February 28, 2013

गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में


जब आप वक़्त का टूटा हुआ आईना देखते हैं तब पाते हैं कि आपके माथे की सलवटों में तकलीफ़ों के निशान कम और उन नेक इन्सानों के नाम की लकीरें ज्यादा है। वे इंसान जो आपको बचा कर ज़िंदगी के इस मुकाम तक लाये हैं। मगर मुहब्बत और ऐसी ही दूसरी बरबादियों की लकीरों के पार जाकर वे नाम पढ़ने के लिए चाहिए एक उम्मीद की रोशनी।

वे मजे मजे के सात आठ दिन
गुच्छे में बंधे हुये फूल गुलाब के
किसी फोन के बहाने बार बार, सूरत चुपके से देख लेना चाँद की।

सुबह नंगे पाँव फर्श पर चलते हुये सुनना
रात की चादर में गुम, सब लड़ाइयाँ
कि फिर से गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में।
* * *

ये दुनिया इसीलिए इतनी सुंदर है
कि इसके भीतर छिपे
रहस्यों को आप कभी जान नहीं पाते हैं।

मनुष्य का मन
राख़ के नीचे छिपा हुआ अघोरी का बदन है
जादू और भय से भरा हुआ।
* * *

प्रेम डरता रहता है,
एक रात की सुकून भरी नींद से
और सुबह आती है किसी खोये हुये ज़माने की
चादर के नीचे से निकल कर अजनबी की तरह।

मगर हम करते जाते हैं, प्रेम।
* * *

वह इतना स्ट्रेट फारवर्ड था
कि उसके तरीकों से क्रूरता की बू आती
हालांकि उसने सिर्फ ये तय कर रखा था
कि ज़िंदगी को फीलिंग्स के गारे से नहीं भर कर रखना चाहिए।

उसकी बार में मुझे खुद ही सर्व करना पड़ता था प्रेम
हालांकि वह भी था किसी कामगार की तलाश में
कि मुख्य दरवाज़े की हत्थी पर लटका हुआ था एक छोटा बोर्ड।

बीयर बार के लिए ज़रूरत है कुछ रूहों की
जो अदृश्य होते हुये भी बन सके बेहतरीन साकी।
और उनको चाहिए कि वे ऊंची फ्रिल वाली स्कर्ट पहने होने के बावजूद
मार्क्स के मजदूरों की तरह न उतर आए हड़ताल पर।

आवेदन करने से पहले
ईश्वर के लिए हमारी हालत के बारे में भी ज़रूर सोचिएगा
कि हमें नहीं चाहिए अपमान जैसी रोज़ रोज़ की ओछी शिकायतें।

जिस तरह अमेरिका सबका बाप है, उसी तरह ग्राहक हमारे लिए देवता है।
* * *
[तस्वीर सौजन्य : नवीन जाजुन्दा] 

February 25, 2013

मेरे पतन के कारण


ऐसा भी कहीं होता है कि जो खिलता हो उसका बीज न हो। इसलिए प्रेम और दुख के भी बीज होते हैं। उनको भी चाहिए होता होगा कोई मौसम अपने रूपायन के लिए। मैंने एक ग्रीन हाउस बना रखा है। इसमें फूल रही पौध को लेकर संशय है कि बोता तो मैं प्रेम हूँ मगर उगता सिर्फ दुख ही है। इस पैदावार के सिलसिले को, इस काम को कुछ मुल्तवी किया जाने का सोचा है। इस फसल के ये कुछ ताज़ा फूल हैं।


मैंने कहा कि हम दो अलग अलग ही दिखते हैं सुंदर
कि दो सुंदर रंग मिल कर बन जाते हैं एक काला रंग।

मैंने सोचा कि उसने जवाब में कहा है
मैं बसा लूँगी इस रंग को अपनी आँखों में
मगर तब तक बावर्ची समेट लेता खाना दोपहर का
इसलिए वह चली गयी बिना कुछ कहे।
* * *

फासला था बहुत
और लोग भी कहते जाने क्या क्या

इसलिए उसने कहा कि
आदमी का सबसे अच्छा आविष्कार है, डिवाइडर
तुम उस तरफ चलो, मैं इस तरफ चलूँगी।
* * *

उसने कहा कि प्रेम रूह से होता है
इसी बात के जवाब में मैंने नहीं दिया सिर्फ एक मेसेज का जवाब
वो शायद रो पड़ी, न जाओ छोड़ कर।

मैंने सोचा कि कहाँ गए कृष्ण, राधा क्या हुई
मगर उसे न होगी कभी खबर मेरी तड़प की।

* * *

उसके पेट पर बनी हुई है कैसी धारियाँ
उसकी पीठ पर क्या बचा है कोई निशान चोट का
उसे देखो अगर पीठ के बल तो कैसा दिखता है
उसे किसी ने नोच लिया था कहाँ से?

मैंने इस सब को दबा दिया है अपनी याद के तहखाने में
जगतपुरा में ज्ञान विहार के सामने बने हुये
ज़ेबरा क्रॉसिंग को भूल जाने के लिए, कर सकता हूँ कुछ भी।
* * *

मैं गधा हूँ
जिसे मालूम है कि किस तरह किया जाता है
लेपटोप के की बोर्ड से टाइप।

मेरे गधा होने पर शक सिर्फ इसलिए है
कि एक गधा कैसे दुखा सकता है किसी का दिल कुछ ही शब्दों से।
* * *

और आप सब लोग
न सोचना मेरे महबूब के बारे में कुछ बुरा

कि वह खुद है दुख का इक दरिया है
मैं भी उसी से पाता हूँ रोशनी दर्द की।
* * *

रावण के पतन के बारे में हो सकते हैं असंख्य मत
उसका छद्म रूप धारण कर धर्म को अपमानित करना
शिव के श्रेष्ठ भक्त का घमंड से भर जाना
अपने उदार और विवेकी भाई के अधिकारों को हड़प जाना
पराई स्त्री को विवाह जैसे अतुल्य और श्रेयस्कर बंधन में बांधने का सपन देखना
युद्ध में अपने निर्दोष परिजनों को आगे कर देना
अपने भीतर छिपे जीवन कलश पर मूढ़ता से विश्वास करना।

मेरे पतन के कारण जब भी कोई गिनाए
तुम उदास मत होना
मैंने खुद ही चुना था रास्ता प्रेम करते हुये फरेब के हाथों मारे जाना।
* * *

February 24, 2013

बरबादी का भागीदार


मेरी पास पुख्ता वजह है सिर्फ अपने आप से नाराज हो जाने की मगर मुझे अब तक सिखाया यही गया है कि मिल जुल कर करने से काम आसान और बोझ हल्का हो जाता है। इसलिए कुछ नाराजगी थोप देता हूँ तुम्हारे ऊपर, कुछ तुमको भी बना लेता हूँ मेरी इस बरबादी का भागीदार। 

मैं एक गुपचुप डायरी लिखता हूँ
ईश्वर का नाम लेकर
ताकि लिख सकूँ, सही सही ब्योरे।

उस डायरी में लिखता हूँ
कि आंसुओं की भी बन सके बेड़ी
तुम भी गिर पड़ो मुंह के बल कभी, मेरी ही तरह।

कहो, आमीन।
* * *

एक दिन आप रो रहे हों
महबूब के घर की खिड़की के सहारे बैठे हुये
और अंडे को फ्राई करते हुये आपका महबूब सोचे
कि ये किसी मुर्गे के रोने की आवाज़ है।

