An illegally produced distilled beverage.


December 30, 2013

तुम जो बिछड़े भी तो खुशी है

इस लेख को कहीं भी 
प्रकाशित किये जाने की 
अनुमति नहीं है. 
ये मेरे जीवन का निज हिस्सा 
और अपनी सोच का अक्स है.


हम अगर कर पाते संभावित दुखों की मामूली सी कल्पना तो जान जाते कि ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करने की वजहें बहुत सारी हैं. इस साल के बीतने में एक दिन बाकी है. साइबेरिया से उड़े पंछी रेगिस्तान की ओर आने के रास्ते में हैं. इधर मगर ठण्ड बढती जा रही है. मैं और ज्यादा बर्फ हुआ जाता हूँ कि दिल्ली जो मेरे देश की राजधानी है, वह एक डरावनी बहस में घिरी है. दो प्रमुख दल एक बात बड़े विश्वास से कह रहे हैं कि सस्ती बिजली और ज़रूरत का पानी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है. मैं घबराया हुआ हूँ कि ‘ख़म ठोक ठेलता है जब नर, पत्थर के जाते पाँव उखड़’ वाली जिजीविषा वाले मनुष्य ने अपने हौसले को खो दिया है. या फिर ये आदमी के खिलाफ आदमी की ही साजिश है. दोनों में से जो भी सत्य है वह नाउम्मीदी से भरा है.

रामधारी सिंह दिनकर और रश्मिरथी, डूबते साल में हतप्रभ हों शायद. लेकिन ऐसा नहीं है. हम अक्सर अच्छी बातों को भूल जाते हैं और दुखों के सांप गले में लपेटे हुए, ज़हर पिए शिव बने रहने को याद रखते हैं. मैं रात के अँधेरे में घर की छत पर बने कमरे में बैठा हुआ चिन्हित करता हूँ उन रश्मियों को जो हमारे जीवन में दुखों के अंधकार के बीच आशा का उजास भर रही है. किसने सोचा था कि मध्यप्रदेश की विधानसभा पालथी मार कर जिस नकली संत को भाव विभोर होकर सुन रही हो, जो मंच पर राम लला की ईंट से देश को झकझोर देने वाले चमत्कारी राजनेता के पास बैठा हो, उसके विरुद्ध कुछ किया जा सकेगा. उनकी यौन कुंठाओं और कृत्यों पर भारतीय अदालत में मुक़दमा चल सकेगा और धर्म के रथ पर विकास नाम का वर्क चढ़ाये हुए प्रधानमंत्री पद की ओर दौड रहा उम्मीदवार बिना नफा नुकसान सोचे, ऐसे व्यक्ति के अनुयायियों की संख्या से घबराए बिना साफ़ पल्ला झाड लेगा. ये इस नए दौर का संकेत है कि वह कई महीनों से जेल के सींखचों में कैद पड़ा है. जबकि हमारे यहाँ गांव के सरपंच तक के खिलाफ़ किसी अबला की पुकार न सुना जाना एक आम बात रही है. इसी तरह तहलका और न्याय के लिए आँखों पर पट्टी बंधी हुई माननीय मूरतों के आचरण पर प्रसंज्ञान लिए जा रहे हों, कार्रवाही हो रही हों. साल उदास तो नहीं है.

पिछली बार हम सुनामी में तबाह हो गए थे, इसबार उड़ीसा के महलों से लेकर कच्चे झोंपड़ों तक, तूफ़ान की हर संभव खौफनाक तबाही बरसी मगर जान को बचा लिया गया. उत्तराखंड में आसमान से जो आफत उतरी उससे उबरने में वक्त ज़रूर लगा, जान खूब गवाईं मगर जिस सेना के दम पर हम देश की सुरक्षा सोचते हैं उसने खुद को साबित किया. ये जान लेने की जगह जान बचने का कठिन युद्ध था. रोटी के लाले थे मगर हिम्मत की कमी न थी. इसी साल मैं अपनी एक शाम ऐसे पायलट के साथ बिता सका जो नए लड़ाकू विमानों की सफल उड़ान का परीक्षण करता हो. आप जानते हैं कि हम सब अपने बच्चों और पत्नी या पति के साथ सुख से रहना चाहते हैं. हमें जब कहीं लाखों के पैकेज मिल सकते हों उसके बीच भी जान जोखिम में डाल कर सेवानिवृति के बाद भी देश के लिए खतरों से भरी उड़ानें भर कर खुद को ज़िंदा होने का अहसास दिलाते हैं. ऐसे इंसान के साथ दो बीयर और पीने का जी, मुझे ज़िंदगी में आगे की ओर धकेलता है. तो उदासी का साल नहीं है.

इस साल की शुरुआत ही खूबसूरत थी. मैं और आभा गुलाबी शहर की सड़को, गलियों और छतों पर मंडराते हुए परिंदों के पंखों की छाँव तले बिता रहे थे. दुनिया इस तरह तेज़ रफ़्तार है जैसे किसी ब्लेक होल की तरफ खींची चली जा रही हो, ऐसे वक्त में हम दोनों सेन्ट्रल पार्क में सुस्ता रहे थे. एक गोरा आदमी फल खाते हुए तोतों की तस्वीरें उतार रहा था और हम देख रहे थे एक भव्य तिरंगा शान से पार्क के बीच फहरा रहा था. राजपथ जैसी सड़क के किनारे छोले कुलचे, राजापार्क में पानी पताशे, विद्याधर नगर की चौपाटी में चाट वाले और हवामहल की अनूठी छवि के आगे ज़िंदगी के विस्तार पर ठहरा हुआ एक लम्हा. दिल्ली के प्रगति मैदान में किताबों से रचे अद्वितीय संसार में दोस्तों के साथ कॉफी से भरे प्याले लिए हुए धूप की आमद का इंतज़ार करते जाने के दिन. जयपुर के पास महल गाँव में अपने घर की बालकनी में बैठकर काली ऊदी घटाओं के स्याह रंग से भीगे हुए, अपने बच्चों के लिए सुखद भविष्य की कामना में देश की मिटटी को निहारते जाने की स्मृतियों से बना हुआ साल. कैसे कह दूं कि उदास है.

