February 17, 2014

मोहे चपरासी कर दे

रबी की फसल की कुछ सतरें दिखाई पड़ती है. बाकी सब सिमट आया है. कहीं कहीं कुछ बेवक्त की फसलें और हरियाली के टुकड़े हैं. शेष रेगिस्तान में अब कुछ आराम के दिन आयेंगे और आखातीज के बाद फिर से नयी फसल के लिए तैयारियां शुरू होंगी. लेकिन मन मेरा कुछ जगहों पर दुखी हो जाता है कि रेत के आँचल में कुछ बरस पहले पड़त की ज़मीन के सिवा कोई हिस्सा खाली न छूटता था. जहाँ कहीं इंसान बसा हुआ था वहाँ पूरी ज़मीन फसल के लिए जोती जाती थी. मैं पिछली बरसात में गाँव गया. मैंने देखा कि सबके खेत लगभग सूने पड़े हैं. किसी किसी ने ही कहीं फसल बो रखी है. ये बदलाव क्यों आया? ऐसा क्यों होने लगा कि पूर्णतया कृषि आधारित और पशुपालन के सहयोग से जीवन जीने वाले लोग कहाँ चले गए. उनके मन में खेती से दूरी क्यों आई? जीविकोपार्जन के लिए हम कृषि करते हैं इसमें कोई संदेह नहीं है. इसलिए संभव है कि हमें जीवन जीने के लिए कमाई के और साधन मिल गए हैं. मेरे गाँव के आस पास पिछले सात आठ सालों में तेल उत्खनन, लिग्नाईट के खनन और बिजली बनाने के कारखाने लगते जा रहे हैं. ये सब शहर के तीस एक किलोमीटर के दायरे में हैं. तेल की खोज वाले आए उन सालों में लोगों में एक कौतुहल था कि हमारी ज़मीन पर ये क्या करने वाले हैं. धीरे से डालर रूपया बनकर बहने लगा. आय का नया स्रोत बना. अब ज़मीन, गाड़ी, ड्राइवर, बाबू, चौकीदार और हर तरह के काम के लिए रोज़गार बना. सब कुछ इतना तेज़ी से बदला कि यहाँ के लोग समझ ही नहीं पाए. वे एक बहाव में बह गए. उनके लिए अपना पुश्तैनी काम और संसाधन बोझा बन गए. सब के सब कठिन परिश्रम वाली खेती को छोड़ कर आसन चपरासीगिरी करने को उतावले होकर कंपनियों के आस पास मंडराने लगे. इन सबने अपनी अपनी जुगत लगाई, अपनी धौंस पट्टी चलाई, राजनीतिक और प्रशासनिक दवाब बनाए. ये एक लाभ का सौदा था कि काम कुछ नहीं है. खड़े रहना या हाजिरी भरना है.

