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Showing posts from January, 2014

हम होंगे कामयाब एक दिन

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उन्नीस सौ उन्नीस में अमेरिका के मेनहट्टन प्रान्त में मई दिवस के दो दिन बाद के दिन पेट सीगर का जन्म हुआ था और वे इस जनवरी महीने के आखिरी दिनों में इस दुनिया के विरोध प्रदर्शनों में गाये जाने के लिए एक बेहद खूबसूरत गीत छोड़ गए हैं. हम होंगे कामयाब एक दिन. विश्व का ऐसा कौनसा कोना होगा जहाँ विश्वास और अमन के लिए संघर्षरत लोगों ने इसे अपने दिल पर हाथ रख कर न गाया हो. हर भाषा में इस गीत का अनुवाद हुआ और इसे पेट सीगर की धुन ने अलग अलग जुबानें बख्शीं. चार्ल्स अलबर्ट के मूल गीत आई विल ओवरकम वनडे को नयी शक्ल वी विल ओवरकम के रूप में मिली. अफ़्रीकी और अमेरिकी जन संघर्षों में गाये जाने वाले इस गीत को पहले पहल उन्नीस सौ अड़तालीस में इस रूप में गाया गया और फिर से संगीता एल्बम का हिस्सा बन कर बाज़ार में आया. सीगर की लोक गायकी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय गीत बना दिया. हमने इस गीत को रक्तहीन आन्दोलनों में खूब गाया है. हम अपने किसी भी सामाजिक चेतना के कार्यक्रम में गए तो वहाँ इसी गीत को गाकर एकजुटता और विश्वास को व्यक्त किया. मजदूरों और क्रांतिकारियों के इस गीत में ऐसी क्या बात है कि दुनिया भर की क्रांतियों और स…

काश मैं गठित कर सकता कोई न्यायिक आयोग

आकाशवाणी के जिस स्टूडियो में काम करता हूँ वहाँ अलग अलग जगह पर स्लेव क्लोक लगीं हैं. वे बंधी हैं एक मास्टर क्लोक के आचरण से. आज अचानक तुम्हारी याद आई और याद आया कि तुमने किस तरह सुनाये थे बहुत सारे लोगों के किस्से, जो तुम्हारी ज़िन्दगी में थे.

कविता की पनाह, सबसे बड़ा मरहम है ज़िंदगी का.

कई बार अचानक दीखते हैं
फैंके हुए जूते, सामने पड़े हुए.

कई बार
हम चुरा लेते हैं नज़र
ऐसी चीज़ों से.

इस बार
बेरी पर आये नहीं उतने बेर
जितने दीखते रहे पिछले बरस.

पिछले बरस की याद आते ही
आया याद कि
फैंके हुए जूते, सामने पड़े हुए.

जाने क्यों
इन फैंके हुए जूतों को देखते
अचानक याद आता है एक लफ्ज़.

मुहब्बत.
* * *

उड़ते हुए पीछे की तरफ
गुलाची खाते
बर्मिंघम रोलर कबूतर की तरह

या फिर पिंजरे में क़ैद
एक पतली लकड़ी से उलटे लटके
बजरीगर की तरह

या याद की कलाबाजियों के बीच
सिर्फ गुरुत्वाकर्षण से बंधी
साँस थामे उड़ते बाज़ की तरह

एक रात थी
बीत गयी उलटे लटके शब्दों को पढ़ते।

लिखा था कि स्याह रात में
उदास कमरे नहीं रखते उम्मीद
अपनी खिड़कियों से किसी झाँक की।
* * *

सुनता हूँ तुम्हारे लफ़्ज़ों को बार बार,
इस तरह एक आ…

बेआवाज़ बातों की दुनिया की ओर

दरवाज़े बायीं तरफ खुलेंगे या फिर दायीं तरफ खुलेंगे. इस तरह की उद्घोषणा के बीच परसों मैंने तीसरी उद्घोषणा सुनी कि दरवाज़े नहीं खुलेंगे. मेट्रो ने जाने किसके सम्मान में अपनी गति को थोड़ा कम किया और सूने स्टेशन से आगे निकल गयी. मैं दिल्ली कम ही जाता हूँ. रेगिस्तान में सुख से जीते जाने का दिल्ली की चमचम और बाकी सारी मुश्किलों से क्या जोड़? लेकिन अपने दूसरे कथा संग्रह के प्री बुकिंग वाले आर्डर पर हस्ताक्षर करने के बाद मैं मेट्रो में हौज खास से चांदनी चौक तक का सफ़र कर रहा होता हूँ. मेरे पास एक छोटा सा थैला था. कंधे पर एक काले रंग की शाल थी. इसके सिवा दो किताबें थीं. इतनी सी चीज़ों को संभाले हुए मैं देख रहा था कि मेरे आस पास खड़े हुए लोग मेट्रो के न रुकने सम्बन्धी विषय पर निर्विकार थे. ऐसा लगता था कि या तो उनको पहले से ही मालूम है या वे भी हिंदुस्तान की सुख से बसर करने की चाह में चुपचाप कष्ट सहती जाती अवाम का हिस्सा हैं. हम ऐसे ही हैं कि हमें सब कुछ पका पकाया चाहिए. कोई सड़क साफ़ कर रहा हो तो हम उसकी मदद नहीं करते. उसके दूर होते ही सड़क को गंदा करने में लग जाते हैं. लोकतंत्र के लिए इतना…