कि अक्सर इसी तरह की बेखयाली के साथ
मेरे महबूब, तुमने भी किया है प्यार मुझसे।
* * *

मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया जीवन में
जिसे मैं बता सकूँ अपने बच्चों को।

तुम्हारे बारे में बताना नहीं चाहता हूँ कुछ भी।
* * *

न्याय के लिए कटघरे में खड़े हुये
कितना असहाय हूँ मैं

कि जो भी बातें मालूम हैं मुझे, सिर्फ तुम्हारा बचाव करती हैं।
* * *

ये सिर्फ उसी आदमी का काम न था
मेरी भी कुछ रज़ा थी शामिल, अपनी इस बरबादी में।
* * *

कई बार हम राजनैतिक चुनाव की तरह
हार जाते हैं दिल
उम्र भर कुछ न कह सकने के हाल में बंधे हुये।
* * *

कई बार कुछ चीज़ें सिर्फ शोक संदेश की तरह
खड़ी होती हैं हमारे सामने
जबकि हम सोच रहे होते हैं किसी नयी शुरुआत के बारे में।

जैसे कि दिल का धड़कना भी ले आता है, बरबादी उम्र भर की।
* * *

ये तय है कि हर रिश्ते को बनाने के लिए
चाहिए थोड़ी सी पूंजी
जैसे मुस्कान, स्पर्श की कामना या कुछ ऐसा ही।

प्रेम के लिए सब कुछ पड़ जाता है, कम।
* * *

एक गरीब आदमी
प्यार के व्यापार में कूद कर कर देता है
सारा खेल तबाह।

मार्क्स ने इसके बारे में कुछ नहीं लिखा है
पूंजी की पहेली में
और सब कुछ क्यों लिखना चाहिए मार्क्स को ही।
* * *

ये सब तुम लिख नहीं रहे हो
बल्कि तुम्हें चुना गया है इस काम के लिए।

खरगोश ने महुआ के पेड़ की तरह
दिल पर लगाया एक और चीरा गर्व से
ताकि सूख न जाए दिल की दवात।

ईश्वर ने झुक कर सलामी दी खरगोश को
उसकी इस प्रतिबद्धता के लिए।
* * *

February 23, 2013

कविता, दिल की नुमाइश है


कोई याद है, नृत्य में मग्न। रिद्म में चुन लेती है कोई भी शब्द और सम्मोहन के आँगन पर उतर आती है।मैं देखता हूँ पारदर्शी वर्तुल के भीतर से दुनिया को, खोजता हूँ अपना महबूब। जो खो गया है मेरे ही भीतर की पेचीदा गलियों में। एक तमाचा वक़्त नाम का। एक उपेक्षा भरी नज़र है जैसे कोई बेहद नुकीला भाला। एक मेरा प्रेम है, ढाल बन कर इस सबके बीच, इस सबसे लड़ता हुआ। ये मैं हूँ या शायद ये तुम हो।

और उसने तय किया चुप बैठूँ
इसलिए कि
ज़िंदगी को बरदाश्त नहीं होती चुप्पी
अगर वो ज़िंदगी है तो।

महबूब भी करेगा बरदाश्त कब तक
अगर वो महबूब है तो
* * *

ज्यादा उम्मीदें न रखो
ज़िंदगी की खस्ता हाल झोली से

एक महबूब की तस्वीर का बोझ तो उठाया नहीं जाता
अक्सर रो पड़ते हो उसे देख कर।
* * *

खोज लाओ साहस का वो टुकड़ा
जिसने पहली बार देखा था,
कंधों को चूम रहे बालों वाली लड़की को।

वरना प्रेम में सिर्फ डरते हुये ही जीते हैं लोग।
* * *

उस महबूब की उदासी के बारे में न लिखना कुछ
जिसने भर ली थी हामी कि अब और न करूंगा मुहब्बत

लिखना मुहब्बत से बेदिली की वजह क्या थी।
* * *

मेरी कोहनी पर गिर रही है धूप
मेरे पाँवों के पंजों पर है छांव
कि उन पर अपने पंजे रख कर खड़ा हुआ है महबूब।
* * *

मैंने दोपहर तय किया कि धूप में तप कर मर जाऊँ
शाम को चाहा कि अचानक घिर आए अंधेरा और गिर पड़ूँ
रात हो चुकी है और सोचता हूँ कि
किसी बंदूक कि गोली रास्ता भूल कर आ लगे मुझे।

मगर आज का दिन ही खराब है।
* * *

तुम उसकी हंसी के बारे में कुछ नहीं जानते
तुम नहीं जानते कि वह बोलते समय कैसी दिखती है
तुम नहीं जानते कि उससे प्रेम करने का अंजाम क्या है

मैं जो जानता हूँ वह कोई और न जाने तो अच्छा है।
* * *

प्रेम का नहीं किया जा सकता आयात
प्रेम का निर्यात भी संभव नहीं है

दिलों की बरबादी के लिए रहना होता है भाग्य के भरोसे।
* * *

कोमल सिद्धान्त रखना चाहिए ज़िंदगी के बारे में
कि किसी रिश्ते को बनाने के लिए
क्या क्या चीज़ें लगाई जा सकती है दांव पर।

किसी को चूमना और उसके साथ रहना
वक़्त और ज़रूरत की बात है, दिल से लगाने की नहीं।
* * *

आप बुन रहे होते हैं प्रेम से दिन का कोई हिस्सा
किसी नयी बुनावट की तलाश में झाँकते रहते हैं उसकी आँखों में
और उसे लगता है कि मुश्किलें कहीं आस पास ही हैं

कि खुशी असल में अपनी पीठ के पीछे छिपा कर लाती है डर को।
* * *

और एक दिन गहरा उदात्त नशीला चेहरा मार गिरता है मुझे
मैं भूल जाता हूँ कि फीनिक्स की तरह हर बार उठा हूँ ऐसी ही राख़ से

रोने के लिए आदमी अपने पास रखता है, हज़ार बहाने।
* * *

असल आनंद है प्रेम का अनुपस्थित होना
असल क़ैद है रिश्तों को बचाने के जाल में उलझ जाना

और कोई दुख नहीं है सिवा इसके
कि असल चीजों को उद्घाटित करने से डरता है दिल।
* * *

प्रेम, कुल्हाड़ी की तरह है
पत्थर से टकरा कर होता है आग बबूला

दिल की क्यारी में खिली
टहनियों को काटते हुये रहता है गीला गीला।
* * *

उसने मुझे लिटा दिया सम्मोहन के आसान पर
दिल की गहरी जड़ों पर डाली पैनी निगाह
औजारों से टटोल कर देखा दायें बाएँ
चिंता की लकीरों को माथे पर करीने से रखते हुये कहा।

बदनसीब आदमी, तुम कोई दाँत का दर्द ही मांग लाते ख़ुदा से।
* * *

लगभग हर बात शुरू और खत्म होती है
सिवा इसके कि मैंने तुम्हें देखा था, मुसकुराते हुये।
* * *

जिस तरह तुमने वक़्त निकाल कर किए थे फोन मुझको
उसी तरह अब वक़्त निकाल रहा है बदला मुझसे।
* * *

महबूब, बिना कान वाला खरगोश होता है
उसे संभाला नहीं जा सकता आसानी से।
* * *

और सोचो उसके बारे में
जिसके बारे में, मैं इतनी बेवजह की बातें करता हूँ

और सोचो कहाँ से आती है
इतनी हिम्मत, खुद का दिल दुखाने की।
* * *

February 20, 2013

कार की सीट पर बैठा हुआ है एक हिरण


कई शामों से हर शाम कुछ लिखने को दिल मचलता रहता है। कल कुछ दोस्तों को आवाज़ दी और उनको सुनाई ये बातें और फिर उठ गया ये कहता हुआ- रेगिस्तान के इस छोर पर एक मुल्ले ने अपने ख़ुदा के आगे दुखड़ा रोना शुरू कर दिया है, मैंने भी कुछ बेवजह की बातें कर ली है और अब वक़्त हो चला है उपदेशक की बातों को भूल कर बाज़ार की उस गली का चक्कर लगा आने का, जहां मिलती है बेअक्ल होने की दुआ... 

