Skip to main content

जंगल गंध वाली व्हिस्की

काश शैतान को आता
अपनी माँ की संभावित मौत को कैश करना
ईमानदारी का ढोंग पीटते हमसफ़र को धोखा देना
दोस्त बनकर दोस्त चुराना।

तो वह भी प्यारा हो सकता था
जिसका करता हर कोई इंतज़ार।

शैतान को प्यारा होना पसन्द नहीं है इसलिए बस वो ऐसा नहीं है।
* * *

वो मेरा नहीं है इसका यकीं है मगर
उसकी चाहतों में मुकम्मल मैं भी हूँ।

इश्क़ मैं, तुम भी
कभी हो जाना गोरखनाथ का चेला
और भीख में माँगना सिर्फ मोहोब्बत।
* * *

और तुम्हे पता है इश्क़
कि जंगल की गंध वाली व्हिस्की
मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है।

जैसे तुम नहीं मिलते
वैसे वह भी नहीं मिलती।

क्या मैं रो सकता हूँ इस बात पर?
* * *

शैतान ने कहा है तुमसे
कि हो जाना
अमेरिका सा तानाशाह
या फिर
जन्नत की झूठी तकरीरें करना
स्वर्ग के नकली स्वप्न दिखाना।

कुछ भी करना
मगर मुझे बाँधकर रखना अपने पास।

कि तुम बिन शैतान तनहा है।
* * *

दीवारों पर टूटती अंगड़ाइयों के साये
बिस्तरों पर सलवटों के निशान
गले में पड़े स्कार्फ के नीचे धब्बे
और खुशबुएँ सीलेपन की।

शैतान सब जानता है
मगर एक मोहब्बत तुम्हारी जाने क्या चीज़ है?
* * *

फरेब और वफ़ा के बीच
सिर्फ मोहोब्बत भर का फासला था।

इश्क़ मैं, तुम इसी वजह से करीब हो।
* * *

मोहोब्बत में हर कोई चाहता है
इस तरह करीब होना कि भड़क कर बुझ जाये।

शैतान मगर सीली माचिस की तरह इंतज़ार करता है।
* * *

याद के रोज़नामचे से
आहिस्ता से उड़ जाती हैं
हरे नीले रंग की परियां।

समन्दर के किनारे
ख़ानाबदोशों के टेंट से झांकती हुई आँखें
ज़िन्दगी भर साथ चलती हैं।

शैतान मुस्कुराता है आँखें सोचकर।
* * *

शैतान तुम्हारे प्यार में
हो जाता है एक लकड़हारा
छांट देता है दिल के जंगल का घना अँधेरा।

तुम भी कभी दियासलाई हो जाओ।
* * *

आँखों से उगना
दिल में बुझ जाना।

आकाश भर रखना मोहोब्बत।

बस डूबती नब्ज़ को भूल जाना
कि आखिर वह एक शैतान है।

तुम्हारा शैतान, अविनाशी।
* * *

वाद्ययन्त्र के बहत्तर हिस्सों में
सुर अलहदा मगर रूह एक है।

शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका।
* * *

हम भूल जाते हैं
बहुत सी चीज़ें कहीं रखकर
फिर धीरे धीरे भूलते जाते हैं
कि कहाँ रख रहे हैं अपने दिन-रात।

बेख़याली में होना कोई अचम्भा तो नहीं
मगर तुम भूल गए अपनी याद मेरे पास।

कभी उसे लेने आओ,
शैतान तुमसे मिलने की आस में रहता।
* * *

इश्क़ मैं, वे जो संगमरमर की मूरतें थीं, वे जिनकी हैसियत शाहों से ऊँची थी, वे जो बर्फ की ठण्ड से सफ़ेद थे। उनके बारे में लिखा था और लिखना जाया न गया कि अतीत के आइने में अब वे सूरतें आसानी से पढ़ीं जा रही हैं। किसी हुनर, इल्म, शक्ल के कारण मोहोब्बत करना गुनाह है तो कहो, अब तुम्हारे बारे में भी न लिखूं कि तुमसे तो बहुत सी वजहें हैं लिखने की।

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…