इस नये काम के मिलने या इसे पाने के लोभ की होड़ असल में रेगिस्तान में पानी की कमी और मौसमी फसलों के लिए भी मानसून पर निर्भर रहने की मज़बूरी रही. बारिश का कोई पक्का ठिकाना नहीं होता. खेती के लिए पानी वाली ज़मीन कुछ एक छोटे टुकड़ों में हैं, जहाँ कहीं ज़मीन में आदमी की पहुचंह तक कोई वाटर क्यूब हाथ लगा वह वह निश्चिन्त होकर खेती कर रहा था. उसकी आमदनी में कुछ स्थायिपन था लेकिन ये भी कोई ऐसा काम न था जो उसे समृद्धि की ओर ले जाये. यहाँ खुशी की बात बस इतनी थी कि बरसात का इंतज़ार करने से बेरों वाले किसान अपने आपको अच्छे हाल में पाते थे. बस इतना ही गर्व था. लोग हालाँकि माला माल होने की बाते किया करते थे लेकिन मैंने बेरों के मालिक किसी किसान को विलासिता का जीवन जीते हुए नहीं देखा. सबको अपने खेतों में मजदूरी करते हुए ही पाया. इसका अर्थ मुझे सिर्फ इतना समझ आता है कि खेती करना मनुष्य के लिए एक पावन कर्म तो है मगर ये एक मजबूरी भर है. इसका मुनाफा और इसकी लागत का मेल पूरी तरह से मेल नहीं खाता है. किसान देखता है कि छोटे छोटे सरकारी ठेके लेकर उनके भाइयों ने खूब धन बनाया है. उनके पास कम समय में गाडियां और नौकर हो गए हैं. आखिर माजरा क्या है कि साल भर खेत में अपना पसीना बहा कर फसल लेने वाला एक मोटर सायकिल पर और ठेकेदारी करने वाला वातानुकूलित गाड़ी में. इसी हाल में जब कहीं छोटे नौकर हो जाने का अवसर हाथ लगा तो किसान ने खेती बाड़ी छोड़ कर नौकर होना जाना पसंद किया है. गाँव में साल भर काम नहीं होता है. इसलिए कृषक मजदूरी करने के लिए दूर दराज़ के बंदरगाहों तक भी जाते रहे हैं लेकिन जब भी खेती का समय आता वे वहाँ से लौटा कर खेती में मग्न हो जाया करते थे. इस तरह प्पोरी तरह खेती से मोह भंग होना जाना अच्छा संकेत नहीं है. क्या इसका अर्थ ये समझा जाये कि खेती एक मजबूरी का पेशा भर है. अगर ये समझ लिया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब भूख देश को अपनी कठोर अष्ट भुजाओं में जकड़ लेगी. भूख मिटाने के लिए रूपया या डॉलर नहं चबाया जा सकता है. उस वक्त उसी अन्न की ज़रूरत होगी जिसे हमारा किसान उपजाता है. किसान खेती करे और सामंत के कारिंदे उसे छीन ले जाएँ, किसान खेती करे और लोक का तंत्र कुछ एक रुपये के बदले हासिल कर ले. इन दोनों हाल में कोई खास फर्क नहीं है. बस के जगह किसान से उसकी फसल इस अनुभूति के साथ ली जाती है कि इसके बदले उसे कुछ दिया जा रहा है. वैसे राजतंत्र भी निशंक जीवन जीने और अपनी जमीन पर बसर करने देता ही था.

हम सबके दिमाग में ये ज़रूर होना चाहिए कि किसान द्वारा की जा रही खेती सिर्फ उसका अपना भरण पोषण भर नहीं है. ये समाज और राष्ट्र के लिए की जाने वाली कमाई है. फिर क्यों ऐसा हाल है कि किसान होना शर्म और अफ़सोस की बात है और चौथे दर्ज़े का नौकर होना उससे अच्छा है. इस हाल के कारणों को तलाश कर अगर हमने समय रहते कुछ न किया तो सोने के चम्मच और चांदी की थालियाँ खाली पड़ी रह जायेगी. हमारी भूख हमको निगल लेगी. हमारे निवाले में रूपया पैसा काम न आएगा. यए खाली छूटती हुई ज़मीन एक गंभीर संकट की ओर संकेत है. इस संकेत को समझना हमारी प्राथमिक ज़रूरत है. गांवों से शहरों की ओर पलायन के खतरे के बाद ये उससे भी बड़ा खतरा है कि गाँव में ही बैठा हस किसान खेती की जगह कुछ और करना चाहता है. हमें सचमुच ऐसी निति की ज़रूरत है जो किसान की फसल पर उसे मोल देने के सिवा ऐसा एप्रिसियेशन भी जो उसके सामाजिक और आर्थिक स्तर को पहले दर्ज़े की ओर ले जाये. साधारण कपड़ों में भरे पेट सुख से जीना, विलासी लिबास में भूखे पेट की मरोड़ों को सहते जाने से बेहतर होगा. उद्योग देश का भला करेंगे मगर भोजन बिन वह भला किसका होगा.

