An illegally produced distilled beverage.


March 31, 2013

मैं तुम्हारी ही हूँ

मौसम की तपिश बनी है इसलिए कि फिर से याद किया जा सके उन गहरे पेड़ों को जिनकी छांव में बीती थी बचपन की अनेक दोपहरें और याद कर सकें इमली के कच्चे पत्ते खाने के दिनों को। आज किसी ने अपनी आवाज़ को बना कर नाज़ुक पंख कान में गुदगुदी की है। धूप फिर सख्त है दिन फिर लंबा है। मैं सब चीजों को अपने दिल में उनके वुजूद के साथ रखता हूँ। एक दिशासूचक यंत्र बता रहा है कि तुम कहाँ हो इस वक़्त... मैं सोच कर घिर जाता हूँ हैरत से कि कैसे कोई हो सकता है, दो जगहों पर एक साथ। कि इस वक़्त उस अजनबी शहर के अलावा तुम मेरे दिल में भी हो... 

ख़ुदा ने एक पर्ची में लिखा
उल्लास की स्याही से
कि इस सप्ताहांत की सबसे बड़ी खुशी
मैं रखता हूँ, अपने प्यारे बच्चे की जेब में
कुदरत के सारे डिस्काउंट्स के साथ।

और एक आवाज़ आई, मैं तुम्हारी ही हूँ।
* * *

आंख में उतरता है
शाम का आखिरी लम्हा
तुम्हारे कुर्ते की किनारी पर रखे हाथ।

अगले ही पल
सड़क के बीच डिवाइडर पर
तेरे कंधों के पीछे
खो जाता है, खुशी का आखिरी दिन
क्षितिज के उस पार।

गुलाबी हथेलियों पर
रखते हुये एक वादा
हम उठ जाते हैं ज़िंदगी भर के लिए।

मेरी रूह
अब भी चौंक उठती है
कि दफ़अतन छू लिया है तूने
कि तूँ बिछड़ कर भी साथ चलता है।
* * *

March 30, 2013

वक़्त के होठों पर एक प्रेमगीत

ये बात कितनी ठीक है, कहना मुश्किल है मगर मेरा दिल कहता है कि अतुकांत, असम्बद्ध, गूढ़ छद्म प्रयोजन, अस्पष्ट, अतार्किक, अनियोजित और ऐसे अनेक विशेषणों वाली आधुनिक कविता को पढ़ना हिम्मत का काम है। मैंने नौवें दशक से नई कविता की किताबें पढ़ना छोड़ दिया था। इसलिए कि मुझ अल्पबुद्धि को ये कभी समझ न आ सका कि इस कविता का प्रयोजन क्या है? अगर कोई प्रयोजन बूझ भी लिया जाए तो ये नहीं समझ पाता था कि इसमें रस किधर है। कुछ लोग इसे अनर्गल प्रलाप कहने लगे किन्तु मैंने कहा कि कवि की अनुभूतियों को अगर आप नहीं पकड़ पा रहे हैं तो आप एक अच्छे दयालु हृदय के पाठक नहीं हैं। दो दशक बीत गए। कविता नारे लगाती हुई बढ़ती ही गयी। बेशुमार कवि और बेशुमार नारे। इतने नारे अगर सड़क पर उतर कर लगाए होते तो शायद पुनर्जागरण हो जाता। 

मैं सड़कों पर नारे लगाता फिरता रहा हूँ। मेरे नौजवान दिनों की यही एक याद बाकी है। इसी एक याद में कई उम्मीदें भी बची हुई हैं। कविता इन्हीं नारों की शक्ल में मेरा पीछा करती रही और मैं इससे डर कर कहीं एकांत में बैठा सिगरेट फूंकता रहा। मेरा एक दोस्त मुझे कविता सुनाता था। उसे सुनते हुये फिर से कविता से प्रेम हो जाता था। उसकी कविता में मिट्टी, प्रेम और ईमान की महक आती थी। इसका कारण था कि वह समकालीन कवियों और खासकर विश्व कविता का गहन अध्ययन भी करता था। उसने मुझे साल नब्बे में महमूद दरवेश की कवितायें सुनाई। मुझे लगता था कि ये बहुत सुंदर गध्य है किन्तु इसका रस और शिल्प इसे कविता का सुंदर रूप देता है। कविताओं में कहानियाँ भी छिपी होती थी। इस तरह कुछ चीज़ें मुझे पूरी तरह भाग जाने से रोक लेती थी। आज की आधुनिक कविता के बड़े हस्ताक्षरों को मैंने पढ़ा नहीं है। इसलिए उनके बारे में कुछ मालूम भी नहीं है। कुछ पहाड़ के कुछ पहाड़ से उतर कर महानगरों में बसे हुये और कुछ दक्षिण के कवि बड़े कवि कहलाते हैं। 

सोशल साइट्स पर होता हूँ तब ऐसा लगता है जैसे किसी सफ़र पर निकल आया हूँ। नए नए से लोग और नए दृश्य। जी चाहे तो रुक जाता हूँ और देखने लगता हूँ। ऐसे ही कई बार कुछ कविताओं और ग़ज़लों से सामना हुआ। ये कितनी अच्छी सुविधा है कि आप कहीं जाते भी नहीं और मंज़र ख़ुद आपके सामने से किसी कारवां की तरह गुज़रता जाता है। पसंद आया तो चुरा लीजिये, न आया तो उसे आगे बढ़ जाने दीजिये। कमोबेश यहाँ भी कविता का हाल वही है जो किताबों और रिसालों देखा करता था। लेकिन इस सब में भी कुछ एक नायाब चीज़ें यहीं पढ़ने को मिली और मैं इनका ग्राहक हो गया। कविता के सामाजिक सरोकार पर मैंने कुछ लेख लिखे थे। इसलिए कि मुझे कविता लिखना, कहना नहीं आता तो ये बताता चलूँ कि मैं क्या पढ़ना चाहता हूँ।

वस्तुतः कविता एक वैश्विक आयोजन है इसलिए आप इसके बारे में चुप रह कर जितना आनंद ले सकते हैं उतना बोलकर कभी नहीं। इसलिए मैंने कविता को अपने पास बैठने को जगह दी। उससे खूब प्यार किया। कविता करने वालों से प्यार किया। कभी जी चाहा तो बेवजह की बातें ख़ुद भी लिख दी। 

विश्व पुस्तक मेला में बोधि प्रकाशन के स्टाल के आगे एक कुर्सी पर बैठे हुये दीपक अरोड़ा बर्गर खा रहे थे। मैंने अपनी बेटी से कहा- देखो अच्छे कवियों को खाने के लिए बर्गर भी मिलते हैं। वे उठकर गले मिलते हैं। मैं याद करता हूँ कि अचानक कोई कविता पढ़ कर सुख हुआ था, वे इन्हीं के शब्द थे। उनकी कविताओं को पढ़ते हुये चिन्हित हो रही उदासी असल में उदासी नहीं होती। मुश्किलें भी होती हैं, सरल हो जाने की उम्मीद की तरह। कविता की प्रॉपर्टी में सेड़िज़्म एक रूमान की तरह साथ चलता है। हम जिन चीजों को फॉर ग्रांटेड लेते हैं, उन चीजों को उधेड़ना इन कविताओं की सबसे बड़ी बदमाशी है। ये शास्त्रीय राग के निर्दोष आलाप की तरह नहीं हैं, इनमें ऐब्रप्टली एंड हो जाने के दोष भरे पड़े हैं। जैसी कि हमारी ज़िंदगी है, सारे प्लान को धता बता कर एक दिन बुझ जाती है बीच राह में। ऐसी कविताओं को पढ़ना, रेत पर गीली मिट्टी से घर बना रहे उदास बच्चे की आँख को पढ़ने सरीखा है। मैंने कई बार कुछ एक बिम्ब ऐसे पाये जिनमें अभी भी बंटवारा या उससे जुड़ी हुई कुछ यादें नुमाया हुई। ये सरोकार की बात है। कवि ऐसे ही किसी दर्द को अपनी आँख में रखता है। 


बोएज़ डोंट क्राइ कहते उसने 
गुलाबी रुमाल से पोंछ ली आँखें। 

मैंने छान मारे 
मारीजुआना, पोस्त, अफीम 
और सस्ती शराब के सारे अड्डे। 
उम्र न उससे रुकी न मुझसे। 

मुझे दस दिन दे दो 
मैं उसके साथ थैला पकड़ कर 
सब्जी मंडी जाना चाहता हूँ।

March 26, 2013

फिलहाल गायब हैं मेरे पंख।

जहां खत्म होती है सीढ़ियाँ वहीं एक दरवाज़ा बना हुआ था। उसके पीछे छिप कर हमने लिए तवील बोसे। पंजों पर खड़े हुए, कमर को थामे। हमने पी ली बेहिसाब नमी। मगर अब मैं सख्त चट्टान पर बैठा हुआ डरता रहता हूँ जबकि परिंदों ने बना रखे हैं घर झूलती हुई शाख पर। 

इस बार की बरसात में धुल जाएंगे पहाड़, छत होगी बहते हुए दरिया जैसी साफ और बादलों की छतरी तनी होगी आसमान में। तब हम दीवार का सहारा लेकर चूमते जाने की जगह चुरा लेंगे परिंदों के पंख और उड़ जाएंगे। डाल पर झूलती चिड़िया भर जाएगी अचरज से। 

फिलहाल गायब हैं मेरे पंख।
* * *

हर चीज़ 
जो हमारे दिल पर रखी होती है 
उसका भार इस बात पर निर्भर करता है 
कि इसे किसने रखा है।
* * *

रूठ जाओ ओ मेहरबान मगर देखो
देखने दुनिया को लाये थे जो ज़िंदगी हम
गुज़र रही है, उनींदी बिस्तरों पर।

आँखें खोलूँ तो लगता है
रात किसी ने रख दिया है चेहरा पत्थर का
सर उठाऊँ तो कोई कहता है, सो जाओ।

तुमसे उधार ली थी खुशी वे दिन बीत गए
ग़म के इस मौसम कब तक फिरूँ तनहा
खिड़की पर बैठा पंछी गाता है, सो जाओ।

प्याले उदास रखे हैं, कासे खाली खाली
न छलकने की आवाज़ आती है
न टूट कर बिखरती है ज़िंदगी बार बार गिर कर।

रूठ जाओ ओ मेहरबान मगर देखो
किस तरह जी रहा है कोई बिना तुम्हारे
बिना तुम्हारे नीम नींद में दिखती है कैसी ये दुनिया।
* * *

जहां पर मैं गिर पड़ा था
उन दो दीवारों के बीच सूखी हुई ज़मीन थी
और किसी बहुत पुराने वक़्त की गंध
मेरे नथुनों के पास कोई हरकत नहीं होने से
शायद वक़्त के उस लम्हे ने मुझे समझ लिया था मरा हुआ
जबकि ये उसके प्यार में जीने का चरम बिन्दु था।

