गुज़र रही है ये शाम

भिक्षु की तरह सर घुटाये हुए
पद्मासन की मुद्रा में ध्यान की तरह
किसी दरगाह के आस्ताने में
दुआ में पड़ी ठुकराई चीज़ की तरह 
लटका हुआ हो लोहे की ज़ंजीर से
सुरीली प्रार्थनाओं के बीच ताल की तरह.

मणिहारे की टोकरी में
छुपे कंगन के हरे बैंगनी रंग की तरह
गाँव की हाट के खोखे पर 
तगारी में पड़े पीतल के मोरचंग की तरह
गोबर से लिपि दीवार पर टंगे
अलगोजा की मौन जोड़ी की तरह
गोरबंध में गुंथी हुई
खारे समंदर की किसी कोड़ी की तरह.

किले के परकोटे से
निगेहबानी को बने सुराख की तरह
रनिवास की खिड़की से उतरती
उदास विकल झांक की तरह
लिप्सा से भरे आदमकद आईनों में
धुंधली अनछुई विस्मृत याद की तरह.

मय-प्याले को थामें
खानाबदोश ठिकाने की ठंडी रात की तरह
सोये अलसाये बदन पर
वक्त की पांख से गिरी सुरमई बात की तरह
धरती के दो छोर से आगे
अनजाने लोकों में देवताओं की जात की तरह.

या फिर किसी दिल में
पल भर की धड़क
किसी पाबन्दी से परे, चाकरी से दूर
जो मन जिस विध हरियाए
रेगिस्तान में उसी बेतरतीब सेवण घास की तरह.

ऐसे प्रेम कैसे प्रेम?

गुज़र रही है ये शाम मगर जाने किस तरह
कि कहीं किसी तरह नहीं, न ऐसे प्रेम न वैसे प्रेम.
* * *

उन्होंने फिर से दोहराया. इसके सिवा कुछ नहीं सूझता? मैंने दर्शन पढ़ा. साहित्य की टोह ली. मैंने दीन-ईमान की बातें सुनी. मैं नीति और जातक कथाओं से गुज़रा. मैंने ठोकरों, पनाहों, निगेहबानी और याद से भरे लोगों के दिलों में एक ही बात को पाया. वो बात जहाँ पहुँचती दिखी, वहीँ दिखा कि ज़िंदगी और कुछ हो न हो प्यार भरा सुकून का एक पल तो होनी ही चाहिए. 


[पेंटिंग सिंध के मशहूर वाटरकलर आर्टिस्ट अली अब्बास साहब की है. ]

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