ज़िंदगी ने कहा है कि खुश रहा करो तो उसका हुक्म बजा लेते हैं।

मुझे यकीन ही नहीं था इस बात पर
कि कोई तुमसा मिल जाएगा ज़िंदगी के रास्ते में

चाहे तब हँसाए, चाहे तब रुलाये।
* * *

एक सुहानी शाम को
बूढ़ा आदमी मिलता है गुलाबी पंखों वाली परी से
और देख कर मुसकुराता है.

परी भी शरमा कर छिप जाती है
एक नौजवान के पीछे
उसे देख कर फिर मुसकुराता है बूढ़ा आदमी
एक सुहानी शाम को....
* * *

सब रोज़गार दफ़्तरों में भरे रहते हैं
रजिस्टर नाम और पतों से
मगर प्रेम के लिए नहीं मिलता कोई उपयुक्त अभ्यर्थी।

कि बेवकूफ आवेदनकर्ता
अपनी आगे की ज़िंदगी जीना चाहता है सुख से।
* * *

शाम के चौकीदार से कहो
भोर के तारे तक जागना हो सकता है आसान

अगर वह पड़े सके किसी तंगदिल औरत के प्यार में।
* * *

अपनी आँखें बंद करो और
उछाल दो ज़िंदगी का सिक्का
फिर देखो कि क्या लिखा है तुम्हारे भाग में?

जबकि एक तरफ लिखा है प्रेम
दूसरी तरफ उसी का पर्यायवाची दुख।
* * *

वो सुबह उठते ही चूमता था बच्चों को
दिन भर प्यार भरी निगाह से देखता साथ काम करने वालों को
रात को बीवी को बताता कि तुम कितनी हसीन हो
और फिर खुश होकर सो जाता था बदनसीब आदमी।

ऐसे मसख़रों की ज़िंदगी के खाते में
ईश्वर को ज़रूर लिखनी चाहिए एक महबूबा,
कि रोना भी एक खूबसूरत काम है।
* * *

मौत से भी बुरा होता है मौत का न आना

लेकिन उससे भी बुरा है
किसी ठुकराये हुये प्रेम को इल्तजा करते जाना
पड़े रहना उसकी फेरी हुई नज़र की ठोकरों में।
* * *

कि शाम तक आते आते
बहुत पीछे छूट जाती है सुबह

लेकिन कुछ सुबहें सताती रहती हैं उम्र भर
कि किसी को नहीं चूमना चाहिए सुबह की नींद में।
* * *

और तुम सौंप दो खुद को मुझे
ये कह कर ईश्वर ने चुरा लिए
जाने कितने ही लोगों से उनके प्रेमी ।

ईश्वर के लिए कोई रहम नहीं है मेरे दिल में।
* * *

मेरा प्याला भर रहा है उसके नाम के अक्षरों से
अफसोस ये है कि ज़िंदगी बीतेगी उसी के बिना।
* * *

और शाम की गंध
उतर आती है, उसकी बाहों के किनारों से
बुझ जाता है साया धूप का,
सब कुछ चल पड़ता है अपनी राह पर।

दुख का क्या है, लंबी तो जिंदगी ज़िंदगी भी नहीं होती।
* * *

कुछ लोगों ने ज़िंदगी को बना लिया फुटबाल
और उससे खेलते रहे उम्र भर
कुछ लोगों ने ज़िंदगी को रख लिया अखरोट जैसे खोल में बचा कर

लेकिन आखिर दोनों नष्ट हो गई।
* * *

ज़िंदगी एक खूबसूरत इंद्रधनुष नहीं है

वह एक बांझ दाई है
बेरहम आँख से देखती है प्रेम को।

तोड़ती रहती है प्रेम के नए बीजों को
पानी देती है सूख कर ठूंठ हुई स्मृतियों को।
* * *

हवा नहीं है मेरे साथ
कि इस तरफ नहीं झुकती कली,
जिस तरफ बैठा हुआ हूँ मैं।

गुमशुदा किसी खयाल में
और साथ में किसी और के।
* * *

चिड़ियाघर में तारबंदी में घिरा हिरण
सोचता है खुले मैदान, हरी घास,
तलहटी की झड़ियों और शिकारी जानवरों के बारे में
आहिस्ता टहलता हुआ रुक जाता है,
नकली पेड़ की छिटपुट बिखरी छांव के पास
बिखरे गंदे पानी में अपना मुंह देखता हुआ।

लोहे की कंटीली बाड़ में
जिंदगी सताती है प्यास बन कर,
याद आती रहती हैं, जी ली गयी सब हसरतें
कि पोखर से पानी पीकर ज़िंदा लौट आना
महबूबा के पहलू से मर कर लौट जाना।

चिड़ियाघर के हिरण का दुख तुम्हें सुनाने से पहले
मैं देखता हूँ कि कार की सीट पर बैठा हुआ है एक हिरण।
* * *

वक़्त के ज़र्द पत्तों के बीच से आती है
किसी भूले हुये रंगीन सपने की आहट
फिर कभी उसकी आवाज़ का एक टुकड़ा
शोर मचाने लगता है गली में दौड़ते हुये नादान बच्चे की तरह।

फिर से बिखर जाती है संभली हुई ज़िंदगी।
* * *

कोई जगह नहीं थी
कोई वादा नहीं था, नहीं थी कोई आवाज़, भ्रम था।

या ये एक भ्रम है
कि कुछ किए बिना अनमना पड़ा हुआ
काट रहा हूँ सुबह की टहनी।

धूप के आते आते चला जाऊँ मुंडेर की छांव में,
एक पारदर्शी मुंडेर जो रोक नहीं पाती तुम्हारी याद की धूप।
* * *

February 18, 2013

किसी ओलिया की दुआ


भौतिक दुनिया की जगह हम ख़यालों में ही बना लेते हैं ,अपने महबूब के साथ एक घर। उस घर में टांग लेते हैं चुप्पी के पर्दे और एक समानान्तर लोक में जीते जाते हैं। मन के भीतर के दरवाज़े के उस तरफ खुलने वाले घर का इस दुनिया में कोई निशान नहीं मिलता... मगर होता है आलसी सा एक प्रेम का बिरवा, न खिलता है न मुरझाता... प्रेम एक सबसे बड़ी दुविधा है।

खत जो लिखो महबूब को तो क्या लिखो उसमें?