मैंने चाहा की उलट दूँ शराब के सारे पींपे
जो मैंने पी लिए हैं इस बीती हुई सदी में
कि सूखी ज़मीन पर हो सके कोई फसल
और मिट जाए तनहाई
कि हवा में लहराते हुये पत्ते बहुत अच्छे लगते हैं मुझको।

उसने जादुई हाथ से
मेरे बालों में
अपनी अंगुलियों से प्रेम का ककहरा लिखते हुये कहा
कि तुम इस वक़्त किस जगह से आ रहे हो लौट कर
और फिर उसने मेरे माथे पर
अपने होठों को रखा किसी स्टेथोस्कोप की तरह और उदास हो गयी।

मेरे माथे में कौरवों ने कर ली थी सुलह पांडवों से
राधा की गोद में लेटे हुये थे कृष्ण
राम का वनवास हो गया था स्थगित
और हिरण भूल चुके थे अपनी प्यास।
मैं अपनी ही खोपड़ी में पड़ा हुआ था
किसी अजगर की तरह कुंडली में दबाये हुये उसका नाम।

उसने एक हकीम से कहा
कि आदमी मरने के लिए ही आया है दुनिया में
मगर जाने क्यों मेरा दिल चाहता है
कि ये जी सके कुछ और सदियों तक।

यूं तो ये बसा रहेगा मेरे दिल के आईने में
मगर मैं जब भी थक जाती हूँ तस्वीरें देख कर
तब उठा लेती हूँ याद की सुराही
और पी जाती हूँ इस आदमी को पूरा का पूरा
बस इसीलिए एक बार देखो इसकी खोपड़ी में।

हकीम ने कहा
कि खुदा अपने नेक बंदों को कभी नहीं चाहता इस हाल में
इसलिए उसने दुनिया के शोरगुल से भरे कमरे में
चार लोगों के साथ मिल, औजारों से खोल कर मेरी खोपड़ी को
उसमें रख दी कुछ गुलाबी गोलियां।

सुबह का सूरज उगा
तो दुर्योधन ने फिर से इशारा किया अपनी जंघा की तरफ
और युद्ध की तैयारियां शुरू हो गयी,
कृष्ण मुस्कुराने लगे और राधा छिप गयी
वन लताओं के पीछे ज़िंदगी भर का विरह लिए हुये
राम ने खड़ाऊ को कस लिया
अपने पाँवों के अंगूठे और अंगुलियों के बीच
धूप ने बढ़ा दी हिरणों की प्यास
और वे भटकने लगे तपते रेगिस्तान में।

दिन के दो बजे पाया कि मैं हूँ
भटकता फिरा बचपन के शहर की अजनबी गलियों में
सड़क के किनारे बैठ गया थक कर
सांस जब उखड़ने लगी
तब मैंने फिर से रख दिये अपने होठ उसके होठों पर
और हकीम की दी हुयी गुलाबी गोलियों को कर दिया बेअसर
बिना खोपड़ी को खोले हुये।

कि जो लोग मोहब्बत नहीं करते
वे ही छेनी हथोड़े से संवारते हैं आदमी का नसीब।

मेरा महबूब तो पी जाता है मुझे
प्यासे ऊंट की तरह पूरा का पूरा
और फिर मैं पाता हूँ खुद को
किन्हीं दो दीवारों के बीच सूखी ज़मीन पर पड़े हुये
फूलों की खेती करने का खयाल लिए हुये।

अनादिकाल से
मैं बुदबुदा रहा हूँ एक प्रार्थना अविराम
तुम, तुम, तुम हाँ बस एक सिर्फ तुम।
* * *

March 17, 2013

कि मोहब्बत भी एक कफ़स है

लिख रहा हूँ मगर उस बीते हुये मौसम से बेखबर एक रूह सीने पर आ बैठी है। कहती है पीठ के तकिये को नीचे करो। इस पर सर रखो और सो जाओ. दुनिया खाली है। इसमें तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। मैं दो पंक्तियाँ और लिख कर हार जाता हूँ। लेपटोप टेबल को एक तरफ रख देता हूँ। खिड़की से दिखते पहाड़ पर सूनापन है। जिंदगी में भी। अभी इसी वक़्त किसी की अंगुलियों का स्पर्श चाहिए। इस भारी रूह को विदा करना चाहता हूँ कि सांस आराम से आए। मुझे चाहिए कि कोई भी आए, कोई भी पर इसी वक़्त आए। ज़िंदगी तुम्हें मैंने खुद ने बरबाद किया है। इसलिए अपने हिस्से की इस सज़ा को कम भी किस तरह करूँ। तीन बार अलमारी तक गया और लौट आया... आह ! गुलाबी रंग की दवा नहीं भर सकती कोई रंग। वह मुझे शिथिल कर देगी। मैं बिस्तर पर आधा लेटा हुआ, ये सब लिखता सोचता हूँ। रहम एक बड़ा शब्द है... रहम करो।
* * *

ग्रेवीटि के खिलाफ़ काम करती है मुहब्बत। दुनिया नहीं पसंद करती हवा में उड़ते आदमी को इसलिए वह खड़ी रहती है स्थापित मूल्यों के साथ और ग्रेविटी के फ़ेवर में एक दिन मार गिराती है इस शे को।
* * *

आत्मकथाओं में लिखा जाने वाला कॉमन झूठ है, बरबादी की वजह। इसलिए कि मैं जिसके लिए लिखता हूँ आँसू, मेरी किस्मत में वही था। हालांकि उम्र भर मैंने दी कितनों को ही आवाज़ और हो जाना चाहा था बरबाद उनके लिए। आत्मकथाएं इन आवाज़ों को छिपा लेती है।
* * *

काश तुकबंदी करने जितनी आसान होती ज़िंदगी 

संशय की लहरों पर जीना, अजनबीयत का सागर भीना, खुद को ही बुद्धू कर दीना, छान छान कर रिश्ते पीना, ऐसा कब तक काम करेंगे, क्यों न हम आराम करेंगे। किसी दूर देश के परबत को, किसी घने कोहरे के जंगल को, किसी नीले सागर के पैरों को, किसी रूठे हुये आदिम भैरों को, हम अपना असलाम कहेंगे, इस कूचे में नहीं रहेंगे। उस सुंदर सी एक बाला को, इस कड़वी सी हाला को, दर्द भरे के एक नाला को, दिल में बैठे छाला को कब तक आँखों से जाम पिलाएँ कब तक रूठें तोड़ते जाएँ, कब तक चीखें कब तक चिल्लाएँ, ये ऐसा जीवन, जाने कैसा जीवन है, ये मिटता ही नहीं हैं, मिटता है तो बुझता ही नहीं है, बुझता है तो धुआँ नहीं है, आखिर कुछ हमको हुआ नहीं है। जी के इतने जंजाले को नहीं सहेंगे, सच कहता हूँ नहीं रहेंगे... लेकिन कब तक आखिर कब तक?
* * *

वह धुंधलका, चुप्पी, अक्स, जिज्ञासा, 
रोशनी, अंधेरा और लिबास है 
वह है एक अनवरत घेरती हुई शाम। 

मैं एक मुट्ठी धूल हूँ, हवा में, मगर उसी के लिए हूँ। 
* * *

उस परिंदे के गुलाबी पैरों में 
न बांधो कोई ज़ंजीर 
कि मोहब्बत भी एक कफ़स है। 

न हो कोई ख्वाब बाकी, 
न किसी दोशीजा को पाने की हसरत 
मगर तुम भी चलते रहो 
किसी मुसाफिर की तरह, कि अभी है तुममें सांस बाकी। 
* * *

March 16, 2013

कैसे लिखूँ कि याद क्यों आती है?

जयपुर के पास एक गाँव में छठे माले पर मेरा घर है। कुदरत ने क्लोन नहीं बनाए इसलिए मैं उस घर में रहता हूँ, मेरे से ज़ुदा एक लड़की के साथ। उस घर में एक लड़की रहती है, अपने ज़ुदा एक लड़के के साथ। दो बच्चे हैं, एक दूजे से मिलते जुलते। कभी एक मेरी शक्ल का लड़का भी आता है। कभी कभी आती है एक मेरी दोस्त। उसके बाल बेढब कटे हुये हैं। थोड़े सुनहरे थोड़े सलेटी रंग के। कभी कभी मुझे आती है याद अपने काले घने लंबे बालों की। इसलिए इन दिनों मैं कर रहा हूँ अपने बालों से प्रेम। उस घर में खूब रोशनी है। उस घर में अब भी रखी है अच्छी विस्की और अच्छी वोदका। उस गाँव के रास्ते में आता है बिड़ला मंदिर। सफ़ेद संगमरमर के आँगन वाला, पहाड़ी की गोद में बैठा हुआ। चौड़े रास्ते पर गुज़रते हुये मुसाफ़िरों के सलाम का जवाब दिये बिना चुप खड़ा हुआ, मंदिर। मैं वक़्त के अंधे कुएं में गोता लगा कर ढूंढ लाना चाहता हूँ कुछ चीज़ें। कुछ ऐसी चीज़ें जिनका इन सब से कोई वास्ता नहीं है। 

उसके बालों में हाथ फेरते हुए
लड़की ने कहा
आओ, यहाँ धड़कनों के पास
तुम यहीं रहते हो, सदियों से।

बरसों पुरानी एक गठरी की
गिरहों की सलवट से उठती खुशबू को छूकर
अनजानी राहों की जानिब
कुछ एक ताज़ा फूल खिले थे। 

लड़के ने ज़रा और झुक कर चूम लिए, अपने महबूब के पांव। बारिश गिरती ही गयी वहाँ से जहाँ आसमान बीच से ठीक दो अलग टुकड़ों में बंट जाता है। सफ़ेद संगमरमर के लम्बे चौड़े फर्श पर बिखर गए, प्रार्थनाओं के बचे हुए शब्द। 

होले से रखा था, सर उसने कंधे पर
धीरे से कहा था ,मुहब्बत है तुमसे
ज़रा सी भी न बची थी, कहने को बात कोई बाकी । 
मौसम भूल गया गुज़रना
रंग जो ठहरा है उसी की नज़र का 
कुछ भी लौट न पाएगा अंधेरे मुहाने से वापस। 
मैं ये कैसे लिखूँ कि ये हाल कैसा है
मैं ये कैसे लिखूँ कि याद क्यों आती है?
* *

March 15, 2013

सब कुछ उसी के लिए



धरती और स्वर्ग के बीच की जगह में उड़ते हुये गोता लगा कर चिड़िया, बादल से बरसी बूंद को चोंच में भर लेती है। उसी तरह प्रेम, महबूब को बसा लेता है अपने दिल में, और बचा लेता है नष्ट होने से।

आह ! कितनी उम्मीदें हैं, एक तुम्हारे नाम से।
* * *

उसकी डायरी में थी
एक मुंह छिपाये हुये निर्वस्त्र नवयौवना
चिड़ियाएं नीले सलेटी रंग की और कुछ शब्द।

