An illegally produced distilled beverage.


April 27, 2014

ये जो आंसू अभी टपक पड़ा है, ये क्या है?

कुर्बानियां बेकार नहीं जानी चाहिए. हमारे पुरखों ने देश को आज़ाद करवाने के लिए असंख्य कुर्बानियां दी थी. उनका ये बलिदान आज़ादी के लिए था. आज़ादी अच्छी और बड़ी कीमती चीज़ होती है. हम आज़ाद हुए तो हमें इस अच्छी चीज़ का फायदा उठाना ही चाहिए. पहले औद्योगिक घरानों ने फिर नेताओं ने और फिर नौकरशाहों ने इसका फायदा उठाया. साठ साल बीतते - बीतते ये फायदा बीडीओ से होता हुआ ग्राम सेवक तक आया. सत्तानशीं नेताओं से ग्राम सरपंचों तक आया. हर कोई आज़ादी के जश्न में डूबा हुआ आज़ादी का फायदा इस तरह उठाने लगा कि आज़ादी को निचोड़ कर सुखा दिया जाये. जैसे अफीम पोस्त का सेवन करने वाले चूरे को कूट - कूट कर छान - छान कर निचोड़ लेते हैं. बचे हुए नाकाम बुरादे को भी खाद के लिए रख लेते हैं उसी तरह देश में आज़ादी को निचोड़ा जा रहा था.

मेरा भीखू महात्रे रेगिस्तान की इन गलियों में राज्य सेवा में ग्राम सेवक की नौकरी करते हुए इस निचोड़ सिस्टम की सबसे खराब कड़ी निकला. इस कारण वह खुद भी निचोड़ा जा रहा था. जिस गाँव में ग्राम सेवक था वहाँ के सरपंच ने उसे अफीम सेवन को उकसाया और इस नशे में घेर लिया. पंचायत के काम काज का हाल ऐसा हो गया कि बीडीओ साहब को उनका कमीशन सही समय पर सरपंच न दे तो वह अमित को अपनी तनख्वाह से भरना होता था. शिक्षा विभाग के सम्मानित शिक्षक भी इस आज़ादी की लूट में शामिल होने के लिए थोक के रूप में बीडीओ साहब बन बैठे थे. यहाँ से देश का दुर्भाग्य देखा जा सकता था कि जिन शिक्षकों ने हमें बेहतर बनने की सीख दी थी, वे नहीं रहे. अमित के बीडीओ साहब ईमानदार आदमी थे. वे कमीशन के लिए तय रुपयों में आने वाले पैसे छोड़ देते थे. लेकिन रुपयों को छोड़ना ईमानदारी नहीं था. इसलिए अमित को नौकरी से निलंबित कर दिया जाता. वह चौथाई और लगभग न बनने वाली तनख्वाह के सहारे होता. सिस्टम की सबसे खराब कड़ी को बस स्टेंड के पास, लक्ष्मी सिनेमा के सामने वासु के टी स्टाल पर और कस्बे की तमाम मालूम ना मालूम गलियों में चाय वालों की थड़ी पर बैठे सिगरेट पीते हुए देखा जा सकता था. कोई स्क्रिप्ट लिखवाने आता तो सौ तीन सौ रूपए दे जाता था. ज़िंदगी उसी कलम के सहारे चल सकती थी मगर परिवार नहीं चलता था. इसलिए अमित आंसू भरी आँखों से उनको खत लिखता जो उसकी नौकरी बहाल करवा सकते थे. जो कलेक्टर साहेब को कह सकते भला आदमी है. लिखता पढता है. लेकिन बीडीओ साहब कहते शराबी और अफीमची है पंचायत को बेचकर खा गया है. सिस्टम की राह का रोड़ा है.