इसी साल आस्था के चरणों में घी की बहती हुई नदी सडकों पर उतर आई. देश भर ने उसे जी भर कर कोसा. असीम सुख हुआ. गड़े खजानों की खोज में रत इस दुनिया में कुछ नहीं बदला. विज्ञान के घोड़े पर चढ़े हुए हमारे देश के ज्ञानी लोगों की अक्ल भी एक साधू ने निकाल ली. हमने उनको भी खूब कोसा. उनकी सार्वजनिक खिल्ली उड़ाई. मेरा जी खुश हुआ. क्रिकेट के भगवान की विदाई में स्टेडियम की दर्शक दीर्घाएं आंसुओं से भर गयी. इस विदाई के समय, अब्दुल क़ादिर की घूमती हुई बाल पर एक घुंघराले बालों वाले लड़के के बल्ले से उड़ते हुए चौके चोके छक्के, जो हाई स्कूल वाली गली में एक दुकान के बाहर खड़े होकर देखे थे, उस लम्हे की याद भी इस साल साथ रही. लड़कियों को स्मैश करते हुए देखा, दुनिया को अपने खेल का लोहा मनवाते देखा. परिवार कल्याण के बेटी बचाओ वाले बेअसर पोस्टरों के बीच ऐसी बेटियों पर फख्र करता और उनके अपने घर में होने की कामना करता हुआ देश देखा. निर्भया की शहादत के बाद सबको स्त्री सम्मान के लिए एकजुट देखा. बीत गया है ऐसा साल. कहो कैसे कह दूं कि उदास है.

इस साल मैं एक मकड़ा था, स्वस्थ और मनोरोगी होने के बारीक तार पर झूलता हुआ. कुछ महीने दीवानेपन में गुज़रे, कुछ दवा खाते हुए. एक घर-संसार वाला मकड़ा, जिसे न आता हो कोई जाल बुनना. जिसकी कामना में सिर्फ मुक्ति हो. जिसके रेगिस्तान वाले घर के ऊपर उड़ते हों लड़ाकू विमान. जिसने दोस्तों के हिस्से में रखा हो आवाज़ देने का फ़ैसला. जिसने चुना हो बच्चों के लिए उनकी पसंद का रंग. जिसने पत्नी से कहा कि तुम घर के कामों और स्कूल के बीच याद रखो कि यही एक ज़िन्दगी है. हमें इसी को जीना है, इसलिए वक्त चुरा कर अपनी पसंद के काम करते जाओ. इतना कह कर मकड़ा शाम होते ही खो जाता अँधेरे की रहस्यमयी दुनिया में. अँधेरा जादू का घर है. आपने कभी सोचा है कि एक बीज में एक पेड़ कैसे छुपा होता है. मैंने सोचा. इसलिए शब्दों में से उगा ली कई किताबें. कभी अचानक खयाल आया कि एक तवील बोसे में छुपी हो सकती है कोई दूसरी दुनिया की झलक. ऐसे करने पर सुना कि ये सब कहाँ से सीखा तुमने?

मैं कल की शाम कैसे बिताऊंगा, ये नहीं मालूम. मौसम सर्द है. हवा में बर्फ की तल्खी है. दुनिया गोल नहीं, आयताकार है. फोन, टेबलेट और कंप्यूटर के स्क्रीन जैसी. आम आदमी से डरे हुए हैं सब केसरिया आदमी. लाल झंडे बौद्धिक बहसों से परे जंगलों में अलाव ताप रहे हैं. चरखे के निशान से पंजे तक पहुंचे लोग अपने घर जाने की बारी के इंतज़ार में हैं. कुल मिलाकर मौसम मस्त है. बीते कल की रात महबूब के लिए कवितायेँ लिख रहा था. आने वाले कल की रात समय की सुराही से टपकनी बाकी है मगर कौन कहता है साल उदास है. ये इस प्रतिबद्धता का भी साल है कि छींके में अंडे की तरह सुख से लटके रहना भी कोई ज़िंदगी है? कभी हमें उठाना चाहिए कौम के लिए भी अपना हाथ, कभी हम डालें हाकिम के गिरेबान पर भी बुरी नज़र.

प्रेम हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत और ताकत है. रूमानी ख़यालों में जीना और हादसों से भरा वक्त का फटा हुआ चादर ओढ़े आगे बढते जाना मनुष्यता का सबसे सुन्दर प्रतीक है. जो बिछड गए उनका इंतज़ार और जो साथ हैं उनकी अँगुलियों के पोरों पर बैठी हुई गर्मी को साझा कर लेने की उम्मीद सबसे सुन्दर उम्मीद है. दुखों के अंधे कुंए में या रास्तों के बीहड़ में खो गए लम्हों की स्मृतियाँ, एक दिन हमारी देह के साथ बुझ जायेगी. मगर उससे पहले एक दिन हम देखेंगे कि सोने की चिड़िया कोई कहावत नहीं है. एक दिन हमारी जींसों की खाली पड़ी हुई गोल्ड कोइन जेबें भर जाएँगी. एक दिन हम हांक देंगे, सब दुखों की परछाइयों को पहाड़ की तलहटी, रेगिस्तान के धोरों की पीठ या समंदर के गर्भ की ओर. उस दिन तक के लिए, इस साल का बहुत शुक्रिया, नया साल आप सबके लिए मुबारक हो. आने वाले मौसमों में खूब अच्छी विस्की और खूब सारा सुकून बरसे.
* * *

इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर टाइम मेगजीन से ली गयी है. बच्चों के अस्पताल की खिड़की को एक कर्मचारी साफ़ कर रहा है.