खुशी की कैंची से कर रहा हूँ
कतरने सुंदर सुबह की
तुम्हारे नाम के सब अक्षर रख रहा हूँ दिल की टोकरी में।
* * *

श्याम परिंदे का, पर टूट गिरे
उजली सी कोई बूंद छू जाए उसे

मुझे रंगों के कंट्रास से सम्मोहन है
और छूना है
तुम्हारे गालों को किसी नाजुकी से।

कुछ न हो तो मुस्कुरा ही दो, कि सुबह खिली है।
* * *

क्या तुमने इस सुबह का चेहरा देखा है
क्या तुम भी पड़ गए हो मेरी ही तरह इसके प्यार में।

कितने तो लोग प्यार से बुलाते हैं तुमको कितने ही नाम से
क्या मैं भी रख दूँ तुम्हारा नाम इस सुबह की शक्ल से मिलता जुलता।
* * *

रात उसने सीने से लग जाने दिया होगा
किसी ओलिया की दी हुई दुआ को
सुबह जागती होगी उसकी वेद मंत्र से ।

इस सुबह में
कई दिलों की प्रार्थना को छूकर आई हवा बह रही है।
* * *

ज़िंदगी जाने किस फूल की है कली
किस रंग में खिला हुआ उसका रूप है

मैं आवाज़ दूंगा तो
उस तरफ जाने किस तरह चटकेगी ये सुबह
इस तरफ जाने कैसे खिलेगा ये दिन नया नया।
* * *

अलसाए पंखों से छिटक कर
गिर पड़ी स्याह उदासी रात की
उड़ गए पंछी, चुगने एक नए दिन को।

मैं अब भी नीम नींद में और
एक तुम्हारा ख्वाब है, आधा जगा हुआ।
* * *

February 17, 2013

तुमको ही बना लेता हूँ शराब


कल की रात से पहले की रात मुझे ये बताने आई थी कि तनहाई के उतरने से पहले मन के आँगन में उतरती है स्मृतियों की अनगिनत पंखुड़ियाँ...

[1]
वो जो ज़रा मुड़ा हुआ सा डंठल है
हिस्सा है, मेरे ताज का।

हाँ मैं बेंगन हूँ उसके प्यार में डोलता, हर दिशा में।
* * *

[2]
नायक को सुनाई दिये कई सारे शब्द समूह
उसने क्रिया, प्रतिक्रिया और परिणाम तक बनाए रखी
अपनी मुख मुद्राएं यथोचित।

मैं पड़ गया तुम्हारे प्यार में और भूल गया सब कुछ।
* * *

[3]
हमने खुद को तैयार किया
सबसे बुरे हालत के लिए
और प्यार को रख लिया किसी ढाल की तरह।

जब तक गिरती रही बारिश की बूंदें ढाल पर
मुसलसल आती रही प्रेम गीत की आवाज़।
* * *

[4]
अगर सिर्फ अच्छे ही होते लोग
दुआओं के सहारे ही चल रहा होता निज़ाम

तो हमको तनहाई के सलीब पर कोई लटकाता किसलिए।
* * *

[5]
क्या फर्क पड़ता है इस बात से
कि उस देश का नाम क्या है?

हम जहां कहीं होते, कर ही रहे होते प्रेम।
* * *

[6]
खूब सारे प्रेम के लिए
चाहिए एक अदृश्य तार जिस पर लटका रहे यकीन।

नफरत का बुत तो
ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता, सच की ज़मीन पर भी।
* * *

[7]
कोई बात नहीं , अंधेरा बना रहने दो
प्रेम को चाहिए, ज़रा सी नमी होठों की।
* * *

[8]
कुछ चीज़ें पेट्रोल की तरह होती है दुनिया में
जैसे जलती हुई नफरत धकेलती रहती है प्रेम को और आगे।
* * *

[9]
और जब भी मैं यकीन करता हूँ उस पर
वो हो जाता है बेवफा।

जबकि भौतिकी में
ऐसा पढ़ाया नहीं गया मुझे किसी भी क्लास में।
* * *

[10]
यह कोई अलौकिक चमत्कार ही था
कि बिना जाने ही उस पर हो गया था यकीन।
* * *

[11]
हताशा एक तरह से
पर्यायवाची है, न चूम पाने का
अपने ख्वाब को।
* * *

[12]
वो जो सुनाता रहता है
किस्से बीते ज़माने के अनदेखे महबूबों के
अक्सर पड़ा होता है, उदासी के प्याले में।

मैं तुमको ही बना लेता हूँ शराब।
* * *

[13]
और दुनिया के लगभग सभी ज़रूरी काम
हो चुके हैं पूरे
बस एक बार मेरा तुमको चूम लेना रह गया है बाकी।
* * *

[14]
मुझे इस कल्पना पर भी है यकीन
कि हुआ करते थे आदम और हव्वा।

तुमसे मिलकर लगता है कितना नया नया।
* * *

[15]
मेरा दिल एक उम्मीद है
नक्षत्रों के पार, किसी आकाशगंगा के बीच।

तुम्हारे होने के पवित्र विचार सा।
* * *

[16]
शायद हर कोई पढ़ना चाहता है
अच्छे दिन के माथे पर लिखी हुई तदबीर

मैंने सोचा है किसी एक बुझती हुई शाम के बारे में
तुम्हारे चहरे से उतरती हुई आएगी एक लकीर नूर की।
* * *

[17]
यह तय नहीं है कि महबूब चूम लेगा झुक कर
हाँ मगर तय है कि ऐसा न किया तो वह रो रहा होगा कहीं।
* * *

[18]
मैं ईश्वर से लड़ना चाहता हूँ इस वक़्त
कि उसने क्यों नहीं रखा तुम्हारे दिल में मेरा नाम इकलौता।
* * *

[19]
इस साल की सोलह फरवरी की
खुशबू के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम था
कलेंडर में लिखी थी कुछ बासी और गैर ज़रूरी बातें।

बस ज़रा कल के लिए कोई उम्मीद छोड़ कर जाना तुम।
* * *

[20]
कविता
आकाश से गिरा, कोई उल्कापिंड नहीं
ये तेरे मेरे बीच की एक ज़रूरी बात है।

तुम हो, तो कविता भी है।
* * *

[पेंटिंग की तस्वीर : विंसलों होमर] 

February 16, 2013

दीवानगी की बातें मगर बेवजह


अब कुछ ताज़ा बेवजह की बातें कि मौसम का रथ सजा हुआ है सुंदर फूलों से, मैं खुश भी हूँ और नशे में भी, मैं बरबाद भी हूँ और आबाद भी और बेवजह की बातें करने को ज्यादा अक्ल कहाँ चाहिए किसी को भी... ज़िंदगी की फेरी हुई एक नज़र काफी है।

[1]
नहीं दिखाई देगा कोई अक्स
आता हुआ दीवार के इस ओर
दुनिया से डरे हुये छुप कर हम करते रहेंगे इंतज़ार।

हम बने ही इंतज़ार के लिए हैं।
* * *

[2]
और इसका कोई हिसाब नहीं है
कि मैंने कितना प्यार किया है

जीवन की तमाम जटिलताओं में
जो चुना जा सकता था आसानी से वह था सिर्फ तुम्हारा नाम।

बाद इसके आसान हो गया ये जीवन
कि अब न मरना है न ही कोई जीना।
* * *

[3]
मैं बैठा रहा
रेत के किनारे मगर रेत ही पर।

जैसे तुम से दूर, तुम्ही के पास।
* * *

उसने बताया
कि कौन सचमुच करता है मुझसे प्यार ।

फिर वो रोने लगा, जाने किसकी याद में।
* * *

[4]
हम कभी जुदा न होंगे
हमारे बीच बह रही होगी समय की नदी।

तुम उस पार रोना, मैं इस पार रोऊँगा।
* * *

[5]
जब तुम्हें ज़रूरत हो प्यार की
तब याद करना मेरी बात
कि प्रेम रूह से किया जाता है, देह नाशवान है।

और मैंने चाहा कि फोड़ लूँ ये रोती हुई आँखें
मगर ये उसने कहा नहीं था।
* * *
[आह मनोरोगी होना बड़ा तकलीफदेह काम है। सब्र आता नहीं उम्मीद जाती नहीं। खुद पर तरस खाकर कुछ आराम नहीं कर पाता हूँ। रेत की कच्ची पगडंडियों वाले शहर की एक शाम फिर से याद कर रहा हूँ कि तुमने कहा है मुझे यहाँ से थाम कर चलो...]