इस तरह दो हज़ार छः के आस पास झंझावातों से घिरा अमित एक दिन सारी नाकामियों को ठोकर मार कर उठ खड़ा हुआ. उसने कहा- मैं इन सब से हार मानने वाला नहीं हूँ. उसने अफीम को छोड़ दिया. दिन को शराब पीनी बंद कर दी. सिगरेट पीने का हिसाब आसमां से ज़मीन पर ले आया. सायकिल चलाने लगा था. एक नया कंप्यूटर और प्रिंटर लाया. होलीवुड फ़िल्मों की स्क्रिप्ट के पीडीएफ के प्रिंट आउट लिए. अपनी कहानियों को स्क्रिप्ट में ढालने लगा. रोज़ कविता लिखता था. रोज़ अपने बच्चों के लिए पढ़ने लिखने की सामग्री खरीदता और घर ले जाता था. उसने मुझसे सौ बार कहा कि मैं अपने बच्चों से बेहिसाब प्यार करता हूँ. मैं उसे कहता कि तुम ये बात उनको कभी कहते हो. वह चुप हो जाता. उसका घर में व्यवहार मैंने जब भी देखा तना-तना सा था. लेकिन मियां बीवी में एक आत्मीयता का वृक्ष सघन होता जा रहा था. वह अपनी ज़िंदगी से जो चाहता था वही सब उससे दूर भागता जाता था.

इस बार उसको नौकरी में फिर वही कमीशनबाजी का सदमा लगा. उसको इस सिस्टम ने ढहा दिया था. अमित आश्चर्यजनक रूप से मानसिक अवसाद में चला गया. वह अज्ञातवास में रहने लगा. अपने फोन से एसएमएस करता था. उसके इन संदेशों में व्यवस्था से नफ़रत, दोस्तों के कमीनेपन, साहित्य के बेहतरीन गध्य के टुकड़े, उम्दा कवितायेँ, शानदार अनुवाद हुआ करते थे. जब अज्ञातवास से बाहर आता तो दिन को बेचैनी से भरा हुआ भटकता रहता था. दोस्तों के घर जाता और चुप बैठा रहता. बोलता तो उसकी बातों में एक अविश्वसनीय मुम्बईया संस्कृति के फेकू किस्से भरे होते. उसका आचरण बेहद असमान हो गया था. वह हर परिचित को दुत्कारने लगा. उसके दोस्त और कद्रदान जो उसके भीतर के हाल को समझते थे वे उसके मुंह पर चुप ही रहते लेकिन उसके जाने के बाद बेहद अफ़सोस करते कि इतना ज़हीन आदमी और कैसा हाल हो गया है. अमित के लिए इस सघन अवसाद में कोई दवा काम न आई. हम सब ने उससे लगभग मुंह फेर लिया था. मैं उसे आकाशवाणी आने को कहता. वह कहता कि मैं आ रहा हूँ लेकिन आता नहीं था. मैं उसे कहता कि तुम आने का हाँ भरने के बाद आने की हिम्मत जुटाने के लिए पीने लगते हो फिर जब पी लेते हो तो सारी दुनिया जाये भाड़ में. वह कहता ऐसा नहीं है. मैं बेहद परेशान हूँ. मेरे अंदर हिम्मत नहीं बची. मैं चल नहीं पाता हूँ. अब कोई अगर आए मिलने तो उसके साथ बाइक पर बैठकर कहीं जा पाता हूँ.

अमित के पापा और हमारे आदरणीय खुशालाराम जी का निधन हो गया. उसके संसार से वह आदमी चला गया जिस आदमी से उसे बेहद प्रेम था और बेहद शिकायतें. तीनों भाइयों के घर पिताजी ने एक ही जगह बनवा दिए. वे जानते थे कि एक दिन छोटे बच्चों पर कोई आफत गुज़री तो भाई के भाई काम आयेगा. पिताजी के जाने के बाद मैं उसके पास गया था. पहले त्यौहार पर संजय बाड़मेर आया तब हम दोनों उससे मिलने गए थे. अमित सर पर पगड़ी बांधे हुए बैठा था. वह दुबला हो चुका था. इतना कि हाथों कि हड्डियां बचीं थीं. सर पर रखी हुई पगड़ी उसे और अधिक दुबला बता रही थी. हम वहाँ बैठे रहे. उसके पास कुछ एक किताबें थी. वह मेहमानों के न आने पर उन किताबों में दुनिया को पढता होगा. मैंने कहा अमित देखो तुम्हारा क्या हाल हो गया है. पिताजी अस्सी साल के होकर गए. तुम अभी ही इस निराशाजनक हाल में हो. वह कुछ नहीं बोला. उसके सामने उसका दोस्त बैठा था, संजय. बचपन का दोस्त. वह संजय को देखता रहा. संजय ने उसे नसीहत दी, अर्ज की. जो और रिश्तेदार बैठे थे वे भी अमित के इस हाल पर खूब अफ़सोस में थे. मेरे पास मेरा कहानी संग्रह रहा होगा. मैंने उसे कहा कि ये लो. अगली बार संजय और तुम्हारी किताब आएगी. वह मुस्कुराया. उसने किताब के पन्ने पलटे. हमने चाय पी. वहाँ से लौटते हुए संजय मेरी बाइक के पीछे बैठे थे. हम दोनों अक्सर इसी तरह इस कस्बे में घूमते होते हैं, जब भी संजय का आना होता है. हमारी ये बाइक सवारी हमें खूब आनंद देती है. लेकिन अमित के पास से लौटते हुए हम दोनों बेहद उदास और चुप थे. हमारे अंदर उसके इस हाल के प्रति जिनती सहानुभूति थी उतना ही गुस्सा भी था. जिन तीन साल उसने ज़िन्दगी को संवारने की लड़ाई लड़ी थी. वे तीन साल कहीं दिख नहीं रहे थे. एक बियाबां उग रहा था. सपनों के दरख़्त तल्ख़ सच्चाई की कड़ी धूप तले झुलस चुके थे. 
 