December 27, 2013

कल्पना के सच

जब मैं अखबार की नौकरी छोड़कर रेडियो में काम करने लगा था तब आपकी अदालत, टीवी का खासा लोकप्रिय कार्यक्रम हुआ करता था. इस कार्यक्रम में एक आधे बाल उड़ा हुआ हँसता मुस्कुराता और इससे भी ज्यादा शांत और शातिर दीखता चेहरा, एक नक़ली कचहरी में वकील बनकर किसी प्रसिद्द व्यक्ति के व्यक्तित्व का अपने नुकीले सवालों से परीक्षण किया करता था. कार्यक्रम को देखते हुए दर्शकों को बड़ा मजा आता था. किसी बड़े, ख्यात या रसूखदार व्यक्तित्व से कड़े सवाल पूछ लेने की चाह, हमें खूब आनंद देती है. सामाजिक परतों में सबसे उपरी परत पर सवार हो चुके आम या खास लोगों को फर्श पर देखने की इच्छा के पूरा होने से हमारा एक अस्थायी प्रतिशोध भी पूरा हो जाता है. हम जिस प्रसिद्धि की कामना करते हैं, वह नहीं मिलती इसलिए हम प्रसिद्द लोगों की खामियों का मजा लेने में सबसे आगे होते हैं. हमारी इसी खामी के मर्म को समझ कर रजत शर्मा ने इसे उत्पादक वस्तु में ढाल दिया था. आपकी अदालत और इसके बाद नए शीर्षक से जनता की अदालत के नए नए कारनामे हमारे सामने आते रहे. इस कार्यक्रम की, जिस बात की ओर दर्शकों ध्यान कभी नहीं जाता था वह थी कि भला इतने प्रसिद्द लोग अपनी पोल खुलवाने के लिए क्योंकर बाखुशी इस कचहरी में अपराधी की तरह आकर बैठ जाते हैं. इस कार्यक्रम में कभी ऐसा नहीं होता कि सवालों से उकता कर नाट्य में अपराधी की भूमिका कर रहा नायक या नायिका चला जाये. वह अपने ऊपर लग रहे आरोपों से तिलमिला उठे और वास्तविक अदालतों में दुर्व्यवहार करने वाले अपराधियों की तरह कोई बर्ताव कर बैठे? इन प्रश्नों के उत्तर कठिन नहीं हैं. ये एक स्वांग है. उतना ही कड़ा जितना कि मुख्य पात्र अनुमति प्रदान करे. इस स्वांग के जरिये हमारा और प्रस्तोता दोनों का काम बन जाता है. हम एक प्रसिद्द व्यक्तित्व को सर खुजाते, नज़रें घुमाते या थोड़ा हकलाते हुए देखकर खुश हो जाते हैं. उससे भी बड़ी बात कि आखिर में कथित अभियुक्त अपनी चतुराई से अभियोजन को नाकारा साबित करके अपनी प्रसिद्धि में एक और तमगा लगा कर सबका अभिवादन करता हुआ रुखसत हो जाता.

मुझे इन रजत शर्मा साहब की याद इसलिए आई कि एशियन ह्यूमन राईट कमीशन ने कहा कि सामूहिक बलात्कार के बाद मौत के मुंह में धकेल दी गयी निर्भया की पहली बरसी पर एक कार्यक्रम पेश किया गया. इन्डिया टीवी द्वारा आयोजित इस सजीव बहस में नारीवादी सामाजिक कार्यकर्ता, विषय विशेषज्ञों और कार्यक्रम प्रस्तोता ने भाग लिया. इसका विषय एक एनजीओ के मुख्य कार्यकारी द्वारा एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ बलात्कार किया जाना था. एएचआरसी ने कहा कि इस कार्यक्रम में टीवी चैनल के कार्यक्रम प्रस्तोता ने ये दावा किया कि हम बलात्कारी को उसके अंजाम तक पहुंचाएंगे. यह एक तरह से मिडिया ट्रायल ही था, जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता और उर्दू स्कोलर खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली. आत्महत्या के कारण क्या हैं, ये जाँच का विषय है. लेकिन क्या सचमुच मिडिया ट्रायल किसी भी तरह से समाज के लिए हितकारी है. क्या कोई भी टीवी और सोशल तंत्र एकतरफा प्रचार करता जाये ये उचित है? क्या कोई एक व्यक्ति किसी भी तरह से इतने बड़े माध्यमों पर हो रहे कुप्रचार का अकेला सामना कर सकता है. क्या हम पीड़िता को इस तरह से न्याय दिलवा सकते हैं. क्या हम इस तरह से नकली पीड़ित और असली दोषी के बीच की पड़ताल को सही दिशा में ले जा सकते हैं? इन सब सवालों का एक जवाब यह है कि हमें न्यायाधिकारी बनने की जगह ये काम न्यायालयों पर छोड़ना चाहिए. किसी को अपराधी करार देकर उसका चरित्र हनन करना भी उतना ही अमानवीय है जितना कि किसी स्त्री की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का दोषी होना. हाल का घटनाक्रम दोनों पीड़ितों के साथ एक तरह का दुर्व्यहार है. इसका सबसे डरावना पक्ष ये है कि जो भी किसी का पक्षधर है, वही सर्वाधिक नुकसान कर रहा है. स्त्री सम्मान की रक्षा के लिए बने कड़े कानून आज इतनी सक्रियता से काम कर रहे हैं कि हमें सोशल मिडिया और इलेक्ट्रोनिक मिडिया पर ऐसे हस्तक्षेप से बाज आना चाहिए जो न्याय की प्रक्रिया से पूर्व ही पीड़िता को बदनामी और आरोपी को मृत्यु की ओर धकेलता है.