February 15, 2013

किताबें कुछ कहना चाहती हैं।

सुबह के ग्यारह बज चुके थे। प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर तीन से बाहर निकलते ही पाया कि एक लंबी कतार पुस्तक मेले में प्रवेश के लिए प्रतीक्षारत है। मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने से पहले दिखने वाला ये बेजोड़ नज़ारा पुस्तकों से प्रेम की खुशनुमा तस्वीर था। मैंने ग्रीन पार्क से मेट्रो पकड़ी थी। कनाट प्लेस, जिसे राजीव चौक कहा जाता पर बदल कर प्रगति मैदान आया था। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा हर दो साल में आयोजित होने वला विश्व पुस्तक मेला इस साल से हर साल आयोजित हुआ करेगा। इस छोटी होती जा रही ज़िंदगी में दो साल इंतज़ार करना किसी भी पुस्तक प्रेमी के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा जैसा होता होगा। कई सारी कतारों में खड़े हुये अंदर जाने के लिए टिकट पा लेने का इंतज़ार करते हुये लोग, पढे लिखे संसार का रूपक थे। वे अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ आए थे। मौसम ज़रा सा ठंडा था लेकिन घर पहुँचने में दे हो जाने की आशंका के खयाल से सबने स्वेटर और जेकेट पहने हुये थे। वह रंग बिरंगा संसार हर उम्र के लोगों से बना हुआ था। मैंने चाहा कि मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने से पहले इस दृश्य को खूब जी भर के देखता रहूँ। मैंने कई बार नाच गानों के कार्यक्रमों के लिए टिकट लेने की लाइंस भी देखी हैं। वहाँ लुच्चे और शोहदे अपने स्तर के अनुरूप व्यवहार करते हुये दिख जाते हैं। वहाँ सीटियाँ बज रही होती हैं, धक्का देने का कारोबार पूरे शबाब पर होता है और व्यवस्था के नाम पर बदतमीजी का आलम हुआ करता है। लेकिन इन कतारों में शालीनता थी। सलीके से टिकट लेते हुए लोग इतनी भारी भीड़ के बावजूद बिना किसी को धक्का दिये प्रवेश कर रहे थे। ये किताबों का ही जादू है कि वे अपने पाठकों को संस्कृत करती हैं। किताब पढ़ने वाले लोग ही सिर्फ बुद्धिमान नहीं होते हैं लेकिन इतना ज़रूर है कि उनके सभ्य होने की उम्मीद की जा सकती है। यही उम्मीद कायम थी।

प्रगति मैदान अपने नाम के अनुरूप किसी खेल के मैदान जैसी जगह नहीं है। वहाँ पर प्रदर्शनी और इसी तरह के आयोजनों के लिए कई विशाल बहुमंजिला भवन बने हुये हैं। इनका आकार इतना बड़ा है कि एक ही हाल में तीन सौ से अधिक स्टाल लगे हुये थे। प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों के इस मेले में पाँव रखने को जगह न थी। लोग एक दूसरे से टकराने से बचते हुये चल रहे थे। लोग प्रदर्शनी में रखी हुई पुस्तकों को अपने हाथों से छू कर देख रहे थे। वे कई किताबों को उलटते पलटते हुये अपने दिल को रोक लेते कि आखिर कोई कितनी सारी किताबें घर ले जा सकता है। मेरे पास जो सबसे पहली किताबें रही होंगी वे हिन्दी की बारहखड़ी और अङ्ग्रेज़ी की वर्णमाला सीखने वाली होंगी। मैं एक अजीब आदत की गिरफ्त में हमेशा से रहा हूँ। अगर मुझे हवाई जहाज मिल जाए और मेरा अध्यापक मुझे हवाई जहाज के पुर्जों और काम करने के तरीके के बारे में सीखने लगे तो मैं बोर होने लगा हूँ। मैं चाहता हों कि अभी इसी वक़्त मुझे पायलट सीट पर होना चाहिए और जहाज हवा में। इसी तरह मैंने कभी पाठ्यक्रम की पुस्तकों को गंभीरता से नहीं देखा। ऐसा करने की यही वजह थी। मुझे अचरज होता है कि ऐसा कैसे संभव है, हम किताब और किताब में फर्क करते हैं। कुछ जो ज़रूरी है उसे छोड़ देते हैं और गैर ज़रूरी को सीने से लगाए फिरते हैं। 

पुस्तक मेला चार फरवरी को आरंभ हुआ था। इस मेले में हर बार किसी देश के साहित्य को खास तौर से आमंत्रित किया जाता है। इस बार दुनिया में समानता के पक्षधर अग्रणी देश फ्रांस का पेवेलियन था। हम किताबों के संसार में घूमते हुये थक गए तो बाहर हरी दूब में आकर बैठ गए। एक कोने में युवा कवि-कवयित्रियों का घेरा था। वे अपने कविता पाठ में मशगूल थे। उनके पास ही एक माँ अपनी बेटी के साथ बैठी हुई तल्लीनता से उसी वक़्त खरीद कर लायी गयी किताब को पढ़ रही थी। पूरे लान में लोग थे। मैं आभा और मानविका के साथ मुंबई से आई हमारी पारिवारिक मित्र राज जैन के साथ धूप में चमकते हुये प्रदर्शनी के पोस्टरों के रंगों को देख रहा था। मेरे ठीक पीछे अनुवादकों का दल बैठा हुआ इस चर्चा में खोया हुआ था कि क्या आज के दौर में अनुवादक सिर्फ अनुवाद के सहारे अपना जीवनयापन कर सकता है? मेरे दिल से आवाज़ आई कि विश्व पुस्तक मेले में उपस्थित ये लोग देश भर के प्रतिनिधि मात्र हैं। ऐसे ही मेले हर जिले में लगते हों और वहाँ इतने ही साहित्य प्रेमी पहुँच सकें तब कहीं किताबों के सिपाही अपना जीवन इस पेशे में रह कर गुज़ार सकेंगे। वहीं फ्रांस से आए लेखक और किताबों के चाहने वाले हिन्दी भाषा सीख रहे थे।