February 13, 2014

तूँ ही तूँ

मैं जब भी कहीं जाने का सोचता हूँ तो रेगिस्तान की रेत में गोल बिल बनाकर ज़मीन के नीचे छुपे बैठे किसी हुकिये की तरह कोई मुझे अपने पास तन्हाई में खींच लेने को तड़प उठता है. मैं एक खराब मुसाफिर हूँ. मेरी आत्मा रेत में बिंधी हुई है. सफ़र से पहले मैं हर रोज़ प्लान करता हूँ और हर रोज़ उसे बिखेर देता हूँ. मुझे विश्व पुस्तक मेला दिल्ली में जाना है और शायद नहीं जाना. मेरा ठिकाना गेंदे फूल की खुशबू से भरी इन नाज़ुक अँगुलियों के पास है, रेगिस्तान की लोक गायिकी में है.

कुछ तय हो तब तक गफ़ूर खां माँगणियार और साथियों के जिप्सी सुरों में आज का दिन भिगो लेते हैं. एक सूफी रचना है.

क्या चंद्र बन रैन है क्या सूर बन पगड़ो
क्या बाप से बैर क्या बँधवाँ संग झगड़ो

क्या नीच को संग क्या ऊंच कर हासो
क्या दासी की प्रीत क्या बैरी घर वासो

चलता नाग न छेड़िए पटक पूछ फिरे पाछो
बैताल कहे सुन बिक्रम नर इतराव तो मूरख करे

हाथ में हाथी बन बैठो कीड़ी में तूं नैनो क्यूँ
होके महात्मा ऊपर बैठो हाकण वालो तूं ही तूं

चोरों के संग चोर बन जावे कपटी के संग कपटी तूं
करके चोरी भागो जावे पकड़ण वालो तूं ही तूं
जीयाजूण जलथल में दाता ज्यां देखाँ ज्यां तूं ही तूं

दाता के संग दाता बन जावे भिख्यारी रे भेलो तूं
होके मंगतो मांगण जावे देवण वालो तूं ही तूं

नर नारी में एक इज रंग दो दुनिया में दीसे तूं
होके बालक रोवण लागो राखण वालो तूं ही तूं

इतरो भेद बता बता मेरे अवधू साबत करणी कर रे तूं
के गोरख के कृष्णा के मछंदर गरु मिल्या वा तूं ही तूं.

क्या चंद्रमा बिना रात, क्या भरे उजास बिना दिन. क्या पिता से दुश्मनी और क्या भाइयों से झगड़ा. क्या नीच का साथ और क्या ऊँची हंसी. क्या दासी से प्रीत, क्या दुशमन के घर वास. टली हुई विपदा को कभी न छेड़िए जैसे जाते हुए विषधर को छेड़ने पर वह पूँछ पटकता हुआ वापस भी मुड सकता है. ओ मनुष्य विक्रम इस वैताल की बात को सुनो कि घमंड करने का काम सिर्फ मूर्ख लोगों का है.

ओ दाता ! तूं हाथी बन कर भी हाथ में आ बैठा है और चींटी की तरह छोटे से जीव में किस तरह समाया है. ऊपर से तूं महात्मा बन कर बैठा है और सबको हांकने वाला भी सिर्फ तूं ही तूं. चोरों के साथ चोर बन जाता है और कपटी लोगों के साथ कपटी. चोरी करके भागने वाला तूं है और भागते को पकड़ने वाला भी तूं ही. इस तमाम जीवन में जल और थल में दाता मैं जहाँ भी देखूं सिर्फ तूं ही तूं है. दानवीरों के संग दानवीर बन जाता है, भिखारी के भी साथ है तूं और मंगता होकर माँगने जाने वाला और देने वाला भी तूं ही है. एक तूं स्त्री में एक तूं पुरुष में, एक ही दुनिया में दो तरह का दीखता है तूं. बच्चा बन कर रोने वाला भी तूं और उसे संभाले वाला भी तूं. ओ मेरे अवधूत मुझे इतना भेद बता, अपने कर्मों को साबित कर, गुरु के रूप में तूं ही गोरखनाथ, तूं ही कृष्ण और तूं ही मछंदरनाथ, जो भी मिले वे सब तूं ही तूं है.

