उपत्यका में प्रेमी युगल

कहवा के प्याले की तलछट 
के रंग की शाम 
पहाड़ पर उतरती हुई.

उपत्यका में प्रेमी युगल, 
पहाड़ को सर पर उठाये हुए. 
* * *
डूबती हुई रोशनी में,
बुझते हुये सायों के बीच 
थोर  के कांटे
रेगिस्तानी सहोदर
केक्टस की आभा लिए हुए.

ज़िंदगी  कितनी सुस्त.
* * *

कई बार इंतज़ार की तरह
खेजड़ी के पेड़ पर गिरती है
बिजली याद की
और फिर अगले तीन मौसम देखना होता है सूना रेगिस्तान. 
* * *

रात बीत गयी 
ऐसी अनेक रातें बीत गयी। 

बिस्तर पर नंगी पड़ी, तस्वीर का रंग उड़ता गया.
* * *

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