इस बार के विश्व पुस्तक मेला में मुझे हिन्दी में बेस्ट सेलर विषय पर अपनी बात कहनी थी। हाल नंबर अट्ठारह के ऑडिटोरियम संख्या एक में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यसभा टीवी के लिए गुफ़्तगू कार्यक्रम प्रोड्यूस करने इरफान साहब एक नियायामक के रूप में थे। किताबों के इस अनूठे आयोजन से जो तस्वीर सामने आती है उसके विपरीत सच ये है कि आजकल हम किताबें पढ़ते ही नहीं हैं। कोई भी किताब खरीदे हुये अरसा बीत जाता है। मेरी कहानियों का पहला संकलन आया तो आश्चर्यजनक तरीके से उसका पहला संस्करण तीन महीने से कम समय में ही बिक गया। ये सब इसलिए संभव हो सका कि इस नए दौर में पाठक किताब की दुकान तक जाने की जगह घर बैठे हुये अपनी पसंद की पुस्तकें मँगवाता है। इन्टरनेट पर मेरे चाहने वाले पिछले पाँच सालों से लगातार पढ़ रहे थे और उन्हें मालूम था कि ये कहानियाँ उनकी रुचि की हैं। अब नया संसार इन्टरनेट का है। हम अपने सुख दुख और खुशी अफसोस को इसी के जरिये साझा करते हैं। आने वाले वक़्त की किताबें भी डिजिटल हुआ करेंगी। सब कुछ वक़्त के साथ बदल जाता है। इस बदलाव के साथ चलने वाले नए जमाने के प्रकाशक शैलेश भारतवासी कहते हैं। पहले इसी पुस्तक मेले में हिन्दी किताबों के बहुत सारे हाल हुआ करते थे, अब हिन्दी की किताबें सिमट कर एक ही हाल में आ गयी है। उनके चहरे पर ये कहते हुये उदासी से अधिक इस हाल से लड़ने और हिन्दी के भविष्य को सँवारने की लकीरें देखी जा सकती है। शाम होने से पहले प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन पर पाँव रखने को जगह न थी। लड़कियों की लंबी कतार थी। मेट्रो स्टेशन पर सामान की की जांच के लिए लगी एक्स रे मशीन अपने पेट से होकर गुजरती हुई असंख्य किताबों को दर्ज़ कर रही थी। मुझे बेहद प्यारे और इस दुनिया के लिए ज़रूरी आदमी सफ़दर हाशमी की याद आई। किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
* * *
[ये लेख राजस्थान खोजखबर अखबार में 14 फरवरी 2013 को प्रकाशित हो चुका है]

February 13, 2013

धूप के बियाबाँ का दरवाज़ा


सुबह के पाँच बजे हैं। किसी करवट में टूट गयी नींद की कोमल पंखुड़ी। किसी झौंके ने छू लिया बदन। बंद घरों में रास्ते नहीं होते इसलिए कोई गुज़रा होगा, दिल या दिमाग के रास्ते। सहूलियत के प्लास्टर से नहीं चढ़ता प्रेम पर कोई कवच। वह सदा के लिए अनछुआ है, अचरज से भरा और व्याकुल...

जी चाहता है
आपको एक प्रेम कहानी सुनाऊँ .

मगर जाने देता हूँ
कि उसके बारे में फिर जाने क्या क्या कहना होगा।
* * *

मिलना इक बार
ज़रूरी है कि तन्हा हो सकूँ।

सोचूँ तेरे आने का क्या, जाने को तेरे क्या कहूँ।
* * *

वहाँ सब तरफ थीं दरारें
कुछ जाहिर, कुछ जाहिर होने से ज्यादा
गहरी पसरी हुई थी चुप्पी,
कोई इक खूबसूरती से जाने कैसे चटक रहा था।

इस ठहरे हुये से मौसम में
मैं खुद को देखता हूँ, मैं खुद को सोचता हूँ।
* * *

स्मृतियों का महीना
धूप के बियाबाँ का दरवाज़ा खुलने से
पहले के दिन।
* * *

कुहासे में स्वरों का वृंद
जीवन यात्रा का सम्मोहन।

रेगिस्तान की
शीत भरी सुबह में
एक परिंदा
चुप।

भोर, अलसाई हुई, वलय निद्रा का।

तुम कहीं नहीं, तुम ही हर कहीं।
* * *

मुझे नहीं मालूम,
उस बियाबाँ में
कैसा होता है, सफ़र ज़िंदगी का।

बुझ चुके हसरतों के तंदूर में बची हो कालिख
खो गए हों अरमानों की राख़ में वक़्त के टुकड़े
दूर तक न दिखाई दे शक्ल, आने वाले कल की
और जी न सके कोई किसी भी तरह।

मालूम है सिर्फ इतना कि
उस घड़ी चाहिए तुम्हारी आवाज़ कि मैं हूँ।
* * *

उसे नहीं मिलना था मुझसे,
मुलाक़ात के बारे में ऐसा पहली दफ़ा तय था।
* * *

जब आप गुज़रते हैं
पत्थर का सीना चीरती हुई सुरंग से
तब बना रहता है पहाड़ का बोझ आप पर।

कहो, मेरे दिल को चीर कर
उस पार जाने के बाद कैसा लग रहा है?
* * *

[तस्वीर : शहर, जिसे दिल्ली कहते हैं]

February 12, 2013

और दर्द है जैसे...


मौसम की नई कोंपलें फूटती रहती हैं और मैं नए दिनों को उदासी की तह देता जाता हूँ। खुशी की वजहों के दिन दोहराए नहीं जा सकते हैं। वे दिन अपने अनूठेपन के साथ कुछ इस तरह आते हैं कि उनकी नकल कहीं नहीं मिलती। वे जाते भी इस तरह हैं जैसे बहुत देर से अटका हुआ कोई सिंदूरी रंग अचानक से टूट कर गिर गया हो पहाड़ के पीछे। किसी ने कहा कि तुम ज़िंदगी लेकर आए हो। मुझे लगा कि यही सबसे झूठी बात है कि मैं अपनी समझ से कुछ लेकर आता तो क्या एसी चीज़ लाता? मुझे इतना मालूम होता कि ज़िंदगी में इस तरह का कारोबार है तो कौन आता इस दरवाज़े? मैं फिर अपनी छत पर उतर रहे अंधेरे और उजाले के खेल को देखता हुआ सोचता हूँ कि चल फिर मुकम्मल हुआ एक दिवस। एक और दिन न जीने की तोहमत से बचे। 

एक दिन अचानक से मैंने अपनी हथेली को देखा। उसमें कुछ नहीं था। एक दिन स्टुडियो में किसी आरजे ने एक मेहमान विदुषी से कहा- "मेम मेरा हाथ भी देखिये" उन्होने उस नवयुवती का हाथ अपने हाथ में लेते हुये कहा- "इन हाथों से जैसा काम करोगे, भाग्य वैसा ही हो जाएगा" मैंने इस याद की रोशनी में पाया कि मैं उसी से घिरा हुआ हूँ जिसे जीने की कामना करता हूँ। मुझे तनहाई प्रिय है, तो वह है इस वक़्त। मुझे प्रेम चाहिए, तो बेचैनी ने थाम रखा है बाजू, मुझे सुकून चाहिए तो देखो आसमान के तारों की ओर। तुम्हें साफ सुथरा दृश्य मिला है। तुम एक दिन इस मिट्टी में मिल जाओ तब तक के लिए खुद को इसी दृश्य के हवाले कर दो। 

किसी ने पुकारा आसमान से- "फरेबी, ओ फरेबी... कैसा चल रहा है तुम्हारा काम? क्या सचमुच लिख पाओगे कभी अपनी आत्मकथा जिसका शीर्षक तुमने सोचा है, एक ऐसा आदमी जो खुद को धोखे देने की बीमारी से पीड़ित था" उसकी आवाज़ को भूल कर, मैंने सोचा कि कितनी बातें हमारे साथ चलती है? वो साल दो हज़ार दस के जून महीने की रात थी। घबराया हुआ बिस्तर की तहों के बारे में सोचता गरमी में आती हवा को जी रहा था। उस रात कई बीते हुये सालों का काफिला मुझे घेर कर खड़ा रहा। एक निरीह आदमी, याद के नुकीले भालों से घिरा हुआ। हरे दरख्तों के टूटने जैसा हाल कि कोई आवाज़ भी नहीं और दर्द का कोई हिसाब भी नहीं। उन्हीं दिनों के जैसे दिन लौट लौट कर आते हैं। इन दिनों मेरे साथ चल रहे हैं। 