मेरी दो किताबें अमित के पास थी. संजय की किताब और मेरी तीसरी किताब आ चुकी थी और विश्व पुस्तक मेला में मैं अपने कुछ चाहनेवालों से मिलने गया था. वहीँ संजय भी था. और ये तय था कि अगले बुक फेयर में अमित का कहानी संग्रह होगा. हम तीन दोस्त एक बार ज़रूर दिल्ली के प्रगति मैदान में कॉफी पीयेंगे. नेरुदा की कविताओं का पाठ करेंगे. हरीश भादानी का रोटी नाम सत् है गीत गुनगुनायेंगे. शाम को संजय पानी पिएगा, मैं और अमित आला दर्ज़े शराब पीयेंगे और मुगलों की रौंदी हुई सड़कों, मीर कासिम की गली और खालसाओं की कुर्बानियों के अद्वितीय इतिहास की स्मृतियाँ चुनते हुए जियेंगे. अंग्रेजों की जेल तोड़ कर बंदी बनाये गए शेखावटी के राजपूत लड़ाकों को छुड़ा कर लाने वाले वीर योद्धा लोट्या जाट और करण्या मीणा को सलाम बजायेंगे. हम ये करेंगे वो वो करेंगे.

मार्च दो हज़ार चौदह की दस तारीख को गुर्दे नाकाम हो जाने से अमित की ज़िंदगी अशेष हो गई. दीये के बुझने का बहाना कुछ भी हो सकता है.

वो कुछ नहीं था. मैं कुछ नहीं हूँ. हम सब कुछ नहीं हैं. ये दुनिया फ़ानी है. ये फ़ानी होना ही ज़िंदगी होना है. ये ज़िंदगी एक तमाशा है. ये तमाशा एक धोखा है. ये धोखा एक भ्रम है. ये भ्रम एक अचेतन का देखा हुआ दृश्य है. इस दृश्य में, इस इल्यूजन में मगर मेरी आँख से ये जो आंसू अभी टपक पड़ा है, ये क्या है?
* * *

ये अमित उर्फ भीखाराम जांगिड़ की जीवनी का हिस्सा नहीं है. ये उतना ही सत्य है जितना मैं उसे जान सका. जितना मैंने उसको जीया था. इसमें लिखा हुआ अमित इकलौते आदमी का देखा हुआ अमित है. इसमें लिखी हुई किसी बात से अमित के किसी सम्बन्धी को कोई ठेस पहुंची हो तो मैं उससे विनय सहित क्षमा याचना करता हूँ.