मेरी डायरी में भरी थी, कच्ची शराब।
* * *

मेरा दिल बना है किसी के लिए
मेरे होने के मक़सद है कुछ और
शुक्रिया ओ मुहब्बत
तुम्हारे दिये इस हाल का।

कुछ सज़ाएँ होती है उम्र क़ैद से भी लंबी।
* * *
उसके होठों पर बचे थे
थोड़े से सितारे, थोड़ा रंग गुलाबी।

मेरे पास बची है उसकी यही छवि।
* * *

ज़मीन, पानी, हवा और रोशनी
है उनके लिए जो जन्मते और मर जाते हैं।

प्रेम के बीज को इनमें से कुछ नहीं चाहिए।
* * *

लज्जा भरे गुदगुदे गालों पर ज़रा सी हंसी
और होठों ने दबा रखी है, बातें सब रात की।

सुबह आई है, हैरत के आईने से उतर कर।
* * *

कोयल भूल गई है लंबा गाना
कूकती है जैसे पुकार रही हो तुम्हारा नाम

हर सुबह, जो सुबह है तुम्हारे बगैर।
* * *

झाड़ियों के झुरमुट में सोये परिंदो को जगा कर
सुबह उठी आसमान में कुछ और ऊंची।

प्रेम में जीए जाना, सबसे बड़ी बात होती है।
* * *

सफ़ेद कबूतर आसमान का फेरा देकर
आ बैठा अपने ही मचान पर।

कोई रात भर सोकर जागा उसी की याद में।
* * *

लाल पंखों से झाड़कर आलस्य
नृत्य मुद्रा में उड़ गया परिंदा।

तप में बैठे किसी सन्यस्त टिड्डे ने
अपना एंटीना किया सुबह की ओर।

मेरी हथेलियों की रेखाओं से उगा
एक नया दिन, तुम्हारे नाम का।
* * *

उधड़ी हुए चुप्पी जितने खिले
फूल का फेरा दे, चला गया श्याम।

प्रिय सखी से रात वादा था
जाने किस गंध, मकरंद का।
* * *

आज की सुबह देखा मैंने
हैरत के बोझ से झुक गयी थी
लज्जा भरे फूलों की उनींदी शाख
अधजगे बागीचे पर बिखरी हुई थीं
बेढब लताएँ, तुम्हारे बालों की तरह।

आज कि शाम पाया मैंने
आसमान में दूज के मुबारक चाँद को
तुम्हारी कमर की तरह बल खाये हुये।

तुम्हारे बिना अपने कमरे में तन्हा
जब कभी जागूँ हूँ दोपहर की नींद के बाद
होता है सुबह होने का गुमा
जैसे कोई लौट आया बिना बताए।

अब
आहिस्ता से उतर रही है, याद की गहरी स्याही
झुक कर छत की मुंडेर पर
देखना कुछ ऐसे कि नीचे गली में खड़े हो तुम।

कि याद को लिखना,
सिर्फ उदासी लिखना नहीं होता, हर बार।
* * *

अज़ानों से बेपरवाह
ओंकार नाद से बहुत दूर
चलता हुआ मुसाफ़िर ज़िन्दगी का।

सुख, जैसे छांव की तलछट
सूरत, किसी बेढब आईने का बयान
और एक कुफ़्र जैसे मुहब्बत का खयाल।

और कभी कभी कोई देता है थपकी
जैसे हवा ने पहने हों हाथों में पंख।
याद आता है, बिछड़ने के वक़्त
तुम्हारी आँखों के
ठहरे हुए पानी पर लिखा था खुशी।

जाने क्यों है यकीं तुम्हें इस बात का
कि ज़िंदगी फिर से मिला देगी हमें।

मैं ठिठक कर देखता हूँ
आसमान पर बादलों की लहरें उकेरता
रेगिस्तान की नकल बनाता है ख़ुदा।
* * *

घूम फिर कर वहीँ आकर बैठ जाता है
प्यास का मारा हुआ हिरन
हरी झाड़ियों के पार देखता है, अकूत रेगिस्तान।

ज़िंदगी एक सूरज है
सर पर चमकता हुआ
मौत की पगडंडी पर वक़्त का अदीठ फासला है।

प्यास का खाली पैमाना है, प्रेम की दस्तक।
* * *

और देखो ऐसे छू रहा है कौन मुझे
कि आलाप में ये किसकी खुशबू है।

जबकि, तुम दुनिया की आखिरी ख़्वाहिश हो।
* * *

तुम नहीं हो
स्वर्ण-मृग के छलावे में
जटायु की मर्मांतक पुकार में।

तुम यहीं हो
दिल के कोने में गुलाब के कांटे से।
* * *

ऐ दिन ! अब उठता हूँ
इस दिल में सुबह का जाम भर कर
तुम भी तपो, मेरी तक़दीर की तरह
मैं भी बरदाश्त करूँ जो लिखा है मुकद्दर में।
* * *

March 11, 2013

मुझे सब मालूम है

मुझे सब मालूम है। इतना कह कर चुप हो जाती है। 
मैं कुछ लिखने, कुछ सुनने या ऐसे ही किसी किताब को पढ़ते हुये पूरा दिन घर के ऊपरी माले में बिता देता हूँ। ये महेन का कमरा है। वह आजकल यहाँ नहीं रहता। उसकी पोस्टिंग जयपुर में है। उसकी अनुपस्थिति से घर का हूलिया बिगड़ जाता है। वह जब भी इस घर में होता है, घर भरा पूरा लगता था। मनोज की पुलिस की नौकरी ऐसी है कि हम सब मान चुके हैं कि उसे छुट्टी नहीं मिलेगी। हम कभी सोच नहीं पाते हैं कि बहुत सारे दिन उसके साथ बिता पाएंगे। लेकिन महेन के जाने के बाद से अब केक, कॉफी, चाय, पार्टी, खाना यानि सब कुछ ऐसे होता है जैसे हम अकेले हों। एक माँ, दो हम और दो हमारे बच्चे। चाय का वक़्त हुआ सेल फोन की रिंग बजी, खाने का वक़्त हुआ सेल फोन फिर से बजा। रात के वक़्त देर से छत पर टहल रहा हूँ कि फिर टिंग की आवाज़। सेल फोन की रिंग वही है। मगर एक सेंस है जो पहले से ही बता देता है कि ये उसने आवाज़ दी है। फोन को बाद में देखता हूँ, दिमाग में आभा का नाम पहले चमकने लगता है। वैसे ही जैसे पुराने नोकिया वाले फोन में एक नाचती हुई रोशनी हुआ करती थी। किसी शादी ब्याह में लगे हुये लट्टू जैसी। ऐसे ही उसका नाम ब्लिंक करता है। मैं जिस हाल में होता हूँ अपने सामान को समेटने लगता हूँ। अगर ये शाम की आखिरी आवाज़ है तो फिर अपने प्याले को देख कर फैसला करता हूँ कि कितनी देर में नीचे आ सकूँगा। फोन उठा लूँ तो उसको लगता है कि अब गयी आधे घंटे की। बिना उठाए काट दूँ तो वह सीढ़ियों पर पाँवों की आवाज़ गिनते हुये पता लगा लेती है कि मैं किस पल दरवाज़े के पास दिखाई दूंगा। वह भी मुझे देखे बिना ही कहती है। आज बड़ी देर लगाई। वही जो कहती है, मुझे सब मालूम है।

कुछ रोज़ से झगड़ा चल रहा था। उसके खत्म होने की मियाद जा चुकी थी। हम दोनों चुप थे। हमारे झगड़े की वजहें ऐसी होती है जैसे काले नीग्रो लोगों को मार कर अमरीका नए गोरे लोगों का देश बन जाता है। जैसे जंगलों से हिरणों को खत्म करके साफ सुथरे बड़े बड़े गोल्फकोर्स जैसे मैदान बनाए जाते हैं। मैं इसके विरोध में खड़ा रहता हूँ। टेम्स नदी में बढ़ते हुये कचरे के खिलाफ़ जिस तरह लोग कोक और पेप्सी के खाली केन्स की ड्रेस पहन कर वाक करते हैं। उसी तरह के विरोध प्रदर्शन पर उतर आता हूँ। अक्सर जिस बात के लिए रूठे होते हैं, उसके बारे में हम दोनों को मालूम होता है कि इसका मोल क्या है। मगर हम दोनों उस एक मामूली बात के आस पास कई सारी फालतू की बातें जमा करके उसे बड़ा आकार देने लगते हैं। छोटी छोटी बातों को आसानी से सुलझा लेने से समझदार होने की, आत्मसम्मान से भरे होने की और अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। हमारी असल लड़ाई की वजह लोमड़ी जैसी होती है कि खुद तो पाव भर की लेकिन उसकी पूंछ दो किलो की। 

कल का दिन बड़ा सख्त था। परसों रात को हम फिर मुंह फेर कर सो गए थे। उसने कहा नहीं मगर मैंने सुना था कि उसने कहा है- मुझे सब मालूम है। रात को तीन बजे तक जागता रहा। छत पर लेटे हुये अच्छी हवा में भी नींद न आई। उठ कर नीचे चला आया। मैं गुस्से या प्रेम में क्या कर सकता हूँ, लिखने के सिवा। मैंने बीस एक दिन पहले एक कहानी लिखना शुरू किया था किन्तु कुछ वजहों से उसे रोक दिया है। सोचा इसी कहानी को कुछ लिख लूँ। फिर खयाल आया कि प्रेम और नफरत के बारे में सोचते हुये ज़िंदगी का ये लम्हा जा रहा है। इसलिए अगले साल का कुछ प्लान किया जाए। मैंने अपने पाँव टेबल पर रखे और लेपटोप की स्क्रीन को ऐसे देखने लगा जैसे कि बारिश से उकताया हुआ आदमी खिड़की से बाहर बारिश को ही देख रहा हो। इस बीच लगा कि किसी ने आवाज़ दी है। ये आवाज़ हमारे फ्लेट के कमरे से आई थी। जबकि मैं रेगिस्तान में कुर्सी पर किसी मुड़ी हुई ककड़ी की तरह लटका हुआ था। मुझे याद आया वही सफ़ेद पतली रज़ाई, वही सर्द दिनों की ठंडी हवा, वही प्रेम में डूबे हुये बालकनी में बैठे रहने के दिनों की आवाज़। मैंने उदास प्रेम की सारी प्रॉपर्टी को लिखा। विगत के प्रेम में एक उदास रूमान होता है। आप याद करते हैं और फिर बड़े हो जाने को बददुआ देने लगते हैं। हाय किसलिए हो गए बड़े। 