तुम इसे जाने क्या समझो और मैं इसे जाने क्या समझता हूँ। हाल कुछ ऐसा है कि पिछले एक साल से मेरी पीठ के दायें हिस्से में खूब दर्द रहता है। इस दर्द की जड़ें हैं। इनमें सलीके से आरोहण होता है। कार में बैठे सामने देखते हुये, लेपटोप की स्क्रीन, किसी को सुनने के लिए उसका रुख किए हुये, ये दर्द शुरू हो जाता है। ये पीठ से होता कंधों तक आता। इसके बाद गरदन के दायें हिस्से को और फिर मेरे चेहरे के सामने वाले भाग को जकड़ लेता है। जैसे किसी विषधर ने डस लिया है। मुझे लगता है कि दायाँ गाल और आँख ज़हर से भर गए हैं। एक डॉक्टर दोस्त ने कहा कि गरदन में दर्द हो और रक्तचाप असामान्य हो यानि पसीना भी आने लगे और घबराहट भी हो तो तुरंत अस्पताल का रुख कर लेना चाहिए। मैंने कहा कि क्या ऐसे में दिल धोखा दे देगा? उन्होने कहा कि नहीं ये धोखा देने से पहले के लक्षण हैं। बाकी कुछ तय भी नहीं है.... मैं मुस्कुराया कि तय है कि एक दिन जीवन को नष्ट हो कर पूर्णता को प्राप्त हो जाना है। इसलिए दिल धोखा दे उससे पहले मैं खुद को धोखे देने के खेल में लगे रहना चाहता हूँ। चिंताओं से अधिक प्रिय है, महबूब की आँखें। लेकिन मैं इस दर्द को किस पहलू में रखूँ कि ज़िंदगी संभल कर चलती रहे। 

न लड़ो ऐसे, चुप बैठो कि सांसें बड़ी कम है।
* * *
[तस्वीर : शहर जिसे दिल्ली कहते हैं की एक सड़क] 

February 6, 2013

अकेलेपन का राजमिस्त्री


फुरसत आती रहे लौट कर कि हम देख सकें, फूलों को चलते हुये। सुनते रहें पत्थरों के दिल का गाना। लेटे रहें आसमान से आँखें लड़ाये हुये। बातें बेवजह...

उसके नाम के पीछे छिपा लेता हूँ
मैं अपना अकेलापन
कि इस दुनिया में कोई समझ नहीं सकता
भरे पूरे घर में भी हो सकता है कोई अकेला।

उस वक़्त तक के लिए
जब लिखा है, तुम्हारा आना ज़िन्दगी में।
***

रात के अंधेरे में अकेलेपन का राजमिस्त्री
धैर्य से चुनता जाता है फूटी हुई तकदीर की ईंटों से दीवार
मगर छन कर आती रहती है किसी बिछोड़े की आवाज़।

जिंदगी कांपती रहती है, किसी प्याले में भरी शराब सी।
***

लिख लूँ, अपने रोज़नामचे में
रेगिस्तान में आज दिन का हाल
कि ये दिन फिर न आएगा लौट कर।

रुई के फाहों से उड़ते रहे बादल
तुम्हारी शिकायतों जैसे
हवा सताती ही रही, तुम्हारी तरह आँखें फेर कर।

कि मैं लिख ही देता इसे एक बरबाद दिन
अचानक किसी के आने की आहट ने
मेरे गालों को खुशी से भर कर, लुढ़का दिया है कंधों तक।

मैं खड़ा हुआ हूँ छत पर
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में, ज़िंदगी को सजदा किए हुये।
* * *

कभी कभी मौसम आता है इत्रफ़रोश की तरह
तुम्हारी खुशबू गलियों में बिखेरता, कोई भीगा नगमा गाता हुआ
लगे कि फिर से तुमने खींच कर रख लिया है, मेरा हाथ अपनी कमर पर
सड़क के किनारे की रेत ने शरमा कर खा लिए हैं कई भंवर
बीती सांझ जैसा ही उगा है, पूरा गोल सूरज सिंदूरी सिंदूरी।

कहाँ हो तुम, ये ठंडी हवा कैसी है, मौसम के इस सितम पर शिकायतें किससे करूँ?
***

February 4, 2013

किसी शोरगर की तरह


कोई आवाज़ न थी। कारीगर और मजदूर बारदानों में शोर और औज़ार एक साथ रख कर अपने घर चले गए थे। वीरानी थी। ज़िंदगी के हाल पर उदास ज़िंदगी थी। दीवारें पूछती थीं कि फिर करोगे मुहब्बत किसी वक़्त के छोटे से टुकड़े के साथ? मैंने कहा कुछ भी कर लूँगा बस रोने की इजाज़त दे दो। फिर बेवजह की बातें कि और कोई सूरत नहीं... 

उसके कंधे को छूकर आती हवा में
मैंने घोल दिये लरज़िश से भरे कुछ टूटे शब्द।

एक दिन श्याम रंग के भँवरे के टूट जाएंगे पंख
एक दिन गुलाबी फूल से झड़ जाएगी पत्तियाँ।

उस दिन से पहले, तुम एक बार फिर मिलना।
* * *

हसरतों की पगडंडियाँ कितनी सूनी होती है
कि एक आदमी को चलना होता है तनहा उम्र भर।

इस वक़्त हालांकि तुमने थाम रखा है, मेरा हाथ
सड़क के किनारे बसे हुये हैं ख़ानाबदोश
मगर हम बिछड़ जाएगे, वक़्त की धूल के गुबार में।
* * *

फूल की गरदन से ज़रा नीचे, उम्मीद किसी कोंपल की
जैसे मेरे दिल में तुम्हारा नाम
मगर कांटे जाने कहाँ से चुभते रहते हैं हर सांस के साथ।
* * *

तुमको सिर्फ इतना करना है
कि चीज़ों को रखना, उनकी शक्ल के हिसाब से
चीनी मिट्टी से बने गुलदानों के आस पास।

बाकी तुमसे प्रेम करना सिर्फ मेरा काम है।
* * *

ज़िंदगी कभी तुम्हारे करीब न होगी
इसे भटकते रहना है, ख़यालों के वीराने में।

यही लिखा है वक़्त की किताब में
कि मैं सांस लेने की जुगत में फिरा करूँ
आवारा गलियों में बंद दरीचे और दरवाज़े देखता
और कभी इन राहों पर गुज़रूँ
हाकिम को सजदा करता हुआ।

कि वो उतार लेता है खरगोश की खाल भी
मुझसे देखा नहीं जाता, काँटा तेरे पाँव में।

कितनी तकलीफ होती है, महबूब के बिना जीने में
और तय है कि ज़िंदगी कभी तुम्हारे करीब न होगी।
* * *

मैं रिफ़्यूजी का तम्बू हूँ
न वो मुझे अपना सके, न मैं उसे।
* * *

कठिन समय की दस्तक ने
मुझको एक पाठ पढ़ाया
कि भावनाओं की कश्ती में
ज़िंदगी की चट्टानों पर नहीं हो सकता है सफ़र। 

मैंने मस्तूल को रोप कर ज़मी पर
नाव से बना ली है छत
अब मर्ज़ी है तुम्हारी आओ, न आओ।
* * *

सब हमारे लिए आसान होता
गर हम रुई के फाहे होते
हम उड़ जाते हवा में, हम जल जाते आग में,
हम खो जाते दुनिया की नज़रों से दूर।