April 15, 2014

इस दुनिया का अकेला नागरिक

क़स्बा अरावली से बिछुड़े हुए छोटे से टुकड़े की गोद में बसा हुआ था. सर्द हवाओं से ओट लेता हुआ और गरम हवाओं की आमद के इंतज़ार में. ढाणी बाज़ार से लेकर फकीरों के कुएं तक. इस सीधी रेखा के नीचे निम्नतर जाति के लोगों के लिए एक छोटी सी बसावट थी. कस्बे से बाहर और उपेक्षित. कालांतर में वह बसावट कस्बे के ह्रदय में आ गई. ऊपर गढ़ मंदिर था. उसके नीचे इस सूखे रेगिस्तान के इकलौते रावल का पहाड़ी के अधबीच बना मकान था. हम मंदिर जाते तब उस मकान के भीतर देखना चाहते थे कि वहाँ कौन रहता है. लेकिन सीमेंट के फर्श वाले, सामान्य दीवारों वाले उस घर का सम्मोहन बस इतना भर था कि वह शहर से ऊपर और पहाड़ी के ठीक अधबीच में बना हुआ था. इसी पहाड़ी पर इस घर के नीचे कुछ फासले पर कुछ और घर थे. वे छोटे सरदारों के लिए होते होंगे. पहाड़ी की उपत्यका में जोशियों और जैनियों के बास थे. इन्हीं के पास प्रसिद्द नरगासर के चारों और बसे हुए खत्री थे. ये अपने आपको ब्रह्म क्षत्रीय मानते हैं. स्कूलों में होने वाली लड़ाइयों में कई बार कुछ बदमाश खत्री लड़के ये साबित करने कि कोशिश करते थे कि वे ब्रह्म ही सही मगर क्षत्रीय हैं. लेकिन क्षत्रीय होना ही कष्टप्रद ही था. स्कूल में साथियों से पिटते, घर जाकर सख्त पिताओं से मार खाते और माएं गालियाँ देती हुई इस तरह सेक करती कि कोई भी सेक नहीं करवाना चाहता. हादसे सब गुज़र ही जाते हैं. मार खाने के निशान और मन पर आई चोटें भी भुला दी जाती हैं. कुछ दिनों बाद स्कूल और कॉलेज में ऐसे क्षत्रियों का पुनरागमन शुरू हो जाता.

जोशियों के बास के पास ही मोचियों का बास था. मोचियों की गलियां पेरिस की कल्चर की लघु प्रतिनिधि थी. वेशभूषा और रंग रूप में नयेपन की हिमायती. वे कई मायनों में ईसाईयों जैसा आचरण भी करते थे. अर्थात कल की चिंता न करना. आज कमाना और आज ही पी जाना. पीने की चिंता ही सबसे कड़ी चिंता हुआ करती थी. रोटी के बारे में वे बहुत धार्मिक थे. उनका मानना था कि जिसने चोंच दी है वह चुग्गा भी देगा. चुग्गा मिल जाता था मगर जिसने प्यास दी वह दारू की जगह सिर्फ नमकीन पानी देता था. फकीरों और जोशियों के कुएं का फीका नमकीन और भारी पानी. इसलिए बुद्धिमान लोग शराब की तलाश करते थे बुद्धिहीन इन्हीं कुँओं का पानी पीकर जीवन नष्ट कर रहे थे. जोशियों के कुंए के दायीं तरफ उपरला और निचला जोशी वास थे. इन दोनों ही जगहों पर बारी बारी से हमारे प्रिय कवि, अनुवादक, प्राध्यापक, प्रोफ़ेसर, सख्त किन्तु उपयोगी भाषण करने वाले आई जी रहते थे. आई जी मतलब डॉ आईदान सिंह भाटी. आप जैसलमेर के नोख गाँव के रहने वाले थे मगर हर कोई उनको बाड़मेर का ही जानता था. लिटरेचर की खुजली से ग्रस्त विवेकशील समूह कस्बे में गोष्ठियां किया करता था. उन गोष्ठियों में आईजी और प्रेम प्रकाश व्यास के सिवा बाकी सब लगभग ढाई ढूश ही थे. गोष्ठियों में हमारे गुरुजन, तहसीलदार, उपखंड अधिकारी, बाबू, चपरासी और यहाँ तक कि कुशल कारोबारी और दलाल क्रेता विक्रेता अपनी रचनाओं का पाठ करते थे. उन बैठकों में अमित भी कभी कभी जाया करता था. होम्योपैथी अस्पताल की छत से लेकर गायत्री मंदिर के ओसारे तक में और फिर पेंशनर सभा भवन में आयोजित होने वाली इन ऐतिहासिक साहित्यिक बैठकों में अमित की इक्का दुक्का रचनाएँ पल्लवित हुई थी. मैं साहित्य का विद्यार्थी था मगर मेरी प्रतिभा ऐसी न थी जो मुझे उन गोष्ठियों में खींच ले जाती.