कभी तो तेरी आवाज़ भी आए मगर फिलहाल इसे सुनो...

February 12, 2014

विदुषी गार्गी और नव पल्लव

अगर कोई मुझसे पूछे कि गार्गी कौन थी? तो यह प्रश्न मेरे मुंह पर लटक जायेगा. मेरी भाव भंगिमाओं से अल्प ज्ञान के तत्वों को विदा होते देखा जा सकेगा. कुछ साल पहले जब रेडियो के पास इतने कार्यक्रम निर्माता थे कि कुछ निर्माता स्टूडियो से बाहर जाकर भी कार्यक्रम रिकार्ड किया करते थे. उन वर्षों में एक बार मुझे गार्गी पुरस्कार वितरण समारोह को कवर करने और उस पर रेडियो रिपोर्ट बनाने का अवसर मिला था. उस पुरस्कार वितरण समारोह को अगर गार्गी देख सकती तो उन्हें समझ आ जाता कि न तो इस दुनिया में याज्ञवल्क्य की क़द्र है न कोई विदुषी का सम्मान करना चाहता है. मुझे विदुषी गार्गी के नाम पर आयोजित उस समारोह को रेडियो पर पेश करना था और मेरी कठिनाइयों का भी कोई हिसाब न था कि मुझे गार्गी का पूरा नाम भी मालूम न था. इसलिए कि मैं एक साधारण छात्र था जो अक्सर कक्षा के बाहर के दृश्यों में खोया रहता था. मैं सिर्फ इतना भर जानता था कि गार्गी पुराणों या मिथिकीय इतिहास में उल्लेखित हैं. वे विदुषी थीं और उन्होंने कोई ऐसा प्रश्न पूछा कि सुनने वालों ने उनको उत्तरदाता के समकक्ष विद्वान मान लिया था. हमें दुनिया के ज्ञान के अकूत खजाने के बारे में जानकारी नहीं हो सकती लेकिन इतना तो होना ही चाहिए कि हम जिन विषयों के संपर्क में आते हैं उनके बारे में जान सकें. विदुषी गार्गी के बारे में हमारे विद्व समाज के पास कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं हैं. मैंने रेडियो रिपोर्ट बनाने के सिलसिले में जो तथ्य जुटाए वे नाकाफी थे. लेकिन फिर भी अच्छे कार्यक्रम बनाने की चाह ने मुझे कई नई जानकारियों से भरा और इससे मुझे अपार प्रसन्नता होती रही है.

