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उम्मीद की केंचुलियाँ

रातों को कभी नीरवता और कभी आंधियों का शोर. एक के बाद एक हवा के झौंके. भूल से या जानबूझकर खुली खिड़कियों के पल्ले टकराते हुए. अचानक कोई शीशा चटककर खन्न की आवाज़ से बिखर जाता है. इस चटक से जन्मे एक उदास लम्हे को हवा की अगली लहर उड़ा ले जाती है. रात आहिस्ता सरकती है. हवा मिट्टी से भरे थपेड़े लिए हर शै से पूछती है- भाग चलोगे मेरे साथ? कि इस शहर में अब कुछ नहीं बचा.

करवटें टूट कर नहीं गिरती. काँटों या पत्थरों की तीखी धार से रगड़ कर सांप जैसे अपनी केंचुली उतारता है ठीक वैसे ही बिस्तर से बार-बार रगड़ कर करवटों को विदा कहना होता है.

तुम मर गए क्या?

नींद जब दोपहर बाद चटकती है तो लगता है, जिस बदन के शीशे में ज़िन्दगी का आसव भरा था वह खाली हो चुका है. खाली शीशा लुढ़क रहा है. लुढकता भी कहाँ है? बस एक करवट पड़े हुए लुढकने का ख्वाब देखता है.

असल में हम एक दूजे से नहीं बिछड़े, हम उम्मीद से बिछड़ गए हैं.

आओ उदासी से भरा कोई डूबा-डूबा गहरा लोकगीत गायें. ऐसा गीत जिसमें इंतजार की शाखों पर आस के फूल न हों.

कि पतझड़ आने पर पत्ते टूटते थे शाखों से
कि शाखों से पत्तों के टूटने पर पतझड़ आता था।

कुछ कहो जाना।
* * *

कि कुछ लिख भेजूं।
लेकिन कोई हरारत पसर जाती है।
टूटे बदन से बंधी अंगुलियां नाकाम पड़ी रहती है।
छोटी झपकियों में बेमुराद ख़्वाब बनकर बिखरते रहते हैं।

हर एक दिन असल में सरल रेखा नहीं है।
* * *

कितनी ही करवटें
घर में फाहों सी उड़ती हुई।
बालकनी से दीखता है एक रास्ता
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में जगा-जगा।
* * *

वक़्त 

सिर्फ बहती-उड़ती शै नहीं है।
वह एक ठहरी हुई बारिश भी है।
जहाँ शब्द और विन्यास गुम है।
सिर्फ एक भारीपन
कि आप देखते हैं गुज़र कर भी कुछ नहीं गुज़र रहा।

तुम कहाँ जा रहे हो?
ये पूछकर ठहर गयी आँख भी वक़्त ही है।

* * *

पोस्ट के साथ लगी ये तस्वीर प्यारे ब्लॉग कबाड़खाना से ली है.

वेलेरी हादीदा के शिल्प
समकालीन फ्रेंच पेंटर और वास्तुशिल्पी वेलेरी हादीदा अधिकतर कांसे और मिट्टी के माध्यमों पर काम करती हैं. आज उनकी कुछ अनूठी वास्तुशिल्पीय कृतियाँ देखिये जिन्हें ‘लिटल वूमेन’ सीरीज का नाम दिया गया गई. आलोचक इस सीरीज के बारे में कहते हैं: “यह एक काव्यात्मक भिड़ंत है जो हमें स्त्रियों द्वारा पार किये गए उन तमाम रास्तों की बाबत बताती है जो उन्होंने युवावस्था से प्रौढ़ होने तक पार किये होते हैं और उन तमाम संवेदनाओं और मूड्स की बाबत भी जो स्त्रियों की इन पीढ़ियों के जीवन का संबल हैं.”

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…