
* * *

ये सिर्फ उसी आदमी का काम न था
मेरी भी कुछ रज़ा थी शामिल, अपनी इस बरबादी में।
* * *

कई बार हम राजनैत…

कविता, दिल की नुमाइश है

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कोई याद है, नृत्य में मग्न। रिद्म में चुन लेती है कोई भी शब्द और सम्मोहन के आँगन पर उतर आती है।मैं देखता हूँ पारदर्शी वर्तुल के भीतर से दुनिया को, खोजता हूँ अपना महबूब। जो खो गया है मेरे ही भीतर की पेचीदा गलियों में। एक तमाचा वक़्त नाम का। एक उपेक्षा भरी नज़र है जैसे कोई बेहद नुकीला भाला। एक मेरा प्रेम है, ढाल बन कर इस सबके बीच, इस सबसे लड़ता हुआ। ये मैं हूँ या शायद ये तुम हो।
और उसने तय किया चुप बैठूँ
इसलिए कि
ज़िंदगी को बरदाश्त नहीं होती चुप्पी
अगर वो ज़िंदगी है तो।

महबूब भी करेगा बरदाश्त कब तक
अगर वो महबूब है तो
* * *

ज्यादा उम्मीदें न रखो
ज़िंदगी की खस्ता हाल झोली से

एक महबूब की तस्वीर का बोझ तो उठाया नहीं जाता
अक्सर रो पड़ते हो उसे देख कर।
* * *

खोज लाओ साहस का वो टुकड़ा
जिसने पहली बार देखा था,
कंधों को चूम रहे बालों वाली लड़की को।

वरना प्रेम में सिर्फ डरते हुये ही जीते हैं लोग।
* * *

उस महबूब की उदासी के बारे में न लिखना कुछ
जिसने भर ली थी हामी कि अब और न करूंगा मुहब्बत

लिखना मुहब्बत से बेदिली की वजह क्या थी।
* * *

मेरी कोहनी पर गिर रही है धूप
मेरे पाँवों के प…

कार की सीट पर बैठा हुआ है एक हिरण

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कई शामों से हर शाम कुछ लिखने को दिल मचलता रहता है। कल कुछ दोस्तों को आवाज़ दी और उनको सुनाई ये बातें और फिर उठ गया ये कहता हुआ- रेगिस्तान के इस छोर पर एक मुल्ले ने अपने ख़ुदा के आगे दुखड़ा रोना शुरू कर दिया है, मैंने भी कुछ बेवजह की बातें कर ली है और अब वक़्त हो चला है उपदेशक की बातों को भूल कर बाज़ार की उस गली का चक्कर लगा आने का, जहां मिलती है बेअक्ल होने की दुआ... 
ज़िंदगी ने कहा है कि खुश रहा करो तो उसका हुक्म बजा लेते हैं।

मुझे यकीन ही नहीं था इस बात पर
कि कोई तुमसा मिल जाएगा ज़िंदगी के रास्ते में

चाहे तब हँसाए, चाहे तब रुलाये।
* * *

एक सुहानी शाम को
बूढ़ा आदमी मिलता है गुलाबी पंखों वाली परी से
और देख कर मुसकुराता है.

परी भी शरमा कर छिप जाती है
एक नौजवान के पीछे
उसे देख कर फिर मुसकुराता है बूढ़ा आदमी
एक सुहानी शाम को....
* * *

सब रोज़गार दफ़्तरों में भरे रहते हैं
रजिस्टर नाम और पतों से
मगर प्रेम के लिए नहीं मिलता कोई उपयुक्त अभ्यर्थी।

कि बेवकूफ आवेदनकर्ता
अपनी आगे की ज़िंदगी जीना चाहता है सुख से।
* * *

शाम के चौकीदार से कहो
भोर के तारे तक जागना हो सकता है आसान

अगर वह पड़े सके कि…

किसी ओलिया की दुआ

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भौतिक दुनिया की जगह हम ख़यालों में ही बना लेते हैं ,अपने महबूब के साथ एक घर। उस घर में टांग लेते हैं चुप्पी के पर्दे और एक समानान्तर लोक में जीते जाते हैं। मन के भीतर के दरवाज़े के उस तरफ खुलने वाले घर का इस दुनिया में कोई निशान नहीं मिलता... मगर होता है आलसी सा एक प्रेम का बिरवा, न खिलता है न मुरझाता... प्रेम एक सबसे बड़ी दुविधा है।

खत जो लिखो महबूब को तो क्या लिखो उसमें?