मगर हम रुई के फाहे नहीं थे।
* * *

किसी शोरगर की तरह
चाहतों की पोटाश से बुनता हूँ मुहब्बत
कभी तुम चटक जाते हो आंच की तरह
कभी तुम बरस जाते हो आँसू की तरह।

कि कुछ नहीं बनता, हथेलियों में छाले के सिवा।
* * *

कच्ची मिट्टी से बने
मैखाने की दीवार का सहारा लिए
मैं देखता हूँ ज़िन्दगी के गुज़रते हुये सालों को
एक अजनबी गली में।

वो गली जिसमें तुम नहीं रहते।
* * *

दोस्त तुम्हारे प्याले में बची हुई है शराब
कि तुम बैठे हुये हो किसी के इंतज़ार में।
* * *

मैंने गलतियाँ की
और अनमना सोया रहा मेरा अपराधबोध।

उसे शिकायत है कि
दुनिया मुझे वो नहीं देगी जो मैं चाहता हूँ।
* * *

मेरे निर्माता ने बनाया था मुझको
किसी प्रेम के आलोड़न में सम्मोहित होकर
मेरे भाग्य को लिखने से पहले वो सो गया गहरी नींद।

मुझे तुमने गले लगाया 
और फिर दूर रहने की नसीहत देकर खो गए।
* * *

उस एक रात के बाद मेरा वुजूद दो तरफा हो गया।

जब नहीं आती उसकी आवाज़ मैं खाई में लुढ़कता हुआ पत्थर हो जाता हूँ
और कभी, उसकी आवाज़ बना देती मुझे कोमल पंखुड़ी हवा में उड़ती हुई।
* * *

[Painting Image : Brad Kunkle]

February 2, 2013

उस आखिरी घड़ी में


उस पार घना अंधेरा, उजाला इधर भी नहीं कि कहीं जाना भी नहीं है और मुझे यहाँ रहना भी नहीं है। रोना नहीं है और रोये बिना जीने की सूरत भी नहीं। बोल पड़ूँ तो सुकून आए शायद मगर बात जो कहनी होगी उसे कहना भी नहीं है। यूं तो ज़ब्त करके मैं हंस भी लूँ मगर यूं सोच-सोच कर कुछ करना भी नहीं है। 

उस खाली खाली से मंज़र में कुछ घड़ी बाद बिछड़ ही जाना था और जीना था कई साल तक मरने की उम्मीद के बिना। सड़क चलती ही नहीं थी, लोग रुकते ही न थे। सांझ मुरझाई जाती थी, कदम टूटे जाते थे। एक मैं था, बिखरी बिखरी सी आती आखिरी सांस की तरह चलता हुआ। क्या सबब कि इस तरह मिला करे कोई, छोड़ जाए तन्हा, धूल भरे रस्तों में। 

खिड़की से बाहर देखूँ तो डर लगता है, कमरे के भीतर एक दोशीजा उदासी है। पगलाया हुआ दरवाज़े से बाहर आता हूँ, फरवरी का महीना है और आसमान पर फिर बादलों का फेरा है। दीवार का सहारा लिए खड़े जाल के पेड़ पर बैठी चिड़िया किसी जल्दी में है शायद और मेरे पास कोई काम ही नहीं है। 

सीने के तलघर में उतर आई है एक भारी सी चीज़। रह रह कर मुझे उकसाती है कि दौड़ने लगूँ। रेगिस्तान में प्यासे हिरण की तरह टूट जाए आँखों में बसी पानी की तस्वीर। गिर पड़ूँ तपती बालू रेत पर। एक बार उचक कर उड़ जाये पंछी दूर किसी दरख्त की शाख से। उस आखिरी घड़ी में सोचूँ कि तुम जा रहे हो मुझसे बिछड़ कर और आसमानों के पार जाने के लिए मुकम्मल हो रहा है मेरा सफ़र। 

ओ कुदरत मुझ पर रहम करो।
* * *

तस्वीर मेरे दुश्मन शहर की एक पुरानी सड़क की है। लोग कौन है, किधर जा रहे हैं मालूम नहीं। मैं कार के शीशे से पीठ टिकाये हुये सोचता हूँ कि कोई जगह बनी होनी चाहिए सुकून के लिए.... 

February 1, 2013

महबूबा, अजमेरी अंडे कुछ नहीं होते


शाम बीत गयी है। शाम का इंतज़ार भी है। कोई नहीं है, कोई है भी। यकीन ज़िंदगी पर नहीं और उसी ज़िंदगी के भरोसे जीए जा रहा हूँ। तुम न आओगे कभी इसी बात पर रोता हूँ और सुना है कि कुछ भी कायम नहीं है। तो क्या तुम आओगे एक दिन, क्या मैं फिर से देखूंगा चाँद अभी डूबा नहीं, सुबह अभी खिली नहीं। जाने दे आज बेवजह की सबसे उबाऊ बातें।

ओ महबूबा, मैं कहना चाहता हूँ
कि इस वक़्त आ गए हैं बादल बहुत सारे आसमान में
इसी वजह से उतार दिया है हरे रंग का स्वेटर।

तुम्हारे बिना
जाने किस शाख पर भूल गया है मौसम, रंगों की ज़ुबान को।
* * *

एक बार बात करो
अपने सब सुखों के बीच इस इकलौते दुख को सुन लो
* * *

तुमने कभी नहीं कहा
कि कोई उम्मीद है
मैंने कभी नहीं सोचा कि कोई उम्मीद है।
* * *

उसने तोड़ लिया इंद्र के सिंहासन का एक पाया
सोने के पाये से खरीदा पुष्पक विमान
और उतर गया एक गुलाब के फूल बेचने वाले के पास।

फिर रात के अंधेरे में कहा
सितारों क्या तुम अभी बने रहोगे वहीं, जहां रोज़ होते हो।
* * *

ये कितना अच्छा था
मैंने खूब सारी गलतियाँ की, तुमने उनको परखा
और आखिर हम किसी नतीजे पर नहीं आए।

इसी बहाने कुछ और वक़्त बिताने की मोहलत मिली।
* * *

हम तीन दोस्त थे।

एक ने मेहरानगढ़ किले की
तलहटी में बनाया किताबों से घर
और छुप गया शब्दों की घनी छांव में।
दूजे ने गज़नी की तोड़ी मूरतों को
सीने से चिपकाए उदास खड़े किराड़ू की याद में
बनाया शराब का टांका और उसमें कूद गया।

मुझे चाहिए, भटकने के लिए हसरतों की उजाड़
मैं भर देना चाहता हूँ तुम्हारे दिल में रेगिस्तान
और बचा हुआ हूँ, तुम्ही को उदास करने के लिए।
* * *

उसने कहा
कथाकार के चेहरे को सलाखों की शक्ल में
किताब के पीछे छापना अच्छी बात नहीं है।
कवि की दाढ़ी भी गलत है
कि उसमें घुसने के लिए चाहिए काले रंग का चोर तिनका।

मैंने कहा आलोचक के बारे में क्या खयाल है?

उसने कहा कि अजमेरी अंडे कुछ नहीं होते
लोग सिर्फ नाम देख कर खड़े हो जाते हैं कतार में।

हालांकि वो जानता था
कि आज फरवरी महीने का पहला दिन है
मेरी जेब में कुछ ऐसे कागज़ के टुकड़े होंगे, जिनसे खरीदी जा सके शराब।

मैं मगर सोच रहा हूँ कि किसी से न कहूँ कुछ।
* * *

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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