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ख़ानाबदोश कारवां में

मेरा जीवन एक आवृति की तरह स्पंदित है. तुम एक अविराम, अन्नत प्रवाह की तरह हो. मेरी नींद और जाग के बीच की घाटी के खालीपन में स्याह आवाजें हैं. उनका ठीक से पढ़ा जाना शेष है. स्मृति की वेगवती धाराएँ स्थिर होने से रोकती हैं. प्रवाह की एक ही दिशा में होते हुए भी तुम्हारे प्रश्न अलग हैं मेरे उत्तर अलग हैं. मैं सुबह को सोया सोया जागता हूँ. रात को जागा जागा सोता हूँ. शामें जैसे मेरी ही टोह में रहती है. जैसे कोई सोलह साला लड़का अपनी प्रेमिका को किसी लम्बे गलियारे में खींच लेता है किसी खम्भे के पीछे.  मैं भी खुद सौंप देता हूँ अपने आपको जैसे रूई का फाहा पानी को छूकर हो जाता है स्थिर, गीला और जयादा नरम. मुझे नहीं मालूम कि इस ज़िन्दगी का क्या होगा. मुझे इससे गरज भी नहीं कि जिनको खूब चिंता थी ज़िन्दगी की वे भी नहीं बचे शेष.

हमारे बीच एक ही अपूर्व सम्बन्ध है
मुझे किसी ने नहीं किया प्यार तुम्हारे सिवा.

मैं इसी बात पर पहली बार समझ सका प्यार.
* * *

प्रेमिका की छेनी की धार उतरती नहीं
शैतान भी विचलित नहीं होता इस टंकार से.

प्रेम जैसा जाने क्या करते हैं ये दो लोग.
* * *

 

प्रेमिका बाल्टी को पानी पर पटकती जाती है
जैसे शैतान की रूह पर गिरता हो कोड़ा.

प्रेम वलय बन-बन बिखरता जाता है.
* * *

एक खराब अध्यापक की तरह
प्रेमिका याद कराती है अतीत के पाठ.
 

प्रेमिका असल में सुनार की धोंकनी है,
शैतान है गलकर नया बन जाने के लिए.
* * *

जब गालों से उड़ गया
मांसल होने का रंग
जब आँखों के कोटरों में
उतर आया खालीपन
जब टूटी हुई प्रार्थनाओं 

और आशाओं से भर गया बेडरूम
जब अजनबियों को लगाया गले
.

शैतान पहाड़ की किसी खोह में गिरा हुआ नीम अँधा.
* * *

 

लीर लीर कपड़ों में
बजूका खड़ा था हरे धान के बीच

 

तुम समझ सकते हो इस बात को?
* * *

उसके पास एक दिल है
बिछोह की आग से भरा हुआ 


जैसे लुहार बैठा हो सुबह से किसी इंतजार में.
* * *

उसने शैतान को मारकर बना ली मशक
ताकि उसमें भर सके प्रेम की याद .

ओ प्रेमी, देखो क्या बदा है तुम्हारे भाग में.
* * *

शैतान तुम्हारे बिन मर जायेगा
तुम जी न सकोगी शैतान के बिन.

मगर ज़िन्दगी हेंस प्रूव्ड कहाँ होती है?
* * *

रात के शिकारी कुत्ते
बैठे रहते हैं
उजले दिनों की भेड़ों के झुण्ड के इंतज़ार में

ज़िन्दगी सिवा इसके क्या है याद नहीं आती.
* * *

कोई कब तक रखे याद,
घटिया मुसाफिरों के नाम

ख़ानाबदोश कारवां में
ये तनहा ज़िन्दगी
एक छोटा एकल गाना है,
जिसे तुम्हारे नाम पर किया जा सकता है पूरा.

* * *

[Painting courtesy : Inam Raja ]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
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* * *
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