खुशी की कैंची से कर रहा हूँ
कतरने सुंदर सुबह की
तुम्हारे नाम के सब अक्षर रख रहा हूँ दिल की टोकरी में।
* * *

श्याम परिंदे का, पर टूट गिरे
उजली सी कोई बूंद छू जाए उसे

मुझे रंगों के कंट्रास से सम्मोहन है
और छूना है
तुम्हारे गालों को किसी नाजुकी से।

कुछ न हो तो मुस्कुरा ही दो, कि सुबह खिली है।
* * *

क्या तुमने इस सुबह का चेहरा देखा है
क्या तुम भी पड़ गए हो मेरी ही तरह इसके प्यार में।

कितने तो लोग प्यार से बुलाते हैं तुमको कितने ही नाम से
क्या मैं भी रख दूँ तुम्हारा नाम इस सुबह की शक्ल से मिलता जुलता।
* * *

रात उसने सीने से लग जाने दिया होगा
किसी ओलिया की दी हुई दुआ को
सुबह जागती होगी उसकी वेद मंत्र से ।

इस …

तुमको ही बना लेता हूँ शराब

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कल की रात से पहले की रात मुझे ये बताने आई थी कि तनहाई के उतरने से पहले मन के आँगन में उतरती है स्मृतियों की अनगिनत पंखुड़ियाँ...

[1]
वो जो ज़रा मुड़ा हुआ सा डंठल है
हिस्सा है, मेरे ताज का।

हाँ मैं बेंगन हूँ उसके प्यार में डोलता, हर दिशा में।
* * *

[2]
नायक को सुनाई दिये कई सारे शब्द समूह
उसने क्रिया, प्रतिक्रिया और परिणाम तक बनाए रखी
अपनी मुख मुद्राएं यथोचित।

मैं पड़ गया तुम्हारे प्यार में और भूल गया सब कुछ।
* * *

[3]
हमने खुद को तैयार किया
सबसे बुरे हालत के लिए
और प्यार को रख लिया किसी ढाल की तरह।

जब तक गिरती रही बारिश की बूंदें ढाल पर
मुसलसल आती रही प्रेम गीत की आवाज़।
* * *

[4]
अगर सिर्फ अच्छे ही होते लोग
दुआओं के सहारे ही चल रहा होता निज़ाम

तो हमको तनहाई के सलीब पर कोई लटकाता किसलिए।
* * *

[5] क्या फर्क पड़ता है इस बात से
कि उस देश का नाम क्या है?

हम जहां कहीं होते, कर ही रहे होते प्रेम।
* * *

[6]
खूब सारे प्रेम के लिए
चाहिए एक अदृश्य तार जिस पर लटका रहे यकीन।

नफरत का बुत तो
ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता, सच की ज़मीन पर भी।
* * *

[7]
कोई बात नहीं , अंधेरा बना …

दीवानगी की बातें मगर बेवजह

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अब कुछ ताज़ा बेवजह की बातें कि मौसम का रथ सजा हुआ है सुंदर फूलों से, मैं खुश भी हूँ और नशे में भी, मैं बरबाद भी हूँ और आबाद भी और बेवजह की बातें करने को ज्यादा अक्ल कहाँ चाहिए किसी को भी... ज़िंदगी की फेरी हुई एक नज़र काफी है।

[1]
नहीं दिखाई देगा कोई अक्स
आता हुआ दीवार के इस ओर
दुनिया से डरे हुये छुप कर हम करते रहेंगे इंतज़ार।

हम बने ही इंतज़ार के लिए हैं।
* * *

[2]
और इसका कोई हिसाब नहीं है
कि मैंने कितना प्यार किया है

जीवन की तमाम जटिलताओं में
जो चुना जा सकता था आसानी से वह था सिर्फ तुम्हारा नाम।

बाद इसके आसान हो गया ये जीवन
कि अब न मरना है न ही कोई जीना।
* * *

[3]
मैं बैठा रहा
रेत के किनारे मगर रेत ही पर।

जैसे तुम से दूर, तुम्ही के पास।
* * *

उसने बताया
कि कौन सचमुच करता है मुझसे प्यार ।

फिर वो रोने लगा, जाने किसकी याद में।
* * *

[4]
हम कभी जुदा न होंगे
हमारे बीच बह रही होगी समय की नदी।

तुम उस पार रोना, मैं इस पार रोऊँगा।
* * *

[5]
जब तुम्हें ज़रूरत हो प्यार की
तब याद करना मेरी बात
कि प्रेम रूह से किया जाता है, देह नाशवान है।

