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Showing posts from June, 2014

बड़ी बात है...

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दो कप कहवा और एक रवा डोसा। जोधपुर की एमजीएच रोड वाला रेस्तरां जहाँ दोपहर को भी नीम अँधेरा बसा हुआ था। जयपुर के जीटी पर चायनीज़ बनाने वाला कोर्नर पापाराज़ी। इन दो लम्हों के भीतर समाए हुए शाद होने के बीस बरस। 
टॉय ट्रेन पर नन्हे बच्चे। आसमान की छतरी से गिरती कुछ बूँदें। आँग्ल भाषा के लफ़्ज़ों की सतरें नियोन रौशनी के अलहदा रंगों में। कारों की हेड लाइट्स जैसे नाट्यशाला के मंच पर किरदार को फोलो करती हुई रौशनी की लकीरें। दुनिया शाम के जादू के सम्मोहन में मंथर, ठहरी, रुकी हुई। 
हम दोनों गोल बेंच पर बैठे, एक लम्हे में समाये हुए बीस बरसों को देखते हुए।  * * *

सौदागरों के पास नुस्खे
असबाब दलालों के पास।
बिचोलियों के पास दवा
और दुआएं हकीमों के पास।
प्रेमियों के संग बेवफाई
और बदज़ुबानी दोस्तों के पास।

जबकि हर सही गलत
पड़ा हुआ है दूजे खानों में,
हम चलते रहे साथ। यही बड़ी बात है।
* * *

कोई नहीं पूछता
किसी से कुछ
समझदारी का दौर है।

बाज़ मचानों पर
चूहे बिलों में
कबूतर मैदान में
बिल्ली अटारी पर।

मगर ख़रगोश पड़ा है
बालकनी में शराब पिए हुए।

यही इकलौता दाग़ है
समझदारी के दौर पर।
* * *

मोनिटर लेजार्ड
उठाती है सर रे…

याद की पगडंडियाँ और सुख

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हवा हर कोने में रखती है ज़रा ज़रा सी रेत। रेत पढ़ती है रसोई की हांडियों को, ओरे में रखी किताबों को, पड़वे में खड़ी चारपाई को, हर आले को, आँगन के हर कोने को।
रेत कहीं जाती नहीं, बस आती रहती है। रेत सुख की तरह आकर उड़ जाने की जगह हर कोने में पसरी रेत से मिलकर चादर बुनती है मगर दुःख नहीं है रेत। ये बस इसकी एक आदत है दुखो की तरह आना और फिर ज़िद्दी होकर पसरते जाना।
रेत उड़ती है तो ये सुख हुई न।
एक घना सुख, गहरे समंदर, ऊँचे पहाड़ और असीम रेगिस्तान जैसा होता है। ऐसे विशाल, वृहद् और पैमाइश से बड़े सुख की पहचान भूलवश दुःख के रूप में की जाती है।
भूल फिर होती है कि सुख ऐसी चीज़ों को समझ बैठते जैसे दो पहाड़ों के बीच कहीं एक गीली नदी बहती हो, रेगिस्तान के बीच सात सौ हाथ गहरे कुएं में खारा पानी रहता हो और जैसे समंदर के बीच किसी टापू पर बची हो थोड़ी ज़मीन।
रेत, पत्थर और पानी जहाँ असीम है वह असल सुख है। नदी, गहरा खारा पानी और ज़रा सा ज़मीन का टुकड़ा सुख में दुःख का छलावा घोलता है। ये विलासिता रचता है। ऐसी विलासिता जो हमें भिगोती सुखाती है कुछ इस तरह कि रेगिस्तान प्यास से भरा उड़ता बिखरता रहता है, पहाड़ अपनी कौंध, तपन …