कल दिन में उसकी किसी सहेली के बच्चे का जन्मदिन था। उसकी सहेलियाँ कौन है? सब उसके साथ काम करने वाली या काम कर चुकी मेडम्स। मैं उनमें से दो तीन को ही जानता हूँ। शायद वे दो तीन ही होंगी। यूं भी वह इस रेगिस्तान में मेरे कारण आई और रह रही है। "हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना" ये हम दोनों के बीच की पहली और आखिरी लिखित पंक्ति थी। जो साफ थी। बाकी सब बातें हमें खुद ही समझनी होती थी। सब पति पत्नी यूके के अलिखित संविधान की तरह बिना बोले एक दूसरे से संवाद करते रहते हैं। इस संवाद में अक्सर कोई तीसरा पक्ष उपस्थित हो तभी मुंह खोल कर एक दूजे को बताना होता है कि ये क्या है और इसका क्या करें? हम बड़े मॉल में होते हैं तब चीजों को देखते हुये चलते रहते हैं। फिर हमारी चाल ही बता देती है कि क्या लेना है। कई बार बिना बोले ही चीजों को नकार दिया जाता है या उनके लिए सहमति बन जाती है। किसी चीज़ को किस तरह पकड़ा हुआ है ये देख कर मैं बता सकता हूँ कि वह इसे लेने वाली है या नहीं। उसे मेरी चाल देख कर मालूम हो जाता है कि मैं आज विस्की पीने के लिए छत पर जाने वाला हूँ या नहीं। ऐसे ही उसने बेटे को मेरे पास भेजा- पापा मम्मा कह रही है कि हम दोनों रेखा मौसी के घर भैया के बर्थडे में जा रहे हैं। इतने लंबे सफाई भरे वाक्य को सुन कर मैं सिर्फ हाँ में सर हिलाता हूँ और अंदाज़ा लगता हूँ कि लड़ाई खत्म होने का समय आस पास ही है।

दिन भर मेरा हाल अच्छा नहीं रहा। मैं ठीक ढंग से खाना नहीं खा पा रहा हूँ। पिछले एक महीने में मैंने पाँच किलो वजन खोया है। मैं पचहतर से लुढ़क कर सत्तर के नीचे आ गया हूँ। वह रोज़ पूछती है कि हुआ क्या है? मैं कहता हूँ कि मुझे राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों ही पसंद नहीं है। वह खुद का उपहास किए जाने जैसे भाव से देखती है। ऐसा मुंह बनती है जिस पर लिखा हो आपसे बात करना ही बेकार है। मैं उसकी चुप्पी के बीच कहता हूँ दोनों ही खुश नसीब आदमियों के बीवी नहीं है। दोनों को ही उनकी पसंद के लोग देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। देखो उनके इस सुख से ईर्ष्या होती है। लेकिन ये बातें हम सिर्फ खुश होने के दिनों में ही कर सकते हैं। हम सब कुछ न कुछ फॉर ग्रांटेड लेते हैं। इस दुनिया की बुराई ये है कि जो भी आदमी या औरत कुछ भी जान लेता है, वह उसका फायदा उठाना शुरू कर देता है। मैं इसकी भरपाई करने में सावधानी बरतता हूँ। वह रसोई में मेरे आने की आहट सुनते ही कुछ ऐसी चीज़ खोजने लगती है जिसे हाथ में पकड़ कर दिखाया जा सके। मेरे से दूर रहना। मैं काम कर रही हूँ। 

मुझे साफ घर अच्छा लगता है। इतना अच्छा कि खुद भी साफ करना पड़े तो भी कोई हर्ज़ नहीं। एक बार गुरविंदर मेरे कमरे पर आया तब मैं पोचा लगा रहा था। उसने कहा- भाई तेईस साल की उम्र में बिना बीवी और महबूबा वाले घर में एक बार झाड़ू मार लो तो भी काम चल सकता है। ये बात उसने अपने दिल को बड़ा करके कही थी कि उसके कमरे में सप्ताह में एक बार ही झाड़ू लगता था। एफएम के स्टूडियो से बाहर निकल कर मैं अपने कमरे तक आता और साफ कमरे के बाहर फैली हुई रेत में बैठ कर विस्की पिया करता था। मुझे साफ चीज़ें खूब पसंद है, जैसे ये रेगिस्तान की रेत। मैं जाने कब से पी रहा हूँ। मेरे परिवार में शराब कभी टेबू नहीं रही। मैंने शराब को हर सामाजिक आयोजन का ज़रूरी हिस्सा पाया है। मुझे शराब पीने में मजा आता रहा है कि ये एक हाइप देती है। ज़रा खुल कर पाँव पसारने का हौसला देती है। इसके बिना दिन ऐसे बीतता है जैसे सचमुच के ज़िंदगी के नौकर ही हैं। उसे शराब पसंद नहीं है। उसने कभी नहीं पी। मैंने कभी कहा नहीं। खैर मैं सब चीजों को करीने से रखने का पक्षधर हूँ। इसलिए घर भर के कपड़े धो लेने, झाड़ू और पौचा कर लेने में खुशी मिलती है। उसे ये सब काम करते हुये देख कर अच्छा नहीं लगता। मैं कहता हूँ मैं तेरे लिए थोड़े ही कर रहा हूँ। मैं तो उनका जीना मुश्किल कर रहा हूँ, जो पड़े पड़े खाते हैं। मेरे आस पास रहने वाले चचेरे भाई, पड़ोसी और कुछ मेरी उम्र के गरीब लोगों की बीवियाँ देखती हैं। रेडियो का प्रजेंटर इस तरह के कामों में लगा है। मैं शान से कपड़े सुखा रहा होता हूँ। मैं अक्सर रसोई में खड़ा हुआ सब्जी छौंक रहा होता हूँ। ज़िंदगी काम करने के लिए ही बनी है। 

अट्ठारहवीं शताब्दी की ऐतिहासिक पानीपत की लड़ाई की तरह हमारी सबसे भयानक लड़ाई शादी के चार साल बाद लड़ी गयी थी। ये अमेरिका और रूस के बीच वाले शीत युद्ध जैसी थी। हम सचमुच का प्यार करते हैं इसलिए हम कभी एक दूजे को धक्का भी नहीं दे पाये। इतने सालों में हजारों मुद्दों पर अबोले होकर ही लड़े हैं। हम अगर मुगलिया ज़माने में पैदा हुए होते तो भी अपने मुर्गों को भी कुछ इस तरह लड़ाते कि वे दोनों मुर्गे एक दूसरे को उड़ कर चौंच मारने की जगह मुंह फेर के बैठ जाते। जो भी पहले सामने देखता या जिसके भी चहरे पर पहले मुस्कान आ जाती वह हार जाता। इस बार की लड़ाई के खत्म होने का वक़्त करीब ही था मगर मुंह फेर का बैठे रहने का फायदा ये हुआ कि महेन के कमरे में टीवी देखते हुये मैंने अपनी पीठ का सेक किया। इससे मांस पेशियों को खूब आराम आया। टीवी पर कुछ फूहड़ हास्य देखने से या जेठा भाई की बबीता जी पर नज़र को देखते हुये मैं चौंकता रहा कि वह मेरे बिस्तर के पास ही खड़ी है और कह रही है। मुझे सब मालूम है। 

सेल फोन पर एक दोस्त ने पूछा- दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की कहाँ है? मैंने कहा रसोई में चाय बना रही है। लेकिन उसने मुझे चाय नहीं पिलाई। वह ऊपर वाले माले में आई तो मैंने कहा भाई चाय न पिलाने की लड़ाई थोड़े ही है। वह बोली आपने कहा नहीं। मुझे अचानक याद आया कि उसने चाय बनाई ही न होगी। वह अकेली पी ही नहीं सकती है। वह आज अपनी किसी देवरानी के पास भी नहीं जाएगी। ये सब याद आते ही मेरी शाम बहुत सुंदर हो गयी थी। मैंने कुछ सुकून को आते हुये देखा। एक यकीन को दोहराया। कुछ चीजों को आज़ादी दी। फिर रात आठ बजे तक माँ भी आ रही थी। मैं रेलवे स्टेशन चला गया। मैं आठवीं कक्षा तक रेलवे स्कूल में ही पढ़ा हूँ। इन रेल की पटरियों पर इंजन बन कर चलते हुये खूब मजा उठाया है। मैंने पाया कि वक़्त का दरिया बहुत बह चुका है। रेल की पटरियों के पास बिखरा रहने वाला सूनापन किसी और जगह की तलाश में चला गया है। लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। मैंने माँ से पूछा था कि आप मेरे साथ पैदल चलकर आना पसंद करेंगी? माँ ने कहा- हाँ बहुत आराम से। मुझे पैदल चलने में सुख होता है। मैं और माँ एक दूजे के बराबर चलते हुये घर तक आ गए। माँ है तब तक जाने कितनी ही चीज़ें बची हुई है। एक वह चीज़ भी जिससे आप खूब डरते रहते हैं, बड़ा हो जाने वाला डर। 

कल रात उसने रिंग नहीं की। उसने बेटे को भेजा। मम्मा आपका वेट कर रही है। हमने खाना खाया और छत पर सोने चले आए। बच्चों को ज़रा झपकी आई होगी कि मैंने उसके हाथ को छुआ। वह किसी बॉलिंग गेम के बाल वे पर बॉल की तरह लुढ़क गयी। मैं बॉलिंग पिन की तरह चित्त हो गया। इस ज़िंदगी में उसकी कोई बॉल भी खाली नहीं गयी है। उसने हमेशा टेन-पिन स्कोर किया है। मैंने कहा- तुमको ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसने कहा- रहने दीजिये। वह कुछ उदास होने का मुंह बनाती या शिकायत करती उससे पहले ही मैंने कहा- मुझे सब मालूम है। वह भूल गयी कि बच्चे सो रहे हैं। उसकी आवाज़ ऊंची हो गयी। उसने कहा- आपको कुछ नहीं पता, मुझे सब मालूम है। 

मैं मुस्कुराया - हे भगवान ये कहीं सही लड़की के बारे में न सोच रही हो। मगर लड़ाई इस बात की नहीं थी।
* * *

[तस्वीर : नौ फरवरी 2013, दिल्ली का प्रगति मैदान]

March 10, 2013

उधड़ी सिलाई से दिखती ज़िंदगी

कमरे की दीवारों का रंग उड़ गया है। उस कारीगर ने जाने कैसा रंग किया था। उसे खुद इसका कोई नाम मालूम न होगा। ऐसे नामालूम नाम वाले रंग के जैसी एक नामालूम चीज़ है। भारी पत्थर की बनी हुई घोड़े की नाल है। चुपके से सर के ऊपरी हिस्से में सलीके से फिट हो गयी है। जिस तरफ सर को घुमाओं साथ साथ उधर ही घूम जाती है। सिंक्रोंनाईज्ड है। बोझ नहीं है। दिमाग के भीतर के तरल द्रव्य के ऊपर तैर रही है। लगता है कुछ अनचाहा रखा हुआ है। ऐसा पहले नहीं था। 