और मैंने चाहा कि फोड़ लूँ ये रोत…

किताबें कुछ कहना चाहती हैं।

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सुबह के ग्यारह बज चुके थे। प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर तीन से बाहर निकलते ही पाया कि एक लंबी कतार पुस्तक मेले में प्रवेश के लिए प्रतीक्षारत है। मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने से पहले दिखने वाला ये बेजोड़ नज़ारा पुस्तकों से प्रेम की खुशनुमा तस्वीर था। मैंने ग्रीन पार्क से मेट्रो पकड़ी थी। कनाट प्लेस, जिसे राजीव चौक कहा जाता पर बदल कर प्रगति मैदान आया था। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा हर दो साल में आयोजित होने वला विश्व पुस्तक मेला इस साल से हर साल आयोजित हुआ करेगा। इस छोटी होती जा रही ज़िंदगी में दो साल इंतज़ार करना किसी भी पुस्तक प्रेमी के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा जैसा होता होगा। कई सारी कतारों में खड़े हुये अंदर जाने के लिए टिकट पा लेने का इंतज़ार करते हुये लोग, पढे लिखे संसार का रूपक थे। वे अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ आए थे। मौसम ज़रा सा ठंडा था लेकिन घर पहुँचने में दे हो जाने की आशंका के खयाल से सबने स्वेटर और जेकेट पहने हुये थे। वह रंग बिरंगा संसार हर उम्र के लोगों से बना हुआ था। मैंने चाहा कि मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने से पहले इस दृश्य को खूब जी…

धूप के बियाबाँ का दरवाज़ा

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सुबह के पाँच बजे हैं। किसी करवट में टूट गयी नींद की कोमल पंखुड़ी। किसी झौंके ने छू लिया बदन। बंद घरों में रास्ते नहीं होते इसलिए कोई गुज़रा होगा, दिल या दिमाग के रास्ते। सहूलियत के प्लास्टर से नहीं चढ़ता प्रेम पर कोई कवच। वह सदा के लिए अनछुआ है, अचरज से भरा और व्याकुल...
जी चाहता है
आपको एक प्रेम कहानी सुनाऊँ .

मगर जाने देता हूँ
कि उसके बारे में फिर जाने क्या क्या कहना होगा।
* * *

मिलना इक बार
ज़रूरी है कि तन्हा हो सकूँ।

सोचूँ तेरे आने का क्या, जाने को तेरे क्या कहूँ।
* * *

वहाँ सब तरफ थीं दरारें
कुछ जाहिर, कुछ जाहिर होने से ज्यादा
गहरी पसरी हुई थी चुप्पी,
कोई इक खूबसूरती से जाने कैसे चटक रहा था।

इस ठहरे हुये से मौसम में
मैं खुद को देखता हूँ, मैं खुद को सोचता हूँ।
* * *

स्मृतियों का महीना
धूप के बियाबाँ का दरवाज़ा खुलने से
पहले के दिन।
* * *

कुहासे में स्वरों का वृंद
जीवन यात्रा का सम्मोहन।

रेगिस्तान की
शीत भरी सुबह में
एक परिंदा
चुप।

भोर, अलसाई हुई, वलय निद्रा का।

तुम कहीं नहीं, तुम ही हर कहीं।
* * *

मुझे नहीं मालूम,
उस बियाबाँ में
कैसा होता है, सफ़र ज़िंदगी का।

बुझ चुके हसरतों क…

और दर्द है जैसे...