अमित, आई जी से मिलने जाता था. संजय भी जाता था. मैं भी जाता था. कस्बे में आया हुआ मुसाफ़िर हो या कस्बे का वासी सब अपना वक्त चुरा कर आई जी के पास होकर आते थे. अमित जब मिड लाइफ क्राइसिस में घिरा तो खूब टूटने लगा था. वह किसी आशा में आईजी के पास हो आता था. उसकी असल जो दिक्कत थी वह अभिमन्यु के लिए रचा गया चक्रव्यूह था जिसके भीतर से लौटने के बारे में उसे कुछ मालूम न था. जैसा कि होता है बड़े होने पर सब भाई अलग घर बसा लेते हैं वैसा ही उसके साथ भी हुआ. उसको शिकायत थी कि पिताजी और भाइयों ने उसे बोम्बे के रंगीन जीवन से खींच कर यहाँ रेगिस्तान में ला पटका था. इसके बाद उन्होंने दबाव बनाया कि सब भाई अलग रहेंगे. कोई किसी पर आश्रित नहीं. यही इस दुनिया की रीत भी है. वह जब ऐसी शिकायतें मुझसे करता तो धोखा शब्द का प्रयोग करता था. मैंने कहा अमित तुम दिन भर शराब पीये हुए, अफीम खाए हुए और सिगरेट लिए फिरते हो तो कोई भी परिवार यही करेगा कि वह ऐसे सदस्य पर जिम्मेदारियां डाले ताकि वह अपनी इन आदतों से बाज़ आए. वह इस बात पर उखड़ जाता था. उसको लगता कि ज़मीन जायदाद के सारे फैसले पिताजी छोटे भाई के कहने से लेते हैं. मैं कहता कि किसी शराबी संतान से किसी सुल्तान ने कोई मशविरा नहीं लिया. या तो तुम शराबी ही रहो या इसे छोड़ कर राज्य की चिंता करो. वह कहता मैं भिखारी, मेरे पिताजी ने भीख में देवताओं से मुझे माँगा और मेरा नाम रखा भीखराम, मेरा कहाँ का राज्य और कैसी प्रजा. तुम मेरे दोस्त हो मेरे पास यही सल्तनत है.

इस हाल में वह कवितायेँ लिखता था. उसने अपने भाई के लिए कविता लिखी.

मुझमें बहुत कुछ तेरे जैसा है
तुझमें बहुत कुछ मेरे जैसा है

हम दोनों में बहुत कुछ एक जैसा है
एक कोख से हमने जन्म लिया है
एक ही आदमी का लहूँ तेरी रगों में भी है
मेरी रगों में भी है
मेरे भाई फिर भी तूँ मुझे पराया सा लगता है
और मैं तुझे अपना सा नहीं लगता
तेरा दुश्मन मुझे आज भी
अपना दुश्मन लगता है
तुझे मेरा दुश्मन
अपना दोस्त सा क्यों लगता है?

मेरे भाई मैं जानता हूँ
कि भाई भाई के दरम्यान जो दीवार है
उसकी पहली ईंट
न तूने रखी है
न मैंने रखी है
जिसने रखी है
वह तेरा भी कोई नहीं
वह मेरा भी कोई नहीं

क्योंकि ऐसा आदमी किसी का कुछ नहीं होता है.

