इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही

टूटे-टूटे गिरते जाते इन लम्हों में, धुंध भरी सुबह की आँखें सोचे, सारे मंज़र खो जाने हैं. दूर किसी धुंधले धब्बे की मानिंद. धुआँ धुआँ सा बेशक्ल तुम्हारा होना दिखता है और मिट जाता है. जैसे कोई पानी की चादर मुड़ी हुई सूखी पत्तियों सी उड़ी जाती है. सूखे सूखे इस रेतीले जीवन में ठंडी नमी भरी हवा का मौसम फुसलाता है. दुःख आने हैं, हाँ दुःख ही आने हैं सच लगता है फिर भी मन मुस्काता है.

उफ़क और मेरी आँखों की बीच तुम्हारी याद किसी व्यू कटर की तरह खड़ी है.

कहीं से भी
अपनी ही आवाज़ की तरह
सुनाई दो।

दिखाई पड़ो अचानक
खाली मैदान के किसी टुकड़े पर
जैसे इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही।

जैसे कोई साया छू जाये
ऐसी छुअन की तरह आओ।

मैं कब तक
एक सर का बोझा उठाये रखूं
दर्द भरी गरदन पर
कब तक पीठ पर मुमकिन रहे
इस गरदन के साथ अतीत का बोझ।

तुम आओ कहीं से।


उसके सामने कई बार हम पिघल कर बह जाते हैं कि आखिर कब तक जिरह करते जाएँ। कई बार हम साँस भी नहीं लेते कि उसके सामने मुंह तक न खोलें।

होता मगर कुछ भी नहीं।
वह अपनी फितरत में और हम अपनी बेबसी में जीते जाते हैं।

शब्द रंग रेखाएं
सबकुछ उधार के
सब प्रसंशाओं के भरोसे टिका विश्वास

प्रेम का एक एक टुकड़ा
पड़ा है गिरवी
किसी खोखले सम्मान की चाह में।

कभी सोचा है इस बारे में?


उसने कहा
मैं किस तरह चूम सकती हूँ कीचड़ को
कमल के फूल की इससे बड़ी मजाक कभी सुनी आपने।

खरपतवार की तरह उगने और सूखे तिनके की तरह दहक जाने वाले रिश्तों के इस दौर में सबकुछ अप्रिय और नाशवान लगता है। जबकि हम कथित गलत ढंग से गुपचुप मिल और चूम लेने का जो सपना देखते हैं वह कितना मोहक लगता है। सारी दुआएं उसी पर जा गिरती हैं।

ओ अबूझ और अनकहे, तुम अमर रहना।

[Painting courtesy : Arif Ansari]

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