गार्गी के बारे में माना जाता है कि वे गर्ग कुल से थीं इसलिए उनको गार्गी कहा गया. उपनिषद काल की इस विदुषी के बारे में उल्लेख है कि एक बार राजा जनक ने यज्ञ के समय घोषणा की कि जो व्यक्ति स्वयं को सबसे महान् ज्ञानी सिद्ध करेगा, उसे स्वर्णपत्रों में जड़े सींगोंवाली एक हज़ार गाएं उपहार में दी जाएंगी। इस घोषण को सुनकर कोई विद्वान् आगे नहीं आया। इस पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से उन गायों को आश्रम की ओर हांक ले जाने के लिए कहा। तब उस सभा में उपस्थित विद्वानों का याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ हुआ। उनसे प्रश्न पूछने वालों में गार्गी भी थी। गार्गी ने जो प्रश्न किये वे बहुत ही सरल किन्तु विद्वता से भरे थे और उनमें कई प्रश्न छुपे हुए थे. गार्गी ने पूछा था- याज्ञवल्क्य आप ये बताएं कि जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल किसमें जाकर मिल जाता है? इस प्रश्न के उत्तर में विद्वान याज्ञवल्क्य ने कहा कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है। इसके बाद गार्गी ने पूछा कि वायु किसमें जाकर मिल जाती है. याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में। इन दो प्रश्नों के बाद गार्गी ने उस महान ज्ञानी ऋषि के हर उत्तर को प्रश्न में बदल दिया. इसी अद्भुत प्रश्नोत्तर में सभी लोक समा गए थे. ज्ञान के उस भव्य और अतुलनीय आयोजन को देखने सुनने वाले अभिभूत हो गए थे. अंतत इस प्रश्नोत्तर से जो प्रमुख प्रश्न चुना गया. उसके बारे में कहा जाता है कि गार्गी ने याज्ञवल्क्य से पूछा था कि  इस पृथ्वी के ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है. उसके बीच जो कुछ भी है, और  जो हो चुका है और जो अभी होना है. ये किसके अधीन और प्रभाव में हैं? इसके उत्तर में याज्ञवल्क्य ने कहा था ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी’ अर्थात अक्षर, अविनाशी तत्व है. जिसके प्रशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है। इस प्रकार गार्गी के प्रश्न का अर्थ था कि ये ब्रहमांड किसके अधीन है. इसमें समय और काल की भूमिका किससे निर्धारित होती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था. अक्षरतत्व के. इस सभा में गार्गी ने एक विद्वान को चुनौती दी थी और उसी विद्वान को अपने प्रश्नों से अधीर करने के पश्चात उनका गुरुत्व भी मान लिया था. यह शिक्षक और शिष्य के बीच की आदर्श स्थिति है. इसमें ज्ञानी शिक्षक को योग्य शिष्य मिला. जिसने उनके ज्ञान की कठोर परीक्षा ली थी. अगर याज्ञवल्क्य उन गायों को हांक ले जाते और उनके ज्ञान के बारे में कोई भी प्रश्न न करता तो ये ज्ञान का क्षय और नष्ट होना ही कहलाता. गार्गी ने जो प्रश्न किये और उनसे जो उत्तर पाए वे ज्ञान की वृद्धि और सुख का कारण बने. वे इतनी मुग्ध हुईं कि उन्होंने याज्ञवल्क्य को परम ब्रहम्निष्ठ मान लिया और वहां उपस्थित बाकी प्रतिद्वंद्वी ब्राह्मणों से कहा- ‘सुनिए, अगर आप अपना भला चाहते हैं तो याज्ञवल्क्य को नमस्कार करके अपने छुटकारे का रास्ता ढूंढो’ उस सभा में गार्गी ने एक अतुलनीय डिबेटर होने का श्रेय पाया और संभव है कि इसी कारण उनको वाचक्नवी कहा गया. गार्गी वाचक्नवी.