क्या हम कभी सोचते हैं कि एक कार्यक्रम से हज़ार करोड़ रुपयों का टीवी चैनल कैसे खड़ा किया जाता है. ये मार्च दो हज़ार पांच की बात थी, जब हम सब बेहद उत्सुक और उत्तेजित हो गए थे. हम टीवी पर फ़िल्मी दुनिया के लोगों के अंतरंग संबंधों को सार्वजनिक होते देखने की प्रतीक्षा करने लगे थे. उस साल कोई आठ एक महीने पहले खबरिया चैनल बाज़ार में आया था और इसने अपने दर्शकों की संख्या बढाने के लिए एक विदेशी कार्यक्रम की नक़ल करते हुए, उसका भारतीय संस्करण तैयार कर प्रसिद्धि पाने वाले सुहैब इलयासी के साथ मिलकर कुछ स्टिंग का प्रसारण करना शुरू किया था. दर्शक बेसब्र इंतज़ार से भर गए थे कि वे सिने जगत के जिस सच को अपनी कल्पना में सोचा करते थे उसे परदे पर साकार देख लेना चाहते थे. दो एपिसोड का प्रसारण मुझे याद है. जिनमें अमन वर्मा और शक्ति कपूर के स्टिंग ऑनएयर किये गए. इसके बाद भी कुछ प्रसारण किये जाने थे. टीवी और प्रस्तोता का दावा था कि वे सच को सामने लायेंगे मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा न होने के संभावित कारण बहुत सारे हो सकते हैं. आप भी बेहतर सोच सकते हैं कि कम से कम नैतिकता और समाज को गंदगी न परोसे जाने की भावना से उनका प्रसारण हरगिज न रोका गया होगा. हम उससे भी भयानक दौर में पहुँच गए हैं कि आज हमारे पास कई सारे माध्यम उपलब्ध है. हम इनके जरिये कितने ही झूठ परोस सकते हैं. क्या सचमुच हमारी सामाजिक और नैतिक चेतना इस स्तर की है कि इस तरह के औजारों का ठीक उपयोग कर सकें. क्या हम समाज के अन्य लोगों और मुद्दों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं जितने कि खुद के लिए रहना चाहते हैं. एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता और पुरुष के बीच के अजाने रिश्ते के सच को जाने बिना ही सार्वजनिक सामाजिक उपहास और घृणा का विषय बना देना कितना बड़ा अपराध है. इस अपराध के लिए सज़ा तय होनी चाहिए.

December 18, 2013

कोई चरवाहा भी न रखे

लोग पड़े हैं जाने कहाँ और जाने कहा अपने दिलों को छोड़ आये हैं.
समझते हैं खुद को दिल के बादशाह और सोचो तो ऐसे लोगों को कोई चरवाहा भी न रखे.
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अनजाने अँधेरे की गिरहों से बेढब, बेहोशियारी की बातें करके रात कहीं चली गयी है. पुल नीचे, एक पिलर के पास उसका बोरिया समेट कर रखा हुआ है.

पुरानी ज़िंदगी की कलाई में फिर एक नया दिन है, रात की तलाश में निकला हुआ.
* * *

जिनको जीवन ने अस्वीकार कर दिया था हमारे हाथ के उन चार दानों को मृत्यु कैसे स्वीकार कर सकती है. इसलिए तुम दुनिया में कहीं भी रहो, मैं तुम्हारे पीछे हूँ.
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पहाड़ो में रहने वाले चूहों से अलग हैं रेतीले मैदानो के चूहे, बाज़ की चोंच मगर असफल है उनके स्वाद को अलग अलग परख पाने में.
मैं कैसे भी भूगोल पर चला जाऊं एक याद बीनने लगती है, मेरा रेशा रेशा.
* * *

कुछ दिन पहले उन्होंने ईश्वर के बारे में कुछ पता करने को सदी का भयानकतम प्रयोग किया था. कुछ दिन बाद एक नन्हीं लड़की रेल में सफ़र कर रही थी.
कुछ दिन बाद नहीं, ठीक उसी दिन कवि ने कविता लिखी.
* * *

धूप ने दीवारों को साये खिड़कियों को रौशनी के फाहे बख्शे हैं. हवा में बर्फ की खुशबू है.
एक उसका नाम न हो तो तन्हाई कुछ नहीं होती.
* * *

हमने तो आवाज़ों को फूलों की गंध में पिरोया
प्रेम का दरवाज़ा बनाया जो खुलता हो उदासी के आँगन में
* * *

स्वप्न, प्रेम की धूसर परछाई है.

सोते हुए बच्चे की बंद आँखों के नीचे होठों पर मचल कर बिखर जाती खुशी की तरह. जवान होने की बारीक रेखा के आस पास किसी सीढ़ी से पैर चूक जाने पर नींद में ही औचक संभल जाने की तरह.

सीवान, सिलीगुड़ी, कोलकाता, कानपुर, बाड़मेर जैसे किसी शहर की यात्रा पर गए बिना ही उस शहर के रास्तों की यात्रा पर होना प्रेम है.