सीना जैसे दुबले जानवर की पीठ है। भूल से इसके भीतर की ओर कोई जीन उल्टी कस दी गयी है। घुड़सवार लौटने का रास्ता भूल गया है। सांस लेना भी एक काम बन कर रह गया है। एक जगह बैठो सांस लो। न बैठ सको तो उठ कर चलो और चलते हुये सांस लो। सांस न लो। ये मुमकिन नहीं है। याद रख कर सांस लेना भूलते ही कोई छटपटाता है। जैसे किसी बासी पानी से भरे हुये अक्वेरियम में कोई मछली ताज़ा सांस की उम्मीद में पानी की सतह को चूमती है और डर कर वापस लौट आती है। वही अपारदर्शी, धुंधला और गंदला पानी जीवन बन जाता है। 

मट्ठा में समझते हो। हाँ छाछ। पतला किया हुआ फेट-फ्री दही। 
मैं फ्रीज़ का दरवाजा खोल कर रोटी खोजता हूँ। रोटी नहीं मिलती, दही का कटोरा निकाल लेता हूँ। जालीदार अलमारी में साग खोजता हूँ मगर कटोरदान हाथ आता है। तीन चपाती ले लेता हूँ। मट्ठा पीने से शायद सांस आएगी। मुझे छोटी कटोरी चाहिए मगर मैं एक चमच हाथ में लेकर खड़ा हूँ। मुझे एक ऐसी झेरनी चाहिए जिसे दिमाग के तरल में रखूँ और सिर के ऊपरी माले में रखी हुई घोड़े की नाल की आकार की भारी चीज़ को मथ दूँ। भूल जाता हूँ कि मुंह में रोटी का टुकड़ा बिना साग के रखा है या साग भी है। ज़रा देर सोच कर मालूम करता हूँ। मुंह में रोटी का टुकड़ा ही नहीं है। पकी हुई लौकी के टुकड़े और कुछ धनिये की पत्तियाँ है।

ये पेन ऊपर की जेब में क्यों रखा है।
मैं अपने हाथ वाली मट्ठे से भरी कटोरी को रसोई के स्टेंड पर रख कर अपने सीने पर हाथ रखता हूँ। वहाँ जेब ही नहीं है। मैंने टीशर्ट पहना हुआ है। मुझे याद आता है कि मैंने पेन को नीली जींस के दायें पॉकेट में रख लिया है। घर के ऊपर वाले माले से आवाज़ आती है। अपना हर दिन ऐसे जीयो, जैसे कि आखिरी हो। लतीफ़ेबाज़ फ़िल्मकार रोहित शेट्टी की फ़िल्म का एंड होने को है। मुझे याद आता है कि मिथुन दादा बहुत बूढ़े हो गए हैं। जैसे मैं बहुत उलझ गया हूँ। दोपहर का भोजन हो गया है फिर ये मट्ठा क्यों बचा हुआ है। अचानक, खुद को देखता हूँ और पाता हूँ कि शॉर्ट् पहने हुये हूँ। वरना कोई कहने वाला था। टक-इन किया करो।

उसका नाम माधवन था। वह कमीज़ को ट्राउजर से बाहर रखे किसी फ़िल्म के दृश्य में नथुने फड़काता हुआ, भय के कारोबार की चिंता करता रहता था। मैं किसकी चिंता करता हूँ। पाँव पर किसी का हल्का सा स्पर्श। कुछ सूखी पत्तियाँ है। गेंदे के फूलों की एक माला से छिटक कर आँगन में फर्श को चूमती फिर रही हैं। मैं ज़रा झुक कर उनको उठा लूँ इससे पहले याद आता है कि मट्ठे में सिर्फ गुलाब की सूखी पत्तियाँ डाली जा सकती हैं।

मैं रोज़ तय करता हूँ कि लिखना छोड़ दूँ।
* * *

[ Painting Image Courtesy : Sharon Cummings]

March 9, 2013

रेगिस्तान में आधी रात के बाद


आज की सुबह सोचा है अच्छी विस्की होनी चाहिए। क्योंकि मेरे लिए अच्छे जीवन का मतलब अच्छी विस्की ही होता है। मैं करता हूँ न सब-कुछ। मानी जो इस दुनिया में एक अच्छा पति करता है, पत्नी के लिए। पिता, बच्चों के लिए। बेटा, माँ के लिए। भाई, भाई के लिए। महबूब, महबूब के लिए। ये सब करते जाने में ही सुख है। ज़िंदगी और कुछ करने के लिए नाकाफी है। इसलिए कि मैंने ये चुना है, इसके मानी न जानते हुये चुना है। मगर अब तो फर्ज़ है कि किया जाए। नींद नहीं आ रही इसलिए सोचा कि स्कूल में जो अक्षर लिखने सीखे थे, जिन अक्षरों के लिखने से पिता खुश हुये थे। जिनको देख कर मास्टर साहब के चहरे पर मुस्कान आई थी। जिनको पढ़ कर तुमने महबूब होने में खुशी पायी। उन्हीं अक्षरों से आज खुद के लिए सुकून का लम्हा बुन लूँ, इसलिए लिख रहा हूँ। 

रेगिस्तान में आधी रात के बाद

जाने क्या क्या आता है याद
और फिर इस तरह शुरू करता हूँ समझाना खुद को।

कि किसी के हिस्से में नहीं बचती ज़िंदगी
इसलिए इस रात का भी
ऐसे ही कुंडली मारे हुये, ज़िंदा रह पाना मुमकिन नहीं है
और तुम गुज़रते हुये उसके ख़यालों से
भले ही सो न सको सुकून की नींद, मगर ठहरेगा कुछ भी नहीं।

उसकी आमद की खुशी को पिरोया था जिन दिनों में
डूब गए वे दिन
और फिर हवा के एक झौंके ने उलट दी मेज पर रखी उसकी तस्वीर।

सर्द रातों में खुला पड़ा दरवाज़ा, एक सफ़ेद पतली रज़ाई
एक उसका झीना कुर्ता
एक शहर की रोशनी में खोये हुये चाँद की भरपाई करता उसका चेहरा
एक मैं अपने ही गुमशुदा होने के अफसोस को सीने से लगाए हुए चुप पड़ा हुआ।

ये कोई दीवाली की रातें न थी
ये कोई बसंत के बाद की खुशबू से भरी सुबहें न थी
ये गरम रुत के सबसे बड़े दिनों की तवील शामें भी न थी
ये ऐसे अबूझ वक़्त के हिस्से थे
कि जितनी बार चूमना था उतनी ही बार बढ़ जानी थी बेक़रारी
और उतना ही भरते जाना था ज़िंदगी का प्याला याद से।

ये और बात है कि आँखों से दूर होते ही
उसने झटक कर अलग कर दिया होगा मुझे
कि उसके हिसाब में जाने क्या होता है ज़रूरी, क्या नहीं?
मेरे लिए सुबह उसकी छातियों के बीच अपना सर रख कर सुनी गयी धड़कन
आखिरी ज़िंदा चीज़ की याद है।

इस वक़्त रेगिस्तान में बीत चुकी है आधी से ज्यादा रात
आँधी उड़ा रही है मेरे लंबे बाल।
मैं उदास हूँ, मेरी आँखें पनियल हैं,
बहलाता हूँ खुद को कि ये खोये हुये घरवालों की भीनी याद का मौसम है
मगर हर कोई जानता है इस सृष्टि में कि उसका नाम क्या है
क्या चुभ रहा है मुझे बिस्तर की सलवटों में
किसलिए वह होकर भी नहीं होता।

सूखी पड़ी नदी में जिस तरह भंवर खाती हुई उड़ती है रेत
उसी तरह उसके बारे में बेहिसाब बातें घूमती हैं मेरे सिर के पास
मैं घबराता हूँ, खुद को हौसला देने के लिए फरियाद करता हूँ
सोचता हूँ कि क्या किसी का महबूब हुआ करता है उसके लिए मुबारक।

बस एक आखिरी बार कर लूँ दुआ
कि मुझे दे दो कोई नींद की सुराही से कुछ बूंदें, कि मैं सो सकूँ
कि अपनी ही कही बात पर एतबार ज़रा कम है कि किसी के हिस्से नहीं बचती ज़िंदगी।

मेरे लिए मुश्किल है ये घड़ी गुज़ारना भी
कि जाने कैसे तो बीतेगी ये रात कैसे खत्म होगी ज़िंदगी।
* * *

[तस्वीर मेरी ख़ुद की ही है पिछले शुक्रवार 1 मार्च की दोपहर को ली हुई] 

March 8, 2013

शौक़ जीने का है मुझको, मगर...


सुबह ज़रा सी ठंडी थी। रंगों वाला त्योहार निकट आ रहा था। सबसे पहली हलचल रेगिस्तानों इलाकों में ही हुआ करती है। मौसम बदला और दिन में आँधी चलने लगी। रेगिस्तान और धूल भरी आँधी का साथ अटूट है। मैंने पहले माले के कमरे की एक खिड़की बंद करते देखा कि बाहर का दृश्य भी परिवर्तित हो रहा है। सर्द दिनों में ये गलियाँ उन किनारों पर लोगों से भरी रहती हैं, जहां धूप का कोई टुकड़ा आ गिरता हो या कहीं अलाव जल रहा हो। लोग सारे दिन अपने काम करते हुये ऐसी जगहों पर आते जाते रहते हैं। रेगिस्तान का जीवन सुकून का जीवन है। यहाँ आदमी एक संतोष के साथ पैदा होता है। कुदरत ने यहाँ के लिए जो ज़रूरी काम तय किया है वह है पानी का प्रबंध करना। आज़ाद भारत ने इस मामले में आशातीत सफलता अर्जित की है। ये सफलता पीने के पानी की है। खेती के लिए इस तरह की सफलता अभी बहुत दूर है कि हर आदमी को अपनी मांग के अनुरूप खेत जोतने को पानी मिलता रहे। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगर आबादी पर कुछ अंकुश लग सका और लोग पढ़ लिख कर ये समझने लगे कि विकास और आबादी का रिश्ता क्या है तो ज़रूर इस देश का भविष्य चमकते हुये सूरज की तरह होगा। गली में लोगों की बेहिसाब भीड़ जो धूप सेकती हुई बैठी रहती थी वह गायब थी। यानि गरम रुत के इन पहले ही दिनों में लोगों ने धूप से बचाने के लिए छाया वाली जगहों का रुख कर लिया था। मुझे सूनी गलियाँ बड़ा डराती हैं। ये अच्छा नहीं लगता कि जहां देखो वहाँ बंद दरवाजे और बंद खिड़कियाँ। मैं किसी की तलाश में भटक रहे प्रेमी के जैसा खुद का हाल पाता हूँ। कि खोजना जारी रखना है देखना है किसी दिव्य दृष्टि से बंद दरवाजों और खिड्कियों के भीतर। मैंने तेज़ चलती हवा से उड़ कर आती हुई मिट्टी से बचने के लिए खिड़की को बंद कर दिया।