आज के अखबार में खबर है कि बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती और विदुषी गार्गी की श्रद्धेय स्मृति और अभिमान में गार्गी पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन हुआ. इस अवसर पर कुछ छात्राओं का कहना था कि उनको योग्यता के बाद भी सम्मान से वंचित रखा गया. आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है. इसलिए कि हर काम को दो खानों में बाँट दिया गया है. एक सरकारी दूसरा गैर सरकारी. बालिका शिक्षा के लिए काम करने वाले एनजीओ और सेवक इसमें कोई रूचि नहीं रखते कि वे सरकार की ओर से आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में सहयोगी बनकर आयें. इसलिए कि वे अपने संस्थानों के नाम और उनको मिलने वाली आर्थिक मदद में ही रूचि रखते हैं. काश उनकी रूचि वास्तव में बालिकाओं के सम्मान में भी होती. शिक्षा तंत्र भी किसी एक विद्यालय के जिम्मे इस कार्यक्रम को इस तरह डालता है कि जैसे हो जाये तो पीछा छूटे. आख़िरकार एक विद्यालय के प्राचार्य, शिक्षक और लेखा विभाग के अधिकारी कर्मचारी मिलकर कैसे जिले भर के आयोजन को अच्छा बना सकते हैं. मैं प्रार्थना करता हूँ कि एक दिन ‘सरकार हमारी और उसके सभी काम हमारे’ होने की अनुभूति देशवासियों में आये. देश की चिंता करने वाले लोग मिलजुल कर सभी सरकारी आयोजनों को अपना खुद का आयोजन बन लें. अपनी बेटियों के सम्मान के लिए आगे आये. हमारे यहाँ इन दिनों रेडियो में डिजिटल प्रसारण विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर की वर्कशॉप चल रही है. इसके उद्घाटन के अवसर पर कार्यालय प्रमुख ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर देशभर से आये प्रतिभागियों का इस तरह सम्मान किया जैसे वे हमारे यहाँ किसी मांगलिक कार्यक्रम में आये हुए अतिथि हों. इस सरकारी काम को आत्मीय काम में बदल जाते देखकर हर कोई अभिभूत था. हमें जब तक हमारे काम पर गर्व नहीं होगा तब तक हम खुद पर और समाज पर गर्व नहीं कर पाएंगे. बसंत के इस मौसम में धरती को जब कुदरत ने नये रंग पहनाये हैं, क्या कभी हमारा मन भी समाज और राष्ट्र के लिए बसंती होगा.

February 6, 2014

थके हारे बेमजा सिपाही की तरह



किसी ने आवाज़ दी- जाखड़ साहब.
मैंने बालकनी से सर नीचे किया. उदघाटन समारोह का कार्ड. इतनी सुबह. मैं आँखें मीचे हुए कहता हूँ आओ चाय पीकर जाना. कहते हैं नहीं नहीं फिर कभी.

रसोई में खड़े हुए मुझे देखकर वो कहती है मालूम ही नहीं चलता कि आदमी है कहाँ? इस इंटरनेट ने सत्यानाश कर दिया सुकून का. मैं ऐसे देखता हूँ जैसे तुमको मुझ पर विश्वास नहीं. वह ऐसे देखती है कि पक्का अविश्वास ही है.

विस्की की बू से भरे हुए चहरे को उठाये हुए सोचता हूँ कहाँ गए रात को, किस घोड़े पर चढ़े, किस सांप को बाँहों में भरा.

परसों रात किसी ने ज़रा कांपते हाथों से ग्लास आगे बढ़ाया- 'सर लीजिए एक बचा रह गया.' जैसे किसी दुश्मन का सर था और बेखयाली में कलम करने से रह गया. सहरा-सहरा, बस्ती-बस्ती अपनी तेग के किनारे खून से भरे हुए थके हारे बेमजा सिपाही की तरह मैंने उसे हलक के नीचे कर दिया.

कुदरत ने बदन बनाया. लोच और गर्मी से भरा हुआ. यही खूब था. इसके आगे रूह जैसी आफत बनायीं. जैसे असल नशे का खयाल आते ही शराब पानी हो जाती है. उसी तरह बदन से उकता गया हूँ.

साहेब. इधर देखो तो.

दीदे हैं तो फाड़ने को थोड़े ही हैं.

या तो मुसलमान रहो या काफ़िर हो जाओ, खच्चर कहीं के. ना कोई मुसल इमान हैं न बे इमान.

सुबह सुबह भक्त पूरी ले लेते हैं. कोई बेसुरा बच्चा पकड़ कर कुछ रिकार्ड कर लिया है. रेलवे स्टेशन के आस पास कहीं टेप बजने लगता है. मैं कहता हूँ सर्दियाँ अच्छी हैं गधों के रेंकने की आवाज़ तो नहीं सुनाई पड़ती बंद कमरों में. या फिर हाय तौबा वाली गर्मी हो कि कमरा बंद करें और ऐसी में रजाई लेकर सोयें. पागल दुनिया, बाहर गर्मी का तमाशा अंदर ठंडी.