इन दिनों ये तय हो गया था कि उसकी जिजीविषा जा रही है. उसने कुछ पत्र लिखे. उनमें लिखा कि मैं मानसिक उपचार चाहता हूँ. मैं ठीक होने की कोशिश में हूँ मगर मेरे गुर्दे खराब हो चुके हैं. मैं खूब तनहा हो गया हूँ. मेरा बारह लोगों का भरा पूरा घर था, वह बिखर गया है. अब मेरे बच्चे और मेरी पत्नी रह गई है. संभव है मैं जल्द ही मर जाऊँगा और मेरे मर जाने के बाद मेरी बीवी को चपरासी की नौकरी करनी पड़ेगी. उसके इन पत्रों में अवसाद चरम पर था. वह हर सातवें दिन फोन नंबर बदलता था. हर बार मेरे पास नये नंबर से फोन आता और वह बोलता- “किशोर दा, संजय के नंबर दो” वह नंबर लेकर कभी कभी संजय को फोन करता था. कहता कि मैं जोधपुर आ रहा हूँ. मुझे चिकित्सक का परामर्श चाहिए. वह दो बार गया. संजय ने उसे किसी चिकित्सक को दिखाया. वह दवा लेकर लौटा. मैंने कहा कि ये कैसी दवाएं हैं. वह कहता- लीवर गुर्दे सब फ़ैल सिर्फ तुम्हारा दोस्त पास. मैं कहता कि दिमाग का इलाज करने गए थे या पेट का. वह हँसता- गोली बड़ा कमीना शब्द है. एक ये गोली है जो मुझे डॉक्टर ने दी, एक वो गोली होती है जो बन्दूक से निकलती है, एक वो जिसकी ज़िंदगी किसी की गुलामी में बीत जाती है. मैं इस गुलामी को ठोकर मारता हूँ. इसके पन्द्रह दिन बाद फोन आया. दवा काम कर रही है. तुम्हारी दुआ चाहिए. मैंने कहा आ जाओ अभी झाड़ा डाल देता हूँ. उसने पूछा- हवन सामग्री लेकर आऊँ? मैंने कहा तुम आला बीमार हो खुद चले आओगे ये काफी होगा. 

हम एक बबूल के नीचे बैठे थे. शाम ढल चुकी थी. स्याही रेत पर उतर रही थी. पत्थर की एक पट्टी पर आमने सामने बैठे हुए एक दूजे को देख रहे थे. हमारे प्लास्टिक के प्यालों को शराब ने अपने भार से थाम रखा था. सिगरेट के धुएं की तलबगार हवा भी थी जो उसे अपने साथ उड़ा ले जा रही थी. उसने कहा- तुम अपनी प्रेम कहानी सुनाओ. मैंने कहा मुझसे कौन प्रेम करेगा पागल. उसने कहा मैं करता हूँ. मैंने कहा- तो फिर मेरा एक काम करो. ये शराब दिन में पीना बंद कर दो. उसने नई सिगरेट जलाई. उसने कहा- तुम मेरे हीरो हो. काश मैं तुम पर कोई फ़िल्म बना सकता. उसकी बातों के टूटे फूटे सिरों के बीच रेत उड़ रही थी. हम दोनों सारे जहाँ से दूर एक विदेशी बबूल की छाँव में बैठे विस्की पीते रहे. अचानक मैं संजीदा होकर आँखें भर बैठा. मैंने कहा तुम मर जाओगे. उसने कहा सबको मरना है. मैंने कहा- बच्चे? उसने कहा चलो चलते हैं शराब खत्म हो गई. इस तरह उसने बात को खत्म किया. इसके बाद हम दोनों मेरे मोहल्ले में अवैध शराब बेचने वालों तक आए. उसने एक आधी बोतल ली. कुछ ग्राम भुने हुए सींग दाने लिए. इस तरह हवन जारी रखने की सामग्री लेकर महावीर पार्क के पीछे बंद पड़ी खोखे वाली दुकानों के आगे बनाये हुए छपरे के नीचे बैठ गए. हमने और पी. रात के पौने बारह बजे पुलिस की पेट्रोलिंग जिप्सी आई. सड़क के किनारों पर पड़ती हुई रौशनी हम पर भी पड़ी. जिप्सी पर दायीं तरफ लगी लाईट में हमारे चहरे और प्लास्टिक के शराब भरे प्याले चमक रहे थे. 

जिप्सी की लाईट गश्त करने आगे चली गई. मैं और अमित उठ गए. अमित ने कहा ये पुलिस अच्छी है. सबसे खराब पुलिस होती है मोरल पुलिस.