सुबह के वक़्त चाय पीने का हिसाब कुल मिलाकर बेहिसाब है। जिन घरों में चाय पी जाती है, वहाँ केतली और आग दोनों मिलकर प्रेम का आसव बनाते रहते हैं। मैं कई दिनों से उद्विग्नता से ग्रसित हूँ। इसे अँग्रेजी भाषा में एंजायटी कहते हैं और उर्दू में इज़्तराब। ये मानसिक रूप से उलझनों में घिरे होने के शब्द हैं। हमारे मस्तिष्क के तरल द्रव में कब किस तरह की क्रिया प्रतिक्रिया के कारण क्या हो जाए कह पाना संभव नहीं है। हम कब इस उद्विग्नता के रास्ते होते हुये निराशा, हताशा और अवसाद के घर पहुँच जाएँ कहा नहीं जा सकता है। मैं खुद को कई सारी बातें समझा रहा था लेकिन बेअक्ली को अक्ल का आसरा नहीं मिल सकता है। ये ज्ञान अक्सर सिर्फ दूसरों को देने के काम आता है। हम खुद के लिए सिर्फ इतना कर सकते हैं कि जीवन जीने के तरीकों में छोटे छोटे किन्तु ज़रूरी बदलाव लेकर आयें। मैंने घर के बहुत सारे काम करने शुरू किए। उन कामों में खुद को व्यस्त रखा और सुबह को बिता दिया। ऐसे काम करते हुये हो सकता है कि हमें लगता रहे कि कोई फायदा नहीं हुआ है, लेकिन हमें ये याद रखना चाहिए कि जितनी देर हमने काम किया वह वक़्त तो सुकून से बिता। हम जिस चिंता के फेर में थे उसे ज़रा सा भूल तो सके। ज़रा सा काम बहुत बार होकर एक बड़ा काम हो जाता है। जिस तरह मैंने अपनी चिंताओं का पोषण किया है उससे ज्यादा वक़्त उनको हटाने ले लिए करना होगा इसलिए ये तय है कि इसमें वक़्त भी ज्यादा लगेगा।

मैं चाय छान रहा था। मैंने देखा कि चाय की छलनी ने चाय की पत्तियों और कूटी हुई अदरक को रोक लिया और चाय के आसव को नीचे मग तक जाने दिया। ये कोई महान वैज्ञानिक आविष्कार नहीं है। हमने छलनी इसी लिए बनाई है। लेकिन मेरे मन में खयाल आया कि मेरा मन इस मग के जैसा हो गया है। जो सब चीजों को रोक कर बैठा है और पूरी तरह भरा हुआ है। इसमें अब कोई नयी चीज़ नहीं आ सकती है अगर हमने कुछ और भरने की कोशिश की तो ये छलक जाएगा। इसके विपरीत छलनी ने ज़रूरी और गैर ज़रूरी को अलग कर दिया। मैंने चाय के मग को देखते हुये सोचा कि मेरा मन भी छलनी की तरह हो सके तो कितना अच्छा हो। मैं जिस हताशा और नाउम्मीदी को इकट्ठा कर के बैठा हूँ उसे छान कर फेंक सकूँ। इससे मेरे मन के मग में भरा हुआ बोझ भी हल्का और मीठा जो जाएगा। सारी कड़वाहट दूर हो जाएगी। लेकिन ये सब बहुत आसानी से नहीं हो सकता है। समय और बहुत सारा परिश्रम चाहिए। मेरे सेल फोन में नुसरत साहब की सूफी क़व्वालियाँ हैं। अब कहा जा सकता है कि वे थी। क्योंकि मैंने उनको कुछ समय के न समझ आने वाले अँग्रेजी गीतों से रीप्लेस कर दिया है। इसलिए कि जीवन के गहनतम विचारों को सुनने और समझने के लिए स्वस्थ मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। सूफी संगीत वैराग्य बुनता है। वह जीवन को आनंद से बिताए जाने और दुखों से मुक्ति के लिए खुद को कुदरत को सौंप देने का आह्वान करता है। इसे सुनते हुये कई बार इसके अर्थ और प्रभाव आपको, आपकी ही नासमझी के कारण उल्टे रास्ते भी ले जा सकते हैं।

ज़िंदगी सबके लिए भारी होती है। अगर हम उसका सही तरीके से उपयोग न करें तो वह जो आशा का दीया है उलट कर तेल बिखेर सकता है, बाती को मिट्टी में डाल सकता है। हमें अपनी ज़िद से परे, सबसे बेहतर हाल चुनना चाहिए। जैसे कि मैंने तुमसे प्रेम करना चुना तो उसके साथ बेचैनी चुनने की जगह इंतज़ार चुनना चाहिए था। अब खुद की गलती को सही कर रहा हूँ। मगर दिल है कि मुज़फ्फ़र वारसी के इस शेर की तरह ज़िद को छोड़ना नहीं चाहता है। "ज़िंदगी तुझसे हर एक सांस पर समझौता करूँ, शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना भी नहीं"। 

March 7, 2013

प्रेम, हथेली के बीच का फफोला


नरम गुदगुदे बिस्तरों में किसी गरमाहट को बुनते जाने का मौसम रेगिस्तान से विदा हो चुका था। आधी रात को नींद ने सुख के बिस्तर पर आने से मना कर दिया। कभी मैंने रेलगाड़ी के निम्नतम दर्ज़े के डिब्बे में दरवाज़े पर नींद को पाया। रेल के सफ़र में नींद के झौंके आते रहे और मैं अखबार बिछाए हुये न बैठ सकने जितनी जगह पर सो गया था। ज़िंदगी ऐसी ही है। ऐसा ही बर्ताव करती है। मैं उठ कर बैठ गया। आभा ने पूछा क्या हुआ? मैंने कहा कोई बात नहीं है। मैं घर के नीचे वाले तल पर जाकर दवा खाकर आता हूँ। मैं ज़रा सी देर लगा कर आया। रात के इस गरम मौसम में उसे भी नींद कहाँ आनी थी। पहले माले तक आने में शायद वक़्त ज्यादा लगाया इसलिए उसने पूछा बड़ी देर लगाई। मैंने कहा कि अलमारी के सामने खड़ा हुआ, सोचने लगा था। कि मैं खुद को धोखे क्यों देता हूँ। जो मुझे साफ दिखता है, उसके अपनी मर्ज़ी के माने क्यों निकालता हूँ। मैं खुद के लिए बड़ा लापरवाह आदमी हूँ इसलिए परेशान हूँ। उसने कहा- न सोचिए। सो जाईए। 

मेरी नींद के बीच एक लहर थी। वह बार बार मुझे रोक रही थी। मैं इस जगत में कुछ ऐसा था जैसे समंदर में उछलती हुई छोटी खाली प्लास्टिक बोतल हो। जिसका अपना कोई वुजूद नहीं होता। लहर आती और अपने हिसाब उठा गिरा देती है। मैं भरी हुई बोतल होता तो ज़रा सा प्रतिरोध भी करता मगर मेरे भीतर का द्रव्य सूख चुका है। मैं खाली होकर भी खाली नहीं हूँ। बस बेढब के विचारों से भरा हुआ हूँ। मैंने कहा सुनो। मैं ज़रा देर लेपटोप पर काम कर लूँ। उसने कहा कि ऐसा करने से नींद न आएगी। मैंने कहा कि इस बेचैनी को बाहर का रास्ता दिखाने का एक ही तरीका है। शब्द। 

अपने दिल का हाल लिखने लगता हूँ। चार पंक्तियों के बाद लगता है कि ज़िंदगी के पानी में उठ रही बेचैनी की लहरों पर सूखे हुये बेबस पत्ते जैसा एक लम्हा स्थिर होने को है। मैंने लिखा कि ज़िंदगी के जींस में बदलाव नहीं किया जा सकता है। जिसकी फितरत दुख उठाना है वह हर हाल में उसे खोज लाएगा। इसलिए मैं उसका नाम दिल में छुपा लूँ पूरा का पूरा ताकि बाहर की खोज का काम खत्म हो जाए। उसके आचरण से मुझे होने वाली तकलीफ के बीच एक पलकों का पर्दा आ सके। कविता को पूरा करते ही पाता हूँ कि एक दोस्त का मेसेज रखा हुआ है। मैं ऐसे ही उसे कहता हूँ कि जाग रही हो तो कविता पढ़ लो। वह बिना देखे कहती है। आपकी कविता में मेरे लिए कुछ नहीं होता। मैं कहता हूँ कि अच्छा है न, ऐसी कविताओं में क्योकर हो तुम्हारा नाम। 

केसी कभी बताओगे वह कौन है?
मैं कहता हूँ- नहीं। 
* * *

रात एक बजे कहीं से भूला भटका हुआ नींद का झौंका, एक सपना साथ लेकर आया। मैं किसी कॉफी शॉप में कुछ ऑर्डर कर रहा हूँ। सुबह का वक़्त है। मैं कुछ वकीलों के बीच घिरा हुआ हूँ। सब तरफ मेरी पहचान के चहरे हैं। वे पश्चिम के भोजन का ऑर्डर दे रहे हैं। वे कहीं बैठ पाने की जगह को दबा लेने को आतुर हैं। उनके मन में दया नहीं है। उनमें भावना जैसा कोई जींस नहीं दिखता है। मैं अचानक से उसी कॉफी शॉप में एक सलून पाता हूँ। कहता हूँ मुझे हेयर कट चाहिए। वह मोटा सा आदमी मेरे बालों पर एक फव्वारे से पानी छिड़कने लगता है। मैं देखता हूँ कि बाल पूरे भीग गए हैं। भीगे हुये बाल अच्छे दिख रहे हैं। उससे पूछ लेना चाहता हूँ कि क्या कोई ऐसी क्रीम है जिससे मेरे बाल हरदम ऐसे ही भीगे हुये दिखते रहें। वह इसका कोई जवाब नहीं देता। मैं अपने बालों को बड़ी हसरत से देखता हूँ। मैं इनको कटवाना नहीं चाहता हूँ। सपना फिर किसी और रेस्तरां तक ले जाता है। फिर वे ही लोग। अचानक से सपना मुझे एक पुराने घर में ले आता है। वह घर मेरे सपनों की यात्रा का एक ज़रूरी और अस्थायी पड़ाव है। उस घर से बाहर देखते हुये पाता हूँ कि मेरे पास एक कड़ी दोपहर है। मैं चाहता हूँ किसी सड़क के किनारे किसी पेड़ की छांव में तनहा बैठ सकूँ। 
* * *