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मौसम की नई कोंपलें फूटती रहती हैं और मैं नए दिनों को उदासी की तह देता जाता हूँ। खुशी की वजहों के दिन दोहराए नहीं जा सकते हैं। वे दिन अपने अनूठेपन के साथ कुछ इस तरह आते हैं कि उनकी नकल कहीं नहीं मिलती। वे जाते भी इस तरह हैं जैसे बहुत देर से अटका हुआ कोई सिंदूरी रंग अचानक से टूट कर गिर गया हो पहाड़ के पीछे। किसी ने कहा कि तुम ज़िंदगी लेकर आए हो। मुझे लगा कि यही सबसे झूठी बात है कि मैं अपनी समझ से कुछ लेकर आता तो क्या एसी चीज़ लाता? मुझे इतना मालूम होता कि ज़िंदगी में इस तरह का कारोबार है तो कौन आता इस दरवाज़े? मैं फिर अपनी छत पर उतर रहे अंधेरे और उजाले के खेल को देखता हुआ सोचता हूँ कि चल फिर मुकम्मल हुआ एक दिवस। एक और दिन न जीने की तोहमत से बचे। 
एक दिन अचानक से मैंने अपनी हथेली को देखा। उसमें कुछ नहीं था। एक दिन स्टुडियो में किसी आरजे ने एक मेहमान विदुषी से कहा- "मेम मेरा हाथ भी देखिये" उन्होने उस नवयुवती का हाथ अपने हाथ में लेते हुये कहा- "इन हाथों से जैसा काम करोगे, भाग्य वैसा ही हो जाएगा" मैंने इस याद की रोशनी में पाया कि मैं उसी से घिरा हुआ हूँ जिसे जीने की काम…

अकेलेपन का राजमिस्त्री

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फुरसत आती रहे लौट कर कि हम देख सकें, फूलों को चलते हुये। सुनते रहें पत्थरों के दिल का गाना। लेटे रहें आसमान से आँखें लड़ाये हुये। बातें बेवजह...

उसके नाम के पीछे छिपा लेता हूँ
मैं अपना अकेलापन
कि इस दुनिया में कोई समझ नहीं सकता
भरे पूरे घर में भी हो सकता है कोई अकेला।

उस वक़्त तक के लिए
जब लिखा है, तुम्हारा आना ज़िन्दगी में।
***

रात के अंधेरे में अकेलेपन का राजमिस्त्री
धैर्य से चुनता जाता है फूटी हुई तकदीर की ईंटों से दीवार
मगर छन कर आती रहती है किसी बिछोड़े की आवाज़।

जिंदगी कांपती रहती है, किसी प्याले में भरी शराब सी।
***

लिख लूँ, अपने रोज़नामचे में
रेगिस्तान में आज दिन का हाल
कि ये दिन फिर न आएगा लौट कर।

रुई के फाहों से उड़ते रहे बादल
तुम्हारी शिकायतों जैसे
हवा सताती ही रही, तुम्हारी तरह आँखें फेर कर।

कि मैं लिख ही देता इसे एक बरबाद दिन
अचानक किसी के आने की आहट ने
मेरे गालों को खुशी से भर कर, लुढ़का दिया है कंधों तक।

मैं खड़ा हुआ हूँ छत पर
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में, ज़िंदगी को सजदा किए हुये।
* * *

कभी कभी मौसम आता है इत्रफ़रोश की तरह
तुम्हारी खुशबू गलियों म…

किसी शोरगर की तरह

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कोई आवाज़ न थी। कारीगर और मजदूर बारदानों में शोर और औज़ार एक साथ रख कर अपने घर चले गए थे। वीरानी थी। ज़िंदगी के हाल पर उदास ज़िंदगी थी। दीवारें पूछती थीं कि फिर करोगे मुहब्बत किसी वक़्त के छोटे से टुकड़े के साथ? मैंने कहा कुछ भी कर लूँगा बस रोने की इजाज़त दे दो। फिर बेवजह की बातें कि और कोई सूरत नहीं... 
उसके कंधे को छूकर आती हवा में
मैंने घोल दिये लरज़िश से भरे कुछ टूटे शब्द।

एक दिन श्याम रंग के भँवरे के टूट जाएंगे पंख
एक दिन गुलाबी फूल से झड़ जाएगी पत्तियाँ।

उस दिन से पहले, तुम एक बार फिर मिलना।
* * *

हसरतों की पगडंडियाँ कितनी सूनी होती है
कि एक आदमी को चलना होता है तनहा उम्र भर।

इस वक़्त हालांकि तुमने थाम रखा है, मेरा हाथ
सड़क के किनारे बसे हुये हैं ख़ानाबदोश
मगर हम बिछड़ जाएगे, वक़्त की धूल के गुबार में।
* * *