जान ज़रा पास आओ तो

मीलों के फासले और लाखों के खर्चे को लात मार कर दुनिया एक हो गयी है. अलग अलग होते हुए भी नैनो तकनीक के आने से पहले ही साथ सो जाती है. सोते हुए पूछती है मजा आया.

हाँ कल फिर बाय

एक ही आदमी और औरत में कितने सलीके छुपे हैं. जिस दिन खुद के पास होता है डर जाता है. अचानक एक खौफनाक खयाल आता है कि मैं अपनों से दूर हो गया. इस अपराधबोध में चूमता चाटता है. कुछ एक लोग सिनेमा दिखा लाते हैं.

मेरे चार दिन बरबाद हुए. पर अच्छा हुआ कि इसी बहाने फोन पर कुछ लोगों से बात कर ली.

मेरे दोस्त व्हाट्स एप पर मेरी वैसे ही बारह बजाते हैं जैसे कि सुबह बेसुर सिंधी गायक बच्चा. रब कहीं है तो इन दोनों को देख ले कृपया. कि ऋ प या करके ज़रूर.

जनवरी डूब रहा था तो सोचा कि गयी भैंस पानी में कि फिर वही दीवानापन. जाने कैसे कहीं से लौट आया. दुनिया के जियादातर लोगों का हाल यही है कि दो टके के फर्ज़ी इश्क का बिल भरने में अनमोल ज़िंदगी तबाह. सोचा नहीं कि कब जागे हैं, क्या सचमुच जागे हैं, क्या करेंगे जाग कर... और ज्यादा सोचना भी अच्छा नहीं.

आह सर फिरा हुआ है. मुआ फूल गेंदे का लगाया था और खुशबू गुलाब की आ रही है. पी रात को रम थी और ख़याल विस्की का ही तारी है. नकली लोगों की संगत में सबकुछ नकली कि जो चाहिए वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह और भी नहीं चाहिए.

वो याद है, अरे वही कुम्हारों की लड़की भरे गदराए बदन वाली और इससे भी बड़ी बात कि जिससे अक्ल मुंह फेरकर बैठी थी. जिसे देखकर मुल्ला नसरुदीन के ज़माने की कमसिन लड़कियां याद आ जाये. गधों की पीठ का सहारा लिए खड़ी मुस्कुराती हुई. वही सिटी कोतवाली का इलाका जहाँ गलियां पानी की तरह नीचे की ओर बहती रहती हैं. लोग सीढियाँ चढ चढ कर ऊपर आते हैं और ढलान उनको वापस जोधपुर शहर में बहा ले जाती है.

कुल जमा, आज की सुबह बहुत अच्छी थी. विविध भारती ने गाना बजाया- सौतन के संग रात बितायी... चाय की प्याली हाथ में लिए बच्चों को स्कूटर पर स्कूल जाते देखकर हिदायतें बरसाई. आहिस्ता गाड़ी चलाने वाला आहिस्ता से गिरता है. खयाल रखना अपना. चाय हाथ में लिए सोचा विस्की गा रही है कि तुम मेरी सौतन रम के साथ सोकर उठे हो.

February 4, 2014

तब तक एक बुदबुदाहट है

रात हर किसी को छूकर तुम्हारा पता पूछते हुए खुद को पाया. पांवों में भारी थकन थी, जींस के बदरंग घुटनों पर समंदर के खारे पानी सी सूखी लहरें थीं. गहरे सलेटी रंग के कमीज की फोल्ड की हुई बाँहों में बीते वक्त की गंध रखी थी. कोई सीला मौसम था आंधी की तरह आता हुआ. बुझती हुई रोशनियों के बीच जाती हुई सर्दी की छुअन, याद की रेत में गुम कुछ एक चेहरे, प्याले में भरे हुए पानी में कोई सोने सा रंग

और अचानक

कोई आहट, कोई साया, कोई शक्ल, कोई कुछ नहीं.