प्रेम, खुशी और भय से भरा हुआ स्वप्न है.
* * *

स्मृति एक पारदर्शी आईना है. विगत को आगत के बीच उकेरता है.
* * *

कच्ची धूप उस जानिब पांवों से लिपटी पड़ी है, इस तरफ रेगिस्तान में, मगर सर पर खड़ी है.
हम ही नहीं, मौसम का हाल भी है जुदा जुदा.
* * *

December 17, 2013

करमण री गत न्यारी

क्ल केह मैं सबसूं बड़ी, बीच कचेड़ी लड़ती
दौलत केह मैं सबसूं बड़ी, मेरे हर कोई पाणी भरती
सूरत केह मैं सबसूं बड़ी, मेरे हर कोई जारत करते
तकदीर केह तुम तीनों झूठे, मैं चावूँ ज्यों करती.


ऊदा भाई करमण री गत न्यारी
टर सके नहीं टारी

आछी पांख बुगले को दीनी, कोयल कर दीनी काली
बुगलो जात बाभण को बेटो, कोयल जात सुनारी

छोटा नैण हाथी ने दीना, भूप करे असवारी
मोटा नैण मृग को दीना, भटकत फिरे भिखायारी

नागर बेल निर्फल भयी, तुम्बा पसरिया भारी
चुतर नार पुत्र को झुरके, फूहड़ जिण जिण हारी

अबूझ राजा राज करे, रैय्यत फिरे दुखियारी
कहे आशा भारती दो दरसण गिरधारी.

मैं लंबे समय से इस प्रतीक्षा में था कि गफ़ूर खां मांगणियार और साथियों की आवाज़ों में इस रचना को रिकार्ड किया जा सके. अभी एक खुशखबरी मिली कि इन बेहतरीन गायकों को आकाशवाणी ने ए ग्रेड के कलाकारों में शामिल कर लिया है. इस ऑडिशन के लिए भेजी जाने वाली रिकार्डिंग करके भेजते समय मैंने चाहा कि बीस सालों की सबसे बेहतरीन रिकार्डिंग हो सके. उस रिकार्डिंग से कोई रचना कभी ज़रूर आपसे बांटना चाहूँगा मगर फ़िलहाल इसे सुनिए.

अक्ल कहती है मैं कचहरी में खड़ी होकर लड़ती हूँ इसलिए सबसे बड़ी हूँ. दौलत कहती है मेरे लिए हर कोई सेवादार होने को आतुर है इसलिए मैं सबसे बड़ी हूँ. सुंदरता कहती है हर कोई मेरे लोभ की चाहना में लगा हुआ है इसलिए मैं सबसे बड़ी हूँ. लेकिन तकदीर कहती है तुम तीनों झूठे, मैं जैसा चाहती हूँ वैसा करती हूँ.

ऊदा भाई, करम की चाल सबसे न्यारी है, इसे टाल कर भी नहीं टाला जा सकता है.

बगुले को सफ़ेद रंग के पंख दिए, कोयल को  काला रंग दे दिया. बगुला किसी ब्राहमण की तरह साफ सुथरा उड़ता रहता है और कोयल सुनार की तरह श्याम हुई, बारीक काम करती जाती है. हाथी को छोटी छोटी सी आँखें दी है जिसकी सवारी राजे महाराजे करते हैं और जिस मृग को बड़ी बड़ी आँखें दी वह भिखारी की तरह वन में भटकता फिरता है. नागर बेल यानी पान की बेल जो औषधीय है उस पर पर कोई फल नहीं खिलता है, कड़वे तूम्बों की बेल खूब फैलती जाती है. विदुषी पुत्र की कामना में रहती है, फूहड़ स्त्री बच्चे जनती ही जाती है. मूर्ख राजा राज कर रहे हैं और जनता दुखों से भरी घूम रही है.  हे गिरधारी, आशा भारती निवेदन कर रहे हैं कि एक बार फिर दर्शन दो.


December 16, 2013

मंडेला मंडेला

नौजवान दिनों के दो ही क्रश यानि पहले सम्मोहन हुआ करते हैं, प्रेम और क्रांति. मैं जिस साल कॉलेज से पास आउट होने वाला था उसी साल यानि उन्नीस सौ नब्बे में अफ़्रीकी जन नेता नेल्सन मंडेला को सत्ताईस साल की लंबी क़ैद से मुक्त किया गया था. नए साल के फरवरी महीने की ग्यारह तारीख को दुनिया का ये दूसरा गाँधी विश्व को अपने नेतृत्व और अकूत धैर्य के जादू में बाँध चुका था. दुनिया भर में नेल्सन मंडेला की रिहाई के जश्न मनाये गए थे. बहत्तर साल की उम्र के इस जननायक को बाईस साल के नौजवानों ने अपने दिल में बसा रखा था. हर कहीं अखबारों, रेडियो और टीवी पर इसी महान शख्स के चर्चे होने लगे थे. मंडेला के साथ होना एक ऐसी क्रांति का प्रतीक था जो श्वेतों के विरुद्ध रक्तहीन क्रांति थी. हालाँकि इस क्रांति की नींव में रंगभेद का शिकार हुए अनगिनत काले लोगों की लहुलुहान आत्माएं थीं. हम उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ से सभी मंज़िलें फतह कर लिया जाना चुटकी भर का काम था. देश में राजनितिक बदलाव की सुगबुगाहट थी लेकिन असल में हर युवा एक ऐसी क्रांति की उम्मीद करता था जो देश की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तनकारी सिद्ध हो सके. नौकरशाही की जड़ों ने भ्रष्टाचार की और कदम बढ़ा लिए थे. नौवें दशक की शुरुआत तक सियासत और नौकरशाही के बीच का गठबंधन विलासी हो चला था और जनता के काम न करने का अपराधबोध भी विदा होने लगा था. जो समाज सत्य और अहिंसा के रास्ते देश को आगे बढ़ाये जाने का ख्वाब देख रहा था उसमें ज़बरदस्त निराशा छाने लगी थी. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था न थी जो किसी दूसरे दल को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बनाये रख सके कि जनता के पास विकल्प बचा रहे. कच्चे और तात्कालिक गठजोड़ों ने इसी टूटी और निराश होती जा रही जनता को और अधिक भयभीत किया. हम देश भर में समान कानून, सबके लिए शिक्षा और भोजन का अधिकार मांगने वाली जन-छात्र रेलियों में सड़कों पर उत्साह से भरे हुए फिरते थे. इसी उत्साह को नेल्सन मंडेला की रिहाई ने नयी उर्जा दी. बुद्धिजीवियों, कामगारों और मजदूरों ने अपने आंदोलनों के बीच पहली बार कोई ऐसा अवसर फिर से पाया था जिस पर मुंह मीठा किया जा सकता हो. खुद को और साथियों को यकीन दिलाया जा सकता हो कि कोई लड़ाई कभी बेकार नहीं जाती.