सुबह का अखबार एक स्मृति संदेश लेकर आता है। पापा की पाँचवीं पुण्य तिथि। वही नेक आदमी जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपने दिल का हाल इस तरह किसी पोस्ट में लिख कर सुकून पा सकूँ। वही आदमी जिसकी तस्वीर के सामने खड़े होकर पंद्रह दिन पहले मैंने कहा था- पापा मैं अच्छा आदमी हूँ। मैं किसी का दिल नहीं दुखाता हूँ। मुझे इस एनजायटी से बाहर निकालो। कहता हूँ कि मैंने आपसे जीवन भर जाने क्या क्या मांगा होगा। आज एक बार आपसे ये और मांगता हूँ। उस वक़्त, मैं बेहिसाब दर्द और बेहिसाब खुशी से भरा हुआ उनकी तस्वीर देख रहा था। मुझे इस तरह के हाल में देख सकने के लिए घर में कोई नहीं था। मुझे लगा कि पापा को कह दिया, अब सब आसान हो जाएगा। उन पर यकीन है। वे मेरी बात सुनते हैं। 

ये उन दिनों के ठीक बीच वाले दिन की बात है, जब मैं दर्द के झूले पर सवार था। झूले की हर पींग के साथ आँसू निकल आते थे।
* * *

सुबह के इन ख़यालों को किसी के रुदन ने तोड़ा। 
सामने वाले घर का इकतालीस साल का आदमी चल बसा है। उसका नाम रामेश्वर लुहार था। मेरी स्मृतियों में वह मुझे दस साल का याद आता है। उसके पिता घर में बनी एक भट्टी में लोहा कूटते थे। वह एक दिन मेरे पास आया। उसके हाथ में एक लोहे की छड़ थी। उसने कहा कि तुम इसको खींच सकते हो। मैंने कहा- हाँ। मैंने उसकी छड़ खींच ली। वह उदास हो गया। उसने कहा- मैं अभी आता हूँ। वह अपने घर के अंदर जाकर आया। उसने फिर से मुझे कहा- एक बार और खींचोगे। मैंने कहा- हाँ। उसने लोहे की छड़ मेरे सामने की। मैंने उसे खींचने के लिए पकड़ा तो दोनों हथेलियाँ जल गयी। इस बार वह घर के अंदर बुझी हुई भट्टी के बचे हुये अंगारों में छड़ को गरम करके लाया था। मेरे हाथों में फफोले निकल आए। वह भागता हुआ गली में दूर गायब हो गया। उसकी माँ ने मेरे हाथ देखे तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। 

कई दिनों तक अपनी हथेली के छालों को लिए हुये मैं एक बारह साल का लड़का स्कूल और घर के बीच सब कुछ भूल जाना चाहता था। वक़्त ने हथेली में बनी हुई भाग्य की रेखाओं पर उग आए फफोलों को मिटा दिया। वे पुराने पत्तों की तरह झड़ कर गायब हो गए। मेरे आँसू सूख गए। मैं अपना दर्द भूल गया। मगर ज़िंदगी मुझे बहला कर फिर कहती है, उम्मीद की छड़ी थामोगे? मैं कहता हूँ- हाँ। वह फिर से मेरे नसीब की हथेलियों पर कुछ फफोले रख देती है। रामेश्वर, मुझे कहता था। आप रेडियो में कितना अच्छा बोलते हो। आज की शाम को एक गाना ज़रूर बजाना। बींटी म्हारे सोने री हवती, बींटी म्हारे रूपे री हवती। राजस्थान का एक लोकगीत है। खोयी हुई मुन्दरी की याद का गीत। यह गीत उस खोयी चीज़ की तारीफ करता है। कहता है कि वह सोने की थी, वह अनमोल थी, वह मेरी इस अंगुली में रहती थी, उसके होने से मेरी अंगुली का रंग गोरा था। एक दिन ऐसे ही ज़िंदगी की अंगुली में पहनी हुई सांस जैसी मुन्दरी खो जाती है और पीछे रह जाती विष की खली। 

खिड़की के नीचे कुछ लोग सर पर शोक को बांधे हुये हुये बैठे हैं। मैं भी रामेश्वर को एक कंधा देने जा रहा हूँ। वह चला गया है मगर मेरे हाथ में न दिखने वाले बचपन के प्रेम के अमिट फफोले हैं। प्रेम ऐसा ही होता है, हथेली के बीच के फफोले जैसा।

जैसी तुम्हारी याद है। 
* * *

March 6, 2013

कि जी सकूँ एक मुकम्मल उम्र


रात होते ही हर कहीं अंधेरा उतरता है। मुझे सबसे ज्यादा पहाड़ों पर दिखाई देता है। सहसा खयाल आता है कि सबसे घना अंधेरा वहाँ पर है जहां कुछ दिख नहीं रहा है। पहाड़ तो कितने सुंदर नज़र आ रहे हैं इस रात के आँचल में चुप खड़े हुये। मैंने पालथी लगा कर छत पर बैठे हुये, पहाड़ से पूछा- तुम किस तरह अपने महबूब से प्यार करते हो। तुम अपने प्रेम में अटल खड़े हो या इंतज़ार में। पहाड़ मुझे जवाब नहीं देता है। संभव है कि पहाड़ को इतना स्थिर होने का अभिमान है। मैं उससे मुंह फेर कर टहलने लगता हूँ। अचानक याद आता है कि पहाड़ पर देवताओं के भी घर हैं। उन तक जाने के लिए बने रास्ते पर रोशनी का प्रबंध है। मैं उस रास्ते को देखने के लिए मुड़ता हूँ। ईश्वर, उदास है। चुप बैठा हुआ है पहाड़ की ही तरह एक मूरत बन कर। ऐसे हाल में क्या तो उसको कोई अर्ज़ी दी जाए, क्या उसको बतलाया जाये। मैं उसे उसी के हाल पर छोड़ कर वापस मुड़ जाता हूँ। 

ठंडी हवा का एक मासूम झौंका आया और आँखों को कुछ इस तरह छेड़ गया कि वे नम हो गयी। इस नमी में दिखता है कि धरती है, घर है, दीवारें हैं, मुंडेर है, हवा है, आसमान है, और कोई है जो मुझे रुला रहा है। वह चाहता है कि ये आदमी कई दिनों से तकलीफ में है। इसे अपने दिल का बोझ हल्का ज़रूर करना चाहिए। इसलिए वह रुलाता जाता है। जैसे शाख से तोड़ा हुआ फूल पानी में डालने पर एक बार का ज़िंदा होने जैसा दिखने लगता है वैसे ही मैं पाता हूँ कि रो लेने में बड़ा सुख है। मैं आज नया नया सा हूँ। मैं भीग रहा हूँ। मेरे चश्मे पर एक नमक की परत चढ़ रही है। जैसे हम ईचिंग से काँच को धुंधला कर देते हैं। इस लायक कि कोई न देख सके अंदर का हाल। लेपटोप का की बोर्ड भी धुल रहा है। सोचता हूँ कि ये कोई धुलने की चीज़ तो नहीं फिर मुस्कुरा देता हूँ कि दिल भी क्या रोने के लिए बना? 

बेईमान आदमी सबसे पहले सोचता है
सिर्फ बेईमानी के बारे में।

निर्मल शैतान सोचता है
शैतान की पवित्र प्रेमिका के बारे में।

चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो नसीब
चालीस की उम्र तक मिल ही जाता है एक खरा महबूब।

और चौबीस करेट सोना, कभी खड़ा नहीं रह सकता अकड़ कर।
* * *

भर रहा हूँ शराब इसमें सिर्फ इसलिए
कि मालूम हो साबुत बचा हुआ है पैमाना।

तुमने जिस तरह तोड़ा है उसका कोई जवाब नहीं
एक भरम तो मगर हो सबके पास जीने के लिए।
* * *

और सच में मैंने चाहा था उसे
कि जी सकूँ एक मुकम्मल उम्र
उसके आसरे।

कहीं पत्थर नहीं होते कहीं दीवारें नहीं होती।
* * *

ओ पहाड़ पर बैठे हुये ईश्वर
तुम अपने तक आने के रास्ते की
बत्तियाँ बुझा कर सोया करो।

कि जब भी महबूब बंद कर देता है, रास्ता
जाने क्यों, तुम तक आने को जी चाहता है।
* * *

कैसी लाईफ बाबू और कैसा केयर
सब जी का जंजाल है, खुद ही रूठते हैं खुद मान जाते हैं।
* * *

तुम हो कहीं ?
जी चाहता है कि
आखिरी अच्छे आदमी से बात कर ली जाए।
* * *

क्या किसी के पास बची है थोड़ी सी विस्की
या थोड़ी सी गैरज़रूरी हिम्मत
या फिर बचा हुआ हो कोई टुकड़ा आत्मसम्मान का।

उधार दे दीजिये, कि एक पूरी ज़िंदगी का सवाल है।
* * *

ईश्वर मैं उठ रहा हूँ तुम्हारा नाम लेकर
गर बची हो ज़रा सी भी गैरत
तो बचा लेना खुद का बेड़ा गर्क होने से।
* * *

[तस्वीर जैसलमेर के गड़िसर तालाब की है। पिछले साल ली थी। सोच रहा हूँ कि महबूब न हुये होते तो इतनी सुंदर जगहें कैसे बनाई जा सकती]  

March 3, 2013

उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं होता


इतवार की सुबह है और बाद मुद्दत के मन का हाल बेहतर है। कुछ काम किए हैं और कुछ कर लेने का इरादा है। एक खयाल दिल से दिमाग तक फेरे लगा रहा है कि पिछले महीने से भर से मुझे बरदाश्त कर रहे दोस्तों को शुक्रिया कह दूँ। शुक्रिया, शुक्रिया और दिल की गहराई से शुक्रिया। महबूब एक ही है मगर प्यार आप सबसे है। जो मुझे बचा लेते हें बुरे दिनों में। आगे कुछ और लिखूंगा तो खुशी में आँखें भीग जाएगी। आप समझ सकते हैं। ये कुछ बेवजह की बातें हैं जो शुक्रवार एक मार्च और शनिवार के दरम्यान लिखी थी। ये कहीं उदास कहीं उम्मीद से भरी हैं कि उदासी से अपने ओरबिट की ओर संक्रमण के समय की कवितायें हैं।

ये कवितायें लिखने से पहले मैं कमरे के अंदर के नीम अंधेरे से घबरा कर बालकनी में आकर बैठ गया था। बाहर खुली रोशनी से उम्मीद थी कि वह मुझे उदासी की छुअन से दूर रखेगी। यातना के तीस दिन गुज़रने के बाद आखिर सब्र को बहला कर लाया। सोच रहा था कि लौट जाऊँ फेसबुक के दोस्तों के पास मगर ज़रूरी था कि दर्द की इस दास्तां को लिखना जारी रखूँ और पूरा होने पर ही लौटूँ। मैंने खुद ही काट डाली थी सुकून की शाख और दोष लगाने को कोई सर भी नहीं है। मैं खुद के लिए दुआ करता हूँ कि बदनसीब आदमी क्यों खुद के लिए खड्डे खोदता है और क्यों उन में गिर कर फरियादें करता है। शुक्रवार की सुबह माँ ट्रेन से जोधपुर गयी है। बच्चे और बीवी स्कूल चले गए थे। एक दो माले का घर था पिताजी का बनाया हुआ और एक मैं था। कुछ ये शब्द थे।

फूल के दिल को चीरती हुई निकलती है
सुई फूलवाले की
इसके बिना मुमकिन नहीं है दो फूलों का एक साथ हो पाना।
* * *

वहाँ ज़रूर रखी होती है एक गहरी सांस
जहां रखा है तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।
* * *

चुप्पी की खुशबू बांध लेती है हवा के पंख
पूरा जंगल भर जाता है अचरज से
कि आवाज़ देकर छिप जाता है कोई परिंदा।

मैं आँखें मूँद कर चुरा लेता हूँ ये दृश्य।
* * *

आज सोचा है
कि लगा ही दूँ विज्ञप्ति।

कि जिसे भी उठाना है दुख
वह आ सकता है प्रेम करने।

शैतान को चाहिए एक खुशी की घड़ी वापस।
* * *

प्यार एक सरल रास्ता है
मगर शैतान चलता रहा है, दुख के अंगारों पर
तुम तक आने के लिए।

जैसे कि मेरे शब्द पढ़ कर अक्सर लोग कोसते नहीं मुझे
समझने लगते हैं मेरा दुख अपनी प्रेमिका को याद करके।
* * *

ऐसा नहीं है कि मैं मरूँगा नहीं
मगर इस तरह मरना, क्या तुम देख सकोगी?