पुल से गुज़री एक कार की हेडलाईट की रौशनी कमरे की दीवार पर उजाला बुनती हुई गुज़री. उस चौंध में कई साल बने और पल भर में मिट गए. यकीनन तुम फिर से पागल हो जाओगे. इसी ख़याल में छत उतर कर से नीचे की ओर चला आया. कड़ाही पर रखे जाने वाले पारदर्शी ढक्कन की तरह बीवी बच्चों की शक्लों को ओढा और बेमजा आलू की तरह सो गया.

सुबह के चार बजकर बावन मिनट हुए हैं. कोई रोता नहीं, कोई हँसता नहीं. काले लिबास को उतार कर शोक के आखिरी पहर में कोई चला गया. वही जो खोज रहा था हर किसी को छूकर. खोयी हुई चीज़ों के बरबाद ढेर में कुछ भी न था तीखा जो चुभ जाता अंगूठे के ठीक बीच. हाथ खाली, पाँव बेजान, बिस्तर दोशीज़ा और सुबह ताज़ा.

गुज़र गयी सुबह.

बिस्तर पर पड़ा हूँ. जैसे किसी ने पानी को भारी चद्दरों में काट लिया है. पानी की वे सतहें मेरे ऊपर उतर रही हैं. सघनता है. सोच है कि शायद सांस लेने में कुछ ही देर बाद मुश्किल होने लगेगी. अपने हाथ को ऊपर उठाता हुआ पानी की चादर से बाहर निकलना चाहता हूँ. कुछ नहीं, बस एक सीलापन है. हथेली में कोई हल्का ठंडा स्पर्श है. खालीपन की छुअन.

आँख में कोई खराबी हुई कि एक गीलापन मुसलसल बह रहा है. चुप, गालों से होता हुआ गले तक और आगे

एक नीले टीशर्ट में खो जाता है. मैं गडरिये को आवाज़ देता हूँ हांक ले जाओ इस उदासी की भेड को. इसलिए अपनी आँखें पोंछता हुआ एक बार खूब लंबे तक होठों को खींचता हूँ. फूल खिलते और मुरझा जाते हैं.

एक पीला रंग था आहिस्ता से बुझ रहा है. स्याह होने तक के लिए. राख की शक्ल में बिखर जाने को. सफ़ेद रंग के लिहाफ बेढब बिखरे पड़े हैं और कुछ नहीं है. कुछ भी नहीं. हाँ कभी कभी आँख का पानी रास्ता बदलकर नाक से बहने लगता है तो फिर कोई उम्मीद आती है. उम्मीद कि खराबी सिर्फ मन की नहीं है.

जनवरी तुम छीज चुकी हो अपनी हद तक, मुझे मगर कोई हल नहीं, मैं हूँ सीढियाँ उतरते तुम्हारे साये की छाँव में, तुम्हारे कुर्ते से उड़ कर आती हवा में, तुम्हारे कान के बूंदों से टपकते हुए काजल जैसे रंग में, तुम्हारी आँखों में रखी आखिरी घड़ी में.

मैं हूँ पानी की गहरी सतह के नीचे, सांस को मोहताज, घनी तड़प और लाजवाब ऐंठन से भरा हुआ. दुआ में मुंह फाड़े हुए आसमान के रंग को देखता. मैं हूँ उसी खूबसूरत शाम के बिछोह के दुःख से सना हुआ.

आह!

बेहिसाब तस्वीरें और ये डूबती हुई जनवरी की पपड़ियों के बीच किसी बीते वक्त की झांक जैसी ज़िंदगी. मैं फिर थक कर गिर गया हूँ मैं फिर उठूँगा अपना हाल कहने को. तब तक एक बुदबुदाहट है अगर सुन सको

तुम तुम तुम

[पेंटिंग तस्वीर स्रोत  :  https://www.facebook.com/GlasgowPainter]

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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