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मैं भरा हुआ होता हूँ तुम्हारे लालच से

नये साल की आमद के साथ कुछ एक बेवजह की बातें लिखीं और भूल गया था. जैसे हम भूल जाते हैं हमारे गुनाह. मगर कभी तो देना ही होता है उनका हिसाब... इसलिए आज उनको इकट्ठा करके टांग रहा हूँ. बातें बेवजह

ईश्वर से उठ जाता है भक्तों का विश्वास
शैतान से डरते रहते हैं वे बारहा.

प्रेम को कौन खोना चाहता है दुनिया में.
* * *

हम सब जानते हैं
कि तन्हाई की आधारशिला पर जन्म लेता है जीवन.

शैतान मगर
तुम्हारे कानों में फुसफुसाता है, चूमना मुझे दोनों होठों से.
* * *

स्वप्न
अकल्पनीय हादसों और
अविश्वसनीय प्रेम का आभासी रूप नहीं होते.

शैतान मुस्कुरा रहा होता है कहीं आस पास
जैसे मैं भरा हुआ होता हूँ तुम्हारे लालच से.
* * *

जिस तरह मैंने
नहीं पाई कोई ऐसी चीज़ जिसके लिए मर सकूं.

उस तरह ये भी होना चाहिए था
कि न हो कोई ऐसी ऐसी चीज़ जिसके लिए जीया जाये.

दिल पत्थर है कि पड़ा हुआ है तुम्हारे कदमों में, जाने कबसे.
* * *

रुखसत एक दुःख भरा शब्द है मगर
कुछ लोग मर जाते हैं अपने से बेखबर
कुछ मरते हैं दुनिया की निगाहों से परे.

शैतान ने लिखा है अपनी वसीयत में
कि जब मैं मरुँ ज़रा सा सी पी लेना एक बार.
* * *

और उसने हंसी में उड़ा दिया ज़िन्दगी को
देवताओं ने कहा कि ये अपमान है ज़िंदगी का.

आखिर दुःख और प्रेम भी कोई चीज़ है.
* * *

मैं बंद कर लेता हूँ अपनी आँखें
भूल जाता हूँ, जो भी जानता हूँ.

तुम्हारे प्यार के सामने ये दुनिया मामूली है.
* * *

तुम कहो तो
शैतान लगा रहे अपने काम पर.

देवताओं के नखरे हज़ार हैं.
* * *

मैं आयोजित करता हूँ
दुखों से भरी एक संध्या.

एक शाम सुख के नाम.
* * *

हम दुःख में जीते हैं उसके लिए
हम सुख में जीते हैं उसके लिए.

ज़िंदगी में किसी का अपना कुछ नहीं होता.
* * *

हम नहीं हो सकते हैं उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव
कि अपनी पसन्द की चीज़ों को खींच लें अपने करीब.

हम जीते हैं बीच के रेखा पर
ये सोचते हुए कि उसका नाम लूं या न लूं.
* * *

कितना अच्छा होता कि
हर किसी के पास होते जुआघर में जाने लायक पैसे
और हार जाने पर सो सकता अच्छी बीयर के नशे में.

दिल विल से खेलना बड़ा वाहियात काम है.
* * *

हमेशा खोजना आला दर्ज़े की शराब
खराब होने को अच्छी चीज़ चुनना.
* * *

रेत ही रेत है
एक मुट्ठी इधर रहे कि उधर.

याद ही याद है
एक लम्हा कम हो कि न हो.

प्यास ही प्यास है
एक बूँद कम हो कि ज्यादा.

और सबके अंत में... जो तारा जहाँ निकलता है वहीँ डूब भी जाता है. आसमान फिर वही, ज़मीन फिर वही. दो अक्षर आगे कि चार शब्द पीछे, बातें सब अधूरी और ज़िंदगी कम कम.

लगा है नया साल तो सोचा है कुछ काम तुम पर भी छोड़ा जाये. कर लेना कभी याद...

[ये पेंटिंग प्रिय कथाकार प्रत्यक्षा सिन्हा की फेसबुक वाल से साभार. ये डिजिटल तस्वीरें कई कथाओं को अपने साथ लिए चलती हैं, इस पेंटिंग के आगे प्रत्यक्षा जी ने लिखा है- जामुन के पेड़ पर लटके पाँव झुलाते सर तने से टिकाये.]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…