फूल की गरदन से ज़रा नीचे, उम्मीद किसी कोंपल की
जैसे मेरे दिल में तुम्हारा नाम
मगर कांटे जाने कहाँ से चुभते रहते हैं हर सांस के साथ।
* * *

तुमको सिर्फ इतना करना है
कि चीज़ों को रखना, उनकी शक्ल के हिसाब से
चीनी मिट्टी से बने गुलदानों के आस पास।

बाकी तुमसे प्रेम करन…

उस आखिरी घड़ी में

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उस पार घना अंधेरा, उजाला इधर भी नहीं कि कहीं जाना भी नहीं है और मुझे यहाँ रहना भी नहीं है। रोना नहीं है और रोये बिना जीने की सूरत भी नहीं। बोल पड़ूँ तो सुकून आए शायद मगर बात जो कहनी होगी उसे कहना भी नहीं है। यूं तो ज़ब्त करके मैं हंस भी लूँ मगर यूं सोच-सोच कर कुछ करना भी नहीं है। 
उस खाली खाली से मंज़र में कुछ घड़ी बाद बिछड़ ही जाना था और जीना था कई साल तक मरने की उम्मीद के बिना। सड़क चलती ही नहीं थी, लोग रुकते ही न थे। सांझ मुरझाई जाती थी, कदम टूटे जाते थे। एक मैं था, बिखरी बिखरी सी आती आखिरी सांस की तरह चलता हुआ। क्या सबब कि इस तरह मिला करे कोई, छोड़ जाए तन्हा, धूल भरे रस्तों में। 
खिड़की से बाहर देखूँ तो डर लगता है, कमरे के भीतर एक दोशीजा उदासी है। पगलाया हुआ दरवाज़े से बाहर आता हूँ, फरवरी का महीना है और आसमान पर फिर बादलों का फेरा है। दीवार का सहारा लिए खड़े जाल के पेड़ पर बैठी चिड़िया किसी जल्दी में है शायद और मेरे पास कोई काम ही नहीं है। 
सीने के तलघर में उतर आई है एक भारी सी चीज़। रह रह कर मुझे उकसाती है कि दौड़ने लगूँ। रेगिस्तान में प्यासे हिरण की तरह टूट जाए आँखों में बसी पा…

महबूबा, अजमेरी अंडे कुछ नहीं होते

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शाम बीत गयी है। शाम का इंतज़ार भी है। कोई नहीं है, कोई है भी। यकीन ज़िंदगी पर नहीं और उसी ज़िंदगी के भरोसे जीए जा रहा हूँ। तुम न आओगे कभी इसी बात पर रोता हूँ और सुना है कि कुछ भी कायम नहीं है। तो क्या तुम आओगे एक दिन, क्या मैं फिर से देखूंगा चाँद अभी डूबा नहीं, सुबह अभी खिली नहीं। जाने दे आज बेवजह की सबसे उबाऊ बातें।

ओ महबूबा, मैं कहना चाहता हूँ
कि इस वक़्त आ गए हैं बादल बहुत सारे आसमान में
इसी वजह से उतार दिया है हरे रंग का स्वेटर।

तुम्हारे बिना
जाने किस शाख पर भूल गया है मौसम, रंगों की ज़ुबान को।
* * *

एक बार बात करो
अपने सब सुखों के बीच इस इकलौते दुख को सुन लो
* * *

तुमने कभी नहीं कहा
कि कोई उम्मीद है
मैंने कभी नहीं सोचा कि कोई उम्मीद है।
* * *

उसने तोड़ लिया इंद्र के सिंहासन का एक पाया
सोने के पाये से खरीदा पुष्पक विमान
और उतर गया एक गुलाब के फूल बेचने वाले के पास।

फिर रात के अंधेरे में कहा
सितारों क्या तुम अभी बने रहोगे वहीं, जहां रोज़ होते हो।
* * *

ये कितना अच्छा था
मैंने खूब सारी गलतियाँ की, तुमने उनको परखा
और आखिर हम किसी नतीजे पर नहीं आए।

इसी बहाने कुछ और…