आँखें फेर लेने से कुछ न होगा
मौत का दृश्य उतरता है उस वक़्त
जब आँखें फेरने जितनी ताकत नहीं बचती किसी के दिल में।
* * *

तुम्हें उन सब
बोसों की गहराई की कसम है
कि भुला देना सब कुछ।

शैतान की दीवानगी के सिवा।
* * *

प्रेम होने से पहले
आराम कुर्सी पर उचक कर बैठा हुआ शैतान
मुस्कुराकर कहता है तुम आओ तो सही।

प्रेम के बाद ढल जाता है शैतान, एक इंतज़ार से भरे आदमी में।
* * *

हाँ तुम चूम सकती हो
जाली से आती रोशनी की गवाही में

मैं मगर इस बालकनी से क्या कहूँगा कल
कि तुम कहाँ चली गयी
और रोशनी आती है क्या याद दिलाने के लिए।
* * *

और सच में कोई करना नहीं चाहता है प्यार
सब गुज़ार देना चाहते हैं एक लम्हा खुशी का।
* * *

शैतान कभी नहीं देखता
ज़िंदगी की तारांकित शर्तों की ओर
वह गाता रहता है, निषिद्ध गान।

रेगिस्तान,समंदर और बर्फ की दुनिया
हसरतें, उम्मीदें और ये दर्द की दुनिया
रंग-बिरंगी फिर भी ये ज़र्द सी दुनिया।

देवताओं के दूत उसे कर देते हैं क़ैद,
तारांकित शर्तों के उल्लंघन में
मगर शैतान रोता नहीं, किस्मत के सितारों का रोना।
* * *

कोई वजह नहीं है
दिन की हथेलियों में खुद को कुर्बान कर देने की।

वजहें चली गयी हैं, उसी के साथ,
अगर कहीं है कोई दुबली पतली सी शैतान की प्रेमिका
तो उसके ये इंतज़ार के दिन हैं।
* * *

आक के पत्तों से बना कर दोना
उसे होठों से लगाकर पानी पीने के बाद
किसान ने उसे रख दिया एक तरफ।

शैतान ने किसान को कभी नहीं किया माफ
कि वन नाइट स्टेंड से नफ़रत है शैतान को।
* * *

रेल के गाने की द्रुत में लय
जैसे शैतान की प्रेमिका के बेकाबू होने की याद

मैं ईर्ष्या करता हूँ इस आवाज़ से, छुक छुक छुक।
* * *

वो बादल की तरह छा जाती है
शैतान खड़ा हो जाता है दोनों हथेलियों से ओक बना कर
एक बूंद टपकती है, टप।

आँखें मुंद जाती हैं एक साथ, खो जाती है बूंद विस्तृत जगत में।
* * *

सदियों तक के लिए
अदृश्य, अनाम, अजीर्ण और अनिमेष
शैतान की प्रेमिका
बिछाए रखती है खुशबू अपने आने की।

रेलवे क्रॉसिंग पर दरवाज़े के आगे बैठा चौकीदार
मुझसे पूछता है, आज किसे विदा कर आए
कोई भी नहीं पूछता कि तुम कब आने वाली हो।
* * *

रंगीन रिबन की तरह
एक खयाल मेरे गालों को छूकर गुज़रा।
वो ही नाम
जो छुपा है मेरे ज़ेहन में, उग आया पूरब से।

रेल की पटरियों पर पहियों के बीच से
छन कर आ रही थी खुशबू नए दिन की।

हवा की ठंडक में कहा मैंने
ऐ कुदरत मुझे फिर से शैतान कर दे
लौटा दे शैतान की प्रेमिका।

वक़्त कितना ही अच्छा क्यों न हो
उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं होता।
* * *

[तस्वीर : प्रतीक्षा पांडे] 

March 2, 2013

तनहा खड़े पेड़ पर खिली हुई कोंपल.

व्यापार सबसे बड़ी विधा है। इसलिए कि ये हर विधा को अपना हिस्सा बना कर उसका उपयोग कर सकती है। इस तरह की खूबी के कारण इसका आचरण भी स्वछंद हो जाता है। मैंने सुना है कि प्रेम, दया, करुणा और रिश्ते जैसी अनुभूतियों तक में व्यापार का आचरण आ जाता है। मैं एक ऐसी किताब के बारे में बात करना चाहता हूँ। जिस विधा को व्यापार ने निगल लिया है। इस किताब को हाथ में लेने पर मुझे बेहद खुशी हुई और आपका भी हक़ है कि आप इसी खुशी के साझीदार हो सकें और इसे अपना बना सकें। यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण और संग्रहणीय है कि इस किताब ने फीचर विधा के खत्म न हो जाने की उद्घोषणा की है। 

फीचर उस समाचार को कहते हैं जो तथ्यों के साथ मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित करे। समाचार की नीरसता में जीवन का रस घोल सके। मैंने सबसे पहले रांगेय राघव के लिखे हुये फीचर पढे थे। उनमें मानव जीवन के दुखों की गहनतम परछाई थी और ये भी था कि जीवन फिर भी वह नदी है जो सूख कर भी नहीं सूखती। इसके बाद मुझे नारायण बारेठ के लिखे हुये फीचर पढ़ने को मिले। वे सब पत्रिका के कोटा संस्करण और कुछ मासिक साप्ताहिक पत्रिकाओं में छपे थे। इसके बाद कई सालों तक एक आध फीचर पढ़ने के लिए जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे समाचार पत्रों का इंतज़ार करना होता था। रेडियो प्रसारण में फीचर आकाशवाणी और बीबीसी पर खूब लोकप्रिय रहे। इन माध्यमों ने समाचार पत्र-पत्रिकाओं से बेहतर फीचर बुने लेकिन जो सुख फीचर को छपे हुये कागज पर पढ़ने को मिलता है, वह मुझे कहीं और नहीं मिला। 

हाल के समय में व्यापार ने समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और सभी तरह के माध्यमों ने फीचर की हत्या कर दी है। मैंने फीचर के लिए संघर्ष करते हुये आखिरी आदमी रविश कुमार को देखा। "रविश की रिपोर्ट" को देखते हुये टीवी के अत्याचार से मुक्ति मिल जाती थी। जिस तरह की खबरों के जरिये टीवी ने दर्शकों को प्रताड़ित किया उसी के बीच ये फीचर सुख का कारण रहे। मुझे मालूम नहीं कि फिर उसका क्या हुआ मगर ये सच है कि वह आखिरी कार्यक्रम था जिसने मुझे टीवी के सामने खुशी से बैठने को प्रोत्साहित किया। इसके सिवा मेरी नज़र में सिर्फ एक ही आदमी है, पृथ्वी परिहार। आप पीटीआई के लिए काम करते हैं। इस किताब को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। जो दोस्त कभी पत्रकार बनना या स्वतंत्र लेखन करना चाहते हैं, उनकी किताबों की अलमारी में इस किताब को ज़रूर होना चाहिए। किताब है, कांकड़। इसके प्रकाशक हैं, बोधि प्रकाशन। इसका मूल्य है दस रुपये किन्तु ये दस किताबों के सेट का हिस्सा है। इसे आप किस तरह पा सकते हैं ये जानने के लिए इस नंबर पर फोन कर सकते हैं। 082900 34632

कांकड़, आत्मा की खिंची हुई एक अदृश्य लकीर है. जिसके इस पार ह्रदय से बंधी हुई गाँव के जीवन की उदात्त और गुनगुनी आवाज़ें हैं और उस पार शहर के जीवन का आरोहण करते हुए अपने साथ चले आये स्मृतियों के लम्बे काफ़िले हैं. समय की अपरिभाषित गति की कसौटी पर छीजते जा रहे दृश्यों और अनुभवों के कोलाज में बचे हुए रंगों को सहेज लेने का एक ठिकाना है. इस अविराम निष्क्रमण में गाँव की सचमुच की भौतिक कांकड़ को डिजिट्स में बदल देने का अनवरत काम है. इसकी खुशबुएँ रेगिस्तान में बहते हुए पानी, आँखों के सूखे हुए पानी और दिलों के उजड़े हुए पानी की कहानी भी कहती हैं. यह जितना आत्मीयता से भरा है, उतना ही इसके खो जाने के डर और फिर उसे बचा लेने के हौसले से भरा हुआ है. यह रेगिस्तान के जीवन की कला, संस्कृति, साहित्य और जिजीविषा का एक रोज़नामचा भी है. इसमें जो कुछ भी दर्ज़ है, वह सब ब्योरे न होकर एक आर्द्र पुकार है. यह अपने अनूठे रिवाजों, अनछुई निर्मल बोलियों और रेत के स्वर्ण रंग में भरे हुए असंख्य रंगों की झलक से भरी हुई एक तस्वीर है.
***
मैं इसके पहले पाठकों में हूँ. मेरे भीतर के खिले हुए रेगिस्तान ने कांकड़ को पढ़ते हुए पाया कि ऊँटों के टोले और लोकगीतों के काफ़िले चले आ रहे हैं. लोक कविता और कहानी के लम्बे सिलसिले हैं. कोई बदलते हुए रेगिस्तान की कहानी कह रहा है और मैं सुनता जा रहा हूँ. मैंने चाहा कि इस कांकड़ पर बार बार लौट कर आना चाहिए. यहीं दिखाई देगी रेत के धोरे पर तनहा खड़े हुए पेड़ पर खिली हुई नई कोंपल.

डरते हैं बंदूकों वाले