मंडेला की रिहाई से साढ़े तीन दशक पहले हम आजाद हो चुके थे. हमारे गाँधी की हत्या की जा चुकी थी. देश आजाद तो था मगर इतने बड़े राष्ट्र के समक्ष असंख्य मुश्किलें थी. आज़ादी जीत लेने के बाद एक पीढ़ी आराम करने लगी थी या उन्होंने काम अगली पीढ़ी को हस्तांतरित कर दिया था. अगली पीढ़ी के पास अनगिनत ख्वाब थे जो कि आज़ादी जिस सिरे पर मिली उसी सिरे से आगे बंधे हुए थे. योरोप और अन्य विकसित देशों की जीवन शैली लुभा रही थी. सुख बेहिसाब चाहिए थे मगर काम का कोई हिसाब न था. सिस्टम में ऐसे लोगों और धाराओं ने सेंध लगा ली थी जिनके हित निश्चित लोगों और वर्गों के लिए थे. समाज में धार्मिक विविधता तो थी ही लेकिन एक बड़ी तकलीफदेह बात थी समाज में उपस्थित जातिवाद. अफ्रीका के लोगों ने रंग भेद के विरुद्ध जो लड़ाई लड़ी, वैसी ही लड़ाई की ज़रूरत हम सबको जातिवाद के विरुद्ध लड़े जाने की है. हम अभी भी एक तीसरे गाँधी के इंतज़ार में हैं जो देश के मौजूद जातिगत व्यवस्था की बीमारी के विरुद्ध व्यापक जनजागरण का अभियान चला सके. हम सब मिलकर एक ऐसी शासन व्यवस्था बनाने में नाकाम रहे हैं जो कि जातिगत भेदभाव को खत्म कर सके. कड़े कानून तो बने हैं लेकिन उन कानूनों के बल से मनुष्य का मन नहीं बदला जा सका है. आज जिन कानूनों के सहारे हम दबी-कुचली और उपेक्षित जातियों के उत्थान के प्रयास कर रहे हैं उसका फायदा भी कुछ एक परिवारों या जातियों में किसी एक आध खास जाति तक सिमट कर रहा गया है. हम लीक पर चलने के आदी हैं. किसी ने कहा कि ऐसे चला जायेगा तो चलते ही जाते हैं. ये नहीं सोचते कि वक्त के साथ क्या बदलाव अपेक्षित हैं.

नेल्सन मंडेला नहीं रहे. उनकी प्रासंगिकता सदैव रहेगी. शांति के नोबेल पुरुस्कार से नवाजे गए मंडेला मुझे असल में किसी भारतीय से भिन्न नहीं लगते हैं. यही वजह है कि दुनिया भर के सभी देशों ने उनको अपने सम्मानों ने नवाजा है. भारत ने अपना सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया और पाकिस्तान ने उनको निशान ए पाकिस्तान अर्पित किया है. सम्मान देना अपने आप में व्यक्ति के द्वारा किये गए कार्यों की महानता की और संकेत तो करता ही है, साथ ही हम अपने देश में इसी तरह के खास लोगों के होने के आदर्श को स्थापित करते हैं. तीसरी दुनिया के देशों में मंडेला समान रूप से प्रिय हैं. आर्थिक विषमताओं वाली दुनिया में मनुष्य के एक समान मोल और बराबरी की इज्ज़त का हक सबसे पहली ज़रूरत है. हम जब कॉलेज से निकले तब हमारे सामने मंडेला जैसी एक ज़िंदा शख्सीयत थी. हम उसके कारनामों के बारे में पढ़ रहे थे. उनके भाषण को सुन रहे थे. संयुक्त राष्ट्र संघ उस नेक इंसान के लिए उसके जन्मदिन को रंगभेद विरोधी जागरूकता को बढ़ाने के लिए मंडेला दिवस के रूप में मना रहा था. ये हमारी खुशनसीबी है कि एक जीते जागते लोक नायक को हमने हमारे जीवन में देखा. आने वाली पीढ़ी के लिए कोई नायक आयात थोड़े ही किया जायेगा. हम में से ही किसी को इस समाज के उत्थान के लिए संघर्ष को चुनना होगा. नेल्सन मंडेला के लिए ये सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम अपने समाज में व्याप्त कुरीतियों और जाति प्रथाओं के विरुद्ध संघर्ष करें. अपने देश में मनुष्यता के परचम को फहरा सकें. हाँ सचमुच हर नौजवान पीढ़ी का क्रश प्रेम और क्रांति होना चाहिए.