बाद मेरे कोई मुझसा ना मिलेगा तुमको

सुबह का अखबार देखता हूँ. एक तस्वीर है. सात आदमी राजस्थानी साफे बांधे हुए एक सरल रेखा में रखी कुर्सियों पर बैठे हैं. तस्वीर से उनकी उम्र का ठीक अंदाजा नहीं लगा पाता हूँ. मेरे संचित ज्ञान का कोई टुकड़ा कहता है कि उनकी उम्र का अनुपात पचास बरस के आस पास होना चाहिए. इस तस्वीर में ऐसी क्या खास बात है? किसलिए मैं इसका ज़िक्र एक इतनी कीमती जगह पर करना चाहता हूँ. इस तस्वीर में उन सात साफे पहने बैठे हुए भद्र लोगों के आगे राजस्थानी वेशभूषा में एक लड़की ठुमका लगाने की मुद्रा में है. सात में से चार आदमी उस लड़की को ऐसे देख रहे हैं जैसे किसी नृत्य प्रतियोगिता के परीक्षक हों. दो आदमी कहीं सामने देख रहे हैं. एक का सर झुका हुआ है और एक आदमी की सूरत लड़की के पीछे होने की वजह से दिख नहीं रही. ये किसी भी महिला महाविद्यालय का दृश्य हो सकता है. ऐसे दृश्यों की झलकियाँ अब रोज़ ही दिखाई देने वाली हैं. इसलिए कि हम भूल गए हैं हमारी जगहें कौनसी हैं. हमें कौनसी भूमिकाएं सौंपी गयी हैं. हम क्या कर रहे हैं. हम सब जानते हैं कि सबसे बड़ा गुरु माता होती है लेकिन शिक्षा व्यवस्था के तंत्र में विश्व विद्यालयों के अध्यापक ऊँचे ग…

मुखौटे

मेरा बारह साल का बेटा मुझे एक फिल्म की कहानी सुनाता है. उसके चेहरे पर सिर्फ कल्पना, हास्य और आनंद का बोध दिखाई देता है. ये एक अमेरिकन फंतासी - हास्य सिनेमा है जिसका शीर्षक है द मास्क. डार्क होरेस की कोमिक सीरीज पर बनी इस फिल्म के बारे में, मैं जब पहली बार सुन रहा होता हूँ तो अपनी उम्र के हिसाब से चिंतित होता जाता हूँ. इसलिए कि कई बार हम समझदार होने की प्रक्रिया में सरल सुखों को जटिल सम्प्रेषण में ढाल देते हैं. मुझे समझदार होना ही चाहिए कि किसी मुखौटे की कहानी देखकर मेरा बेटा क्या प्रतिक्रिया कर रहा है, इससे ये मालूम हो कि उसके कच्चे मन पर इस सिनेमा ने क्या असर डाला है. कई बार मुझे किसी लड़ाकू विमान की आवाज़ घर के किसी कोने से आती हुई सुनाई देती है और उसके समानांतर कोई दूसरा टोही विमान अपने तन्त्र से रोबोट भाषा में संदेशे भेज रहा होता है. इस तरह एक काल्पनिक युद्ध घर के ड्राइंग रूम या हमारे बेड रूम के कोने में चल रहा होता है. ऐसे युद्ध और वर्च्युअल फाइट्स को हमारे नन्हे मुन्ने घरों में रचते रहते हैं. घर में बच्चों की आवाज़ आती रहे, वे बिना किसी वास्तविक खतरे के खेलते रहें तो हम खूब निश्चि…

मैं भरा हुआ होता हूँ तुम्हारे लालच से

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नये साल की आमद के साथ कुछ एक बेवजह की बातें लिखीं और भूल गया था. जैसे हम भूल जाते हैं हमारे गुनाह. मगर कभी तो देना ही होता है उनका हिसाब... इसलिए आज उनको इकट्ठा करके टांग रहा हूँ. बातें बेवजह

ईश्वर से उठ जाता है भक्तों का विश्वास
शैतान से डरते रहते हैं वे बारहा.

प्रेम को कौन खोना चाहता है दुनिया में.
* * *

हम सब जानते हैं
कि तन्हाई की आधारशिला पर जन्म लेता है जीवन.

शैतान मगर
तुम्हारे कानों में फुसफुसाता है, चूमना मुझे दोनों होठों से.
* * *

स्वप्न
अकल्पनीय हादसों और
अविश्वसनीय प्रेम का आभासी रूप नहीं होते.

शैतान मुस्कुरा रहा होता है कहीं आस पास
जैसे मैं भरा हुआ होता हूँ तुम्हारे लालच से.
* * *

जिस तरह मैंने
नहीं पाई कोई ऐसी चीज़ जिसके लिए मर सकूं.

उस तरह ये भी होना चाहिए था
कि न हो कोई ऐसी ऐसी चीज़ जिसके लिए जीया जाये.

दिल पत्थर है कि पड़ा हुआ है तुम्हारे कदमों में, जाने कबसे.
* * *

रुखसत एक दुःख भरा शब्द है मगर
कुछ लोग मर जाते हैं अपने से बेखबर
कुछ मरते हैं दुनिया की निगाहों से परे.

शैतान ने लिखा है अपनी वसीयत में
कि जब मैं मरुँ ज़रा सा सी पी लेना एक बार.
* * *

और उ…