सार्वजानिक स्थल पर हवन करते हुए हमने एक पूरी शाम को पवित्र मद से भर दिया था. मैंने कहा भाई सुनो जिस तरह बेल्ली होलीडे दो सिपाहियों की क़ैद में अफीम का इंतज़ार करते हुए मर गई वैसे मत मरना. उसने कहा- मैं इस दुनिया का अकेला नागरिक हूँ, मैं मर गया तो ये दुनिया भी मर जायेगी. वह लड़खड़ाया. मैंने उसका बरसों के बाद हाथ पकड़ा. हम दोनों एक दूजे को घर तक पहुँचाना चाहते थे. मेरा घर पास था. हम घर तक आए. मैंने अपनी बाइक ली और उसे कहा बैठो. दानजी की होदी के थोड़ा आगे. उसने कहा रुको. उसका घर आ गया था. उसके पिताजी उन सबको शराब पीकर गालियाँ देते थे जो उनके बेटे को शराब पिलाकर घर छोड़ने आता था. दोस्त के दिल को ठेस न लगे इसलिए उसने तय किया कि गली में वह अकेला ही जायेगा. मैंने कहा अच्छा मैं चलता हूँ. उसने कहा रुको. उसने जेब से वही अद्धा निकाला और उसमें पानी भर कर बोला. आधा पियो और आधा मेरे लिए बचाओ. मैंने कहा होलीवुड जिस शहर में बसा है वह शहर शराबियों अपराधियों और नालायकों की सबसे बड़ी जगह है. अगली बार इस रेत की जगह उसी शहर की अँधेरी गलियों में पैदा होना. दुआ कर कि कोई अमेरिकी अपने ईश्वर से तुझे भीख में मांग ले.

इतनी सुन्दर शाम के बाद भी मैं उदास लौटा. मुझे जाने क्यों लग रहा था कि वह चला जायेगा और ये हमारी आखिरी दावत है. जाने दीजिए कुछ कवितायेँ इस तस्वीर में पढ़िए जो उसने अपने दोस्त संजय के लिए लिखी थी. मैं उसका दोस्त नहीं था उसका नायक था.

April 14, 2014

एक साबुत रुदन कितना होता है?

समयमापी की एक टिक के बीच का फासला कितना होता है?

बेआवाज़ हल्का स्याह, तेज़ उजला, धूसर मटमैला, सिंदूरी या उदित गुलाबी रंग का बढता हुआ कुछ, जो गुज़रता है बिना छुए. जिसके साथ खिलता है फूल और जिसकी जद में बिखरती है फूल की एक एक पंखुड़ी. एक साँस से दूसरी के बीच का फासला उससे अलग होता है जितना कि एक टिक के बीच का फासला होता है.

जो बनाता है उसका मिटाना कितना होता है?

मेरा मन कच्ची शराब का कारखाना है. तेज़ गंध वाली, तीखी और गले की नसों को चीरने की तरह चूमती हुई उतरती शराब बुनता है. ये शराब उदासी के सीले रूई पर तेज़ाब की तरह गिरती है. एक धुआँ सा उठता है. इस कोरे ख़याल में मन खो जाता है कि उदासी खत्म हो रही है. जल रहा है सब कुछ जो ठहरा हुआ और भारी था. जिसके बोझ तले सांस नहीं आती थी.

एक जादूगर के पास अपने दुखों के लिए कितना उपचार होता है?

मेरा मन एक जादूगर का थैला है. मैं उसमें से शराबी खरगोश निकालता हूँ. शराबी खरगोश के फर से बन जाती है एक नन्ही बुगची. उसमें रखा जा सकता है इस भुलावे को कि खरगोश ज़िंदा है. उसी में से निकालता हूँ एक भालू का नाखून. जंगल के सारे पेड़ खरोंच कर जो बच गया है मेरे मन पर लकीरें खींचने को. ऐसी लकीरें जैसी कि शल्क उतरी मछली की सुन्दर गुलाबी देह होती है. भालू का नाखून एक आखिरी लड़ाई का हौसला देता है. जैसे कि किसी दिन तय किया जा सके कि ये आखिरी प्रेम है.

एक तड़प, एक गहरी डूबी आह, एक साबुत रुदन कितना होता है?

इस सुबह देखो मेरी अद्वितीय मुस्कान जैसे किसी मुस्कुराते हुए बारहसिंगा की गर्दन काट ली हो उस तेज़ शातिर धार से कि वह भूल गया हो आखिरी बार कि तड़प के भाव चेहरे पर लाना. उसकी आँखें और मुस्कान, आगत दर्द को व्यक्त करने से पहले ही ठहर गई हो. अक्षुण और अजर स्थिति. एक सुन्दर दीवार पर अनश्वर सौंदर्य का प्रतीक.

मुस्कुराता है पदरज का सबसे छोटा कण. जिसे एक बूढ़े दोस्त ने प्यार से पहली बार पुकारा तो कहा था ओह केसी आई लव यू.

डरते हैं बंदूकों वाले