December 11, 2013

साजन गुडी उडावता

रात को आती है आवाज़ खाली कांच के प्यालों की मगर बिल्ली शराब नहीं पीती. गाय मुतमईन है शहर में प्लास्टिक में बचा कुछ भी खाते हुए उसे क्या गरज होगी ढोल बजाने की मगर आती है लोहे चद्दरों से किसी के टकराने की आवाज़. बूढ़े खुजियाये कुत्ते ने कर ली आत्माओं के रंग और लक्षणों से मित्रता, रोना बंद है उसका इन दिनों मगर मैं जाग उठता हूँ बार बार अचानक.

कि आवाजें ज़बरन बुनती है भय के बारीक रेशे.

नीम नींद में उठकर बीवी भी बदल लेती है कमरा किसी अच्छी गहरी नींद की तलाश में. सुबह के साढ़े तीन बजे दर्द के बेहिसाब बेशक्ल लिबास में सही जगह की तलाश भटक जाती है अपनी राह से और कोई कारण नहीं मिलता कि दर्द कहाँ और किस वजह से है.

सुबह जो लड़का पतंग उड़ा रहा था उसके मांझे पर क्या बारीक कांच पिसा हुआ होगा? क्या अंगुलियां गरम दिनों के आते आते कट न जायेगी कई जगहों से. ऐसे ही खुद को बचाने के लिए हम छिलते जाते हैं. हम खुद खरोंच से कहते हैं आ लग जा मेरे सीने से कर्क रेखा की तरह. ज़िंदगी के मानचित्र पर कुछ जो रेखाओं सा दीखता है वह वास्तव में कट जाने के निशान हैं. हम काफी उम्रदराज़ हो चुके हैं.

आ मेरी बाहों में मगर बता कि तेरी उम्र क्या है? उम्र का हिसाब आसान करता है, दर्द की किस्म को समझने के काम को...

जब कोई आ रहा होता है उसकी तरफ तब हर बूढ़ा आदमी अक्सर लिख लेता है दिल की पर्ची पर आने वाले आदमी की सीरत और उसके दुखों को, उस तक पहुँचने से पहले. मगर एक अफवाह मैंने सुनी थी कि बेटों ने ठग लिया अपने माँ बाप को. यकीन अब भी नहीं है.
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साजन गुडी उडावता लोम्बी दैवता डोर, झोलो लागो प्रेम रो कहाँ गुडी कहाँ डोर.

सजन पतंग उड़ाते हुए खूब ढील देते थे, प्रेम का एक झोंका लगते ही जाने कहाँ तो पतंग गयी और कहाँ गयी डोर. सुबह सात बजे से एक लड़का ओवर ब्रिज पर खड़ा हुआ पतंग उडा रहा है. मौसम सर्द है और धूप नन्हे पिल्ले की तरह अलसाई आँख से देख रही है रेगिस्तान को.
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शोर आता है दसों दिशाओं से
ज़िंदगी के हर कोने तक
मन की कच्ची दीवारों पर जैसे कोई चोट करता हो.

आदमी यूं जीए जा रहा है जैसे भुला दिया है खुद को.
दुनिया नए औज़ार खोज रही है कुछ इस तरह
जैसे आवाज़ें ही घोट डालेंगी आवाज़ों का गला.

शोर के बीच हम भूल चुके हैं नाम जाने कितने
एक दोस्त रूह रूह जपा करता था पिछले मौसम
कभी उससे मिलेंगे तो मुमकिन है हादसे सारे भूल जायेंगे.

December 8, 2013

ज़िन्दगी रात थी, रात काली रही

लोकतन्त्र और चुनावों के बारे में एक प्रसिद्द उक्ति है कि चुनावों से अगर कुछ बदला जा सकता तो इनको कभी का अवैधानिक क़रार दे दिया जाता. इसे याद करते हुए हमें लगता है कि दुनिया भर के लोकतान्त्रिक देश निश्चित अविधि के बाद नयी सरकारें चुनते हैं किन्तु वे जिस उद्धेश्य और सोच से प्रेरित होकर वोट करते हैं वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हम ख़ुशी से भरे होते हैं कि इस बार ज़रूर कुछ बदलने वाला है लेकिन सिर्फ चहरे और नाम बदल जाते हैं. व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आता. आम आदमी के जीवन को आसान करने वाले काम की जगह नया शासन उसी ढर्रे पर चलता रहता है. इस सदी का सबसे बड़ा रोग भ्रष्टाचार है. ये रोग हर बार नए या फिर से चुनकर आने वालों का प्रिय काम बन कर रह जाता है. वे ही लोग जो कल तक इस बीमारी के कारण हुए राष्ट्र के असीमित नुकसान का हल्ला मचाते हुए नए अच्छे शासन के लिए बदलाव की मांग करते हैं इसी में रम जाते हैं. आप अगर कुछ नेताओं के जवानी के दिनों की माली हालत को याद कर सकें तो एक बार ज़रूर करके देखिये. ऐसा करते हुए आप असीम आश्चर्य से भर जायेंगे. ये अचरज इसलिए होगा कि ऐसे अनेक नेता पक्ष और विपक्ष में बराबरी से मौजूद हैं. वे बारी बारी से सत्ता की कुर्सी पर विराजते हैं और अपनी संपत्ति बढाते जाते हैं. यही हाल अपराधों का है. अपराधमुक्त राजनीति की बात करने वाले दल, हर चुनाव में आरोपित नेताओं को टिकट बाँटते हैं. हम इस दोमुंहे आचरण को पढ़ते, देखते, जानते और समझते हैं मगर चुप ही रहते हैं. हम दूसरे दल को ज्यादा भ्रष्ट बताकर अपने कम दागियों के बचाव में उतर आते हैं. इस तरह चुनावों के बरस बीतते जाते हैं. व्यवस्था में कोई फर्क नहीं आता. हम कोसते रहने के काम में लगे रहते हैं.

हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं. इनमें किसी तरह का आदर्श न राजनैतिक दलों ने प्रस्तुत किया है, न मतदातों ने ऐसा करने के बदले किसी को मतदान के माध्यम से दण्डित किया है. आर्थिक और सामाजिक अपराधों के आरोपों से घिरे हुए नेता हमारे बीच वोट मांग रहे थे. अगर कोई नेता जेल में बंद है या किसी तरह से जमानत पर रिहा है तो वह या उसका कोई परिजन उसी दल का उम्मीदवार है. इतने गिरे हुए हाल में भी मतदाता किसी न किसी वजह से उत्साहित रहता है. वह सुबह सवेरे वोट डालने के लिए कतारों में खड़ा हुआ अपनी बारी का इंतजार करता है. एक दिसंबर की सुबह नौ बजे के आस पास मैं आकाशवाणी के दफ्तर से निकला और अपने पोलिंग बूथ पर पहुंचा. इस पर कुल पंद्रह सौ वोटर चिन्हित हैं. इनमें से कोई सत्तर फीसद वोटर दिहाड़ी मजदूर हैं. वे रोज़ कुआं खोदते और रोज़ पानी पीते हैं. उनके जीवन में अवकाश के दिन सिर्फ तब आते हैं जब उनका शरीर काम करने से मना करने लगता है. इस बूथ पर सुबह दस बजे तक पच्चीस फीसद वोट पड़ चुके थे. मेरे पास भारत निर्वाचन आयोग का मिडियाकर्मियों के लिए जारी प्रवेश पत्र था. मैंने पीठासीन अधिकारी से पूछा कि कैसा चल रहा है. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- शांतिपूर्ण और तेज. मतदाता शांत थे मगर जल्दी में भी थे. उनके लिए सरकार चुनने को मतदान करना ज़रूरी था लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूरी कोई काम उनको तेज़ी से आगे धकेल रहा था. उस बूथ के बाद दोपहर के दो बजे तक कई संवेदनशील और सामान्य मतदान केन्द्रों पर मैंने लोकतंत्र के उत्सव का आनंद लिया. मैंने कई लोगों से बात की. आज का मतदाता बहुत समझदार हो गया है. वह अपने पत्ते नहीं खोलता और अक्सर ये भी कह देता है कि आप कहो किसे वोट देना है? मैं उसी को दे दूंगा. इस बार की गयी बातचीत में यही सामने आया कि मतदाता हर तरफ से घिरा हुआ महसूस करता है. उसके पास चुनने के लिए जो विकल्प हैं वे उसे सीधे उत्साहित नहीं करते वरन वह इस उम्मीद में वोट कर रहा है कि शायद कुछ बदले. उसके अपने अनुभव निराशाजनक हैं. लेकिन उसकी आशाएं अभी अक्षुण हैं.

इस बार नोटा यानि उपरोक्त में से कोई नहीं का विकल्प उपयोग में लाया गया. इससे क्या फर्क हुआ इसके परिणाम अभी आने शेष हैं. मतदान के प्रति मतदाता की रूचि शायद इस बात से जगी हो कि वह मतपेटी में सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने मत डाल सकेगा. वास्तव में नोटा एक प्रकार के असहयोग का प्रतीक है कि जो सरकार बनती हैं उसमें हमारी सहमति नहीं है. काश नोटा एक कारगर हथियार की तरह होता कि सबसे अधिक मत मिल जाने पर सभी चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों को हारा हुआ मान लिया जाता और नए उम्मीदवारों के साथ नया चुनाव होता. ये बहुत कारगर हो सकता है मगर इस प्रक्रिया को अपनाये जाने पर भी वैसे ही खतरे उपस्थित हैं जैसे वर्तमान में हाल में हैं. मुझे एक परिवार के मुखिया मिले वे दो कार लेकर पूरी रात भर का सफ़र करके वोट डालने आये थे. उत्साह में कहते हैं- साहब अपने परिवार के बारह लोगों को वोट दिलाने के लिए साढ़े पांच सौ किलोमीटर दूर आया हूँ. मैं सोचता हूँ कि इस परिवार के लोग भले ही राजनितिक लक्ष्य के लिए या अपनी जात पांत के चक्कर में वोट डालने आये हैं मगर ये एक सच्ची प्रतिबद्धता है. इस बार के चुनाव हर बार की तरह देश के लिए बेहतर सरकार को चुनेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन व्यवस्था का भ्रष्टाचार सिर्फ वहीँ तक सिमित नहीं है. रेगिस्तान के इस सदूर स्थित भूगोल पर बसे हुए लोगों ने राजनितिक रेलियों में भाड़ोत्री बनकर जाने को अपना लिया है. क्या हमारी समझ और पेट के बीच यही एक भूख का ही सिद्धांत शेष है. और क्या कभी भूख से बाहर आकर नए राष्ट्र के निर्माण के लिए हम खुद को तैयार कर पाएंगे. साइमन सेनेक का कहना है कि नेतृत्व अगले चुनाव के लिए वरन अगली पीढ़ी के लिए है. हमें भी याद रखना चाहिए कि हम जिनको चुन रहे हैं उनका असर सिर्फ अगले पांच साल पर ही नहीं होगा, ये असर हमारी नयी पीढ़ी पर दिखाई देगा. हम एक दिन ज़रूर कामयाब होंगे मगर तब तक के लिए बशीर बद्र साहब का एक शेर है- चाँद तारे सभी हमसफ़र थे मगर/ ज़िन्दगी रात थी, रात काली रही.

[ये लेख विगत शुक्रवार को दैनिक राजस्थान खोजखबर में प्रकाशित हो चुका है. ]

डरते हैं बंदूकों वाले